सतत विकास लक्ष्य एवं मासिक धर्म स्वच्छता

विश्वपति वर्मा, सिटीजन न्यूज सर्विस - सीएनएस 
भारत को सतत विकास लक्ष्य 2030 पूरा करने के लिये आम जनता, विशेषकर महिलाओं, के प्रजनन स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है. इसकी एक महत्त्व पूर्ण कड़ी है मासिक धर्म स्वच्छता।  आज के परिवेश मे लड़कियों मे लगभग 12 वर्ष की आयु से माहवारी का सिलसिला शुरू  हो जाता है. माहवारी के दौरान सही जानकारी और उचित परामर्श ना मिलने से लड़कियों को अक्सर अनेक प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ता है.

भारत में वर्षों से मासिक धर्म से जुड़े चले आ रहे अंधविश्वासों और पुरानी प्रथाओं की वजह से इस प्राकृतिक प्रक्रिया को लेकर किशोरियों में शर्म और बेचैनी की भावना घर कर जाती है. अशिक्षा और उचित जानकारी के अभाव में माहवारी जैसे मुद्दों पर समाज आज भी खुले रूप से बातचीत करने में हिचकता है. हमारे समाज में जो पढे -लिखे शिक्षित लोग हैं वे भी माहवारी जैसी समस्यायों पर खुल कर बोलने से हिचकते हैं. यही कारण है कि आज माहवारी सम्बन्धी परेशानियां महामारी का रूप धारण कर रही है.

बस्ती के एक डॉक्टर विनोद कुमार शर्मा ने बताया कि माहवारी के समय साफ़ सफाई न रखने के कारण फंगस ,खुजली, सहित कई प्रकार की बीमारियाँ फैलती हैं जिसके  बारे में उनको सही जानकारी स्कूल की शिक्षिकाओं को देनी चाहिये। किशोरियों को भय और संकोच की भावना को त्याग कर अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहना चाहिये। डा शर्मा ने  स्पष्ट किया कि माहवारी के दौरान सेनेटरी नैपकिन अथवा साफ़ कपड़े का प्रयोग अवश्य करना चाहिए।

बस्ती जिले के अमरौली शुमाली गाँव की रहने वाली उर्मिला चौधरी ने बताया कि गाँव मे नियुक्त आशा बहुएं ऐसे मुद्दों पर जानकारी देती हैं, लेकिन लड़कियां ये सब सुन कर शर्मिन्दगी  महसूस करती हैं. और अगर यह जानकारी कोई पुरुष स्वास्थ्य कर्मी अवगत कराता है तो उसे बिल्कुल सुनना पसंद नही करतीं। अमरौली शुमाली मे बने मातृ शिशु स्वास्थ्य केंद्र पर तैनात महिला सहायक नर्स राधा देवी से बात चीत के दौरान उन्होने बताया कि अभी भी ग्रामीण क्षेत्रो मे अधिकांश युवतियां व महिलाये मासिक धर्म के दौरान पुराने कपडे का इस्तेमाल करती हैं जिससे उन्हें बीमारियों का दंश झेलना पड़ता है. राधा देवी ने बताया कि, "हम लोगों द्वारा मासिक धर्म मे उपयोग होने वाला पैड आशा बहू के माध्यम से नि:शुल्क उपलब्ध कराया जाता है लेकिन जागरुकता के अभाव मे  अधिकाँश किशोरियां पैड़ का इस्तेमाल करना जरूरी नही समझतीं।"

जागरूकता का ही अभाव है कि आज हमारे समाज में इस विषय पर बात करना तो दूर, मासिक धर्म के दिनों में लड़कियों के साथ अछूतों जैसा व्यवहार किया जाता है.  हम सबके सामूहिक प्रयास से ही किशोरियां माहवारी सम्बन्धी भ्रांतियों से मुक्त होकर उसके दौरान लिए जाने वाले उचित कदमों को समझ पाएंगीं। ऐसा तभी संभव है जब हम ऐसे मुद्दों पर जगह -जगह जन जागरूकता अभियान चलाकर किशोरियों  व महिलाओं को जागरूक करेंगे।

हर गाँव में नियुक्त की गई आशा बहुएं भी ऐसी समस्या से निजात दिलाने के लिये लड़कियों को जागरुक करने का काम करें तो हम उत्तर प्रदेश के सतत विकास लक्ष्य 2030 को 100%पूरा कर सकते हैं.  और इसके लिये प्रदेश स्तर पर इस मिशन को पूरा करने के लिये ब्लाक ‎लेवल पर सेनेटरी पैड बनाने की सस्ती मशीनें अथवा यूनिटें लगवाई जायें तथा स्थानीय स्तर पर महिलाओं को प्रशिक्षित कर उन्ही ‎के द्वारा सेनेटरी पैड का निर्माण करा कर सेनेटरी पैड़ का कम मूल्य में अथवा नि:शुल्क वितरण करा कर उन्हें आवश्यकता अनुसार उपलब्ध कराया जाये ताकि सभी किशोरियों के पास सेनेटरी पैड पहुँच सके और वे स्वस्थ नागरिक बनकर समाज को सतत विकास की दिशा मे ले जायें|

विश्वपति वर्मा, सिटीजन न्यूज सर्विस - सीएनएस 
७ मार्च, २०१६ 

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