छठे क्लास के बच्चों को तम्बाकू सेवन क्यो ‘कूल’ लगता है?

छठे क्लास के बच्चों को तम्बाकू सेवन क्यो ‘कूल’ लगता है?

तम्बाकू के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष विज्ञापनों के वजह से ही आज यह हालत है कि भारत में ११ साल के बच्चे तक तम्बाकू का सेवन कर रहे हैं! टैक्सस विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ़ पब्लिक हैल्थ के द्वारा भारत में किए शोध में ऐसे चौकाने वाले आकडे निकल के आए हैं.

यह शोध ‘Associations Between Tobacco Marketing and Use Among Urban Youth In India', अमेरिकन जर्नल ऑफ़ हैल्थ बेहविऔर् के मई/ जून २००८ के अंक में प्रकाशित हुआ है.

तम्बाकू के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष विज्ञापनों की वजह से ही शहरों में रहने वाले युवाओं में तम्बाकू सेवन बढ़ रहा है, यह इस शोध से प्रमाणित होता है.

इस शोध के अनुसार भारत में छठी क्लास में पढने वाले छात्रों में तम्बाकू सेवन सबसे अधिक पाया गया था. आठवीं क्लास के छात्रों की तुलना में छठी क्लास के छात्रों में तम्बाकू सेवन तीन गुणा अधिक पाया गया!

‘जैसे जैसे भारत अधिक विकसित होता जाएगा, युवाओं में तम्बाकू सेवन भी बढ़ता जाएगा” इस शोध के प्रमुख शोधकर्ता प्रोफेस्सर चेरय्ल पेरी का कहना है.

“छठी क्लास के छात्रों को तम्बाकू सेवन ‘कूल’ या बढ़िया लगता है, और आठवीं क्लास के छात्रों को छठी क्लास के छात्रों की तुलना में उतना ‘कूल’ इसलिए नही लगता क्योकि छठी क्लास के छात्र भारत में तेज़ी से होते हुए विकास के साथ जो नए विज्ञापन आदि के तरीके आ रहे हैं, उनसे अधिक रूबरू हैं”.

उदाहरण के तौर पर जो लोग १० साल पहले छठी क्लास में थे, उनको आज के छठी क्लास के छात्रों की तुलना में तम्बाकू सेवन बहुत कम ‘कूल’ लगेगा क्योकि १० साल पहले जो विज्ञापन आदि थे और आज जो हैं, उनमें बहुत अन्तर है.

“भारत में यह पहली study है जो तम्बाकू विज्ञापनों और युवाओं में तम्बाकू सेवन के बीच डोस-रेस्पोंस या सीधा स्पष्ट सम्बन्ध स्थापित करती है. इससे यह साफ जाहिर है कि उचित नीतियों की और युवाओं में तम्बाकू सेवन को कम करने के लिए प्रभावकारी कार्यक्रमों की आवश्यकता है” कहना है डॉ मेलिसा स्तिग्लेर का, जो इस शोध में प्रोफेस्सर चेरय्ल के साथ सह-लेखिका भी हैं.

३१ मई २००८ को विश्व तम्बाकू निषेध दिवस 'तम्बाकू-मुक्त युवा' के विचार पर ही केंद्रित है।

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