डॉ विनायक सेन की ७ महीनों से अधिक की गिरफ्तारी के विरोध में आवाज़

डॉ विनायक से की गिरफ्तारी के विरोध में आवाज़

डॉ विनायक सेन की गिरफ्तारी के विरोध में केवल भारत में बल्कि भार्तिये मूल के विदेशों में रहने वाले लोगों ने भी आवाज़ उठाई है
भारतीये प्रधान मंत्री डॉ मन मोहन सिंह, छत्तीसगढ़ के मुख्य मंत्री डॉ रमण सिंह, आदि को समर्थन करने वालों की बढती हुई सूची के साथ ज्ञापन जा रहे हैं कि डॉ सेन को बिना किसी शर्त के तुरंत रिहा किया जाये

एसोसिएशन फॉर इंडिया'एस देवेलोप्मेंट (Association for India's Development) के कार्यकर्ताओं ने गहरी चिंता व्यक्त की क्योकि सुप्रीम कोर्ट ने डॉ सेन की 'बेल' याचिका न मंजूर कर दी।

डॉ सेन १४ मई २००७ को छत्तीसगढ़ स्पेशल पब्लिक सिक्यूरिटी एक्ट २००६ के तहत गिरफ्तार हुए थे। यह छत्तीसगढ़ का एक खतरनाक और अमंविये कानून है जो प्रदेश सरकार को खुली छूट देता है कि किसी को भी नाक्साल्वादियों से सम्पर्क रखने के शक कि बुनियाद पर गिरफ्तार कर लिया जाये। डॉ सेन का कहना है कि उन्होंने प्रदेश सरकार की संस्तुति के बाद ही जेल में कैद नाक्साल्वादियों से सम्पर्क किया था। आज तक प्रदेश सरकार डॉ सेन के खिलाफ कोई ठोस सबूत नही जुटा पाई है।

हालांकि डॉ सेन नाक्सालवाद के नाम पर बिना सबूत ७ महीनों से गिरफ्तार है परन्तु प्रदेश में न्याय व्यवस्था बिगड़ती जा रही है। दंतेवाडा जेल कारागार में सुरक्षा व्यवस्था का टूटना, और बढ़ता हुआ हिंसा से जुदा मृत्यु-दर इस बात की पुष्टि करता है।

डॉ बिनायक सेन च्रिस्तियन मेडिकल कॉलेज से डाक्टरी पढ़ के छत्तीसगढ़ में जन-स्वास्थ्य पर सरह्निये कार्य कर रहे थे। डॉ सेन छत्तीसगढ़ के सामाजिक न्याय के लिए जन संगठन (प यू सी ल) के सचिव हैं। वें पिछले २५ सालों से समाज सेवा में सक्रिए भूमिका अदा कर रहे हैं, और दल्ली राज्घारा में खानों में काम करने वालों के लिए शहीद अस्पताल की स्थापना का श्रेय भी उनको जाता है।

देश-विदेश से लोगों की माँग है कि:

* डॉ सेन को बिना विलम्ब रिहा किया जाये और उनके विरोध में सारे मुक़दमे खारिज किये जाये* चात्तिस्गार्फ प्रदेश सरकार बिना विलम्ब प्रदेश में न्याय एवं शांति व्यवस्था स्थापित करने के लिए मुमकिन कदम उठाए और नक्सल एवं सलवा जुडूम की हिंसक गतिविदियों पर रोक लगे
* प्रदेश सरकार सलवा जुडूम को समर्थन देना बंद करे
* प्रदेश सरकार सब वर्गों के हित को ध्यान में रखे और ये भी ध्यान में रखे कि लोग नाक्सालवाद का समर्थन क्यो करते हैं?

इसके पहले भी ये प्रदेश एक समर्पित कार्यकर्ता शंकर गुहा नियोगी को खो चुका है महीनों से बिना कोई ठोस सबूत के डॉ सेन जेल में कैद हैं, ये बेहद चिंता का विषय हैये लोकतंत्र पर भी प्रश्न चिन्ह लगता है जहाँ गरीब और कम्जूर वर्गों के हित की बात करने वालों की आवाज़ प्रदेश दबाने की कोशिश करता है

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अस्पताल में टीबी होने पर मरीज ने डाक्टर को कोर्ट में घसीटा

अस्पताल में टीबी होने पर मरीज ने डाक्टर को कोर्ट में घसीटा

चंडीगढ़ में एक मरीज का गल ब्लाद्देर या पिट्ठी की थैली का आपरेशन हुआ। आपरेशन के बाद उस मरीज को टीबी ह गयी। मरीज ने कोर्ट में दावा किया कि डाक्टर या शल्य चिकित्सक या सर्जन की लापरवाही की वजह से उसको टीबी हुई। कोर्ट ने १ लाख का हर्जाना डाक्टर पर ठोक दिया।

स्वास्थ्य व्यवस्थाओं के भीतर संक्रामक रोगों के फैलने पर चिंतन पहले भी हुआ है पर ऐसा शायद पहली बार हुआ हो कि डाक्टर को कोर्ट में न केवल घसीटा गया बल्कि कोर्ट ने एक लाख का दवा भी डाक्टर पर ठोक दिया क्योकि अस्पताल में एक मरीज को संभवत टीबी संक्रमित हो गया।

ये निश्चित तौर पर नही कहा जा सकता कि टीबी अस्पताल में हुआ या कही और, पर सम्भावना नि:संदेह काफी है कि भारत के अस्पताल में मरीज को टीबी हो जाये।

भारत में दुनिया के / टीबी मरीज हैं, और स्वास्थ्य व्यवस्थाओं में संक्रमण के नियंत्रण पर समयोचित जोर नही है
अब विवाद का विषय ये नही है कि मरीज को टीबी कैसे हुई पर संभावनाओं पर अवश्य विचार किया जाना चाहिऐ जो मानिये कोर्ट ने किया:
डाक्टर या सर्जन पर संदेह लाजमी है कि आपरेशन के दौरान लापरवाही से टीबी हो गयी। ये लापरवाही किसी भी स्वास्थ्य कर्मी की हो सकती है पर सर्जन टीम का नेता होता है इसलिए इल्जाम उसपर लगाया गया।

संभवत ये भी सोचने का समय है कि:

* एक मरीज से मिल
ने वाले कितने रिश्तेदार तीमारदार आते हैं, अस्पताल को अक्सर पुलिस तक का सहारा लेना पड़ता है क्योकि भीड़ न्यांतरण में नही आती। अब शायद हम इस बात को गंभीरता से ले कि मरीज को देखने सिर्फ समय पर जाया जाये और उचित संकमरण नियंत्रण के निर्देश को सावधानी से सुना जाये।

* न केवल हमारे देश की पर विश्व में अस्पताल में संकमरण की रोक्धाम के सुझाव बहुत सीमित हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के टीबी विभाग के निदेशक का कहना है कि अस्पताल की खिड़की खोल दी जाये - इतना पर्याप्त है अस्पताल में टीबी संकमरण को नियंत्रित करने के लिए।

ये गंभीर बात इसलिए भी है क्योकि:
* अब दोस्तो क्या करें? यदि OPD या दिखाने आने वाले मरीजों को आपस में एक दुसरे से कोई संकमरण हो जाये तो कहा तक डाक्टर को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है?
* टीबी विशेशाग्य क्या करे यदि उनको दिखाने आने वाले मरीजों को आपस में संकमरण हो जाये? ये और गंभीर प्रशन है क्योकि भारत में और विश्व में ४१ राष्ट्रों से ऐसी टीबी रिपोर्ट की गयी है जिसका इलाज संभव है ही नही क्योकि सारी ट
ीबी की दवाएं ऐसी टीबी पर कारगार नही हैं।
* वह मरीज क्या करें जिनकी स्वयम की पर्तिरोधक छ्मता कम है, उदाहरण के तौर पर वह लोग जो एच.इ.व। के साथ जीवित हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि अस्पताल की खिड़की खोल दी जाएँ। क्या इतना करना पर्याप्त है?


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दिल्ली को टीबी मुक्त करना है तो विश्व टीबी मुक्त हो!

दिल्ली को टीबी मुक्त करना है तो विश्व टीबी मुक्त हो!

कोप टीबी मुक्त करने का नारा लगाया नगर प्रमुख सुश्री आरती मेहरा ने। आरती जी दिल्ली मुनिसिपल कॉर्पोरेशन का गुलाब बाघ में एक टीबी जागरूकता शिविर को संबोधित कर रही थीं।

आरती जी ने खेद जताया कि तमाम प्रयास के बावजूद दिल्ली में ४०,००० से अधिक टीबी से ग्रसित लोग हैं। दिल्ली में ६०० से अधिक DOTS केनरा है। दोट्स यानी कि चिकित्सीय निरीक्षण में टीबी की दवा लेना। दोट्स एक सीमित सफलता प्राप्त कार्यक्राम रहा है खासकर कि उस टीबी में जिसपर दवा असर करती है। यदि ये दवा समय से या उचित मात्रा में न ली जाएँ तो दृग रेसिस्तांस की स्थिति उत्पन हो जाती है और ये दवा बेअसर हो जाती है। ऐसी स्थिति में बहुत कम दवा बचती हैं जो संभवत असर्दायक हों, पर इलाज लंबा है, कठिन है, और मुश्किल भी। अक्सर ऐसी टीबी जानलेवा भी हो सकती है। इसीलिए यदि ऐसी टीबी हो जिसपर दोट्स कि दवा कारगार है तो दवा समय से और उचित मात्रा में लेने पर विशेष ध्यान देना चाहिऐ।

आरती जी का ये नारा कि दिल्ली को टीबी मुक्त बनाना है, मगर गले नही उतर रहा। क्योकि टीबी एक संक्रामक रो है, जिसका नियंत्रण मुमकिन है पर सरल नही। एक शहर को टीबी मुक्त नही बनाया जा सकता। दुनिया का एक भी देश नही है जो अपने आप को टीबी मुक्त कह सके। इसीलिए २००७ के विश्व टीबी दिवस - २४ मार्च - को यहीविचार था कि 'यदि टीबी कही पर भी है, तो टीबी हर जगह है' - TB anywhere is TB everywhere

परन्तु शायद आरती जी को य याद न रह हो कि ९ माह पेहे विश्व टीबी दिवस पर उन जैसे उच्च स्तारिये नेताओं ने इसी विचार पर भाषण दिए थे।

आरती जी को याद था तम्बाकू नियंत्रण का नारा - दिल्ली को २००९ तक धुआं रहित बनने का नारा - Smoke-Free Delhi। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ऐसे अभियान को समर्थन दिया है जो नगर को धुआं रहित बनने की योजना रखते है।

तम्बाकू नियंत्रण और टीबी नियंत्रण कार्यक्राम अलग अलग प्रकार के हैं। धुआं रहित नगर का नारा तो वास्तविक हो सकता है पर एक संक्रामक रोग मुक्त का नारा तब तक वास्तविक नही हो सकता जबतक उस संक्रमण को विश्व से मिटने की योजना सशक्त न हो।

हाल ही में विश्व बैंक की नयी रिपोर्ट - The Economic Benefit of Global Investments in Tuberculosis Control - यानी कि विश्व स्तर पर टीबी नियंत्रण में निवेश के आर्थिक लाभ को भी आरती जी और दिल्ली मीडिया भूल गयी। इसी महीने तो ये रिपोर्ट रेलेअसे हुई थी और लगभग सभी देशी विदेशी समाचार पत्रों में इस रिपोर्ट का जिक्र था। इस रिपोर्ट से साफ जाहिर है कि यदि भारत जैसे राज्य, जहाँ विश्व के १/३ टीबी रोगी है, ने 'ग्लोबल प्लान तो स्टॉप टीबी' - Global Plan to Stop TB - का समर्थन नही किया और इसमे निवेश नही किया तो टीबी कण्ट्रोल प्रभावकारी नही होगा और भारत को कही ज्यादा खर्चा करना पड़ेगा टीबी के विकराल चुनौती से निबटने के लिए।

दिल्ली को टीबी मुक्त बनाना है तो विश्व को टीबी मुक्त बनाना है। केवल एक घर, एक शहर, एक राज्य, एक देश, टीबी मुक्त अकेले नही हो सकता।

आरती जी ने दृग रेसिस्तंत टीबी से निबटने के लिए कोई ठोस योजना का जिक्र नही किया। ऐसा ही कुछ भारत के परिवार कल्याण और स्वास्थ्य मंत्री डाक्टर अम्बुमणि रामादोस ने भी किया था जब वी इसी महीने अखिल भारतीय टीबी संगोष्टि को संबोधित कर रहे थे। डाक्टर रामादोस ने भी दृग रेसिस्त्तंत टीबी से निबटने की कोई ठोस बात नही की थी और न ही ग्लोबल प्लान तो स्टॉप टीबी या विश्व बैंक की नयी रिपोर्ट का jikr किया। (पुरा समाचार यह पढे: recently)



टीबी मरीज जाल काट के अस्पताल से भागे

टीबी मरीज जाल काट के अस्पताल से भागे

साउथ अफ्रीका के अस्पताल से 23 टीबी मरीज दीवार का जाल काट के भागने को मजबूर हुए।

टीबी, खासकर की ऐसी टीबी या तपेदिक जिसपर आमटीबी की दवाएं बेअसर हो जाएँ बहुत खतरनाक होती हैइसको दृग-रेसिस्तंत टीबी या तपेदिक कहते है

.डी..टीबी ऐसी ही एक इस्थ्ती है जब आम 'दोट्स' कीटीबी पर असर करने वाली दवाएं बेअसर हो जाती हैंऐसेरोगियों के लिए अन्य दवाएं तो है पर इलाज लम्बा है, १००० गुना महंगा है और समस्या जटिल हैसामान्य टीबी का इलाज केवल मुमकिन है पर मुफ्त मेंउपलब्द है 'दोट्स' कार्यक्रम के तत्वाधान.डी..टीबी का इलाज कुछ विशेष केन्द्रों पर नि-शुल्कउपलब्ध हो रह है पर आसान कदापि नही है

एक्स.डी..टीबी सबसे खतरनाक इस्थ्ती है जिसमे इलाज संभव नही है क्योकि टीबी का कीटाणु परलगभग सब दवाएं बेअसर हो जाती हैंऐसी इस्थ्ती में औसतन रोगी १५-२० रोज़ जिंदा रहता है

अफ्रीका के अस्पताल में कैसी इस्थ्ती होगी आप अंदाजा लगाएं कि २३ मरीजों को अस्पताल कीदीवार का जाल काट के भागना पड़ामरीजों को इलाज करना मंजूर है पर अस्पताल का शोशंयुक्तऔर तिरस्कार से भरा माहौल मंजूर नही

हैरत होगी ये जान के कि अफ्रीका के कोर्ट ने आर्डर निकला है कि यदि मरीज वापस नही आये इलाजकरने के लिए तो घर-घर उनकी तलाश की जायेगीटीबी का रोगी होना जैसे कि कोई खतरनाकमुजरिम होना

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पलामू में ललित मेहता की हत्या

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पुरानी टीबी दवा ज्यादा कारगर है

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तम्बाकू उद्योग ने किया नशा छोडो अभियान

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सच्ची मुच्ची

सच्ची मुच्ची भारत में जन आन्दोलनों में संघर्षरत कार्यकार्तओं की कहानी है।

Food for thought – on World Food Day

Food for thought – on World Food Day

Shobha Shukla


The world observes October 16 as World Food Day. Once again another day of rhetorics to rue about the dismal food scenario (especially among the developing nations); to reiterate our noble intentions of formulating new plans to feed the starving masses by reeling out scary statistics that world wide 9 billion people are dying every year due to hunger and hunger related causes, of which more than 50% are children.

Hunger accounts for more deaths than war, tuberculosis and AIDS put together. Even amongst those who escape the killing spree of hunger a whopping 1 billion are undernourished, most of whom are again children and women. And yet an almost equal number are overweight. (It is ironic that 80% of world’s hungry children live in food surplus countries).

Both, the under fed and the overweight, are examples of malnutrition. This indeed is a public catastrophe where obesity poses as much a health hazard as under nourishment. Poverty arising out of under or no employment is the main cause of hunger related deaths whereas affluence is killing people in the form of diabetes, heart and other chronic diseases. ‘Round bellies’ (arising out of too much of eating) are as much a sign of ill health as ‘pot bellies’( arising out of too less to eat).

It seems that the entire society is sick in mind if not in body. In fact our thinking process has become so unhealthy that it is in immediate and dire need of ‘proper nutritional values’. Else why would rich companies falsely allure farmers to grow killer tobacco instead of life sustaining food crops?. This is one of the reasons for a steady decline in India’s grain production after the year 2000, resulting in more hunger related deaths.The land used for tobacco growing denies food denies food to about 20 million Indians apart from being responsible for another 9 lakh deaths per year from tobacco related diseases alone. Thus consumption of tobacco in any form contributes to a hungry and diseased society by reducing economic productivity and posing serious health hazards for the poor and rich alike.

Again, there is something definitely wrong when in the name of progress we are building huge dams which often not only threaten the environment but also expose the displaced people towards imminent poverty and hunger as a result of improper and long drawn out rehabilitation process. The likes of Medha Patekar are waging a relentless battle against this menace.

The creation of special economic zones by grabbing fertile land from poor farmers for the benefit of the super rich industrialists is just another symptom of our mentally sick government.Not only are the farmers paid a measly price, they are also deprived of their sole means of livelihood, pushing them deeper into the abyss of debt and poverty from which only death can rescue them.

If they are mentally sound then why are companies knowingly producing ‘Fun For You’ foods ( rather than ‘Good For You’ products) which are potentially unhealthy and then spending billions to run campaigns which are unscrupulously targeting the most vulnerable ( children )? Why are our super film and sports stars endorsing these false advertisements which is contributing towards making a whole generation of kids addicted to colas and junk/processed food, thus jeopardizing their health? By donating a small part of their earnings to some charity they cannot wipe their conscience clean of their grave sins.

It is imperative that all of us start eating just enough of the right type of nutritional food and rid ourselves of the illeffects of poverty and affluence alike. Hunger should not be traded with obesity and diseases of poverty should not be replaced by diseases of excess.

There is as much a crying need to teach about healthy diets and moderate lifestyles to school children as is to empower the rural masses with education and join them in their fight for fair wages and land/water rights. We need to wage a war on all those multinational companies, government policies, and people who are bartering the nation’s health for illgotten wealth and thereby supporting hunger in the garb of economic development.

At our own small level as individuals let us boycott all such harmful products like cola beverages, fatty and processed junk food, tobacco products and at the same time share our overstuffed refrigerators with those who have nothing to eat and also support all efforts aimed at empowering them towards poverty alleviation. Let there be enough good food for all. Amen.

Shobha Shukla

(The author teaches Physics at India’s noted Loreto Convent, and writes for media in India and abroad. She can be contacted at: shobha1shukla@yahoo.co.in)

Mounting public pressure against dams in Uttarakhand

Mounting public pressure
against dams in Uttarakhand
People of Uttarakhand state, are fasting since 9 October 2007 against the state government’s approval to building dams on Ganga and other rivers.

The native people of Uttarakhand who are to be affected from the dam constructions on rivers in the state, organized themselves and representatives of many people’s movements including journalists joined their agitation.

These dams have been sanctioned in Uttarakhand in the absence of comprehensive Environmental Impact Assessment (EIA) or Socially Impact Assessment (SIA). In India, though EIA came into existence around 1978-79, it was made mandatory only in 1994.

EIA seeks to ensure sustainable development through the evaluation of those impacts arising from a major activity (policy, plan, program, or project) that are likely to have significant environmental effects, like dams. Now the EIA has become a requirement in more than 100 countries (Canter 1996).

SIA is a methodology to review the social effects of infrastructure projects and other development interventions, like dams. It includes the processes of analysing, monitoring and managing the intended and unintended social consequences, both positive and negative, of planned interventions (policies, programs, plans, projects) and any social change processes invoked by those interventions. Its primary purpose is to bring about a more sustainable and equitable biophysical and human environment.

The fast began on 9 October 2007 at Devprayaga Sangam, on the banks of river Bhagiratha and Alaknanda, this is where the Kotli Bhel projects are being implemented. The Fast is lead by MATU Jan Sangathan with support from Ganga Rakshak Sangharsh Samiti and several other organizations and individuals.

‘Baandh Pariyavaran - Hum Aur Uttarakhand’ (Dams, environment, we and Uttarakhand) meeting took place on 10 October 2007 at Devprayaga Sangam, and was attended by noted individuals like Dr Giridhar Pundit, State Joint Secretary of CPI, JP Pundit, former Principal of Omkarananda College, Aacharya Shailendra Shastri of Devprayaga, Dr Prabhakar Joshi, senior Journalist from Dainik Jagaran and the Presidents of affected gram panchayats.

Dr. Giridhar Pandit strictly opposed these dams which will affect the environment as well as the local people. “Its all about a political game, people will not get any benefit from these dams” said JP Pundit. Dr Prabhakar Joshi raised a question of what kind of development will be there if the local people are unaware of the current circumstances.

Presidents and other members of affected gram panchayats raised vital concerns about the loss of livelihood of local people, displacement impact and also on the role of government in deciding compensation and managing rehabilitation. Gram panchayat members and people were outraged that how can they trust the government when they were not even consulted before giving a green signal to dam projects on state rivers!

MATU Jan Sangathan and Ganga Rakshak Sangharsh Samiti activists demand that the construction of dams in Uttarakhand should be immediately halted and proper comprehensive EIA and SIA be conducted. The affected people should be allowed to engage in dialogue and decision making involving the dams. The use of emergency clause of land acquisition Act should be stopped, demand the affected people. There is also a demand to explore other alternative energy sources including solar and wind energy systems.

For more information, please contact: MATU Jan Sangathan at: matuporg@gmail.com

Will Independent Commission increase judicial accountability?

Will Independent Commission

increase judicial accountability?



The recent case of Justice Sabharwal and the sentencing of four Mid Day journalists again brought to the fore the problem of the lack of accountability of the higher judiciary in the country.


"We have today, a judiciary with enormous powers, but virtually no accountability" said senior Supreme Court advocate Prashant Bhushan, on behalf of Campaign for Judicial Accountability and Reforms (CJAR) committee which is patronized by Justice VR Krishna Iyer, Justice PB Sawant, Justice H Suresh, Shri Shanti Bhushan, Shri Prabhash Joshi, and Arundhati Roy among others, in the invitation to the Seminar on this issue in New Delhi on 13 October 2007. The Seminar is being held at the Indian Society for International Law, Bhagwandas Road, opposite the Supreme Court of India, on Saturday, October 13, 2007, from 10 am to 5 pm.

With the failure of the impeachment system, no mechanism has been put in place for investigating and taking action against judicial misconduct. "The problem is compounded by the use of contempt power which is deterring even exposure of judicial misconduct" said Dr Sandeep Pandey, Magsaysay Awardee (2002) and National Convener of NAPM (National Alliance of People's Movements).

An Independent National Judicial Commission might be able to regulate the power of contempt of the Judiciary. CJAR is dedicated to build strong public opinion to force Parliament and the Government to bring the required amendments to the Constitution and the laws for an independent judicial commission.

The judiciary in the country today is not only the arbiter of disputes between citizens, between citizens and the State, between States and the Union, it also in purported exercise of powers to enforce fundamental rights, directs the governments to close down industries, commercial establishments, demolish jhuggis, remove hawkers and rickshaw pullers from the streets, prohibits strikes and bandhs etc. In short, it has come to be the most powerful institution of the State.

Every other institution of the State is accountable to the anti-corruption agencies, and to the judiciary which has the power of judicial review over every executive and legislative action. Moreover, the political executive is accountable to the legislature and the legislature is democratically accountable to the people-that at least is the theory of our constitutional scheme.

However, when it comes to the judiciary, we find that it is neither democratically accountable to the people, nor to any other institution. The only recourse against a judge committing judicial misconduct is impeachment, which has been found to be a totally impractical remedy. To initiate the impeachment process one needs the signatures of 100 Lok Sabha or 50 Rajya Sabha MPs. This one cannot secure unless two conditions are satisfied. First, one must have conclusive documentary evidence of very serious misconduct against a judge. And second, the evidence and the charges must have been publicized, such that it has assumed the proportions of a public scandal. Till that happens, there are few MPs who are willing to put their signatures on an impeachment motion. Most MPs or their parties have cases in court, and nobody wants to invite the wrath of the judiciary.

The media is unwilling to publicise the charges against judges (even when they have documentary evidence to back the charges) because of the fear of contempt of Court which constantly hangs as a sword over their necks.

Mid Day had carried a series of articles in May and June 2007 showing how Justice Sabharwal passed the orders of sealing commercial properties in residential areas in Delhi after his sons had got into partnerships with at least two of the leading shopping mall and commercial complex developers of Delhi. These orders stood to directly benefit his sons and their partners by pushing the sealed shops and offices to shopping malls and commercial complexes and thus driving up their prices.

Mid Day published much of the documentary evidence in support of this huge story exposing what appeared to be a scandalous conspiracy at the Apex of the judiciary.

Yet neither any other media organization, nor any judicial, executive nor legislative authority acted upon these news stories.

Thereafter, on 3 August 2007, CJAR released a detailed charge-sheet containing as many as 7 serious charges against Justice Sabharwal, each backed with documentary evidence. Tehelka and Karan Thapar carried major stories on it. The story however hit the headlines in the mainstream media only after the conviction of 4 Mid Day journalists by the Delhi High Court for contempt.

If someone has evidence of corruption by a judge, there is not much that can be done. It cannot be exposed because of the fear of contempt, in the absence of which, even impeachment is a non-starter. FIR cannot be registered against the judge under the prevention of Corruption Act, because of an embargo created by the Supreme Court in 1991 by means of a judgement where they held that no judge can be subjected to a criminal investigation without the prior written consent of the Chief Justice of India. In the 16 years since that judgement, not even a single FIR has been registered against a sitting judge. To top it all, the recent attempt by the judiciary to insulate themselves from the Right to Information Act, has made it further difficult.

The Mid Day journalists were convicted despite their offering to prove the truth of all their allegations. The High Court held that the truth of the allegations was irrelevant since they had brought the entire judiciary into disrepute.

All this underlines the need to do away with this jurisdiction of punishing for "scandalizing the court or lowering the authority of the court".

There is a compelling need to have a totally independent constitutional body called the National Judicial Commission which will have the power to investigate charges against judges and take action against them, feels CJAR.

For more information about CJAR, please contact:

Campaign for Judicial Accountability and Judicial Reforms
14, Tower 2, Supreme Enclave,
Mayur Vihar Phase-I
New Delhi- 110 091
Tel: 9811164068, 9958141703
Email: judicialreforms@gmail.com

Action demanded against attack on Catholic priest

Action demanded against

ATTACK ON CATHOLIC PRIEST

VARANASI: Representatives from Fathers and Sisters from Church Institutions of Varanasi and from a consortium of social activists in Varanasi called “Sajha Sanskriti Manch” met city’s District Magistrate and SSP demanding prompt action against those who attacked a 64 years Catholic Priest Father Dr Joseph Neetilal on the night of 29 September 2007.

Although police lodged the FIR and took possession of the motorcycle used by alleged attackers, still no action has been taken to-date to bring the alleged attackers to books.

Father Joseph hails originally from Kerala State, and is the Secretary of the secular registered society, ‘Lok Chetana Samiti Varanasi’. He has been working from his office near Chiraigaon Chauki in Varanasi since 1994. His main work consists in educating people in all issues connected with rural development especially in view of community building and communal harmony, making effective use of the Panchayati raj system as a means for the same.

At about 6.30 pm on 29 September, two unidentified people attacked him at his residence with ‘desi Katta’ (country-made pistol) and knife, demanding money. However Father Joseph didn’t yield and putting his life in danger, took the serious risk and with the help of his other two associates Father Emmanuel D’Cunha and Father Bins John to catch hold of one of the attackers. The local residents are witness to the entire episode. Eventually the alleged attacker escaped leaving behind his motorcycle (registration number UP65 B 2017) and also the ‘desi Katta’ and knife used by them to intimidate and injure Father Joseph.

Earlier Father Joseph and Sister Lily Mathew (also from Varanasi) had received threatening phone calls and had duly reported the matter (along with the phone numbers used for making those threatening calls) to Station Officer of police station in Sarnath, Varanasi.

Till-date, police has neither traced back these phone numbers nor the owner of the motorcycle used by the two alleged people who attacked Father Joseph.

UPDATE from VARANASI by Father Anand:

Dear Friends,

I am very glad to inform you that the campaign for booking the culprit behind the attack on Neeti Bhai (Fr.Neetilal IMS) has brought a positive result.

The criminal who attacked Neeti Bhai with gun and knife, has been arrested by the police today. Neet Bhai was called to identify him. The police has assured that they will within two days unsolve the conspiracy behind the incident. Let us wait and see. Thanks a lot for your cooperation. If you have not sent the appeal to the DGP, there is no need to send it.

Thanks a lot from Neeti Bhai and all of us here.

Anand IMS

Farmers march to fight hunger in UP

Farmers march to fight hunger in UP
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More than 4000 small and marginal farmers from all over Uttar Pradesh are taking part in a march which started on 7 October and culminate on 16 October on the occasion of World Food Day.

This march is being organized by the Small and Marginal Farmers Union as part of a ‘kisan hit adhikar yatra programme’ to highlight the woes of the small and marginal farmers.
Agriculture is main livelihood option of about 80% of India’s vast population while for U.P. the figure is 90%. A majority of these are small and marginal farmers. It is ironical that these ‘bread growers’ who work hard to feed millions never have enough to eat themselves and lead a life of abject poverty. During the last 15 years about 1.5 lakh farmers have committed suicide due to their miserable living conditions and the phenomenon continues unabated.
It is a telling commentary on our times that while India marches ahead as a rising global economy, its vast majority is still struggling to get two square meals a day.

Lack of feasible and /or misappropriate implementation of government policies have only added fuel to this fire burning in empty bellies. The so called developmental and farmer friendly projects of the MNCs also seem to be aimed at filling their own coffers rather than resolve the basic problems.

During the last 60 years, most of the government efforts in the field of agriculture have benefitted the small number of big farmers only. The abolition of the Zamindari system brought in its wake more exploitative groups in the garb of public servants and corporations.

In U.P. alone, more than 4 lakh land consolidation cases are pending in various courts. Even where courts have decided in favour of the small farmers, a majority of them have not been given possession of the land which is rightfully theirs.

Now in the name of global economic development the government, in collusion with multinational companies, is acquiring agricultural land at throw away prices to create ‘special economic zones’. This is totally destabilizing the already crumbling economy of the small farmer.

There have been mass protests ( Nandigram and Singrur, to mention the least), but these have been quelled ruthlessly. As a result of this ‘land grabbing’ by vested interests, there has been a massive exodus of these farmers to neighbouring cities, which in turn has created more problems for the city as well as the urban populace.

We are ready to grow less and borrow more, ready to make more destitutes to make a few more rich, ready to dazzle a few homes to snatch away even the embers of a dying fire from others.

“Globalization is indirectly leading our country towards dependency (not independency) and crores of marginal and small farmers are being deprived of their meagre livelihood” said Dr Shiraj A Wajih, a senior activist in Eastern UP working for Small and Marginal farmers since last 20 years now.

In view of the present grim scenario what is needed is a collective initiative of the small and marginal farmers for protection of their own interests and rights. New policies need to be formulated with their help which will uplift them economically and socially and at the same time not jeopardize the country’s progress.
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Amit Dwivedi
Special Correspondent, Citizen News Service
Email: amit.dwivedi.lko@gmail.com or ph: +91 9839412418
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Also published in:
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Assam Times (Assam, India): 10 October 2007
Central Chronicle (Madhya Pradesh, India): 10 October 2007
Scoop Independent News (New Zealand): 10 October 2007