तपेदिक में तम्बाकू का सेवन जानलेवा

तपेदिक में तम्बाकू का सेवन जानलेवा

फ्रांस की राजधानी पेरिस में फेफडे के स्वास्थ्य को लेकर चल रही ३९ वीं अन्तरास्त्रिय सेमिनार के दौरान विसेसज्ञों द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में यह बात निकल कर आयी है की विश्व में फेफडे के रोग द्वारा होने वाली कुल मौतों में से ५० प्रतिशत लोगों की मौत तम्बाकू जनित बिमारियों की वजह से होती है। यही नहीं दुनिया में तपेदिक रोग से होने वाली प्रत्येक ५ में से १ व्यक्ती की मौत तम्बाकू के सेवन से होने वाली तपेदिक की बिमारियों से होती है। इस सम्बन्ध में तपेदिक रोग तथा फेफडे से सम्बंधित बिमारियों पर बने अन्तरास्त्रिय संगठन के कार्यकारी निदेशक डाक्टर नील्स बिल्लो का कहना है की “तपेदिक से होने वाली इन पॉँच मौतों में से १ को आसानी से रोका जा सकता है यदि लोग धूम्रपान का सेवन बंद कर दें तो।” तपेदिक रोग तथा फेफडे से सम्बंधित बिमारियों पर बने अन्तरास्त्रिय संगठन वैश्विक स्तर पर तम्बाकू विरोधी तथा जन स्वास्थ्य से सम्बंधित विषयों पर काम कर रहा है। विश्व में कुल तम्बाकू का सेवन करने वाले लोगों में से ८० प्रतिशत लोग निम्न और मध्यम वर्गीय आय वाले देशों के लोग हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में करीब ५० लाख लोगों की मौत हर साल तम्बाकू जनित कारणों से होती है। यदि तम्बाकू का प्रयोग इसी तरह से चलता रहा तो आने वाले ५० सालों में मरने वालों लोगों की संख्या करीब ४२० मिलियन हो जायेगी। समस्त विश्व के दो तिहाई तपेदिक की बीमारी से ग्रषित लोग एशिया के तीन देशों में रहतें हैं, यह देश हैं भारत, इंडोनेशिया और चीन। अकेले भारत में ही तपेदिक और तम्बाकू से मरने वाले लोगों की संख्या करीब २८ लाख है।

सेमिनार के दौरान यह बात भी निकल कर आई की तम्बाकू का प्रयोग डाक्टरों तथा जन स्वास्थ्य रक्षकों में उन देशों में ज्यादा पाया गया है जहाँ पर तपेदिक के द्वारा ग्रषित लोगों की संख्या ज्यादा है। इन देशों के कुछ इलाकों में तो तम्बाकू का प्रयोग करने वाले डाक्टरों की संख्या ५० प्रतिशत से भी ज्यादा है। स्वास्थ्य सुधारकों द्वारा ही इस तरीके से तम्बाकू का प्रयोग करने से इन देशों में तम्बाकू नियंत्रण अभियान में और भी बाधाएं आ रही हैं। इसलिए यह आवश्यक है की सबसे पहले हम इन स्वास्थ्य सुधारकों को तम्बाकू छोड़ने में मदद करें जिससे की यह और तम्बाकू का प्रयोग कर रहे लोगों को छोड़ने में मदद कर सकें।

छत्रपती चिकित्सा विश्वविद्यालय में चल रही तम्बाकू नशा उन्मूलन केन्द्र के प्रमुख तथा विश्व स्वास्थ्य संगठन के अन्तरास्त्रिय तम्बाकू विरोधी पुरूस्कार से सम्मानित डाक्टर रमाकांत का कहना है की “ यह अत्यन्त आवश्यक है की तपेदिक रोग के साथ जीवन जी रहे लोगों के लिए तम्बाकू नशा उन्मूलन केन्द्र को और बढाया जाए इस तरह के केन्द्र प्रत्येक जनपद के जिला चिकित्सालय तथा जिले के प्रत्येक विकास खंडों पर हो।” हार्वर्ड विश्वविद्यालय की ओर से कराए गए एक अध्ययन में पाया गया है कि यदि चीन में धूम्रपान की आदत और जैव ईधन एवं कोयले की खपत की मौजूदा प्रवृत्ति जारी तो वर्ष २०३३ तक क्रोनिक प्रतिरोधी फेफडे के रोग (सीओपीडी) से करीब ६।५ करोड और फेफडे के कैंसर से अनुमानित १.८ करोड लोगों की मौत हो जाएगी। विज्ञान पत्रिका "साइंस डेली" ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि श्वास से संबंधित रोग चीन में होने वाली मौतों के १० प्रमुख कारणों में से हैं।

यह बड़े ही विरोधाभास का विषय है की तम्बाकू कम्पनियाँ तम्बाकू के जानलेवा स्वरुप को जानते हुए भी लोगों को आसानी से मौत का सामान बेच रहीं हैं। लेकिन दोष सिर्फ़ तम्बाकू कंपनियों को ही देना सही नहीं होगा इसमें गलती कहीं न कहीं हमारी भी है की हम आसानी से तम्बाकू कंपनियों के भ्रामक बहकावे में आकार उनके खतरनाक उत्पादों का सेवन शुरू कर देतें हैं और अपने बहुमूल्य जीवन को दांव पर लगा बैठतें हैं।

अमित द्विवेदी
लेखक सिटिज़न न्यूज़ सर्विस के विशेष संवाददाता हैं

मेरी ख़बर में प्रकाशित

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