शिक्षा के मंदिर या धर्म के अखाडे ?

शिक्षा के मंदिर या धर्म के अखाड़े ?
शोभा शुक्ला

आजकल
हमारी राजनैतिक पार्टियों एवं धार्मिक संगठनों की एक आदत सी बन गयी है की साधारण से साधारणघटना पर भी धर्म का लेप चढा कर उसे साम्प्रदायिकता की आग में झोंक कर अपने अपने स्वार्थ की रोटियां सेंकी जाएँ. धर्म के नाम पर घृणा की भावनाओं को उत्तेजित करना जितना सरल है, धर्मांध हिंसा की आग को बुझानाउतना ही कठिन.

ऐसी हे एक घटना अभी हाल ही में जयपुर के १४२ साल पुराने, अति प्रतिष्ठित सेंत जेवियर स्कूल में घटित हुई. इस स्कूल की बारहवीं कक्षा के सात छात्रों को उनके प्रधानाचार्य फादर जोस जेकब ने अनुशासन एवं उद्दंडता केआरोप में निलंबित कर दिया. ये विद्यार्थी, गणेश चतुर्थी के अवसर पर, कक्षा में गणेश जी का पोस्टर लगा करउसकी तथा कथित पूजा कर रहे थे और पूरी कक्षा शोर मचा कर इस मनोरंजन का मज़ा लूट रही थी. यह तो एकप्रकार से उनके अपने ही धर्म का अपमान करने के समान था.पूजा जैसे पवित्र मांगलिक कार्य को उन विद्यार्थियोंने मौज मस्ती का रूप देकर गणपति जी का ही अपमान किया. और इसके लिए वे छात्र वास्तव में निंदा के पात्र थे. परन्तु भारतीय जनता युवा मोर्चा के कार्यकर्ताओं को तो ऐसे ही सुनहरे अवसरों की तलाश रहती है. उन्होंने फादरजोस पर हिन्दुओं की धार्मिक आस्था को ठेस लगाने का आरोप लगाया. स्कूल में तोड़ फोड़ करने का बहाना मिलगया इन विवेकहीन युवाओं को. युवा मोर्चा के अध्यक्ष ने तो प्रधानाचार्य की गिरफ्तारी तक की मांग कर डाली. स्कूल में अनुशासनहीनता फैलाने वाले विद्यार्थियों का समर्थन कर के भारतीय युवा मोर्चा के सदस्यों ने अपनी हीउश्रन्खालाता का परिचय दिया है.

यह तो सर्व विदित है कि हमारी अधिकांश शिक्षण संस्थाएं असामाजिक कार्यों और गुंडागर्दी का अड्डा बन चुकी हैं, जहाँ पढ़ाई लिखाई के अलावा और सब कुछ होता है. इसका एक बहुत बड़ा कारण है शिक्षा के क्षेत्र में राजनैतिकपार्टियों एवं धार्मिक संगठनों का अनुचित एवं अनावश्यक हस्तकक्षेप .

हम सभी समझदार नागरिकों का कर्तव्य है की युवाओं के चारित्रिक हास को रोकने का प्रयत्न करें कि उसे बढ़ावा दे. हम सभी मन, वचन कर्म से अपने बच्चों को अनुशासन का पाठ पढाएं तथा उनकी निरंकुशता पर प्रेम काअंकुश लगाते हुए उन्हें अपने गुरुजनों का आदर करना सिखाएं. उन्हें धर्म का वास्तविक अर्थ समझना होगा औरधर्म के नाम पर हो रही विचारहीन हिंसा के विरुद्ध आवाज़ उठानी होगी. हमारी तथा कथित धर्म निरपेक्ष राजनैतिक पार्टियों का कर्तव्य है कि वो युवा वर्ग को हिंसा के लिए उकसाने के बजाये उनका उचित मार्गदर्शन करें . स्कूल और कॉलेज मंदिर के समान पवित्र स्थल हैं और उनके प्रांगण में केवल शिक्षा का सम्मानीय कार्य ही होनाचाहिए कि गुंडागर्दी. उपरोक्त प्रकरण में, एक भुक्तभोगी छात्र के पिता ने अपरोक्ष रूप से यह माना कि छात्र नेग़लत काम तो किया, पर निलंबन सज़ा कुछ ज़्यादा ही सख्त थी.

भारतीय युवा मोर्चा के गुंडों के निंदनीय व्यव्हार को नज़र अंदाज़ करने का अर्थ होगा उन गिने चुने शिक्षकों के प्रतिविश्वासघात जो अपने विद्यार्थियों को एक सभ्य एवं संवेदनशील नागरिक बनाने में सतत प्रयत्नशील हैं. साम्प्रदायिकता की आग को बढ़ावा देने वालों का बहिष्कार करमा ही होगा चाहे वे किसी भी जाति या धर्म या पार्टी के हों

शोभा शुक्ला

(लेखिका, सिटिज़न न्यूज़ सर्विस की संपादिका हैं और लखनऊ के प्रसिद्ध लोरेटो कॉन्वेंट में अध्यापिका भी)

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