डॉ विनायक सेन की ७ महीनों से अधिक की गिरफ्तारी के विरोध में आवाज़

डॉ विनायक से की गिरफ्तारी के विरोध में आवाज़

डॉ विनायक सेन की गिरफ्तारी के विरोध में केवल भारत में बल्कि भार्तिये मूल के विदेशों में रहने वाले लोगों ने भी आवाज़ उठाई है
भारतीये प्रधान मंत्री डॉ मन मोहन सिंह, छत्तीसगढ़ के मुख्य मंत्री डॉ रमण सिंह, आदि को समर्थन करने वालों की बढती हुई सूची के साथ ज्ञापन जा रहे हैं कि डॉ सेन को बिना किसी शर्त के तुरंत रिहा किया जाये

एसोसिएशन फॉर इंडिया'एस देवेलोप्मेंट (Association for India's Development) के कार्यकर्ताओं ने गहरी चिंता व्यक्त की क्योकि सुप्रीम कोर्ट ने डॉ सेन की 'बेल' याचिका न मंजूर कर दी।

डॉ सेन १४ मई २००७ को छत्तीसगढ़ स्पेशल पब्लिक सिक्यूरिटी एक्ट २००६ के तहत गिरफ्तार हुए थे। यह छत्तीसगढ़ का एक खतरनाक और अमंविये कानून है जो प्रदेश सरकार को खुली छूट देता है कि किसी को भी नाक्साल्वादियों से सम्पर्क रखने के शक कि बुनियाद पर गिरफ्तार कर लिया जाये। डॉ सेन का कहना है कि उन्होंने प्रदेश सरकार की संस्तुति के बाद ही जेल में कैद नाक्साल्वादियों से सम्पर्क किया था। आज तक प्रदेश सरकार डॉ सेन के खिलाफ कोई ठोस सबूत नही जुटा पाई है।

हालांकि डॉ सेन नाक्सालवाद के नाम पर बिना सबूत ७ महीनों से गिरफ्तार है परन्तु प्रदेश में न्याय व्यवस्था बिगड़ती जा रही है। दंतेवाडा जेल कारागार में सुरक्षा व्यवस्था का टूटना, और बढ़ता हुआ हिंसा से जुदा मृत्यु-दर इस बात की पुष्टि करता है।

डॉ बिनायक सेन च्रिस्तियन मेडिकल कॉलेज से डाक्टरी पढ़ के छत्तीसगढ़ में जन-स्वास्थ्य पर सरह्निये कार्य कर रहे थे। डॉ सेन छत्तीसगढ़ के सामाजिक न्याय के लिए जन संगठन (प यू सी ल) के सचिव हैं। वें पिछले २५ सालों से समाज सेवा में सक्रिए भूमिका अदा कर रहे हैं, और दल्ली राज्घारा में खानों में काम करने वालों के लिए शहीद अस्पताल की स्थापना का श्रेय भी उनको जाता है।

देश-विदेश से लोगों की माँग है कि:

* डॉ सेन को बिना विलम्ब रिहा किया जाये और उनके विरोध में सारे मुक़दमे खारिज किये जाये* चात्तिस्गार्फ प्रदेश सरकार बिना विलम्ब प्रदेश में न्याय एवं शांति व्यवस्था स्थापित करने के लिए मुमकिन कदम उठाए और नक्सल एवं सलवा जुडूम की हिंसक गतिविदियों पर रोक लगे
* प्रदेश सरकार सलवा जुडूम को समर्थन देना बंद करे
* प्रदेश सरकार सब वर्गों के हित को ध्यान में रखे और ये भी ध्यान में रखे कि लोग नाक्सालवाद का समर्थन क्यो करते हैं?

इसके पहले भी ये प्रदेश एक समर्पित कार्यकर्ता शंकर गुहा नियोगी को खो चुका है महीनों से बिना कोई ठोस सबूत के डॉ सेन जेल में कैद हैं, ये बेहद चिंता का विषय हैये लोकतंत्र पर भी प्रश्न चिन्ह लगता है जहाँ गरीब और कम्जूर वर्गों के हित की बात करने वालों की आवाज़ प्रदेश दबाने की कोशिश करता है

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अस्पताल में टीबी होने पर मरीज ने डाक्टर को कोर्ट में घसीटा

अस्पताल में टीबी होने पर मरीज ने डाक्टर को कोर्ट में घसीटा

चंडीगढ़ में एक मरीज का गल ब्लाद्देर या पिट्ठी की थैली का आपरेशन हुआ। आपरेशन के बाद उस मरीज को टीबी ह गयी। मरीज ने कोर्ट में दावा किया कि डाक्टर या शल्य चिकित्सक या सर्जन की लापरवाही की वजह से उसको टीबी हुई। कोर्ट ने १ लाख का हर्जाना डाक्टर पर ठोक दिया।

स्वास्थ्य व्यवस्थाओं के भीतर संक्रामक रोगों के फैलने पर चिंतन पहले भी हुआ है पर ऐसा शायद पहली बार हुआ हो कि डाक्टर को कोर्ट में न केवल घसीटा गया बल्कि कोर्ट ने एक लाख का दवा भी डाक्टर पर ठोक दिया क्योकि अस्पताल में एक मरीज को संभवत टीबी संक्रमित हो गया।

ये निश्चित तौर पर नही कहा जा सकता कि टीबी अस्पताल में हुआ या कही और, पर सम्भावना नि:संदेह काफी है कि भारत के अस्पताल में मरीज को टीबी हो जाये।

भारत में दुनिया के / टीबी मरीज हैं, और स्वास्थ्य व्यवस्थाओं में संक्रमण के नियंत्रण पर समयोचित जोर नही है
अब विवाद का विषय ये नही है कि मरीज को टीबी कैसे हुई पर संभावनाओं पर अवश्य विचार किया जाना चाहिऐ जो मानिये कोर्ट ने किया:
डाक्टर या सर्जन पर संदेह लाजमी है कि आपरेशन के दौरान लापरवाही से टीबी हो गयी। ये लापरवाही किसी भी स्वास्थ्य कर्मी की हो सकती है पर सर्जन टीम का नेता होता है इसलिए इल्जाम उसपर लगाया गया।

संभवत ये भी सोचने का समय है कि:

* एक मरीज से मिल
ने वाले कितने रिश्तेदार तीमारदार आते हैं, अस्पताल को अक्सर पुलिस तक का सहारा लेना पड़ता है क्योकि भीड़ न्यांतरण में नही आती। अब शायद हम इस बात को गंभीरता से ले कि मरीज को देखने सिर्फ समय पर जाया जाये और उचित संकमरण नियंत्रण के निर्देश को सावधानी से सुना जाये।

* न केवल हमारे देश की पर विश्व में अस्पताल में संकमरण की रोक्धाम के सुझाव बहुत सीमित हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के टीबी विभाग के निदेशक का कहना है कि अस्पताल की खिड़की खोल दी जाये - इतना पर्याप्त है अस्पताल में टीबी संकमरण को नियंत्रित करने के लिए।

ये गंभीर बात इसलिए भी है क्योकि:
* अब दोस्तो क्या करें? यदि OPD या दिखाने आने वाले मरीजों को आपस में एक दुसरे से कोई संकमरण हो जाये तो कहा तक डाक्टर को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है?
* टीबी विशेशाग्य क्या करे यदि उनको दिखाने आने वाले मरीजों को आपस में संकमरण हो जाये? ये और गंभीर प्रशन है क्योकि भारत में और विश्व में ४१ राष्ट्रों से ऐसी टीबी रिपोर्ट की गयी है जिसका इलाज संभव है ही नही क्योकि सारी ट
ीबी की दवाएं ऐसी टीबी पर कारगार नही हैं।
* वह मरीज क्या करें जिनकी स्वयम की पर्तिरोधक छ्मता कम है, उदाहरण के तौर पर वह लोग जो एच.इ.व। के साथ जीवित हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि अस्पताल की खिड़की खोल दी जाएँ। क्या इतना करना पर्याप्त है?


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दिल्ली को टीबी मुक्त करना है तो विश्व टीबी मुक्त हो!

दिल्ली को टीबी मुक्त करना है तो विश्व टीबी मुक्त हो!

कोप टीबी मुक्त करने का नारा लगाया नगर प्रमुख सुश्री आरती मेहरा ने। आरती जी दिल्ली मुनिसिपल कॉर्पोरेशन का गुलाब बाघ में एक टीबी जागरूकता शिविर को संबोधित कर रही थीं।

आरती जी ने खेद जताया कि तमाम प्रयास के बावजूद दिल्ली में ४०,००० से अधिक टीबी से ग्रसित लोग हैं। दिल्ली में ६०० से अधिक DOTS केनरा है। दोट्स यानी कि चिकित्सीय निरीक्षण में टीबी की दवा लेना। दोट्स एक सीमित सफलता प्राप्त कार्यक्राम रहा है खासकर कि उस टीबी में जिसपर दवा असर करती है। यदि ये दवा समय से या उचित मात्रा में न ली जाएँ तो दृग रेसिस्तांस की स्थिति उत्पन हो जाती है और ये दवा बेअसर हो जाती है। ऐसी स्थिति में बहुत कम दवा बचती हैं जो संभवत असर्दायक हों, पर इलाज लंबा है, कठिन है, और मुश्किल भी। अक्सर ऐसी टीबी जानलेवा भी हो सकती है। इसीलिए यदि ऐसी टीबी हो जिसपर दोट्स कि दवा कारगार है तो दवा समय से और उचित मात्रा में लेने पर विशेष ध्यान देना चाहिऐ।

आरती जी का ये नारा कि दिल्ली को टीबी मुक्त बनाना है, मगर गले नही उतर रहा। क्योकि टीबी एक संक्रामक रो है, जिसका नियंत्रण मुमकिन है पर सरल नही। एक शहर को टीबी मुक्त नही बनाया जा सकता। दुनिया का एक भी देश नही है जो अपने आप को टीबी मुक्त कह सके। इसीलिए २००७ के विश्व टीबी दिवस - २४ मार्च - को यहीविचार था कि 'यदि टीबी कही पर भी है, तो टीबी हर जगह है' - TB anywhere is TB everywhere

परन्तु शायद आरती जी को य याद न रह हो कि ९ माह पेहे विश्व टीबी दिवस पर उन जैसे उच्च स्तारिये नेताओं ने इसी विचार पर भाषण दिए थे।

आरती जी को याद था तम्बाकू नियंत्रण का नारा - दिल्ली को २००९ तक धुआं रहित बनने का नारा - Smoke-Free Delhi। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ऐसे अभियान को समर्थन दिया है जो नगर को धुआं रहित बनने की योजना रखते है।

तम्बाकू नियंत्रण और टीबी नियंत्रण कार्यक्राम अलग अलग प्रकार के हैं। धुआं रहित नगर का नारा तो वास्तविक हो सकता है पर एक संक्रामक रोग मुक्त का नारा तब तक वास्तविक नही हो सकता जबतक उस संक्रमण को विश्व से मिटने की योजना सशक्त न हो।

हाल ही में विश्व बैंक की नयी रिपोर्ट - The Economic Benefit of Global Investments in Tuberculosis Control - यानी कि विश्व स्तर पर टीबी नियंत्रण में निवेश के आर्थिक लाभ को भी आरती जी और दिल्ली मीडिया भूल गयी। इसी महीने तो ये रिपोर्ट रेलेअसे हुई थी और लगभग सभी देशी विदेशी समाचार पत्रों में इस रिपोर्ट का जिक्र था। इस रिपोर्ट से साफ जाहिर है कि यदि भारत जैसे राज्य, जहाँ विश्व के १/३ टीबी रोगी है, ने 'ग्लोबल प्लान तो स्टॉप टीबी' - Global Plan to Stop TB - का समर्थन नही किया और इसमे निवेश नही किया तो टीबी कण्ट्रोल प्रभावकारी नही होगा और भारत को कही ज्यादा खर्चा करना पड़ेगा टीबी के विकराल चुनौती से निबटने के लिए।

दिल्ली को टीबी मुक्त बनाना है तो विश्व को टीबी मुक्त बनाना है। केवल एक घर, एक शहर, एक राज्य, एक देश, टीबी मुक्त अकेले नही हो सकता।

आरती जी ने दृग रेसिस्तंत टीबी से निबटने के लिए कोई ठोस योजना का जिक्र नही किया। ऐसा ही कुछ भारत के परिवार कल्याण और स्वास्थ्य मंत्री डाक्टर अम्बुमणि रामादोस ने भी किया था जब वी इसी महीने अखिल भारतीय टीबी संगोष्टि को संबोधित कर रहे थे। डाक्टर रामादोस ने भी दृग रेसिस्त्तंत टीबी से निबटने की कोई ठोस बात नही की थी और न ही ग्लोबल प्लान तो स्टॉप टीबी या विश्व बैंक की नयी रिपोर्ट का jikr किया। (पुरा समाचार यह पढे: recently)



टीबी मरीज जाल काट के अस्पताल से भागे

टीबी मरीज जाल काट के अस्पताल से भागे

साउथ अफ्रीका के अस्पताल से 23 टीबी मरीज दीवार का जाल काट के भागने को मजबूर हुए।

टीबी, खासकर की ऐसी टीबी या तपेदिक जिसपर आमटीबी की दवाएं बेअसर हो जाएँ बहुत खतरनाक होती हैइसको दृग-रेसिस्तंत टीबी या तपेदिक कहते है

.डी..टीबी ऐसी ही एक इस्थ्ती है जब आम 'दोट्स' कीटीबी पर असर करने वाली दवाएं बेअसर हो जाती हैंऐसेरोगियों के लिए अन्य दवाएं तो है पर इलाज लम्बा है, १००० गुना महंगा है और समस्या जटिल हैसामान्य टीबी का इलाज केवल मुमकिन है पर मुफ्त मेंउपलब्द है 'दोट्स' कार्यक्रम के तत्वाधान.डी..टीबी का इलाज कुछ विशेष केन्द्रों पर नि-शुल्कउपलब्ध हो रह है पर आसान कदापि नही है

एक्स.डी..टीबी सबसे खतरनाक इस्थ्ती है जिसमे इलाज संभव नही है क्योकि टीबी का कीटाणु परलगभग सब दवाएं बेअसर हो जाती हैंऐसी इस्थ्ती में औसतन रोगी १५-२० रोज़ जिंदा रहता है

अफ्रीका के अस्पताल में कैसी इस्थ्ती होगी आप अंदाजा लगाएं कि २३ मरीजों को अस्पताल कीदीवार का जाल काट के भागना पड़ामरीजों को इलाज करना मंजूर है पर अस्पताल का शोशंयुक्तऔर तिरस्कार से भरा माहौल मंजूर नही

हैरत होगी ये जान के कि अफ्रीका के कोर्ट ने आर्डर निकला है कि यदि मरीज वापस नही आये इलाजकरने के लिए तो घर-घर उनकी तलाश की जायेगीटीबी का रोगी होना जैसे कि कोई खतरनाकमुजरिम होना

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पलामू में ललित मेहता की हत्या

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पुरानी टीबी दवा ज्यादा कारगर है

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तम्बाकू उद्योग ने किया नशा छोडो अभियान

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सच्ची मुच्ची

सच्ची मुच्ची भारत में जन आन्दोलनों में संघर्षरत कार्यकार्तओं की कहानी है।