स्कूली बच्चे बन रहें हैै मानसिक रोगी

स्कूली बच्चे बन रहें हैै मानसिक रोगी

मानसिक रोगी बच्चों की संख्या निरन्तर बढ़ रही है फिर भी अस्पतालों, प्राथमिक स्वास्थ्य कन्द्रों और क्लीनिकों में उनके देखरेख की समुचित व्यवस्था नहीं है। एक तरफ डाक्टरों की कमी है तो दूसरी तरफ अभिभावक व अध्यापकों का बच्चों पर तरह-तरह का दबाव बढ़ता जा रहा है।


यूनीसेफ और मीडिया नेस्ट के संयुक्त तत्वावधान में प्रेस क्लब में आज ‘‘चिल्ड्रिन आवर’’ के एक कार्यक्रम में मानसिक स्वास्थ्य पर बोलते हुए डाक्टर मंजू अग्रवाल ने कहा कि आज तीस प्रतिशत स्कूली बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के केयर की जरुरत है लेकिन बड़े दुख की बात है कि इसके लिए कोई कौंसिलिंग सेन्टर तक नहीं है जिसके कारण इस रोग के मरीजों की संख्या बढ़ रही है। आज अभिभावकों व अध्यापकों के दबाव, पढ़ाई का बोझ, अधिक से अधिक अंक लाने की होड और आलोचना के कारण बीस प्रतिशत स्कूली बच्चों के मन में एक हफ्ते में दो बार आत्महत्या करने का ख्याल आता है। उन्होंने कहा कि अभिभावकों व अध्यापकों का बच्चों पर दबाव लगातार बढ़ रहा है जिसका प्रभाव उनके मस्तिष्क पर पड़ता है और वे डिप्रेशन, आत्महत्या, मानसिक असंतुलन और पागलपन जैसे रोगों के शिकार हो जाते है।


इस अवसर पर डाक्टर आलोक बाजपेई ने कहा कि बच्चों की सफलता का अस्सी प्रतिशत उनके व्यक्तित्व पर निर्भर करता है और केवल बीस प्रतिशत अभिभावक और अध्यापकगण अपना योगदान देकर उनको आगे बढ़ते है। मानसिक स्वास्थ्य आज एक गम्भीर समस्या बन गयी है। यह एक व्याहारिक समस्या भी है। हम सब अभिभावकों व अध्यापकों को मिलकर इससे निपटना है। इससे निपटने का एक ही रास्ता है कि वर्तमान जनरेशन को सुधारा जाएं। हर अभिभावक अपने बच्चें को और हर अध्यापक अपने छात्रों को जाने पहचाने और उनको समझें। बच्चों को 6-7 साल की उम्र से ही फैसले लेने दीजिए और उनको आत्म निर्भर होने दीजिए लेकिन उनके कार्यो पर पैनी निगाह अवश्य रखिए ताकि वे कोई गलत निर्णय न ले सके। अभिभावक व अध्यापक बच्चों में एैसी सोच, भावना और काबलियत पैदा करे कि वे अपने लक्ष्य को प्राप्त करे अपने व्यक्तित्व को शीर्ष पर पहुंचा सकें। और साथ ही साथ दूसरे के बारे में भी सोचें और उनकी भी सहायता करें।


‘‘उत्तर प्रदेश को स्वस्थ्य और खुशाल बनाना है’’ यह विचार है बच्चों के लिए समर्पित यूनिसेफ के बाल विशेषज्ञ अगस्टीन वेलियथ के। आज ‘‘यूनिसेफ डे’’ के अवसर पर उन्होंने कहा कि माता-पिता अपने बच्चों को पैसा, शिक्षा, अनुशासन और अच्छे से अच्छे भोजन की व्यवस्था कर देते है लेकिन उनको प्यार, लगाव और अपनापन नहीं देते है जिससे वे मानसिक अस्वस्थ हो जाते है। आज जरुरत है मानसिक स्वास्थ्य के प्रति लोंगो को जागरुक करने की। मीडिया नेस्ट की महामंत्री कुलसुम तल्हा ने कार्यक्रम का संचालन किया।

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