क्या है सम्बन्ध? मधुमेह और लेटेंट टीबी, टीबी रोग, दवा प्रतिरोधक टीबी

[English] वैज्ञानिक शोध से यह तो प्रमाणित था कि मधुमेह होने से टीबी-रोग होने का ख़तरा 2-3 गुना बढ़ता है और मधुमेह नियंत्रण भी जटिल हो जाता है, पर "लेटेंट" (latent) टीबी और मधुमेह के बीच सम्बंध पर आबादी-आधारित शोध अभी तक नहीं हुआ था। 11-14 अक्टूबर 2017 को हुए अंतर्राष्ट्रीय अधिवेशन में, लेटेंट-टीबी और मधुमेह सम्बंधित सर्वप्रथम आबादी-आधारित शोध के नतीजे प्रस्तुत किये गए.

सरकार के एड्स-मुक्त भारत का वादा सराहनीय, पर कैसे होगा यह सपना साकार?

(बाएं से दायें) डॉ फ्रांको बी, डॉ ईश्वर गिलाडा,
डॉ शेरोन लेविन, डॉ नवल चन्द्र (एसीकॉन 2017)
[English] भारत समेत, 190 देशों से अधिक की सरकारों ने, 2030 तक एड्स-मुक्त होने का वादा तो किया है परन्तु वर्त्तमान के एड्स सम्बंधित आंकड़ों और विशेषज्ञों के शोध-अनुभव को देखें तो संभवत: अभी इस लक्ष्य के अनुरूप बहुत कार्य होना शेष है. डॉ ईश्वर गिलाडा, जो एड्स सोसाइटी ऑफ़ इंडिया (एएसआई) के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, और हैदराबाद में 6-8 अक्टूबर 2017 के दौरान संपन्न होने वाले एएसआई के 10वें राष्ट्रीय अधिवेशन (एसीकॉन 2017) के प्रमुख भी हैं, ने कहा कि 1986 के बाद से जब भारत में पहला एचआईवी पॉजिटिव व्यक्ति चिन्हित हुआ, तब से भारत ने एड्स नियंत्रण की दिशा में सराहनीय कदम तो उठाये हैं परन्तु यह पर्याप्त नहीं हैं.

कमज़ोर संक्रमण नियंत्रण के कारण बढ़ी बच्चों में दवाप्रतिरोधक टीबी

अधिकांश बच्चों में, विशेषकर छोटे बच्चों में, टीबी उनके निकटजनों से ही संक्रमित होती है। अविश्वसनीय तो लगेगा ही कि सरकार ने अनेक साल तक बच्चों में टीबी के आँकड़े ही एकाक्रित नहीं किए पर 2010 के बाद के दशक में अब बच्चों में टीबी नियंत्रण पर सराहनीय काम हुआ है - देश में और विश्व में भी। पर यह पर्याप्त नहीं है क्योंकि संक्रमण नियंत्रण कुशलतापूर्वक किए बैग़ैर हम टीबी उन्मूलन का सपना पूरा नहीं कर सकते।

तम्बाकू के 'सादे पैकेट' पर चित्रमय चेतावनी क्यों है अधिक प्रभावकारी?

सिगरेट एवं अन्य तम्बाकू उत्पाद अधिनियम 2003 के तहत तम्बाकू उत्पाद के पैकेट पर, चित्रमय चेतावनी 1 जून 2009 से भारत में लागू हो पायी. पर इतना पर्याप्त नहीं है क्योंकि तम्बाकू महामारी पर अंकुश लगाये बिना असामयिक मृत्यु दर कम हो नहीं सकता. अब भारत को जन स्वास्थ्य के लिए, एक बड़ा कदम लेने की जरुरत है जो अनेक देशों में लागू है और तम्बाकू नियंत्रण में कारगर सिद्ध हुआ है: 'प्लेन पैकेजिंग' या सादे तम्बाकू पैकेट पर अधिक प्रभावकारी और बड़ी चित्रमय चेतावनी की नीति अब भारत में भी पारित होनी चाहिए.

बिना स्वस्थ पर्यावरण के स्वस्थ इंसान कहाँ?

स्वास्थ्य से जुड़े लोग अक्सर पर्यावरण को महत्व नहीं देते और पर्यावरण से जुड़े लोग स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर कम बात करते हैं। ज़मीनी हक़ीक़त तो यह है कि बिना स्वस्थ पर्यावरण के, इंसान समेत जीवन के सभी रूप, स्वस्थ रह ही नहीं सकते। जीवन से जीवन पोषित होता है. सरकारों ने सतत विकास लक्ष्यों का वादा तो किया है जिनमें स्वास्थ्य, पर्यावरण, लिंग जनित समानता, शहरी ग्रामीण सतत विकास, आदि सभी मुद्दों को एक दूजे पर अंतरंग रूप से निर्भर माना गया है पर सही मायनों में जिस विकास मॉडल के पीछे हम भाग रहे हैं वो हमारे पर्यावरण का विध्वंस कर रहा है और जीवन को अस्वस्थ।

तम्बाकू महामारी पर अंकुश लगाये बिना सतत विकास मुमकिन नहीं

[विश्व तम्बाकू निषेध दिवस 2017 वेबिनार रिकॉर्डिंग | पॉडकास्ट] हालाँकि सरकार ने 2030 तक हर इंसान के लिए सतत विकास का सपना पूरा करने का वादा तो किया है पर तम्बाकू महामारी के कारणवश, अनेक विकास मानकों पर प्रगति उल्टी दिशा में जा रही है. जानलेवा गैर-संक्रामक रोग (ह्रदय रोग, पक्षाघात, कैंसर, दीर्घकालिक श्वास रोग, आदि) से मृत्यु का एक बड़ा कारण है: तम्बाकू. तम्बाकू के कारण गरीबी, भूख, पर्यावरण को नुक्सान, अर्थ-व्यवस्था को क्षति, आदि भी हमको झेलने पड़ते हैं.

हर एचआईवी पॉज़िटिव व्यक्ति को एआरटी इलाज देने की नयी सरकारी नीति सराहनीय

हर एचआईवी पॉज़िटिव व्यक्ति को (बिना सीडी4 जांच के) अब सरकारी एड्स स्वास्थ्य सेवा केंद्रों से नि:शुल्क एंटिरेटरोवाइरल (एआरटी) दवा मिलेगी। अभी तक सिर्फ़ उन एचआईवी पॉज़िटिव लोगों को नि:शुल्क दवा मिलती थी जिनका सीडी4 जाँच 500 से कम होती थी। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने तो 2015 में ही वैज्ञानिक प्रमाण को देखते हुए यह निर्णय ले लिया था कि हर एचआईवी पॉज़िटिव व्यक्ति को एंटिरेटरोवाइरल दवा मिलनी चाहिए और एआरटी दवा मिलना सीडी4 जाँच पर निर्भर नहीं होना चाहिए।

[पॉडकास्ट] जन-स्वास्थ्य इस सप्ताह: टीबी और हार्ट अटैक पर नयी मार्गदर्शिकाएं, अस्थमा और तम्बाकू निषेध दिवस, और मेक्सिको में ट्रेकोमा उन्मूलन


[पॉडकास्ट सुने या डाउनलोड करें] जन स्वास्थ्य इस सप्ताह, सीएनएस की साप्ताहिक पॉडकास्ट सीरीज है जो पिछले सप्ताह से 5 मुख्य जन स्वास्थ्य सम्बन्धी न्यूज़ प्रस्तुत करती है. इस सप्ताह 5 मुख्य जन-स्वास्थ्य सम्बन्धी समाचार इस प्रकार हैं: मेक्सिको में trachoma उन्मूलन का सपना पूरा; हार्ट अटैक पर भारत की पहली राष्ट्रीय मार्गदर्शिका जारी; विश्व स्वास्थ्य संगठन की टीबी मार्गदर्शिका जारी; विश्व अस्थमा दिवस 2017; विश्व तम्बाकू निषेध दिवस 2017. [पॉडकास्ट सुने या डाउनलोड करें]

हर जरूरतमंद को जब तक दमा (अस्थमा) इलाज नहीं मिलेगा, तब तक कैसे पूरे होंगे राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 के लक्ष्य?

[वर्ल्ड अस्थमा डे वेबिनार रिकॉर्डिंग] [सुने और डाउनलोड करें पॉडकास्ट] [English] भारत सरकार एवं अन्य 194 देशों की सरकारों ने 2030 तक, गैर-संक्रामक रोगों (जैसे कि दमा/ अस्थमा) से होने वाली असामयिक मृत्यु को एक-तिहाई कम करने का वादा किया है (सतत विकास लक्ष्य/ SDGs). भारत सरकार की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 (National Health Policy 2017) का भी एक लक्ष्य यह है कि भारत में दीर्घकालिक श्वास रोगों (जैसे कि दमा/ अस्थमा) से होने वाली असामयिक मृत्यु 2025 तक, 25% कम हों. पर बिना पक्की चिकित्सकीय जांच और सर्वगत प्रभावकारी इलाज के यह लक्ष्य कैसे पूरे होंगे?

अखिलेश शुक्ला जी की आकास्मक मृत्यु पर शोक

हम सभी के प्यारे मित्र अखिलेश शुक्ला जी का यूँ अचानक से चले जाना बहुत ही पीड़ादायक तथा विश्वास न कर पाने वाली घटना है. आप निश्चित तौर पर एक जीवन्त, खुशनुमा, सज्जन तथा प्रेरक व्यक्तित्व वाले इंसान थे.

आपकी अपूरणीय कमी हम लोगों को सैदाव याद दिलाएगी कि कैसे ह्रदय और रक्त-कोष्ठक रोग हमारी ज़िन्दगी को प्रभावित कर रहे हैं. अखिलेश, आपकी कर्तव्यनिष्ठा, कर्मठता और मूल्यवान जीवन हमें हमेशा प्रेरित करेगा.

सड़क-दुर्घटना-मृत्यु दर 2020 तक आधा करने के वादे के बावजूद थाईलैंड में 'सोंगक्रान' त्यौहार में दर बढ़ा!

थाईलैंड के सोंगक्रान त्यौहार में सड़क-दुर्घटनाएं और सम्बंधित मृत्यु दर, पिछले साल की तुलना में, बढ़ गए हैं (समाचार). यह बेहद चिंताजनक है क्योंकि थाईलैंड का सरकारी वादा तो है 2020 तक सड़क दुर्घटनाओं और मृत्यु दर को आधा करने का! थाईलैंड सरकार जब तक ठोस और कड़े कदम नहीं उठाएगी तब तक यह वादा कैसे पूरा होगा? सामाजिक न्याय की दृष्टि से भी यह अत्यंत पीड़ाजनक है क्योंकि सुरक्षित सड़क और यातायात व्यवस्था तो सभी नागरिकों को मिलनी ही चाहिए.

2025 तक टीबी मुक्त भारत के लिए जरुरी है स्वास्थ्य एवं गैर-स्वास्थ्य वर्गों में साझेदारी

अब इसमें कोई संदेह नहीं कि टीबी मुक्त भारत का सपना सिर्फ स्वास्थ्य कार्यक्रम के ज़रिए नहीं पूरा किया जा सकता है. टीबी होने का खतरा अनेक कारणों से बढ़ता है जिनमें से कुछ स्वास्थ्य विभाग की परिधि से बाहर हैं. उसी तरह टीबी के इलाज पूरा करने में जो बाधाएं हैं वे अक्सर सिर्फ स्वास्थ्य कार्यक्रमों से पूरी तरह दूर हो ही नहीं सकतीं - उदहारण के तौर पर - गरीबी, कुपोषण, आदि. इसीलिए टीबी मुक्त भारत का सपना, सभी स्वास्थ्य और ग़ैर-स्वास्थ्य वर्गों के एकजुट होने पर ही पूरा हो सकता है. इसी केंद्रीय विचार से प्रेरित हो कर, विश्व स्वास्थ्य दिवस 2017 के उपलक्ष्य में, हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला स्थित, हिमाचल प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन (एचपीसीए) के परिसर में, टीबी मुक्त भारत सम्मेलन का आयोजन हुआ.

"टीबी हारेगा, देश जीतेगा" जब हम सब एकजुट होकर टीबी उन्मूलन के लिए कार्य करेंगे!

[English] टीबी (ट्यूबरक्लोसिस या तपेदिक) रोग से बचाव मुमकिन है, दशकों से देश भर में पक्की जांच और पक्का इलाज सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में नि:शुल्क उपलब्ध है, पर इसके बावजूद टीबी जन स्वास्थ्य के लिए एक विकराल चुनौती बना हुआ है. विश्व स्वास्थ्य संगठन की नवीनतम रिपोर्ट देखें तो भारत में 2015 में, 28 लाख नए टीबी रोगी रिपोर्ट हुए (2014 में 22 लाख थे), 4.8 लाख टीबी मृत्यु हुईं (2014 में 2.2 लाख मृत्यु हुईं थीं), और 79,000 दवा प्रतिरोधक टीबी (मल्टी-ड्रग रेसिस्टेंट टीबी या MDR-TB) के रोगी रिपोर्ट हुए (2015 में 11% वृद्धि). "टीबी उन्मूलन संभव है पर अभी 'लड़ाई' जटिल और लम्बी प्रतीत होती है" कहना है शोभा शुक्ला का जो सीएनएस (सिटीजन न्यूज़ सर्विस) का संपादन कर रही हैं और टीबी उन्मूलन आन्दोलन से दशकों से जुड़ीं हुई हैं.

यदि सतत विकास लक्ष्य हासिल करने हैं तो कार्यसधाकता जरुरी

वैश्विक स्तर पर भारत समेत 190 देशों ने 2030 तक सतत विकास लक्ष्यों को पूरा करने का वादा तो किया है पर यदि राष्ट्रीय स्तर पर नीतियों, कार्यक्रमों और आँकड़ों को देखें तो संशय होना निश्चित है कि यह वादे कैसे होंगे पूरे? एक ओर सैन्य बजट में बढ़ोतरी तो दूसरी ओर सतत-विकास बजट में कटौती.