क्यों हैं अब तक हाशिये पर महिलाएं?


क्यों हैं अब तक हाशिये पर महिलाएं?

वर्तमान समय में हर तरफ़ महिला-पुरूष बराबरी और महिलाओं के हक को लेकर चर्चा हो रही है। लेकिन इन चर्चाओं के बीच महिलाओं की वास्तविक स्थिति का खुलासा वे आंकडे करते हैं, जिनमें इनके प्रति दोहरे रवैये का कच्चा चिट्ठा खुलता है। अगर बात हमारे देश के सन्दर्भ में की जाए, तो निशिचित रूप से दिल दहला देने वाले हैं। आश्चर्य की बात यह है कि ऐसा उस देश में हो रहा है, जहाँ के शास्त्रों में स्त्री के बारे में लिखा गया है, जहाँ स्त्रियों की पूजा होती है, वहां देवताओं का निवास होता है। परन्तु यथास्थिति इसके ठीक विपरीत है।

आख़िर क्या वजहें हो सकती है कि जिस देश में देवियों की सबसे ज्यादा पूजा होती है, वहीँ उन पर सबसे ज्यादा अत्याचार भी होता है। महिलाओं के विरूद्व अपराधों में दिनोंदिन इजाफा होता जा रहा है। सामान्य महिलाओं से लेकर अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, शरणार्थी और संस्थानों में कार्यरत महिलाओं के प्रति हिंसा बदस्तूर जारी है।

दरअसल, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और धार्मिकp सभी स्तरों पर महिलाओं के प्रति भेदभाव का सिलसिला सदियों से चला आ रहा है, जो बालिकाओं के जन्म लेने के पहले से ही शुरू हो जाता है और मृत्युपर्यंत चलता रहता है। हमारे देश में महिला व् पुरूष का अनुपात १०००:९३२ है, इनमें ०-६ वर्ष की आयु का लिंगानुपात ९२७ है। ६० लाख बालिकाएं लापता हैं जिनके पीछे मादा भ्रूण हत्या व् शिशु हत्या जैसे कारण हैं। महिलाएं मुख्यत : सीमान्त समूहों में देखा जा रहा है कि वे असुरक्षित और अधिकार हीन हैं।

हमारे यहाँ लड़कियों के स्वास्थ्य और शिक्षा के प्रति दोहरे मापदंड का आलम यह है कि महिलाएं और छोटी बच्चियां गंभीर कुपोषण, विशेष रूप से एनीमिया की शिकार हैं, बालिकाओं की मृत्युदर भी अधिक है, प्रति १००००० बालिकाओं में से ४१० की मौत जन्म के समय हो जाती है। यौन संक्रमितp रोग की वजह से उन्हें असुरक्षा का सामना करना पड़ता है।

यह तो हुए स्वास्थ्य की बात, शिक्षा के क्षेत्र में भी उन्हें दोयम दर्जे पर रखा गया है। ७६ प्रतिशत पुरुषों की तुलना में केवल ५४ प्रतिशत महिलाएं ही शिक्षित हैं। हालाँकि, बालिकाओं के स्कूल में दाखिला लिए जाने पर जोर दिया जा रहा है लेकिन स्कूल छोड़ने वाली लड़कियों की दर अधिक है। जहाँ तक महिलाओं की आर्थिक भागीदारी का सवाल है अनौपचारिक क्षेत्र में महिलाएं हाशिये पर हैं और उनकी कार्य परिस्थिति बदतर है। कुल आता शक्ति में उनकी भागीदारी ३६ प्रतिशत है. ज्यादातर महिलाएं असुरक्षित कार्य क्षेत्रों में पाटा पाटा हुई हैं उन्हें निम्न ई आधारित कार्य में ही लगाया जाता है. साथ ही मेहनताना पूनम उनके पुरूष सहकर्मियों की अपेक्षा काफी कम दिया जाता है. यही नहीं, मासिक आय की वृद्धि में भी उनके साथ भेद-भाव किया जाता है और उनके मेहनताने में पुरूष साथियों की अपेक्षा कम वृद्धि होती है. भारत जैसे कृषि प्रधान देश में आधे से अधिक कृषि का श्रमिक दलित तथा महिलाएं हैं जबकि उन्हें इसका पूरा लाभ नहीं मिल पाता।

यह बिडम्बना ही है कि जिस देश की सत्ता पार्टी की प्रधान एक महिला है तथा लोकसभा जैसे लोकतंत्र की सबसे बड़ी संस्था की द्विवेदी भी एक महिला है, वहां स्त्रियों की स्थिति में सुधार लाने की लिए कोई ठोस पहल नहीं की जा रही है।

सामाजिक रूढिवादिता, महिलाओं के प्रति पूर्वाग्रह, गरीबी, अशिक्षा जैसे कारण महिलाओं की बेहतरी के मार्ग में प्रमुख रोडे हैं. जब तक राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक स्तर पर नीचे से ऊपर स्त्रियों की स्थिति में सुधार की दिशा में प्रयास नहीं होगा, तब-तक उन्हें मुख्यधारा में लाने का सुनहरा सपना सच नहीं हो पायेगा। इस सन्दर्भ में राजनैतिक इच्छा शक्ति की सख्त आवश्यकता है ताकि महिलाओं को दोयम दर्जे की नागरिकता से ऊपर उठाकर उन्हें पुरुषों के सामानांतर खड़ा किया जा सके।

इस पुनीत कार्य के लिए महिला संगठनो, संसद में महिला प्रतिनिधियों, गैर सरकारी संस्थाओं, विद्वानों तथा समाजसेवियों जैसे लोगों को विशेष रूप से आगे आना होगा। केन्द्र से दूर-दराज के इलाकों और ग्रामीण क्षेत्रों में बालिकाओं की शिक्षा और उन्हें रोजगारोन्मुख बनाने के लिए युद्घ स्तर पर प्रयास होने चाहिए, तभी वे आत्म निर्भर हो सकेंगी और उनके प्रति होने वाले भेदभाव और हिंसा पर विराम लग सकेगा।

पूनम द्विवेदी

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