कतरा-कतरा जिन्दगी


कतरा-कतरा जिन्दगी

हमारे पित्रसत्तात्मक भारतीय समाज में महिलाओं की दशा-दयनीय तो है ही, यही नहीं सदियों से चला आ रहा महिलाओं पर पुरुषों का शिकंजा आज भी कायम है। हमारे बीच ही बुनियादी इकाई परिवार का स्वरुप भी टूटते-टूटते सिमटता जा रहा है। इसके चलते पारिवारिक ढांचे में सबसे कमजोर महिलाओं को सबसे अधिक असुरक्षा और तनाव से होकर गुजरना पड़ रहा है, जो आज एक व्यापक समस्या का रूप धारण कर चुकी है। महिलाओं के साथ सामाजिक स्तर पर तो हिंसा होती ही है परन्तु घर के भीतर भी वह सबसे ज्यादा हिंसा का शिकार होती हैं।

आज एक महिला अपने ही घर में और अपनों के बीच सबसे ज्यादा असुरक्षित है। वर्तमान परिवेश में बाज़ार की हिमायत में सबसे आगे मीडिया ने, जिसे इस ज्वलंत विषय पर संवेदन्शीलता दिखानी चाहिए, भी महिलाओं को खरीद विक्री वाली वस्तु के रूप में समाज को परोशने में कोई कसर नहीं छोड़ी है इससे परिवारों में आंतरिक हिंसा बढ़ती जा रही है।

राष्ट्रिये स्वास्थ्य परिवार कल्याण सर्वेक्षण -३, वर्ष २००६-०७ के मुताबिक भारत में २७ फीसदी विवाहित महिलाएं पति की शारीरिक व यौन हिंसा की शिकार हैं। विवाहित हिंसा की यह घटना बिहार में सबसे ज्यादा ५९ प्रतिशत दर्ज की गई जबकि उत्तर प्रदेश में यह आंकडा ४२।४ प्रतिशत है। इस सर्वेक्षण के मुताबिक ५४ फीसदी महिलाओं ने पति द्वारा पत्नी की पिटायी को उचित बताया।

राष्ट्रिये अपराध शोध संस्थान की रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश में विभिन्न आपराधिक मामलों में वृद्धि होती जा रही है, वर्ष २००५ में अपहरण के २३०४ मामले बढ़कर २००७ में २९४७ हो गए। दहेज़ हत्या २००५ में १५८४ से बढ़कर २००७ में १८७७ हो गई। यह आंकडे बताते हैं की उत्तर प्रदेश कुल जनसँख्या के लिहाज से ही नहीं वरन महिलाओं के प्रति हिंसा के लिहाज से भी सबसे आगे है।

इस सम्बन्ध में उत्तर प्रदेश में महिला स्वास्थ्य और कन्या भ्रूण हत्या पर कार्यरत गैर सामाजिक संस्था, वात्सल्य की प्रमुख, डाक्टर नीलम सिंह का कहना है की ‘ महिलाओं के प्रति भेद-भाव जन्म लेने के पहले से ही शुरू हो जाता है और उनकी मृत्यु तक चलता है। गरीबी, अशिक्षा, कोई भी सामाजिक हिंसा इत्यादी की मार सबसे ज्यादा महिलाओं पर ही पड़ती है।’ उनका आगे कहना है की ‘प्रदेश में वात्सल्य द्वारा कराये गए सर्वेक्षण में यह परिणाम सामने निकलकर आया है की ५२ प्रतिशत औरतों ने माना की वे संयुक्त परिवार में ज्यादा हिंसा का शिकार होती हैं जबकी ११ प्रतिशत औरतों का कहना था की एकल परिवार में ज्यादा हिंसा होती है। ५३ प्रतिशत औरतों ने कहा की हिंसा ख़त्म करने की जिम्मेदारी पति की होनी चाहिए क्योंकि वही सबसे ज्यादा हिंसा करता है। ८१ प्रतिशत युवा महिलाएं कानून के जानकारी की आवश्यकता भी महसूस करती हैं घरेलु हिंसा को ख़त्म करने में।'

भारत ने अधिकतर अंतर्राष्ट्रीय प्रतिग्यांपत्रों पर लिंग समानता तथा महिला सशक्तिकरण पर अपनी प्रतिबधता हेतु हस्ताक्षर किए हैं किंतु इसके बावजूद भी महिलाओं पर हिंसा की किसी भी प्रकार से कोई कमी नहीं आई है। सिर्फ़ संवैधानिक अधिकार दे देने से ही महिलाओं के प्रति हिंसा को कम नहीं किया जा सकता है। महिलाएं अपने- आप को तभी स्वतंत्र महसूस करेंगी जब हमारा राज्य, राष्ट्र, हमारा समाज उनकी निजी महत्ता, छमता और प्रतिभा को समझे, उनकी इच्छाओं और सपनो को मान्यता दे और समाज में खुल कर संवाद करने का उन्हें भी मौका मिले।

पूनम द्विवेदी

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