"नोटा" का चुनाव-नतीजे पर सीधा असर क्यों नहीं?

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब "नोटा" (None Of The Above/ 'नन ऑफ द एबव', यानि 'इनमें से कोई नहीं') का बटन इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) पर होता है पर चाहे "नोटा" वोटों की संख्या कितनी भी अधिक हो इसका चुनाव नतीजे पर कोई सीधा प्रभाव नहीं पड़ता. एक तरफ चुनाव आयोग का कार्य प्रशंसनीय है कि चुनाव प्रणाली पिछले सालों में निरंतर दुरुस्त हो रही है, अलबत्ता धीरे धीरे. दूसरी ओर लोकतंत्र में "नोटा" अभी भी मात्र 'कागज़ी शेर' जैसा ही है जो चिंताजनक है.

वादा है सड़क दुर्घटनाएं 2020 तक आधी करने का पर उत्तर प्रदेश में 27% वृद्धि!

हिंदुस्तान टाइम्स, 14 फरवरी 2017
उत्तर प्रदेश में सड़क दुर्घटनाओं में 27% वृद्धि हो गयी जो बेहद चिंताजनक है क्योंकि सरकारी वादा तो है 2020 तक सड़क दुर्घटनाओं और मृत्यु दर को आधा करने का! सरकार जब तक ठोस और कड़े कदम नहीं उठाएगी तब तक यह वादा कैसे पूरा होगा? सामाजिक न्याय की दृष्टि से भी यह अत्यंत पीड़ाजनक है क्योंकि सुरक्षित सड़क और यातायात व्यवस्था तो सभी नागरिकों को मिलनी ही चाहिए.

साइकल ट्रैक बड़ी उपलब्धि है या फिर सुपर-ऐक्स्प्रेसवे?

एक्सप्रेसवे से नज़ारा कुछ और पर नाले पर
रहने वालों की हकीकत कुछ और (सीएनएस फोटो)
वर्त्तमान में अधिकांश आबादी साइकल, पैदल और सार्वजनिक यातायात साधन से चलती है, पर हमारे नेता हमें बताते हैं कि बड़ी चौड़ी सड़कें इक्स्प्रेसवे जिसपर मोटोरगाड़ी दौड़ेंगी वो बड़ी उपलब्धि है. पैदल चलने वालों और साइकिल आदि चलाने वालों के लिए यह बड़ी-चौड़ी सड़कें खतरनाक और असुरक्षित भी हो रही हैं. हो सकता है यही हमें भी लगने लगा हो कि बड़ी चौड़ी सड़कें ही विकास का मापक हैं. पर सच्चा सतत विकास उसे ही कहा जाएगा जिसमें सभी लोग सम्मान से समानता के साथ जीवन यापन कर सकें. हमारी सरकार की नीतियों को अधिकांश आबादी की ज़रूरतों को प्राथमिकता के साथ पूरा करना चाहिए.

पुरुष की गैरजिम्मेदारी और असंवेदनशीलता का नतीजा है अनचाहा गर्भ और असुरक्षित गर्भपात

गर्भपात और अनचाहे गर्भ पर नेपाल के पहले राष्ट्रीय शोध ने गंभीर सवाल उठाये हैं. नेपाल में गर्भपात पर 2002 से कोई कानूनी रोक नहीं है और पिछले सालों में प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता भी बहुत बढ़ी है. पर इसके बावजूद अनेक महिलाएं (58%) असुरक्षित गर्भपात करवा रही हैं. नेपाल और अन्य 190 देशों ने संयुक्त राष्ट्र 2015 महासभा में सतत विकास लक्ष्य (Sustainable Development Goals/ SDGs) हासिल करने का वादा किया है जिनमें लिंग-जनित असमानता समाप्त करने और सभी लड़कियों/ महिलाओं तक प्रजनन स्वास्थ्य सेवाएँ पहुचाने के लक्ष्य शामिल हैं.

क्या इन्टरनेट पर उपलब्ध 'पोर्न' (अश्लील विडियो, फोटो) हमारी मानसिकता विकृत कर रहा है?

नव भारत टाइम्स, 9 फरवरी 2017
चंद महीनों की बच्चियों तक के साथ क्रूरतम दरिन्दिगी के समाचार हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि ऐसा कौन सा कारण है जो मनुष्य को यह घिनोना कृत करने को उकसाता है? इस चरम दरिन्दिगी को सिर्फ यौनिक अपराध कह देना पर्याप्त नहीं है. क्या इसके लिए कुछ हद तक इन्टरनेट पर उपलब्ध 'पोर्न' या अश्लील विडियो और तस्वीरें जिम्मेदार हो सकती हैं?

"कोई नवजात शिशु एचआईवी पोसिटिव न हो" इस सपने को एड्स कार्यक्रम साकार करे

थाइलैंड और श्री लंका जैसे कुछ देशों ने एचआईवी पॉज़िटिव मातापिता से बच्चे को होने वाले एचआईवी संक्रमण को पूर्ण रूप से समाप्त कर दिया है। सभी गर्भवती महिलाओं को एचआईवी जाँच प्रदान करना, जो एचआईवी के साथ जीवित हों उन्हें नेविरापीन-वाली दवा का इलाज आदि नि:शुल्क प्रदान करवाना और बच्चे के जन्मोपरांत पहले 6 माह सिर्फ़ माँ का स्तनपान करवाना (और कोई आहार नहीं) जैसे प्रमाणित कार्यक्रमों के ज़रिए इन देशों ने यह जन स्वास्थ्य के लिए बड़ी उपलब्धि हासिल की है. इसके साथ ही इन देशों में जो महिलाएँ गर्भावस्था के दौरान एचआईवी पॉज़िटिव पायी गयीं थीं उनको पूरी उम्र नि:शुल्क अंतिरेट्रोविरल दवा मिलती है जिससे कि वे सामान्य ज़िंदगी जी सकें।

कैंसर मृत्यु दर में तेज़ी से गिरावट के बगैर 2030 के वायदे पूरे करना संभव नहीं

(वेबिनार रिकॉर्डिंग, पॉडकास्ट) विश्व कैंसर दिवस 2017 पर सरकार को यह मूल्यांकन करना जरुरी है कि विभिन्न प्रकार के कैंसर की दर कितनी तेज़ी से कम हो रही है ताकि भारत सरकार अपने वायदे अनुसार, 2030 तक कैंसर मृत्यु दर में एक-तिहाई गिरावट ला सके (सतत विकास लक्ष्य या एस.डी.जी.).

जीवन-रक्षक टीबी दवाएं सरकार बिना विलम्ब जरूरतमंद लोगों को उपलब्ध कराये

टीबी का पक्का इलाज सरकारी टीबी कार्यक्रम में नि:शुल्क उपलब्ध है पर यदि दवा प्रतिरोधक टीबी हो जाए, तो इलाज न केवल मुश्किल बल्कि अत्यंत महंगा भी हो सकता है. सरकारी टीबी कार्यक्रम के तहत दवा प्रतिरोधक टीबी का भी इलाज नि:शुल्क उपलब्ध है - पर नवीनतम जीवनरक्षक दवाओं की उपलब्धता गंभीर रूप से असंतोषजनक है.

संविधान की मौलिक भावना व उसके मूल्यों को खतरा

डॉ संदीप पाण्डेय, सीएनएस स्तंभकार और मग्सेसे पुरुस्कार से सम्मानित कार्यकर्ता
वैसे तो हमारा लोकतंत्र धीरे-धीरे संविधान की भावना और उसमें निहित मूल्यों से दूर जा ही रहा था, नरेन्द्र मोदी की सरकार ने उस गति को और तेज कर दिया है। संविधान के पहले वाक्य में ही भारतीय गणराज्य के जो चार आधार स्तंम्भ बताए गए हैं - सम्प्रभुता, समाजवाद, धर्मनिर्पेक्षता व लोकतंत्र - वे ही डगमगाने लगे हैं। सम्प्रभुता का अर्थ है हम अपने निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं या हम स्वायत्त हैं। लेकिन कितने ऐसे आर्थिक नीतियों से सम्बंधित निर्णय हैं जो हम अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों अथवा अमीर देशों जैसे अमरीका के दबाव में लेते हैं। इतना ही नहीं कई बार तो देशी-विदेशी बड़ी कम्पनियां ही निर्णयों को प्रभावित करती हैं।

गांधी होने का मतलब

डॉ संदीप पाण्डेय, सीएनएस स्तंभकार और मग्सेसे पुरुस्कार से सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता
गाँधी प्रिंटिंग प्रेस,दक्षिणअफ्रीका:गांधीजी यहाँ से अखबार निकलते थे
इधर खादी व ग्रामोद्योग आयोग के कैलेण्डर पर चरखे के साथ महात्मा गांधी की जगह नरेन्द्र मोदी की तस्वीर छपने से कुछ विवाद खड़ा हुआ है। मोदी समर्थक पूछ रहे हैं कि जब नरेन्द्र मोदी की तस्वीर झाड़ू के साथ छप रही थी तब इतना बवाल क्यों नहीं मचा क्यों कि झाड़ू का प्रतीक भी मोदी ने गांधी से ही लिया है? गांधी का चश्मा स्वच्छ भारत अभियान के प्रतीक चिन्ह के रूप में जगह जगह छप रहा है।

नए टीबी शोध ने जन-स्वास्थ्य जगत को चेताया: बुनियादी संक्रमण नियंत्रण अत्यंत आवश्यक!

टीबी से बचाव मुमकिन है और यदि टीबी रोग हो जाए तो सफल इलाज भी सरकारी स्वास्थ्य सेवा में नि:शुल्क उपलब्ध है. परन्तु यदि टीबी की दवाओं से प्रतिरोधकता उत्पन्न हो जाए, यानि कि, दवाएं टीबी बैक्टीरिया पर बेअसर हो जाए, तो इलाज कठिन होता जाता है. जैसे-जैसे टीबी दवाओं से प्रतिरोधकता बढ़ती जाती है वैसे वैसे इलाज भी कठिन होता जाता है और गंभीर प्रतिरोधकता के कारण मृत्यु तक हो सकती है.

क्या सरकारें 2020 तक सड़क दुर्घटनाओं और सम्बंधित मृत्यु दर को 50% कम कर पाएंगी?

हिंदुस्तान टाइम्स (20 जनवरी 2017) में प्रकाशित समाचार के अनुसार सड़क दुर्घटनाएं और इनमें मृत लोगों विशेषकर कि बच्चों की संख्या बढ़ती जा रही है. ये एक और उदहारण हैं जब सरकारें वादें कुछ और करती हैं और जमीनी हकीकत ठीक विपरीत होती है. भारत सरकार एवं अन्य १९२ देशों की सरकारों ने वादा किया है कि 2020 तक सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मृत्युदर आधा हो जायेगा परन्तु मृत्यु दर तो बढ़ता जा रहा है!

हॉर्न ध्वनि-तीव्रता कम करना ठीक है पर सोचने की बात है कि हमें हॉर्न बजाने की जरुरत क्यों है?

हिंदुस्तान टाइम्स (अंग्रेजी दैनिक)
हाल ही में केंद्रीय सरकार के सड़क-परिवहन मंत्रालय की संभावित नीति समाचार में थी कि दो-चार पहिया और अन्य मोटर-गाड़ियों के 'हॉर्न' की ध्वनि-तीव्रता कम होनी चाहिए और ध्वनि-तीव्रता पर अधिकतम उपरी सीमा को कम किया जाए. यह प्रयास ध्वनि-प्रदूषण और सड़क सुरक्षा दोनों की दृष्टि से नि:संदेह जरुरी कदम है पर अधिक जरुरी यह है कि क्या यह पर्याप्त है? अधिक गंभीर प्रश्न यह है कि हमें हॉर्न बजाने की जरुरत क्यों पड़ती है जबकि अधिकाँश विकसित देशों में बिना हॉर्न बजाये सड़क सुरक्षा बेहतर है और परिवहन व्यवस्था भी. विकसित देशों में हॉर्न सम्बंधित नीति सही है कि हॉर्न का उपयोग सिर्फ आकास्मक कारणों में ही हो (जैसे कि ट्रेन की चैन) और आम आवागमन के लिए प्रतिबंधित हो.

हाईटि देश में 2010 तक हैजा था ही नहीं: विश्व शांति, सैन्य और स्वास्थ्य नीतियों में तालमेल जरुरी

2010 तक हाईटि देश में हैजा था ही नहीं पर संयुक्त राष्ट्र के शांति बनाये रखने वाले सैन्य बल के जरिये से यहाँ हैजा फैला. हाल ही में समाचार के अनुसार, भारत सरकार ने यह प्रमाणित किया था कि उसके शांति बनाये रखने वाले सैन्य बल को हाईटि भेजने से पहले हैजा-टीका दिया गया है, पर जब पूछ-ताछ हुई तो पता चला कि भारतीय सुरक्षाकर्मी को हैजा टीका नहीं दिया गया था. गौर हो कि हाईटि में हैजा फ़ैलाने के लिए संयुक्त राष्ट्र प्रमुख डॉ बन-की मून ने, पिछले महीने ही, शांति बनाये रखने के लिए भेजी गयी सैन्य बल की ओर से ऐतिहासिक माफ़ी भी मांगी थी.