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बढ़ रही है बाल दमा रोगीयों की संख्या

दमा रोग ब्रोन्कियल ट्यूबों (वायुमार्ग) की बीमारी है जिसमे आमतौर पर साँस लेने के दौरान घरघराहट या सीटी बजने की ध्वनि सुनाई देती है,  खासकर जब साँस बाहर निकालते है. बच्चों में यह विशेषकर सांस की तकलीफ या खाँसी को जन्म देती है जिसके कई कारण हो सकते हैं। वास्तव में इसका कोई प्रमाणित कारण नहीं है कि क्यों अधिक से अधिक बच्चों में दमा रोग विकसित हो रहा है पर कुछ विशेषज्ञों का सुझाव है कि एलर्जी कारक जैसे धूल, वायु प्रदूषण, और परोक्ष धूम्रपान इसके प्रमुख कारण हैं। भारत में दमा रोग से 2.4 करोड़ लोग पीड़ित हैं। 

प्रोफेसर नादिया जो इन्टर्नैशनल यूनियन अगेन्स्ट ट्युबरक्लोसिस एंड लंग डिज़ीज़ (द यूनियन) में अस्थमा पर सलहकार और ग्लोबल अस्थमा रिपोर्ट 2011 की सहलेखिका भी है का कहना है कि “अस्थमा का कारण अज्ञात है. केवल कुछ संभावित कारक ही हैं जो अस्थमा के विकास के लिए जिम्मेदार हैं: जेनटिक और एलर्जी। कुछ अन्य कारक अस्थमा के विकास में योगदान देते है जैसे   घर के अंदर का प्रदूषण, बाहर का प्रदूषण, व्यायाम, मौसम में बदलाव, कुछ मामलों में विशिष्ट खाद्य और गैर-स्टेरायडल ऐंटी इन्फ्लैमटॉरी दवाएं”। 
  
ज्यादातर लोग बच्चों में दमा के लक्षणों को जैसे खाँसी, घरघराहट, और सांस की तकलीफ की अनदेखी करते है जो बच्चे के स्वास्थ्य के लिए खतरनाक होता है, पर यदि उचित ध्यान रखा जाये तो 70 प्रतिशत दमा रोगी बच्चों में लक्षणों को नियंत्रित किया जा सकता है, और 12 साल की उम्र तक हो सकता है कि लक्षण गायब हो जाये। दमा रोग के नियंत्रण का सही उपाय इन्हेलर है जिसका कोई प्रतिकूल प्रभाव भी नहीं होता है। द यूनियन के फेफड़े-रोग विभाग के निदेशक डॉ चियांग चेन युआन के अनुसार “इन्हेलर के द्वारा कार्टिको-स्टीरोइड को श्वास द्वारा अंदर लेने से अधिकांश दमा रोगी दमे को नियंत्रित कर सकते है। पर यह दुर्भाग्य की बात है कि अधिकांस दमा रोगी कार्टिको-स्टीरोइड को इन्हेलर के द्वारा नहीं ले पाते हैं। एक शोध के अनुसार केवल 20% से कम दमा रोगी कार्टिको-स्टीरोइड इन्हेलर के द्वारा ले पाते हैं”। चूंकि दमा रोग को ठीक नहीं किया जा सकता है, इसके लक्षणों को नियंत्रित करना ही एक मात्र  उचित उपाय है अतः बच्चों में जल्दी से जल्दी इस रोग के लक्षणों की पहचान और उसका परीक्षण दमा से बचाव के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। दमा रोग के कारण प्रतिदिन लाखों बच्चे स्कूल, पढाई और खेलकूद आदि जैसे तमाम चीजों को छोडते हैं। 

डॉ करेन बीस्सेल्ल जो अस्थमा ड्रग्स फेसिलिटी की डिप्टी डाइरेक्टर है, का कहना है कि “विशेष रूप से कम आय वाले देशों में अस्थमा पर पर्याप्त डेटा नहीं है, लेकिन हाल ही में जो डेटा कम आय वाले देशों से एकत्र किया गया है से पता चलता है कि समय के साथ वहाँ बच्चों में विशेष रूप से दमा रोग के प्रसार में वृद्धि हुई है. पर कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इसका कारण शहरीकरण है, जैसा कि पिछले दो दशकों में शहरीकरण की प्रक्रिया में तेजी से विकास हुआ है जिसके फलस्वरूप वातावरण प्रदूषण बढ़ा है”। हालांकि बच्चों में यह समान रूप से लड़कियों और लड़कों को प्रभावित करता है, लेकिन लड़कियों की तुलना में थोड़ा अधिक लड़कों को प्रभावित करता है. प्रोफेसर नादिया का कहना है कि “बच्चों में दमा रोग की घटना वयस्कों की तुलना में अधिक है. बच्चों में दमा रोग लड़कियों की तुलना में लड़कों में अधिक और वयस्कों में महिलाओं में अधिक होता है”।

छत्रपति शाहुजी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय के पलमोनरी मेडिसिन विभाग के विभागाअध्यक्ष प्रोफेसर (डॉ) सूर्य कान्त का कहना है कि दमे की शुरुआत मूल रूप से बचपन में होती है. वास्तव में तीन चौथाई से अधिक मामलों में बचपन से शुरू होती है, चूंकि यह एक आजीवन बीमारी है जो वयस्कता में भी जारी रहती है. प्रायः 50% दमा रोगी बच्चे या वें बच्चे जो, घरघराहट, नाक रुकावट, सीने में जकड़न, सांस लेने में तकलीफ़ आदि लक्षणों की शिकायत करते हैं, आमतौर पर 12 साल की उम्र से राहत पाने लगते हैं. अतः प्राथमिक रोकथाम की शुरुआत जब बच्चा गर्भ में हो तभी से कर देनी चाहिए है. यदि माँ को दमा है, तो एक तिहाई ऐसे मामलों में गर्भावस्था के दौरान रोग बढ़ाने की संभावना होती है. तो ऐसी स्थिति में माँ को और अधिक सतर्क हो जाना चाहिए, और डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए और नियमित तौर पर इनहेलर का प्रयोग करना चाहिए. अगर उसके फेफड़ों का कार्य बिगड़ा और उसके शरीर में ऑक्सीजन की कमी आयी तो शिशु में भी ऑक्सीजन की कमी होगी. ऐसी माँओ को फास्ट फूड से बचना चाहिए क्योंकि यह दमा रोग को बढ़ता है। फास्ट फूड भी बच्चों में दमा रोग वृद्धि का एक प्रमुख कारण है. हाल ही में दिल्ली में किये गये अध्ययन के अनुसार वहाँ 16% स्कूल जाने वाले बच्चे दमा रोग से पीड़ित हैं जबकि हम मानते है की भारत में  3-5% लोगों को दमा है. इस सब की वजह फास्ट फूड बर्गर, कोल्ड ड्रिंक, पेस्ट्री, चाउ मीन, पिज्जा, और डिब्बा बंद भोजन/ जूस आदि हैं.

हाल ही में किए गए एक अध्ययन के अनुसार सामान्य रूप पैदा हुए बच्चों की तुलना में सीज़ेरियन विधि से पैदा हुए बच्चों में दमा होने की संभावना अधिक होती है, चाहे माँ को दमा हो या न हो. यह कहा जाता है कि योनि का तरल पदार्थ शिशु के शरीर में प्रतिरोधक क्षमता का विकास करता है और उसे दमा सहित अन्य रोगों से बचाता है. ठंडा-गरम और ए.सी कार/कमरे में रहने के बाद गरम धूप में निकलना या गरम धूप से ए.सी कार/कमरे में जाना आदि भी अस्थमा रोग को बढ़ते हैं। अतः यदि किसी को नाक की एलर्जी है तो उसका सही तरीके से इलाज कराना चाहिये क्योंकि बाद में यह अस्थमा का रूप धारण कर सकता हैं 

राहुल कुमार द्विवेदी 
लेखक ऑनलाइन पोर्टल www.hindi.citizen-news.org के लिए लिखता है

सुखराम की एचआईवी और डीआर-टीबी के विरूद्ध जंग

39 वर्षीय सुखराम पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक पिछड़े जिले आजमगढ़ के मूल निवासी हैं|यद्यपि वो मुंबई में एक आटा-मिल में कार्य करते हैं, पर उनका परिवार, जिसमे उनकी पत्नी, उनके माता-पिता और 14 व 12 वर्षीय दो पुत्रियाँ हैं, आजमगढ़ में ही  रहते हैं | वो 2001 से एंटी रेट्रोवायरल थेरेपी(एआरटी) पर हैं| ड्रग रेजीस्टेंट टीबी (डीआर-टीबी) के कारण 2006 में वो एमएसएफ चिकित्सा हेतु भेजे गये, जहाँ तबसे उनका सफलतापूर्वक इलाज चल रहा है | कुछ समय पूर्व उन्होने टीबी बेक्टीरिया-एचआईवी वाइरस के सह-संक्रमण और उसके बाद की अपनी जिन्दगी के बारे में  Medcins Sans Frontiere (एमएसएफ) से वार्ता की |

सुखराम की विषादपूर्ण जिन्दगी का आरम्भ 1993 में सूखी खाँसी से हुआ |एक माह तक निजी चिकित्सक से उपचार लेने के पश्चात जब कोई लाभ नहीं हुआ, तब उनको मुम्बई के म्यूनिसपल अस्पताल जाने की सलाह दी गई | थूक(कफ) की जाँच द्वारा फेफड़े की तपेदिक(टीबी) होने की पुष्टि हुई | तब उन्होने एक निजी चिकित्सक की देखरेख मे 6 महीने की चिकित्सा पूरी की | इसके बाद उनको अपने गाँव जाने की अनुमति दे दी गई | यह सोचकर कि उनकी टीबी ठीक हो चुकी थी, उन्होने न तो दुबारा जाँच करवाई और न ही डाक्टर ने उन्हें ऐसा करने की सलाह ही दी|

2000 में वो पुनः अस्वस्थ्य हो गये| वजन में कमी और भूख न लगने के साथ साथ  उनको खाँसी व तेज़ बुखार हो गया | उन्हे बहुत तेज़ सरदर्द भी हो जाया करता था | उनके बाल भी गिरने लगे| उनकी हालत धीरे-धीरे खराब होने लगी तथा सारे शरीर में गाँठें हो गई | तब वह उसी म्यूनिसपिल अस्पताल में गये, जहाँ पुनः उन्हें टीबी की पुष्टि की गई |इस बार उन्हें एक डाट्स केंद्र जाने की सलाह दी गई, जहाँ उन्होने दुबारा 6 माह का टीबी के इलाज का कोर्स पूरा किया| लेकिन उनकी गाँठें ठीक न होने के कारण उनको हिंदुजा अस्पताल भेजा गया जहा डॉक्टरों ने बताया कि ट्यूबर्कूलर ग्लैंड्स होने के कारण बिना दवाएँ खाये यह ठीक नहीं होंगी | वह उलझन में पड़ गये| उन्होने डॉक्टरों को बताया कि काफी लम्बे समय तक वो पहले भी टीबी की दवाएं खा चुके थे | इसलिए उन्हे केईएम एआरटी सेंटर भेजा गया जहाँ उन्हें अपने एचआईवी पॉज़िटिव होने का पता चला | उन्हें 2001 में पहले स्तर की ऐन्टीरेट्रोवाइरल थेरेपी(एआरटी) पर रक्खा गया |उन्होने टीबी का उपचार भी प्रारम्भ कर दिया |

धीरे-धीरे उनकी सारी ग्लेण्ड्स गायब हो गईं और उनकी हालत बेहतर हो गई | इसलिए उन्होने दवाएँ लेना बन्द कर दिया | कुछ समय पश्चात उनका सीडी4का स्तर गिरकर 20 हो गया | केईएम के चिकित्सकों ने बताया कि उपचार बीच में ही बन्द कर देने के कारण दवाएँ असर नहीं कर रही थीं, और अब उन्हें द्वितीय स्तर की दवाएँ चाहिए थीं जो कि उस अस्पताल में उपलब्ध नहीं थीं और उन्हें बाहर से खरीदना था | वह उन महंगी दवाओं को अपनी आमदनी से नहीं खरीद सकते थे | काफी परेशानियों के बाद वह प्रफुल्ल ट्रस्ट नामक एक गैर सरकारी संस्था से मिलने में कामयाब हो गये, जिसने उनको जे जे हॉस्पिटल भेजा, जहाँ से अंततः वह एमएसएफ पहुँच गये |

मार्च 2006 में जब वह एमएसएफ आये, उनकी सीडी4की गणना 20 थी | उनको 6 माह तक प्रथम स्तर की चिकित्सा पर रक्खा गया जिससे उनका सीडी4 लगभग 75-76 तक ही बढ़ सका | इसलिए डाक्टरों ने उन्हें दूसरे स्तर की एआरटी की चिकित्सा प्रदान की | वह याद करते हैं कि, “मैंने दो दिनों तक दवाएँ खायीं, और तीसरे दिन से खाँसी व उल्टी होना शुरू हो गया | कभी-कभी खाँसी के साथ खून भी आ जाता था | अब मुझे बुखार भी रहने लगा | जाँच करने पर पता चला कि मुझे टीबी थी| कल्चर की रिपोर्ट से टीबी की प्रकृति की पुष्टि होने तक मुझे टीबी की दवाएँ खाने को कहा गया | 8 सप्ताह बाद जब रिपोर्ट आयी तब इस बात की पुष्टि हुई कि मुझे एमडीआर-टीबी है| उस समय मैं बहुत बीमार था | इन दो महीनों में मेरी हालत काफी बिगड़ चुकी थी| खाँसी बहुत गंभीर हो चुकी थी और मैं चल तक नहीं सकता था | लेकिन मैंने एचआईवी की दवाएँ लेना बन्द नहीं किया | फिर मैंने दिसम्बर 2006 से एमडीआर-टीबी का उपचार भी शुरू कर दिया |”

उन दिनों के बारे मेँ सोचकर सुखराम के रोंगटे खड़े हो जाते हैं | वे बताते हैं – “जब 2006 मेँ इलाज शुरू हुआ तब दवाओं का बोझ बहुत था | मैं गोलियो की संख्या देखकर डर जाया करता था | डीआर-टीबी के लिए कई गोलियों के अलावा एचआईवी के लिए लगभग 8 गोलियां लेनी पड़ती थी – मुझे एक दिन मेँ 27-28 गोलियां खानी पड़ती थी | इन दवाओं का बहुत बुरा असर भी होता था | मुझे दस्त, उल्टी, चक्कर, और बहुत कमजोरी का अनुभव होता था | मुझे लगता था कि जैसे मैं अब कभी चल नहीं पाऊँगा | ऐसा लगता था कि जैसे दवाएं मेरे मस्तिष्क को भी प्रभावित कर रही थी क्योंकि मेरी याददाश्त कम होने लगी थी, मैं भूलने लगा था | मेरा शरीर उन इंजेक्शन के निशानों से भरा पड़ा था, जो मुझे साढ़े सात महीने तक लगवाने पड़े थे | दो माह तक मैं केवल तरल भोजन पर ही निर्भर था | मैं कोई ठोस पदार्थ नहीं ले पाता था क्योकि मेरा शरीर उसे पचा नहीं पा रहा था | कोई भी चीज, यहाँ तक कि पानी भी, मैं उलट दिया करता था | मैं वास्तव मेँ बड़ी मुसीबत मेँ था |लेकिन एक भी खुराक छोड़े बिना मैंने किसी तरह दवाएं जारी रक्खीं | एक गोली की चूक भी भारी मुसीबत पैदा कर सकती थी |”
तीन महिने के उपचार के बाद सेहत मेँ बहुत सुधार महसूस कर सुखराम ने प्रसन्नता एवं आश्चर्य का अनुभव किया| एमएसएफ मेँ 8 माह के उपचार के बाद वह एक बार फिर से हष्ट-पुष्ट हो गये और यह भी भूल गये कि उनको कभी टीबी थी |

सुखराम आज भी यह नहीं समझ पाते हैं कि दो बार चिकित्सा लेने के बाद भी उनको टीबी तीसरी बार क्यों हो गई ?एमएसएफ मेँ उनको बताया गया कि पहले यहाँ वहाँ लिये गये उनके उपचार और दवाओं मेँ शायद उनसे कोई चूक हुई जिसके कारण टीबी इतने भयावह रूप मेँ हो गई |सुखराम स्वीकार करते हैं कि,” शायद मेरे एचआईवी की गोलियां छोड़ने के कारण फिर से टीबी हो गई थी | वास्तव मेँ मैंने अनेकों बार गोलियां खाने मेँ चूक की – एक बार मैंने 6 माह तक दवा लेना छोड़ दिया था | मैं सोचता हूँ कि ऐसा करने से ही मेरे शरीर मेँ वाइरल के बोझ की अधिकता और सीडी4 मेँ कमी आ गई, और धीरे-धीरे कमजोरी के कारण इसी ने टीबी का रूप ले लिया |”

लेकिन पहली बार टीबी उन्हे क्यों हो गई? वह इसके लिये अपने व्यवसाय को दोष देते हुये बताते हैं –“मैं एक आटा-मिल मेँ काम करता हूँ | यह बहुत धूल-भरा कार्य है | वहाँ पर चारों ओर इतना अधिक आटा उड़ता रहता है कि हम लोग सफेद भूतों की तरह दिखते हैं | आटे के कण हमारे फेफड़ों मेँ प्रवेश करते रहते हैं | इसलिए, इन मिलों मेँ काम करने वाले लोग अक्सर 55-56 वर्ष की उम्र के बाद दमा और टीबी के मरीज बन जाते हैं | इसलिए टीबी हम लोगों के लिये एक व्यवसाय-जनित खतरा है।“

वह दु:खी होकर बताते हैं कि,” यदि मुझे कोई नया काम मिल सकता, तो मैं यह काम छोड़ देता और अपने गाँव वापस चला जाता |लेकिन अब मैं कोई नया हुनर नहीं सीख सकता हूँ | मैं अपने परिवार के पालन-पोषण के लिए इस मिल से ही धनोपार्जन करता हूँ | मैं किसी अन्य नौकरी के लिए अधिक शिक्षित भी नहीं हूँ | इसलिए मैं यही हूँ क्योकि अब मुझे अपनी दवाएं लगातार लेनी हैं | अब मेरे गाँव वापस जाने का कोई मौका नहीं हैं |” यद्यपि सुखराम एचआईवी/टीबी से ग्रस्त लोगों की मदद करना चाहते हैं, लेकिन अपनी एचआईवी अवस्था को दूसरों को बताने में संकोच का अनुभव करते हैं | वह इस बीमारी के बारे में अधिक जागरूकता फैलाना चाहते हैं, लेकिन लोगो द्वारा यह पूछना कि वह इस बीमारी के विषय में इतना अधिक कैसे जानते हैं, उनको ऐसा करने के लिए रोकता है| उन्होने अपने गाँव के कुछ लोगों का एचआईवी के उपचार के लिए बनारस मेडिकल कॉलेज जाने में मार्ग-दर्शन किया, लेकिन अपने गाँव में एचआईवी-ग्रस्त कुछ परिचितों का नियमित व उचित इलाज के अभाव में म्रत्यु को प्राप्त होने का वो खेद महसूस करते हैं |

लेकिन वो एमएसएफ की मुक्त-कंठ से प्रशंसा करते हैं |उनके अनुसार—“ एमएसएफ ने मुझे नई जिंदगी दी है | यहाँ आने पर एमएसएफ के चिकित्सकों और परामर्शदाताओं द्वारा मुझे एचआईवी/टीबी के बारे में, दवाओं के नियमित सेवन करने के बारे में, एचआईवी से ग्रस्त होने के कारणों के बारे में, सम्पूर्ण जानकारी दी गई| सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों तक पहुंचना ही काफी कठिन होता था| वे मुझे छूते तक नहीं थे-- केवल नुस्खा लिख देते और दवाएं बाहर से खरीदने को कहते | वे हमारे साथ बुरा और अमानवीय व्यवहार करते | यदि मैं यहाँ न आता तो अभी तक मेरे लिए सब कुछ समाप्त हो चुका होता और मैं मर चुका होता | यहाँ आने से पूर्व, मेरी सारी कमाई दवाओं में खर्च हो जाती थी | मैं कंगाल हो गया था | एमएसएफ ने मुझे जिंदगी का नया सवेरा दिया है |”

सुखराम अब डीआर-टीबी से मुक्त हो चुके है | अब उनकी प्राथमिकता अपनी पुत्रियों की शिक्षा है | यद्यपि वह पढ़ नहीं सके, किन्तु महसूस करते हैं कि “आज के संसार में शिक्षा बहुत आवश्यक है |” उनको इस बात का गर्व है कि उनकी पुत्रियाँ अँग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ रही हैं| उनकी बड़ी पुत्री काफी बुद्धिमान है और विज्ञान वर्ग से शिक्षा ग्रहण कर रही है | वह चाहते हैं कि उनकी पढ़ाई और विवाह के लिए पर्याप्त धन जुटाने में वह सक्षम हो सकें|

(अंग्रेजी में शोभा शुक्ला के   मूल लेख का  सुश्री माया जोशी द्वारा हिंदी में अनुवाद)

चंद्रिका की कहानी, उन्हीं की जुबानी

चन्द्रिका गौड़ मुंबई निवासी एक 28 वर्षीय हिजड़ा है जो एचआईवी के साथ-साथ औषधि प्रतिरोधक अथवा ड्रग रेजिस्टेंट टीबी (डीआर-टीबी) से भी पीड़ित है | इस समय वो दूसरे स्तर की एंटी- रेट्रो वाइरल दवाओं और डीआर-टीबी के उपचार मेँ है | उसे अपने एचआईवी ग्रस्त होने का पता 2006 मे चला और डीआर–टीबी की पुष्टि 2010 मे हुई जब उसे एमएसएफ (Medicins Sans Frontiere)  मेँ जाने की सलाह दी गई | एमएसएफ मेँ आने से पूर्व वो दो बार टीबी का उपचार ले चुकी थी| अपनी दोहरी बीमारी के भार के अपने संघर्ष की कहानी उसने हाल ही मे एमएसएफ को बताई|

अपने निवास-स्थान के आस-पास की बस्ती में भीख मांगकर चन्द्रिका अपना जीवन-यापन करती है| (भारत में, आज भी हिजड़ों के लिए उन घरों में, जहाँ हाल ही में विवाह सम्पन्न हुआ हो या किसी बच्चे का जन्म हुआ हो, नाचने गाने की प्रथा है | इसके बदले में उन्हें धन और उपहार मिलते हें | भीख मांगने के अतिरिक्त यही उनका जीवकोपार्जन है|) वह अपने समुदाय के कुछ अन्य लोगों—अपनी दादी माँ और अपने कुछ शिष्यों के साथ रहती है| वे एक समूह में साथ-साथ रहते हैं, लेकिन चन्द्रिका इस बात पर जोर देते हुए बताती है कि,”मै अपने घर में अकेली रहती हूँ | मेरा घर अलग है | मेरा शयन-कक्ष और रसोई-घर सब अलग हैं | मैं दूसरों के साथ नहीं रहती हूँ |”उसको सन 2004 में छाती में दर्द के साथ भयंकर खाँसी होने लगी | उसने बताया कि,” मै अत्यधिक बलगम के साथ बहुत खाँसा करती थी | मैंने सोचा कि यह खांसी बेर खाने के कारण है | मेरे गुरु ,मेरे शिष्यों और अन्य सभी ने सोचा कि यह फल शीतकारी होता है | अतः मेरी खाँसी के लिए यही जिम्मेदार है | यह फल मुझे बहुत पसन्द था, लेकिन फिर भी मैंने इसे खाना बन्द कर दिया। पर मेरी खाँसी में कोई कमी नहीं आई | इसलिए मैं एक डाक्टर के पास गई जिसने मुझे बताया कि मुझे टीबी थी| उन्होने बताया कि खाँसी बेर के कारण नहीं, अपितु टीबी के कारण थी |)

चन्द्रिका उलझन में पड़ गई | उसे टीबी के विषय में तनिक सा भी ज्ञान नहीं था | “मुझे समझ में नहीं आया कि टीबी से उनका क्या तात्पर्य था ? यह क्या बीमारी थी? इसलिए मैं वहाँ चुपचाप खड़ी रही |” उसने 2004 में सेवरी अस्पताल से 9 महीने का निःशुल्क टीबी का उपचार लिया| (यह उसके रिकॉर्ड के अनुसार है, यद्यपि अपने साक्षात्कार में उसने बताया कि उसने 6 महीने तक दवा खाई)। किन्तु उसने सोचा कि उसका शरीर इस उपचार को स्वीकार नहीं कर रहा था | उसने बताया कि,”मुझे हर समय नींद आती थी| मैं कितनी भी दवाएं खाती थी मेरी दशा पर कोई भी अन्तर नहीं होता था | जीना चढ़ने पर बेहोशी होने लगती | सांस भी फूलने लगती थी |”
2006 में, चक्कर आने और भूख न लगने के कारण, वो पुनः बीमार महसूस करने लगी | अपनी दादी माँ तथा अपने गुरु द्वारा अधिक जोर देने पर वह एक डॉक्टर के पास गई जिन्होने उसे एचआईवी/एड्स होने की जानकारी दी | केईएम एआरटी सेंटर में, 2007 में उसे ऐन्टीरेट्रोवाइरल थेरेपी (एआरटी) पर रक्खा गया |

लेकिन कुछ समय बाद उसे फिर खाँसी आने लगी और वो काफी कमजोरी महसूस करने लगी | उसका वजन कम हो गया | उसे कुछ भी खाने का मन नहीं होता था और उल्टी महसूस होती थी | इसलिए वह फिर अस्पताल गई, जहाँ रक्त की जाँच हुई और उसे 2009 में सेवरी के उसी अस्पताल में दुबारा 6 माह के लिए एआरटी पर रहना पड़ा | उसने डाक्टर द्वारा बताई सभी सावधानियाँ बरती | उन्होने उसको ठंडी वस्तुओं से परहेज करने को कहा | अतः उसने ठंडा पानी पीना और  फ्रिज में रक्खा खाना या फल लेना बन्द कर दिया | उसने सोचा कि ऐसा करने पर उसकी बीमारी पर नियंत्रण हो जायेगा, लेकिन सभी सावधानियों के बाद भी उसकी खाँसी दूर नहीं हुई |

चन्द्रिका यह न समझ सकी कि इतनी अच्छी दवाएँ लेने के बाद भी उसको दवा का दूसरा कोर्स क्यों लेना पड़ा ? जब उसने डॉक्टर से पूछा तो उन्होने बताया कि उनको यह विश्वास नहीं है कि उसने पहले दवाएँ सुचारु रूप से ली थीं | डॉक्टर ने उसे विश्वास दिलाया कि उसकी खाँसी 6-7 माह बाद ठीक हो जायेगी| लेकिन ऐसा नहीं हुआ| उसकी हालत नहीं सुधरी और वो बहुत बीमार महसूस करने लगी | तब वह केईएम अस्पताल गई, जहाँ एआरटी पर वह पहले रह चुकी थी | लेकिन वहाँ केवल जांच और एचआईवी की चिकित्सा की गई ,टीबी की नहीं | वहाँ से 2010 में वह एमएसएफ भेजी गई | एमएसएफ में उनको डीआर-टीबी होने का संदेह हुआ, कल्चर जाँच की गई जो पॉज़िटिव निकली| अब उसकी डीआर-टीबी की चिकित्सा आरम्भ हुई|

इस प्रकार काफी जद्दोजहद के पश्चात सन 2010 में उसका डीआर-टीबी के लिये दो वर्षो का उपयुक्त उपचार प्रारम्भ हो सका | डीआर-टीबी की चिकित्सा के प्रारम्भ में उसे अनेकों परेशानियों का सामना करना पड़ा| उसके शब्दों में, “मुझे हर समय उल्टी सी महसूसहोती थी, भूख नहीं लगती थी | 9 गोलियां खाना वास्तव में एक यंत्रणा थी| मैं सोचती थी कि इतनी अधिक दवाएँ खाने से तो मर जाना बेहतर है | मुझे रोज़ इंजेक्शन भी लगवाने होते थे |” लेकिन अपनी दादी माँ के प्यार और देखभाल के कारण वह यह सब झेलती गई| वह उन दिनों की याद करते हुए बताती है कि,”मेरी दादी दवाएँ खाने के लिये मुझे जोर देती रहती थीं |वो कहती थीं कि ठीक होने के लिये मुझे दवा अवश्य खानी चाहिये| अतः उनके जोर देने के बाद दवा खाने के बाद मैं एक से तीन घंटे चलती थी और एक घंटा सोती थी | इस एक घंटे की नींद के बाद मैं बेहतर महसूस करती थी |”

चन्द्रिका ने अपनी चिकित्सा का कठिन दौर पूरा कर लिया है पर अभी उपचार जारी है | अब उसने दवाओं का पूरा कोर्स लेने का द्रढ़-निश्चय कर लिया है | उसे डर है कि, “यदि मैं दवा छोड़ती हूँ तो मर जाऊँगी और अब दवा छोड़ने पर इतने सालों से उपचार करने का क्या लाभ होगा? यदि पूरा कोर्स नहीं करती हूँ तो टीबी फिर से हो सकती है | मैं चिकित्सा जारी रक्खूंगी और इसे बीच में नहीं छोड़ूँगी|” अपनी बीमारी के कारण, अपनी बिरादरी में हुये भेदभाव को वह याद करते हुये बताती है कि उसके अपने ही लोग उसे नीचा देखते थे और उसके साथ अछूत-सा व्यवहार करते थे| वो सब उससे दूर रहते थे | अगर वह किसी से अपने बालों में तेल लगाने को कहती थी तो वो उसे भगा देते थे |वह अपने गाँव या अन्य कहीं भी नहीं जा सकती थी | वह घर के अंदर ही रहती थी और किसी के साथ नहीं बैठ सकती थी | वह काम के लिये भी बाहर नहीं जा सकती थी |

एमएसएफ में आने के कारण अब उसकी हालत में सुधार हो गया है | उसे लगता है कि यहाँ मिलने वाली दवा दूसरे तरह की हैं | अब खाँसी नहीं है और उसे भूख भी लगने लगी है | सबसे अच्छी बात तो यह है कि उसकी बिरादरी ने भी अब उसे स्वीकार कर लिया है | उनके द्वारा अब वह अपमानित नहीं होती है |एक बार पुनः उन लोगों ने उससे अच्छी तरह से बात करना शुरू कर दिया है | वे उसकी प्रशंसा में कहते हैं,”अब तुम बहुत खूबसूरत लगती हो चंद्रिका, तुम अपने पुराने रूप में आ गई हो | अब तुम्हें नज़र न लगे |”

वह बहुत खुश है कि उसके परिचित अब उसको पहले की भाँति प्यार करते हैं और अब वह भी अपनी जिन्दगी में रुचि लेने लगी है | इसके लिए वह एमएसएफ के सारे कार्यकर्ताओं की आभारी है | उसका सबके लिये यह संदेश है कि किसी को टीबी के प्रति लापरवाह नहीं होना चाहिए उसके अनुसार,” कुछ लोग टीबी के उपचार में ध्यान नहीं देते हैं और अपनी जिन्दगी दांव पर लगा देते हैं | लेकिन मैं सोचती हूँ कि दवाएं खाकर तथा चिकित्सा का कोर्स पूरा  कर के स्वस्थ रहना, व्यर्थ में मरने से बेहतर है| इसलिए उन सबको, जिन्हें इसकी आवश्यकता हो, टीबी का उपचार जरूर लेना चाहिये|”

(अंग्रेजी में शोभा शुक्ला के   मूल लेख का  सुश्री माया जोशी द्वारा हिंदी में अनुवाद)

तपेदिक (टीबी) अब एक सूचनीय रोग

[English] तपेदिक या टीबी को एक सूचनीय रोग घोषित करके जहां एक ओर भारत सरकार का पुनरीक्षित राष्ट्रीय टीबी नियंत्रण कार्यक्रम (आरएनटीसीपी) सराहना का पात्र है, वहीं दूसरी ओर उसे उन अनेक सावधानियों का पालन करना भी अनिवार्य होगा जिनके बगैर सभी टीबी रोगियों को उपचार सेवाएँ उपलब्ध कराना संभव नहीं होगा। सरकार के लिए कदाचित खतरे की घंटी तब बजी जब मुंबई में अत्यधिक औषधि प्रतिरोधक टीबी ( टोटली ड्रग रेसिस्टेंट टीबी) के मामले सामने आए, जिसके फलस्वरूप भारत सरकार ने टीबी को सूचनीय रोगों में शामिल करने का निर्णय लिया।

इसके कुछ सकारात्मक परिणाम अवश्य निकलेंगे—जैसे कि सभी निजी डाक्टरों, स्वास्थ्य प्रबन्धकों, प्रयोगशालाओं एवं अन्य देखभाल करने वालों को प्रत्येक टीबी केस की सूचना सरकार को देनी होगी, जिससे देश में टीबी रोग की स्थिति का वास्तविक विश्लेषण हो सकेगा कि देश में टीबी रोगियों की संख्या कितनी है, उनमें से कितने सरकारी उपचार सेवाओं का लाभ उठा रहे हैं, और कितने निजी क्षेत्र के डाक्टरों से उपचार ले रहे हैं। इस प्रकार की अन्य जानकारी प्राप्त होने से जन स्वास्थ्य संबंधी सकारात्मक नतीजे निकाल सकते हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय के टीबी डिवीज़न के महानिदेशक डा अशोक कुमार ने आईबीएन लाइव टीवी न्यूज़ में कहा कि, “टीबी केसों की सम्पूर्ण जानकारी होना बहुत आवश्यक है।अत: सभी स्वास्थ्यकर्मी अपने क्षेत्र के प्रत्येक टीबी रोगी की जानकारी प्रत्येक माह एक निर्धारित प्रपत्र पर स्थानीय अधिकारियों, जैसे जिला स्वास्थ्य अधिकारी,मुख्य चिकित्सा अधिकारी, नगरपालिका के स्वास्थ्य अधिकारी को अनिवार्यत: प्रदान करेंगे”।

परंतु इस नियम के दु:खद परिणाम भी हो सकते हैं, विशेषकर उन लोगों के लिए जिन्हें टीबी उपचार सेवाएँ अभी उपलब्ध ही नहीं हैं और जिनकी इस नयी व्यवस्था के चलते अनेक कारणों से भूमिगत होने की संभावना बढ़ने से वे निजी अथवा सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँचने में बाधित हो सकते हैं। इस सबके टीबी नियंत्रण और स्वास्थ्य व्यवस्था पर व्यापक प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकते हैं।

आरएनटीसीपी के अनुसार 2010 में केवल 73% नए टीबी रोगियों की पहचान की जा सकी। इसका तात्पर्य तो यह हुआ कि हमारी सरकारी आरएनटीसीपी व्यवस्था अनुमानित 27% टीबी रोगियों तक नहीं पहुँच पा रही है। क्या टीबी को एक सूचनीय रोग घोषित कर देने से इन रोगियों तक पहुँचने में मदद मिल सकेगी? यह एक गंभीर और विचारणीय प्रश्न है जिसका कोई सीधा उत्तर नज़र नहीं आता है।

इसके अलावा रोगी की निजी गोपनीयता को लेकर भी कई समस्याएँ उठ सकती हैं जैसे इलाज में चूकने वाले रोगियों को ज़बरदस्ती आइसोलेशन वार्ड में अलग रख कर इलाज करना आदि।

इसके अलावा एक और मानव अधिकार संबंधी मुद्दा है। आरएनटीसीपी के आकड़ों के हिसाब से भारत में प्रत्येक वर्ष 100,000 व्यक्ति अति प्रतिरोधक टीबी अथवा मल्टी ड्रग रेसीसीटेंट टीबी (एमडीआर)टीबी के शिकार होते हैं, जिनमें से दिसंबर 2011 तक केवल 3610 रोगियों को आरएनटीसीपी के तहत इलाज उपलब्ध कराया जा सका था। आरएनटीसीपी के अनुसार वह 2013 तक इस संख्या को बढ़ा कर 30,000  एमडीआर टीबी रोगियों का इलाज कर पाने में सक्षम होगा। इसका अर्थ यह हुआ कि प्रत्येक वर्ष 70,000 ऐसे रोगी फिर भी उचित उपचार से वंचित रहेंगे। यह कैसा सामाजिक न्याय है? जब सरकार सभी टीबी रोगियों को इलाज उपलब्ध कराने में असमर्थ है तो केवल टीबी को सूचनीय बनाने से समस्या का हल निकलने के बजाय वह और गंभीर रूप धारण कर सकती है। क्या हमने कभी यह सोचा है इस नियम का उन रोगियों के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ेगा जिन्हें अपनी गोपनीयता को ताक पर रख कर अपने एमडीआर टीबी से ग्रसित होने की सूचना तो सरकार को देनी है, पर उसको इलाज नहीं मिल सकता? वर्तमान में केवल 3% से कम एमडीआर रोगियों को सरकारी इलाज की सुविधा मिल पा रही है, और बाकी 97% को किसी भी प्रकार उपचार, देखभाल और सहायता नहीं मिल पा रही है जिसकी उन्हें नितांत आवश्यकता है। इसके अलावा उन समुदायों (जैसे एड्स के साथ जीवित व्यक्ति, इंजेक्टिंग ड्रग यूजर्स, अवैध प्रवासी आदि) जिनमें टीबी होने का खतरा अधिक है, पर भी इस नियम के विपरीत प्रभाव ही पड़ने की संभावना है।

एक विशेषज्ञ  के अनुसार “आरएनटीसीपी को नागरिक समाज के साथ मिल कर इस विषय पर एक खुले मंच पर परिचर्चा और बहस करने के बाद ही यह तय करना चाहिए कि टीबी को एक अनिवार्य सूचनीय रोग घोषित करने की नीति के टीबी रोगियों पर क्या परिणाम हो सकते हैं। यदि इस नीति का सही तरह से परिपालन नहीं किया गया तो रोगियों को सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ सकता है जिसके चलते उनके भूमिगत होने अथवा देर से उपचार की मांग करने की संभावना बढ़ सकती है। कम से कम सरकार को इस विषय पर एक वार्तालाप तो करना चाहिए कि इस नीति का किस प्रकार प्रतिपालन किया जाय जिससे रोगी को चिकत्सीय गोपनीयता, मानसिक अवलंबन, और उचित इलाज मिल सके जैसा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशा निदेशों में इंगित है”।

केवल टीबी को सूचनीय रोग घोषित करने से ही समस्या का हल नहीं निकलेगा। एक सार्थक टीबी नियंत्रण कार्यक्रम में टीबी से प्रभावित समुदायों को टीबी कार्यक्रमों का एक अहम हिस्सा मान कर उनकी बराबर की मर्यादित साझेदारी होना; उन्हे उच्च कोटी का परामर्श मिलना; बेहतर उपचार एवं स्वास्थ्य साक्षरता होना, समाज में व्याप्त टीबी संबन्धित भेदभाव दूर करना; उपचार पद्यति में डाट्स प्रोग्राम से कुछ अलग हट कर सोचना; टीबी कार्यक्रमों का अन्य विकास कार्यक्रमों (जैसे पोषण, स्वच्छता, दवाओं का दुरुपयोग, एड्स, डायबिटीज़ आदि) से एकीकरण करना; और स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृद करना नितांत आवश्यक है। तभी हम समाज से टीबी का प्रकोप दूर करने में सक्षम हो सकेंगे। 

शोभा शुक्ला एवं बाबी रमाकांत - सी.एन.एस.
(लेखक ऑनलाइन पोर्टल सी.एन.एस. के संपादक हैं। ईमेल: stoptb@citizen-news.org)

दमा को अपने दम से वश में कीजिये

42 वर्षीय राशिद अली, एक मध्यमवर्गीय परिवार से हैं और लखनऊ में जरदोज़ी के काम का बिजनेस करते हैं। 1990 में उन्हें टीबी हो गई थी जिसका 18 महीने तक इलाज चला था। पिछले 8 सालों से दमा (अस्थमा) से ग्रस्त होने के बावजूद वे एक सामान्य जीवन बिता रहे हैं। उन्होने बताया कि, ‘मैं अब बिलकुल ठीक हूँ, और रोज़मर्रा की ज़िंदगी में मुझे कोई परेशानी नहीं है। इसके लिए मैं अपने डाक्टर का शुक्रगुजार हूँ, जिनके सही इलाज और उम्दा देखरेख की वजह से ही मैं अपने दमे पर काबू पा सका हूँ। उन्होने मुझे एक इन्हेलर दिया है जिसका अब मुझे कभी कभार ही इस्तेमाल करना पड़ता है। शुरू शुरू में ज़्यादा इस्तेमाल करना पड़ता था। उन्होने मुझे कभी खाने की गोली नहीं दी। इन्हेलर के जरिये ही दवा मेरी साँस की नली में जाती है। इसमें तकरीबन हर महीने 150 रुपये का खर्च आता है। मैं और मेरे घरवाले खुदा के शुक्रगुजार हैं कि मुझे एक उम्दा डाक्टर से सही इलाज मिल सका”। 

राशिद भाई दुनिया भर में अस्थमा (दमा) से जूझ रहे 23.5 करोड़ लोगों में से एक हैं। वैश्विक स्तर पर प्रत्येक 250 मौतों में एक का कारण अस्थमा ही है। भारत में दमा के लगभग 240 लाख रोगी हैं, जो विश्व भर के दमा रोगियों का 10% है। भारतीय बच्चों में 2% से लेकर 12% बच्चे इस श्वास रोग से प्रभावित हैं। अस्थमा एक यूनानी शब्द है, जिसका अर्थ होता है ‘साँस का फूलना’। दमा रोग के मुख्य लक्षण हैं खाँसी और साँस का फूलना जो ऐलर्जी पैदा करने वाले तत्वों के कारण भीषण रूप धारण कर लेते हैं। अनुवांशिक कारणों के अलावा अनेक ऐसे बाहरी तत्व हैं, जो फेफड़े के अंदर एलर्जी पैदा करके अस्थमा के लक्षणों को तीव्र कर देते हैं, जैसे फूल के पराग कण, धूल, सिगरेट का धुआँ, ट्रैफिक का धुआँ, आदि। इसके साथ ही मानसिक तनाव, कुछ खाड़ी पदार्थ, मोटापा, मौसम में बदलाव भी अस्थमा के कारण हो सकते हैं। 

चूँकि अस्थमा के लक्षण अन्य श्वास रोगों, जैसे टीबी, से मिलते जुलते हैं, इसलिए इस रोग की सही पहचान करने में अक्सर बाधा आती है, (विशेषकर बच्चों में), जिसके कारण इस रोग का उपचार या तो हो ही नहीं पाता या विलंब से होता है। लखनऊ के वरिष्ठ चेस्ट रोग विशेषज्ञ डा बी बी सिंह जी के अनुसार, “यदि बच्चे को निरंतर खांसी और श्वासनली के ऊपरी भाग का संक्रमण हो तो अक्सर चिकित्सक उसे गलती से प्राइमरी कांप्लेक्स समझ कर टीबी का इलाज शुरू कर देते हैं। यह बेहद चिंता का विषय है, क्योंकि इस प्रकार न केवल रोग की गलत पहचान होती है, वरन दवा का दुरुपयोग भी होता है”।

अस्थमा का इलाज तो मुमकिन नहीं है, परंतु इसका नियंत्रण सहजता से संभव है। अत: अस्थमा के बारे में लोगों को उचित जानकारी दे कर जागरूक करने की आवश्यकता है, ताकि वे एक स्वस्थ और सामान्य जीवन जी सकें। डा सिंह का कहना है कि, “समस्या यह है कि जन साधारण में अस्थमा संबधित पर्याप्त जागरूकता का अभाव है और अधिकांश अस्थमा रोगियों को उच्च कोटी की उचित चिकित्सीय सुविधाएं उपलब्ध नहीं हो पाती हैं। मुंबई में हुए एक शोध के अनुसार अनेक चिकित्सकों में भी अस्थमा संबंधी इलाज एवं नियंत्रण के बारे में पर्याप्त ज्ञान नहीं था। अस्थमा का सही नियंत्रण इन्हेलर के द्वारा ही संभव है। इन्हेलर प्रणाली द्वारा कोर्टिकोस्टीरोयड दवा को श्वास में अंदर लेने से दमा पूर्ण रूप से नियंत्रित रहता है और इन्हेलर के दीर्घकालीन सेवन से भी न तो कोई विपरीत लक्षण (साइड इफेक्ट) होते हैं न ही इसका नशा होता है। द यूनियन के फेफड़े विभाग के निदेशक डा चियांग सेन युआन के अनुसार, “इन्हेलर के जरिये कोर्टिकोस्टीरोयड को श्वास में अंदर लेने से अधिकांश रोगी अस्थमा को नियंत्रित कर एक सामान्य जीवन व्यतीत कर सकते हैं। परंतु दुर्भाग्य की बात है कि अधिकांश अस्थमा रोगियों को इन्हेलर कोर्टिकोस्टीरोयड उपलब्ध नहीं है। एक शोध के अनुसार विश्व भर के 20% से भी कम अस्थमा के रोगी इस सर्वोत्तम अस्थमा नियंत्रक प्रणाली का लाभ उठा पाते हैं। अनेक विकासशील देशों में या तो ये इन्हेलर बहुत महँगे हैं या फिर जनसाधारण एवं चिकित्सकों को इनके बारे में उचित जानकारी नहीं है”। 

भारत में भी 70% से अधिक रोगी खाने वाली गोली के रूप में अस्थमा की दवा का प्रयोग करते हैं, जो इन्हेलर के समान असरदार नहीं होती है और जिसके खतरनाक साइड इफेक्ट होते हैं। डा सिंह के अनुसार इसका मुख्य कारण है रोगियों और चिकित्सकों में समुचित जानकारी का अभाव, तथा जन साधारण में अस्थमा को लेकर प्रचलित भ्रांतियाँ जैसे इन्हेलर की लत पड़ जाती है, इसके विपरीत प्रभाव होते हैं, इसका नियमित इस्तेमाल मुश्किल है, आदि। वास्तविकता तो यह है कि इन्हेलेशन थेरेपी में दवा की मात्रा बहुत कम (माइक्रो ग्राम) होती है तथा इन्हेलर के द्वारा यह सारी की सारी  औषधि सीधे फेफड़ों में पहुँचती है जहाँ उसकी आवश्यकता होती है। शरीर के बाकी अंग उसके प्रभाव से अछूते रहते हैं। फिर साइड इफेक्ट का तो प्रश्न ही नहीं उठता।  इसके विपरीत गोली के रूप में मुँह से दवा खाने पर, उसमें औषधि की मात्रा तो 10 गुना अधिक (मिलीग्राम में) होती है, परंतु  केवल 1% दवा ही फेफड़ों में पहुँच पाती है और बाकी रक्त में मिल कर शरीर के अन्य हिस्सों में पहुँच कर उन्हें नुकसान पहुंचाती है। इससे खाने वाली दवा का असर भी कम होता है और साइड इफेक्ट भी कहीं ज़्यादा होते हैं। यह बात दमा के रोगियों को समझना बहुत ज़रूरी है।  

छत्रपती शाहूजी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय के पलमोनरी मेडिसिन विभाग के प्रमुख प्रोफेसर (डा) सूर्यकांत के अनुसार, “इन्हेलर द्वारा की जाने वाली चिकित्सा प्रणाली पर प्रति दिन मात्र 4-5 रुपये का खर्च आता है, इसलिए अस्थमा का इन्हेलर द्वारा उपचार बहुत ही सस्ता है। इन्हेलर हमारे चश्मे की तरह हैं। जिस प्रकार आँखें कमजोर हो जाने पर हम बेझिझक चश्मा पहनते हैं, उसी प्रकार श्वासनली कमजोर हो जाने पर हमें इन्हेलर का नियमित इस्तेमाल करने में कोई झिझक नहीं होनी चाहिए। जैसे हम रोज़ अपने दाँतों को टूथपेस्ट से साफ करते हैं, उसी प्रकार अस्थमा के रोगी को सुबह शाम इन्हेलर का प्रयोग करके एक सामान्य जीवन जीना चाहिए। इसके साथ साथ जल नेति (पानी से नाक के अंदर की सफाई) करने से अस्थमा को बढ़ावा देने वाले एलर्जी तत्व साफ हो जाते हैं।”

उचित उपचार करने के साथ साथ अस्थमा के रोगी को ऐसे कारणों से बचना चाहिए जिनसे अस्थमा तीव्र हो सकता है, जैसे तंबाकू/सिगरेट का धुआँ, धूल, पराग कण, मानसिक तनाव, अधिक परिश्रम, आदि। यदि अस्थमा नियंत्रण प्रभावकारी और व्यवस्थित ढंग से अविलम्ब नहीं किया गया तो इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। न केवल अस्थमा रोगी को एक स्वस्थ और सामनी जीवन-यापन करने का अधिकार है, वरन अस्थमा नियंत्रण सरल भी है, यदि इसे सुचारु रूप से लागू किया जाय। यूनियन की सलाहकार प्रोफेसर नादिया के शब्दों में, “समय रहते अस्थमा का निदान तथा दीर्घ कालिक प्रबंधन करके हम न केवल अस्थमा रोगियों को एक आम और स्वस्थ सामाजिक एवं व्यावसायिक जीवन प्रदान कर सकते हैं, वरन अस्पताल और दवा पर हो रहे उनके निजी और सरकारी अनावश्यक आर्थिक खर्चों को भी कम कर सकते हैं”।  

शोभा  शुक्ला -सी.एन.एस  

अस्थमा/ दमा कार्यक्रम की अब और न उपेक्षा हो

इंटरनेशनल यूनियन अगेन्स्ट टूबेर्कुलोसिस अँड लंग डीसीज़ (द यूनियन) की ‘ग्लोबल अस्थमा रिपोर्ट 2011’ के अनुसार बच्चों की दीर्घकालिक बीमारियों में से सबसे अधिक अनुपात अस्थमा/ दमा का है। विश्व में 23.5 करोड़ लोग अस्थमा से प्रभावित हैं। 'द यूनियन' के निदेशक डॉ निल्स बिल्लो के अनुसार “अस्थमा नियंत्रण न करने के कारण जो संसाधन व्यर्थ जाते हैं और जितनी पीड़ा लोगों को झेलनी पड़ती है उसकी कीमत प्रभावकारी अस्थमा नियंत्रण से कहीं ज्यादा है”।

अधिकांश अस्थमा के रोगी आकस्मिक चिकित्सा सेवा में ही आते हैं जब तीव्र अस्थमा अटैक पड़ता है। यदि अस्थमा के रोगियों के पास गुणात्मक दृष्टि से उत्तम और आर्थिक रूप से वहन करने योग्य कीमत पर ‘इन्हेलर’ उपलब्ध हों तो अस्थमा नियंत्रित रह सकता है। परंतु अधिकांश अस्थमा से जूझ रहे लोगों तक गुणात्मक दृष्टि से उत्तम, प्रभावकारी और सस्ते ‘इन्हेलर’ नहीं पहुँचते। स्वास्थ्य प्रणाली में अस्थमा नियंत्रण से संबन्धित प्रशिक्षण और एक प्रभावकारी अस्थमा नियंत्रण कार्यक्रम का भी अभाव है।

भारत में अस्थमा: भारत में 2.4 करोड़ लोग अस्थमा से जूझ रहे हैं जिनमें से 11.8% तक बच्चे हैं। अस्थमा के सबसे समान लक्षण ख़ासी, सांस फूलना है जो एलर्जी पैदा करने वाले तत्वों से अधिक भीषण होता है।  आनुवांशिक कारणों के अलावा अनेक बाहरी ऐसे तत्व हैं जो ऐलर्जी पैदा करने से अस्थमा को तीव्र करते हैं जैसे कि फूल का पोलन, धूल, तंबाकू धुआँ, लकड़ी के चूल्हे का धुआँ, ट्रेफिक धुआँ, और अन्य कारण जैसे कि मानसिक तनाव, विशेष भोजन सामग्री, ऐसिडिटी, मोटापा, मौसम बदलाव, आदि। 

चूंकि अस्थमा के लक्षण अन्य रोग जैसे कि टीबी आदि से मिलते-जुलते हैं इसलिए अस्थमा की सही पहचान करने में अकसर बाधा आती है (विशेषकर बच्चों में) और अस्थमा की चिकित्सकीय पहचान, उपचार नहीं होता या विलंब से होता है। लखनऊ के वरिष्ठ चेस्ट रोग विशेषज्ञ डॉ बी.पी.सिंह के अनुसार “यदि बच्चे को निरंतर खांसी और श्वासनली के ऊपरी भाग का संक्रमण हो तो अकसर चिकित्सक उसे गलती से ‘प्राइमरी कॉम्प्लेक्स’ समझ कर टीबी का इलाज आरंभ कर देते हैं। यह बेहद चिंता का विषय है क्योंकि ऐसे केस में न केवल रोग की गलत पहचान हो जाती है बल्कि दवा का भी दुरुपयोग हो जाता है”।

अस्थमा का इलाज मुमकिन नहीं है परंतु इसका नियंत्रण सहजता से संभव है। इसीलिए अस्थमा के साथ जीवित लोगों की जागरूकता आवश्यक है जिससे कि वें स्वस्थ और सामान्य ज़िंदगी जी सकें। डॉ बी.पी.सिंह का कहना है कि “समस्या यह है कि आम लोगों में अस्थमा संबन्धित जागरूकता पर्याप्त नहीं है और अधिकांश अस्थमा रोगी ऐसे उपयुक्त अस्पताल जहां अस्थमा संबन्धित चिकित्सकीय सेवा सही से मिल पाये, तक नहीं पहुँच पाते। मुंबई में हुए शोध के अनुसार अनेक चिकित्सकों तक को अस्थमा का चिकित्सकीय इलाज/ नियंत्रण संबन्धित पर्याप्त ज्ञान नहीं था”।

‘इन्हेलर’: अस्थमा नियंत्रण का सही तरीका ‘इन्हेलर’ के जरिये है। कोर्टिको-स्टीरोइड को ‘इन्हेलर’ द्वारा श्वास में अंदर लेने से अस्थमा नियंत्रित रहता है, और यह ‘इन्हेलर’ का उपयोग नशा नहीं होता और कोई अन्य विपरीत लक्षण (साइड इफैक्ट) भी नहीं होता। द यूनियन के फेफड़े-रोग विभाग के निदेशक डॉ चियांग चेन युआन के अनुसार “‘इन्हेलर’ के जरिये कोर्टिको-स्टीरोइड को श्वास द्वारा अंदर लेने से अधिकांश अस्थमा रोगी अस्थमा नियंत्रित कर सकते हैं। दुर्भाग्य की बात है कि अधिकांश अस्थमा रोगी कोर्टिको-स्टीरोइड को ‘इन्हेलर’ द्वारा नहीं ले पाते। शोध के अनुसार 20% से कम अस्थमा रोगी कोर्टिको-स्टीरोइड को ‘इन्हेलर’ द्वारा ले पाते हैं”।

भारत में 70% से अधिक अस्थमा रोगी ओरल या मुख से दवा लेते है (और न कि ‘इन्हेलर’ से)। डॉ बी.पी.सिंह के अनुसार “भारत में अस्थमा रोगी अकसर कोर्टिको-स्टीरोइड को ‘इन्हेलर’ द्वारा श्वास में नहीं ले पाते हैं क्योंकि चिकित्सकीय परामर्श का अभाव है, लोग दवा नियमित नहीं लेते, या इस दवा से संबन्धित अनेक भ्रांतियाँ है जैसे कि इससे विपरीत लक्षण या साइड इफैक्ट होंगे आदि”।

अस्थमा देखभाल और नियंत्रण मुमकिन है: छत्रपति शाहूजी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय के पलमोनरी मेडिसिन विभाग के प्रमुख प्रोफेसर (डॉ0) सूर्य कान्त के अनुसार “‘इन्हेलर’ द्वारा दी गयी दवा की कीमत रुपया 4-5 प्रति दिन आती है और अस्थमा इलाज इसीलिए सबसे सस्ते इलाजों में से एक है। ‘इन्हेलर’ चश्मे की तरह हैं, जैसे कि जिस व्यक्ति की आँख कमजोर हो वो चश्मा लगाता है उसी तरह जिस व्यक्ति की ‘ब्रोंकीयल नली’ कमजोर है वो ‘इन्हेलर’ का उपयोग करता है। जिस तरह हम लोग रोजाना दंत मंजन करते हैं उसी तरह अस्थमा रोगी को सुबह और शाम ‘इन्हेलर’ से दवा लेनी चाहिए। इससे अस्थमा नियंत्रण प्रभावकारी ढंग से हो पाएगा। जल-नेति करने से भी ऐलर्जी पैदा करने वाले तत्व साफ हो जाते हैं। अस्थमा रोगी को अन्य ऐसे कारण जिनसे अस्थमा तीव्र हो सकता है जैसे कि तंबाकू धुआँ, मानसिक तनाव, आदि से भी बचना चाहिए”।

हमारा मानना है कि यदि अस्थमा नियंत्रण प्रभावकारी और व्यवस्थित ढंग से बिना विलंब नहीं किया गया तो इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। न केवल अस्थमा रोगी को स्वस्थ और सामान्य जीवन-यापन करने का अधिकार है बल्कि अस्थमा नियंत्रण सरल भी है बशर्ते कार्यक्रम समुचित  ढंग से लागू किया जाये।

बाबी रमाकांत - सी.एन.एस.

भारत में दवा प्रतिरोधक टीबी के बढ़ते हुए प्रकोप को चाहिए अधिक प्रतिक्रिया

“भारत में दवा प्रतिरोधक टीबी के बढ़ते हुए प्रकोप को देखते हुए यह अत्यावश्यक हो गया है कि टीबी उपचार एवं निजी बाज़ार में टीबी दवाओं के नियंत्रण से संबन्धित समस्याओं का तुरंत निराकरण किया जाय”। ऐसा मानना है ‘मेडिसिन्स सांस फ़्रंटियर (एमएसएफ)/सीमा रहित डाक्टर’ नामक अंतर्राष्ट्रीय चिकित्सीय मानवतावादी संस्था का, जिसका अनुमोदन जन स्वास्थ्य अभियान, स्टॉप टीबी पार्टनरशिप, तथा दिल्ली नेटवर्क आफ पोसिटिव पीपुल (डीएनपी+) ने भी किया है।
     
औषधि प्रतिरोधक टीबी के रोगियों की संख्या के अनुसार भारत का विश्व में दूसरा स्थान है, तथा अनुमानत: भारत में प्रत्येक वर्ष औषधि प्रतिरोधक (ड्रग रेजिस्टेंट) टीबी अथवा डीआर टीबी के 99,000 नए रोगी होते हैं। परंतु फिर भी 2010 में इनमें से केवल 2% रोगियों को ही राष्ट्रीय कार्यक्रम के अंतर्गत ‘सेकंड लाइन ट्रीटमेंट’ उपलब्ध हो पाया।
     
जन स्वास्थ्य अभियान के डा अमित सेनगुप्ता के अनुसार, “यह बात तो साफ है कि भारत में दवा प्रतिरोधक टीबी का संक्रमण बढ़ रहा है। औषधि प्रतिरोधकता के आविर्भाव की स्थितियाँ निजी स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र तथा सरकारी कार्यक्रमों, दोनों में व्याप्त हैं"।

भारत के संशोधित राष्ट्रीय टीबी नियंत्रण कार्यक्रम (आरएनटीसीपी) के अंतर्गत टीबी रोगियों को प्रतिदिन के स्थान पर एक दिन के अंतराल पर दवा दी जाती है। इससे दवा की खुराक छूट जाने का खतरा बढ़ जाता है जो दवा प्रतिरोधक टीबी कीटाणुओं की उत्पत्ति को बढ़ावा देता है। इसके अलावा यह कार्यक्रम ऐसे उपचार परामर्श पर भी पैसे खर्च नहीं करता जो नियमित दवा लेने में सहायक हो सकता है।
     
डीएनपी+ के हरी शंकर के अनुसार, “आरएनटीसीपी का ‘डाट्स’ माडल अपनी टीबी उपचार पद्धति के द्वारा रोगियों को अपना इलाज पूरा करने की क्षमता और प्रोत्साहन नहीं प्रदान करता है, जिसके चलते इलाज में व्यवधान की संभावना बढ़ जाती है। यह न केवल रोगियों के लिए हानिकारक है, वरन औषधि प्रतिरोधकता का भी विस्तार करती है। उचित परामर्श के चलते ही मेरे जैसे अन्य एड्स रोगी स्वयं ही अपनी एचआईवी दवाओं की बंधी हुई खुराक रोज़ खा लेते हैं - बिना किसी स्वास्थ्यकर्मी के सामने जाये। टीबी कार्यक्रम को भी ऎसी उपचार संहिता  (प्रोटोकॉल) बनानी चाहिए जो सरल हो तथा जिन पर आसानी से अमल किया जा सके। इसमें रोगी को उचित परामर्श देना भी शामिल होना चाहिए, जैसा कि एड्स उपचार के लिए किया गया है।“
     
एमएसएफ के मुंबई स्थित एचआईवी क्लीनिक में एड्स के रोगी अधिकतर काफी खराब हालत में पहुँचते हैं तथा अक्सर उनकी डीआर टीबी का इलाज शुरू होने से पहले ही उनकी मृत्यु हो जाती है। इनमें से अधिकांश अपना इलाज प्राइवेट सेक्टर में करा चुके होते हैं जहां टीबी की उचित दवा और खुराक न मिलने के कारण उनकी हालत बिगड़ जाती है।
     
एमएसएफ के भारत स्थित कार्यालय के प्रमुख पिएरो गंदीनी का मानना है कि, “प्राइवेट मार्केट में विभिन्न प्रकार की टीबी दवाओं की प्रचुरता तथा बिना डाक्टर के पर्चे के एंटीबायोटिक्स की सरल उपलब्धता (जिनमें से कुछ डीआर टीबी के इलाज में भी प्रयोग की जाती हैं) ही औषधि प्रतिरोधकता की वृद्धि को बढ़ावा देती है। डीआर टीबी के गंभीर स्वरूप के बढ़ते हुए फैलाव को रोकने के लिए यह नितांत आवश्यक है कि प्राइवेट सेक्टर में टीबी दवाओं की बिक्री और संचालन को नियंत्रित किया जाय। “स्टॉप टीबी पार्टनरशिप की ब्लेसिना कुमार ने कहा, “पूरे विश्व की निगाहें भारत में डीआर टीबी के बढ़ते हुए संकट पर लगी हैं। अब जब हमारे पास ऐसी नई जाँचें उपलब्ध हैं जिनके द्वारा 2 घंटे से भी कम समय में डीआर टीबी की पक्की जांच की जा सकती है, तो अब सही समय है कि सरकार तुरंत ही आवश्यक कदम उठा कर अपने राष्ट्रीय कार्यक्रम में डीआर टीबी के निदान और उपचार की उपलब्धता की समुचित व्यवस्था कराये, ताकि अधिक से अधिक रोगियों को उचित मात्रा में दवा मिल सके और भारत में इस बीमारी का प्रकोप कम हो सके।“
     
ज्ञात रहे कि सदियों पुरानी बीमारी होने के बावजूद, वर्तमान में विश्व स्तर पर मृत्यु का दूसरा सबसे बड़ा कारण टीबी रोग ही है, और टीबी का इलाज करने वाली फ़र्स्ट लाइन ड्रग्स के प्रतिरोधी रोगियों की संख्या में वृद्धि हो रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रत्येक वर्ष भारत में टीबी से 20 लाख नए रोगी ग्रसित होते हैं जो विश्व भर में सबसे अधिक है, तथा डीआर टीबी के प्रति वर्ष 99,000 नए रोगी बनने के कारण इस बीमारी में भारत का स्थान विश्व में दूसरे नंबर पर है। डीआर टीबी: यह टीबी का वो प्रकार है जो प्रथम चरण (फ़र्स्ट लाइन) टीबी औषधियों का प्रतिरोधी है। रोगी डीआर टीबी से प्रत्यक्ष रूप से संक्रमित हो सकता है अथवा यह उसमें तब विकसित होती है जब टीबी की प्रथम चरण दवाएं या तो उचित मात्रा में न ली गई हों या उपचार की अवधि पूरी न की गई हो। भारत में डीआर टीबी की समस्या को अधिक गंभीर बनाने में अनियंत्रित निजी स्वास्थ्य सेवा का बहुत बड़ा योगदान है, जहां अविवेकपूर्ण ढंग से और अनुचित मात्रा में दवा निर्धारित किए जाने के कारण दवा प्रतिरोधकता बढ़ती है और साथ साथ डीआर टीबी भी। एक अध्ययन के अनुसार भारत में 4 फ़र्स्ट लाइन टीबी औषधियों के 48 विभिन्न प्रकार के ‘फिक्स्ड डोसेज कांबिनेशन’ एवं 22 विभिन्न ‘सिंगल ड्रग निरूपण’ उपलब्ध हैं।
    
डीआर टीबी का उपचार पुरानी एंटी बायोटिक्स पर निर्भर करता है, जिनके विकट दुष्प्रभाव होते हैं, जैसे जी मिचलाना, बहरापन, मनोविकृति, आदि। रोगी को दो वर्ष तक प्रत्येक दिन 17 गोलियां खानी होती हैं और 6 महीने तक कष्टदायक इंजेक्शन भी लगवाने पड़ते हैं।

एमएसऍफ़ नामक अंतर्राष्ट्रीय चिकित्सीय मानवतावादी संस्था लगभग 70 देशों में अति संवेदनशील जनसमुदायों को उच्च-कोटि की नि:शुल्क चिकित्सीय सहायता उपलब्ध कराती है, तथा 29 देशों में डीआर टीबी के रोगियों का इलाज करती है.   और हर वर्ष 1000 नए रोगी इस इलाज के लिए भर्ती होते हैं। 2006 से यह संस्था मुंबई के खार इलाके में एड्स के इलाज के लिए एक ‘एंटी रेट्रो वाइरल ट्रीटमेंट (आए.आर.टी.) सेंटर चला रही है, जिनमें उन एचआईवी+ रोगियों पर विशेष ध्यान दिया जाता है जो डीआर टीबी से भी संक्रमित हैं। वर्तमान में इस क्लीनिक में 29 डीआर टीबी के रोगियों का इलाज हो रहा है।

डीआर टीबी के उपचार के लिए बनाई गईं अपनी मेडिकल योजनाओं में एमएसएफ ने समुदाय केन्द्रित मॉडल अपनाया है। एमएसएफ के द्वारा उपचार करा रहे  रोगियों को मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक सहायता मिलती है तथा वे अपने समुदाय में रह कर ही अपना उपचार करवाते हैं। उन्हे इस बात का इख्तियार होता है कि वे अपनी दवा और इंजेक्शन अपने घर पर या घर के पास से ले सकते हैं। यह पद्धति सेवाओं को रोगी की आवश्यकताओं के अनुकूल बनाने की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम है। तथा इससे उनकी यह क्षमता भी बढ़ती है कि दवाओं के विकट दुष्प्रभावों के बावजूद वे अपना 2 साल तक चलने वाला इलाज भली भांति पूरा कर सकें।

शोभा शुक्ला - सी.एन.एस. 

सच्ची मुच्ची - अप्रैल 2012 अंक

सच्ची मुच्ची, जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय की हिन्दी मासिक पत्रिका है। यह सच्ची मुच्ची का अप्रैल 2012 का अंक है।

क्या मायावती का दलित वोट बैंक खिसका है?

हाल में उत्तर प्रदेश में असेम्बली के चुनाव परिणाम घोषित होने पर मायावती ने अपनी हार के कारण गिनाते हुए यह दावा किया था कि बेशक वह यह चुनाव हार गयी हैं परन्तु उसका दलित वोट बैंक बिलकुल बरकरार है. अब अगर चुनाव परिणामों का विश्लेषण किया जाये तो मायावती का यह दावा बिलकुल खोखला साबित होता है.

आईये सब से पहले उत्तर प्रदेश में दलितों कि आबादी देखी जाये और फिर उसमें मायावती को मिले वोटों का आंकलन किया जाये. उत्तर प्रदेश में दलितों कि आबादी कुल आबादी का २१% है और उनमे लगभग ६६ उपजातियां हैं जो सामाजिक तौर पर बटी हुयी हैं. इन उप जातियों में जाटव /चमार - ५६.३%, पासी - १५.९%, धोबी, कोरी और बाल्मीकि - १५.३%, गोंड, धानुक और खटीक - ५% हैं. नौ अति- दलित उप जातियां - रावत, बहेलिया खरवार और कोल ४.५% हैं. शेष ४९ उप जातियां लगभग ३% हैं. चमार/ जाटव आजमगढ़, आगरा, बिजनौर , सहारनपुर, मुरादाबाद, गोरखपुर, गाजीपुर, सोनभद्र में हैं. पासी सीतापुर, राय बरेली, हरदोई, और इलाहाबाद जिलों में हैं. शेष समूह जैसे धोबी, कोरी, और बाल्मीकि लोगों की अधिकतर आबादी बरेली, सुल्तानपुर, और गाज़ियाबाद जनपदों में है.

आबादी के उपरोक्त आंकड़ों के आधार पर अगर मायावती की बसपा पार्टी को अब तक बिभिन्न चुनावों में मिले दलित वोटों और सीटों का विश्लेषण करना उचित होगा. अब अगर वर्ष २००७ में हुए विधान सभा चुनाव का विश्लेष्ण किया जाये तो यह पाया जाता है कि इस चुनाव में बसपा को ८९ अरक्षित सीटों में से ६२ तथा समाजवादी (सपा) पार्टी को १३, कांग्रेस को ५ तथा बीजेपी को ७ सीटें मिली थीं. इस चुनाव में बसपा को लगभग ३०% वोट मिला था. इस से पहले २००२ में बसपा को २४ और सपा को ३५ अरक्षित सीटों में विजय प्राप्त हुई थी. वर्ष २००४ में हुए लोक सभा चुनाव में बसपा को कुल आरक्षित १७ सीटों में से ५ और सपा को ८ सीटें मिली थी और बसपा का वोट बैंक ३०% के करीब था.

वर्ष २००९ में हुए लोक सभा चुनाव में बसपा को आरक्षित १७ सीटों में से २, सपा को १० और कांग्रेस को २ सीटें मिली थीं. इस चुनाव में बसपा का वोट बैंक २००७ में मिले ३०% से गिर कर २७ % पर आ गया था. इसका मुख्य कारण दलित वोट बैंक में आई गिरावट थी क्योंकि तब तक मायावती के बहुजन के फार्मूले को छोड़ कर सर्वजन फार्मूले को अपनाने से दलित वर्ग का काफी हिस्सा नाराज़ हो कर अलग हो गया था. यह मायावती के लिए खतरे की पहली घंटी थी परन्तु मायावती ने इस पर ध्यान देने की कोई ज़रुरत नहीं समझी.

अब अगर २०१२ के विधान सभा चुनाव को देखा जाये तो इस में मायावती की हार का मुख्य कारण अन्य के साथ साथ दलित वोट बैंक में आई भारी गिरावट भी है. इस बार मायावती ८५ आरक्षित सीटों में से केवल १५  ही जीत पायी है जबकि सपा ५५  सीटें जीतने में सफल रही है. इन ८५ आरक्षित सीटों में ३५ जाटव/चमार और २५ पासी जीते हैं. इस में सपा के २१ पासी और मायावती के २ पासी ही जीते हैं मायावती की १६ आरक्षित सीटों में से २ पासी और १३ जाटव/चमार जीते हैं. इस विश्लेषण से स्पष्ट है कि इस बार मायावती की आरक्षित सीटों  पर हार का मुख्य कारण दलित वोटों में आई गिरावट भी है. इस बार मायावती का कुल वोट प्रतिशत २६% रहा है जो कि २००७ के मुकाबले में लगभग ४% घटा है.

मायावती दुआरा २०१२ में जीती गयी १५  आरक्षित सीटों का विश्लेषण करने से पता चलता है कि उन्हें यह सीटें अधिकतर पशिचमी उत्तर प्रदेश में ही मिली हैं यहाँ पर उसकी जाटव उपजाति अधिक है. मायावती को पासी बाहुल्य क्षेत्र में सब से कम और कोरी बाहुल्य क्षेत्र में भी बहुत कम सीटें मिली हैं.

पूर्वी और मध्य उत्तर प्रदेश में यहाँ पर चमार उपजाति का बाहुल्य है वहां पर भी मायावती को बहुत कम सीटें मिली हैं.  मायावती को पशिचमी उत्तर प्रदेश से ७ और बाकि उत्तार प्रदेश से कुल ८ सीटें मिली हैं. इस चुनाव
में यह भी उभर कर आया है कि जहाँ एक ओर मायावती का पासी, कोरी, खटीक, धोबी और बाल्मीकि वोट खिसका है वहीँ दूसरी ओर चमार/जाटव वोट बैंक जिस में लगभग ७०% चमार (रैदास) और ३०% जाटव हैं में से अधिकतर चमार वोट भी  खिसक गया है. इसी कारण से मायावती को केवल पशिचमी उत्तर परदेश जो कि जाटव बाहुल्य क्षेत्र है में ही अधिकतर सीटें मिली हैं. एक सर्वेक्षण के अनुसार मायावती का लगभग ८% दलित वोट बैंक टूट गया है.

मायावती के दलित वोट बैंक खिसकने का मुख्य कारण मायावती का भ्रष्टाचार, कुशासन, विकासहीनता, दलित उत्पीडन की उपेक्षा और तानाशाही रवैया  रहा है. मायावती द्वारा  दलित समस्याओं को नज़र अंदाज़ कर अँधा धुंद मूर्तिकर्ण को भी अधिकतर दलितों ने पसंद नहीं किया है. सर्वजन को खुश रखने के चक्कर में मायावती द्वारा  दलित उत्पीडन को नज़र अंदाज़ करना भी दलितों के लिए बहुत दुखदायी सिद्ध हुआ है. दलितों में एक यह भी धारणा पनपी है कि मायावती सरकार का सारा लाभ केवल मायावती की उपजाति खास करके चमारों/जाटवों को ही मिला है जो कि वास्तव में पूरी तरह सही नहीं है. इस से दलितों की गैर चमार/जाटव उपजातियां प्रतिक्रिया में मायावती से दूर हो गयी हैं. अगर गौर से देखा जाये तो यह उभर कर आता है की मायावती सरकार का लाभ केवल उन दलितों को ही मिला है जिन्होंने मायावती के व्यक्तिगत भ्रष्टाचार में सहयोग दिया है. इस दौरान यह भी देखने को मिला है की जो दलित मायावायी के साथ नहीं थे बसपा वालों ने उन को भी प्रताड़ित किया है. उनके उत्पीडन सम्बन्धी मामले थाने पर दर्ज नहीं होने दिए गए. कुछ लोगों का यह भी आरोप है कि मायावती ने अपने काडर के एक बड़े हिस्से को शोषक, भ्रष्ट और लम्पट बना दिया है जिसने दलितों का भी शोषण किया है. यही वर्ग मायावती के भ्रष्टाचार, अवसरवादिता और दलित विरोधी कार्यों को हर तरीके से उचित ठहराने में लगा रहता है. दलित काडर का भ्रष्टिकरण दलित आन्दोलन की सब से बड़ी हानि है.

 इस के अतिरिक्त बसपा कि हार का एक कारण यह भी है कि मायावती हमेशा यह शेखी बघारती रही है कि मेरा वोट  बैंक हस्तान्तार्नीय है. इसी कारण से मायावती अस्सेम्ब्ली और पार्लियामेंट के  टिकटों को धड़ल्ले से ऊँचे
दामों में बेचती रही और दलित उत्पीड़क, माफिया और अपराधियों एवं धनबलियों को टिकेट देकर दलितों को उन्हें वोट  देने के लिए आदेशित करती रही. इस बार दलितों ने मायावती के इस आदेश को नकार दिया और बसपा को वोट  नहीं दिया. दूसरे दलितों में बसपा के पुराने मंत्रियों और विधायकों के विरुद्ध अपने लिए  ही कमाने के सिवाय आम लोगों के लिए कुछ भी न करने के कारण प्रबल आक्रोश था और इस बार  वे उन्हें हर हालत में  हराने के लिए कटिबद्ध थे. तीसरे मायावती ने सारी सत्ता अपने हाथों में केन्द्रित  करके तानाशाही रवैय्या अपना रखा था जिस कारण उस के मंत्री और विधायक बिलकुल असहाय हो गए थे  और वे जनता के लिए कुछ भी न कर सके  जो उनकी  हार का कारण बना.

मायावती की अवसरवादी और भ्रष्ट राजनीति का दुष्प्रभाव यह है कि आज दलितों को यह नहीं पता है कि उन का दोस्त कौन है और दुश्मन कौन है. उनकी मनुवाद और जातिवाद के विरुद्ध लड़ाई भी कमज़ोर पड़ गयी है क्योंकि बसपा के इस तजुर्बे ने दलितों में भी एक भ्रष्ट और लम्पट वर्ग पैदा कर दिया है जो कि जाति लेबल का प्रयोग केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए ही करता है. उसे दलितों के व्यापक मुद्दों से कुछ लेना देना नहीं है. एक विश्लेषण के अनुसार उत्तर प्रदेश के दलित आज भी विकास की दृष्टि से बिहार, उड़ीसा और मध्य प्रदेश के दलितों को छोड़ कर भारत के शेष अन्य सभी राज्यों के दलितों की अपेक्षा पिछड़े हुए हैं. उतर प्रदेश के लगभग ६०% दलित गरीबी की रेखा से नीचे जी रहे हैं. लगभग ६०% दलित महिलाएं कुपोषण का शिकार हैं. एक ताजा सर्वेक्षण के अनुसार ७०% दलित बच्चे कुपोषण का शिकार हैं. अधिकतर दलित बेरोजगारी और उत्पादन के साधनों से वंचित हैं. मायावती ने सर्वजन के चक्कर में भूमि सुधारों को जान बूझ कर नज़र अंदाज़ किया जो कि दलितों के सशक्तिकरण का सबसे बड़ा हथियार हो सकता था. मायावती के सर्वव्यापी भ्रष्टाचार के कारण आम लोगों के लिए उपलब्ध कल्याणकारी योजनायें जैसे मनरेगा, राशन वितरण व्यवस्था , इंदिरा आवास, आंगनवाडी केंद्र और वृद्धा, विकलांग और विधवा पेंशन आदि भ्रष्टाचार का शिकार हो गयीं और दलित एवं
अन्य गरीब लोग इन के लाभ से वंचित रह गए. मायावती ने अपने आप को सब लोगों से अलग कर लिया और लोगों के पास अपना दुःख/कष्ट रोने का कोई भी अवसर न बचा. इन कारणों से दलितों ने इस चुनाव में मायावती को बड़ी हद तक नकार दिया जो कि चुनाव नतीजों से परिलक्षित है.

कुछ लोग मायावती को ही दलित आन्दोलन और दलित राजनीति का प्रतिनिधि मान कर यह प्रशन उठाते हैं कि मायावती के हारने से दलित आन्दोलन और दलित राजनीति पर क्या असर पड़ेगा. इस संबंध में यह स्पष्ट कर देना उचित होगा कि मायावती पूरे  दलित आन्दोलन का प्रतिनधित्व नहीं करती है. मायावती केवल एक
राजनेता है जो कि दलित राजनीति कर रही है वह भी एक सीमित क्षेत्र : उत्तर प्रदेश और उतराखंड में ही. इस के बाहर दलित अपने ढंग से राजनीति कर रहे हैं. वहां पर बसपा का कोई अस्तित्व नहीं है. दूसरे दलित आन्दोलन के अन्य पहलू सामाजिक और धार्मिक  हैं जिन पर दलित अपने आप आगे बढ़  रहे हैं. धार्मिक आन्दोलन के अंतर्गत दलित प्रत्येक वर्ष बौद्ध धम्म  अपना रहे हैं और सामाजिक स्तर में भे उनमें काफी नजदीकी आई है. यह कार्य अपने आप हो रहा है और होता रहेगा. इस में मायावती का न कोई योगदान  रहा है और न ही
उसकी कोई ज़रुरत भी है. यह डॉ. आंबेडकर दुआरा प्रारम्भ किया गया आन्दोलन है जो की स्वत सफूर्त है.हाँ इतना ज़रूर है कि इधर मायावती ने एक आध बौद्ध विहार बना कर बौद्ध धम्म के प्रतीकों  का राजनीतक इस्तेमाल ज़रूर किया है. यह उल्लेखनीय है मायावती ने न तो स्वयं बौद्ध धम्म अपनाया है और न ही कांशी राम ने अपनाया था. उन्हें दर असल बाबा साहेब के धर्म परिवर्तन के जाति उन्मूलन में महत्व में कोई विश्वास ही नहीं है. वे  तो राजनीति में जाति के प्रयोग के पक्षधर हैं न कि उसे तोड़ने के.  उन्हें बाबा साहेब के जाति विहीन और वर्ग विहीन समाज कि स्थापना के लक्ष्य में कोई विश्वास नहीं है. वे दलितों का राजनीति में जाति वोट बैंक के रूप में ही प्रयोग करके जाति राजनीति को कायम रख कर अपने लिए लाभ  उठाना चाहते हैं.

उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि मायावती का यह दावा कि उसका दलित वोट बैंक बिलकुल नहीं खिसका है सत्यता से बिलकुल परे है. शायद मायावती अभी भी दलितों को अपना गुलाम समझ कर उस से ही जुड़े रहने की खुश फहमी पाल रही है. मायावती की यह नीति कोंग्रेस की दलितों और मुसलामानों के प्रति लम्बे समय
तक अपनाई गयी नीति का ही अनुकरण  है. मायावती दलितों को यह जिताती रही है कि केवल मैं ही आप को बचा सकती हूँ कोई दूसरा नहीं. इस लिए मुझ से अलग होने की बात कभी मत सोचिये. दूसरे दलितों के उस से किसी भी  हालत में अलग न होने के दावे से वह दूसरी पार्टियों को दलितों से दूरी बनाये रखने की चाल भी चल रही है ताकि दलित अलगाव में पद उस के गुलाम बानर रहें. पर  अब दलित मायावती के छलावे से काफी हद तक  मुक्त हो गए हैं. अब यह पूरी सम्भावना है की उत्तर प्रदेश के दलित मायावती के बसपा प्रयोग से सबक लेकर एक मूल परिवर्तनकारी  अम्बेडकरवादी राजनीतिक विकल्प की तलाश करेंगे और जातिवादी राजनीति से बाहर निकल कर मुद्दा आधारित जनवादी राजनीति में प्रवेश करेंगे.  केवल इसी  से उनका राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक सशक्तिकर्ण एवं मुक्ति हो सकती है.

एस. आर. दारापुरी आई. पी.एस. (से. नि.)

बच्चों में टीबी रोग की पहचान और संक्रमण- एक बड़ी चुनौती

टीबी रोग का निदान मुमकिन है, लेकिन बच्चों में समय रहते इसकी पहचान समाज में आज भी एक गंभीर समस्या के रूप में विद्यमान है जिसका अंदाजा इसी से होता है कि 14 वर्षीय एक टीबी रोगी बच्चे के अभिभावकों के अनुसार “बच्चे को एक साल पहले से खांसी आ रही थी, और गैर सरकारी चिकित्सक का इलाज चल रहा था। पाँच महीने पहले सरकारी अस्पताल में दिखाया और एक्स रे कराया, बलगम जांच कराई गई तब पता चला कि टीबी है और वहीं इलाज शुरू किया गया”

पिछले वर्ष विश्व स्वास्थ्य संगठन के द्वारा प्रकाशित “ग्लोबल टीबी कंट्रोल रिपोर्ट 2011” के अनुसार इस साल 90 लाख टीबी रोगी मे से 10% से 15% टीबी रोगी 14 वर्ष व उससे कम वर्ष के बच्चे हैं जिनको इलाज की ज़रूरत होगी। यह आंकड़ा दिन प्रति दिन बढ़ता रहेगा यदि हम बच्चो में टीबी संक्रमण को रोकने में विफल रहे। चूंकि बच्चो में टीबी संक्रमण का एक प्रमुख कारण बड़ों की टीबी है, अतः बच्चों में टीबी संक्रमण को रोकने के लिए परिवार के सदस्यों व अभिभावकों की टीबी के बारे में साक्षरता बहुत ज़रूरी है। 6 वर्षीय एक टीबी रोगी की माता का कहना कि “बच्चे के पिता जी को भी टीबी हो चुकी थी जिसका इलाज डाट्स केन्द्र पर 6 महीने तक चला था, लेकिन डाट्स केन्द्र पर परिवार के अन्य सदस्यों का टीबी परीक्षण कराने सम्बन्धी कोई भी जानकारी नहीं दी गई और हम लोगों को टीबी के बारे में कुछ भी नहीं मालूम”। 

स्पष्ट है कि जन साधारण में अभी भी टीबी के साक्षरता की कमी है, तथा सरकार को लोगों में टीबी की साक्षरता को बढ़ाने हेतु राष्ट्रीय कार्यक्रमों में सुधार लाने की आवश्यकता है, साथ ही बच्चों को टीबी रोग के संक्रमण से बचाने के लिए नई रोकथाम विधि जैसे इसोनाइज्ड प्रिवेन्टिव थेरिपी (आई॰पी॰टी) को अपनाना चाहिए।     
इन्टर्नैशनल यूनियन अगेन्स्ट ट्युबरक्लोसिस एंड लंग डिज़ीज़ (द यूनियन) के अनुसार वयस्क टीबी रोगी के परिवार और उनके संपर्क में रह रहे सभी 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों का परीक्षण करना चाहिए। यदि बच्चे स्वस्थ हैं, तो उन्हें इसोनाइज्ड प्रिवेन्टिव थेरिपी देनी चाहिए ताकि उन्हें सक्रिय टीबी न हो सके। यदि बच्चे स्वस्थ नहीं हैं, तो उनका चिकित्सीय परीक्षण कराने के बाद टीबी उपचार करना चाहिए।   

राम मनोहर लोहिया सरकारी अस्पताल के वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ अभिषेक वर्मा का कहना है कि “प्रायः बच्चों में प्राइमरी टीबी होती है तो उसमें लक्षण बहुत कम मिलते हैं। यदि बच्चा कमजोर हो,  भूख न लगती हो, वजन न बढ़ रहा हो, एकान्त बैठा रहता हो व अन्य बच्चों के साथ खेलता-घूमता न हो तो ऐसे बच्चों की जाँच करनी चाहिए क्योंकि इन बच्चों में प्राइमरी टीबी की सम्भावना अधिक रहती है। जाँच में अगर फेफड़े में हाइलर शैडो दिखती है तो कई डॉक्टर उसे प्राइमरी टीबी मान लेते हैं, लेकिन ऐसा करना गलत है, 99% मामलों में हाइलर शैडो टीबी से भिन्न प्रकट होते हैं और अगर हाइलर लिम्फ़नोड बड़े हों तो भी ज़रूरी नहीं है कि बच्चे में टीबी हो। जब तक बच्चे में कमजोरी, पैरालाइटिस, और वजन न बढ़ने के लक्षण न हो तब तक प्राइमरी काम्पलेक्स में टीबी की दवा नही देनी चाहिये।

यूनियन के ट्रीट टीबी इनिशिएटिव में कार्यरत बाल टीबी विशेषज्ञा डॉ डेटजेन का कहना है कि “टीबी रोगी के परिवार के सभी सदस्यों का परीक्षण और निवारक चिकित्सा बच्चों में टीबी के रोग को रोकने के लिए सबसे महत्वपूर्ण उपाय है। टीबी मरीजों के निकट संपर्क में आने वाले बच्चों में संक्रमित होने का और टीबी रोग विकसित होने का सबसे ज्यादा खतरा होता है। उचित चिकित्सा के अभाव में अक्सर गंभीर टीबी रोग विकसित हो जाता है। ऐसे बच्चों को खोज न पाना और उपचार न कर पाना अवसर खोने जैसा है। वयस्कों में समय रहते टीबी रोग की पहचान करना और संक्रमण को रोकना, बच्चों में टीबी रोकथाम के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है”.

अतः बच्चों को टीबी रोग से बचाने हेतु भारत सरकार को अपने राष्ट्रीय कार्यक्रमों में सुधार लाने और लोगों को जागरूक करने के साथ-साथ बी.सी.जी टीके के अतिरिक्त अन्य आधुनिक निवारक चिकित्सा प्रणाली, जैसे इसोनाइज्ड प्रिवेन्टिव थेरिपी को भी अपनाना होगा। तभी हम पूर्ण रूप से बच्चों में टीबी के संक्रमण को रोक पाने में सफल होंगे।

राहुल द्विवेदी 
(लेखक ऑनलाइन पोर्टल www.citizen-news.org के लिए लिखता है )  

गैर लोकतान्त्रिक ढंग से परमाणु ऊर्जा थोपने के प्रयास का लखनऊ में विरोध

[English] कुडनकुलम में गहराते परमाणु विरोधी अभियान के समर्थन में देश भर में अनेक जगह आन्दोलन जड़ पकड़ रहे हैं. लखनऊ के हजरतगंज में अनेक नागरिक और संगठन ने परमाणु विरोधी अभियान में पुरजोर हिस्सा लिया. 

ओम प्रकाश पाण्डेय, महासचिव, अखिल भारतीय विद्युत अभियंता संघ, उत्तर प्रदेश इकाई, पूर्व पुलिस महानिरीक्षक एस.आर.दारापुरी, पूर्व पुलिस महानिदेशक इश्वर चन्द्र द्विवेदी, जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता नवीन तिवारी, वरिष्ठ पत्रकार शैलेन्द्र सिंह, सूचना अधिकार कार्यकर्ता उर्वशी शर्मा और अखिलेश सक्सेना, हमसफ़र की कार्यकर्ता ममता सिंह, नर्मदा बचाओ आंदोलन और जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय की वरिष्ठ कार्यकर्ता अरुंधति धुरु, आशा परिवार से चुन्नीलाल, शोभा शुक्ला, राहुल द्विवेदी, रितेश आर्या, किरण जैसवार, नदीम सलमानी, नीरज मैनाली, जीतेन्द्र द्विवेदी, बाबी रमाकांत एवं अन्य शामिल थे.

प्रदर्शनकारियों का कहना था कि: हम भारत सरकार के गैर लोकतान्त्रिक ढंग से परमाणु ऊर्जा थोपने के प्रयास का विरोध करते हैं। अमरीका और यूरोप में जब भारी संख्या में आम लोग सड़क पर उतार आए तब उनकी सरकारों को परमाणु ऊर्जा त्यागनी पड़ी परंतु भारत में जब आम लोग परमाणु ऊर्जा पर सवाल उठा रहे हैं तो उनकी आवाज़ दबाने का प्रयास किया जा रहा है। कुडनकुलम, तमिल नाडु के डॉ एस.पी. उदयकुमार के नेतृत्व में परमाणु ऊर्जा के विरोध में जन अभियान को भारत सरकार ने भ्रामक आरोपों आदि द्वारा दबाने का पूरा प्रयास किया है। जब कि डॉ उदयकुमार ने अपनी संपत्ति का ब्योरा सार्वजनिक किया है और उनके पास ‘एफ.सी.आर.ए.’ ही नहीं है जिससे ‘विदेशी पैसा’ लिया जा सके। यह भी साफ ज़ाहिर है कि भारत सरकार स्वयं ‘विदेशी’ ताकतों (जैसे कि अमरीका, रूस, आदि) के साथ मिलजुल कर सैन्यीकरण और परमाणु कार्यक्रम बढ़ा रही है।

भारत सरकार ने एक जर्मन नागरिक को जिसने शांतिपूर्वक कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा विरोधी अभियान में भाग लिया था, उसको पकड़ कर वापिस जर्मनी भेज दिया। 8 मार्च 2012 को भारत सरकार ने एक जापानी नागरिक का वीसा भी रद्द कर दिया। ‘ग्रीनपीस’ के निमंत्रण पर फुकुशिमा,जापान में 11 मार्च 2011 को हुई परमाणु दुर्घटना झेले हुए माया कोबायाशी को भारत सरकार ने 15 फरवरी 2012 को ‘बिजनेस’ वीसा दिया था जिससे कि वो भारत में एक सप्ताह आ कर जगह-जगह आयोजित कार्यक्रमों में परमाणु विकिरण आदि खतरों के बारे में बता सकें। परंतु 8 मार्च 2012 को भारत ने उनका वीसा ही रद्द कर दिया।

अब विकसित दुनिया यह मानने लगी है कि निम्न चार कारणों से नाभिकीय ऊर्जा का कोई भविष्य नहीं हैः (1) इसका अत्याधिक खर्चीला होना, (2) मनुष्य स्वास्थ्य व पर्यावरण के लिए खतरनाक, (3) नाभिकीय शस्त्र के प्रसार में इसकी भूमिका से जुड़े खतरे, व  (4) रेडियोधर्मी कचरे के दीर्घकालिक निपटारे की चुनौती।

भारत को नाभिकीय ऊर्जा का विकल्प ढूँढना चाहिए जो इतने खर्चीले व खतरनाक न हों। पुनर्प्राप्य ऊर्जा के संसाधन, जैसे सौर, पवन, बायोमास, बायोगैस, आदि, ही समाधान प्रदान कर सकते हैं यह मान कर यूरोप व जापान तो इस क्षेत्र में गम्भीर शोध कर रहे हैं। भारत को भी चाहिए कि इन विकसित देशों के अनुभव से सीखते हुए नाभिकीय ऊर्जा के क्षेत्र में अमरीका व यूरोप की कम्पनियों का बाजार बनने के बजाए हम भी पुनर्प्राप्य ऊर्जा संसाधनों पर ही अपना ध्यान केन्द्रित करें। भारत को ऐसी ऊर्जा नीति अपनानी चाहिए जिसमें कार्बन उत्सर्जन न हो और परमाणु विकिरण के खतरे भी न हो।

सी.एन.एस.

कूड़ंकुलम परमाणु विरोधी अभियान के समर्थन में देश में जगह-जगह विरोध




इडिंठकरई में चल रहे उपवास के समर्थन में सात दिवसीय देश व्यापी उपवास

[English] कूड़ंकुलम परमाणु बिजलीघर के विरोध में इडिंठकरई, तमिल नाडु में चल रहे उपवास के समर्थन में, जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय, परमाणु निशस्त्रीकरण और शांति के लिए गठबंधन, और लोक राजनीति मंच ने संयुक्त रूप से जंतर मंतर, दिल्ली, पर 26 मार्च से 1 अप्रैल 2012 तक सात दिवसीय उपवास का आह्वान दिया है। मग्सेसे पुरुस्कार से सम्मानित वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता डॉ संदीप पाण्डेय जंतर मंतर दिल्ली में उपवास पर रहेंगे और परमाणु कार्यक्रम के ऊपर लोकतान्त्रिक और खुली बहस की मांग को लेकर आन्दोलनरत रहेंगे. 


कूड़ंकुलम परमाणु बिजलीघर के विरोध में चेन्नई में भी लोग उपवास पर हैं और मुंबई में प्रख्यात फिल्म निर्माता आनंद पटवर्धन दादर रेलवे स्टेशन के सामने विरोध का नेतृत्व करेंगे।

कूड़ंकुलम परमाणु बिजली घर के विरोध में, 27 मार्च 2012 को एक दिवसीय उपवास का आयोजन देश में जगह जगह होगा।

डॉ संदीप पाण्डेय ने कहा कि यह विडम्बना ही तो है कि एक तरफ भारत ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में, श्री लंका में तमिल लोगों के ऊपर हुए अत्याचार का मुद्दा उठाया है, परंतु देश के भीतर तमिल नाडु में परमाणु बिजली घर बनाने की जिद्द पर भारत अड़ा हुआ है जिसकी वजह से तमिल नाडु में रह रहे लोग खतरनाक परमाणु दुष्परिणामों को आने वाले सालों में भुगत सकते हैं।

डॉ संदीप पाण्डेय ने कहा कि  हम भारत सरकार के गैर लोकतान्त्रिक ढंग से परमाणु ऊर्जा थोपने के प्रयास का विरोध करते हैं। अमरीका और यूरोप में जब भारी संख्या में आम लोग सड़क पर उतार आए तब उनकी सरकारों को परमाणु ऊर्जा त्यागनी पड़ी परंतु भारत में जब आम लोग परमाणु ऊर्जा पर सवाल उठा रहे हैं तो उनकी आवाज़ दबाने का प्रयास किया जा रहा है। कुडनकुलम, तमिल नाडु के डॉ उदयकुमार के नेतृत्व में परमाणु ऊर्जा के विरोध में जन अभियान को भारत सरकार ने भ्रामक आरोपों आदि द्वारा दबाने का पूरा प्रयास किया है। जब कि डॉ उदयकुमार ने अपनी संपत्ति का ब्योरा सार्वजनिक किया है और उनके पास ‘एफ.सी.आर.ए.’ ही नहीं है जिससे ‘विदेशी पैसा’ लिया जा सके। यह भी साफ ज़ाहिर है कि भारत सरकार स्वयं ‘विदेशी’ ताकतों (जैसे कि अमरीका, रूस, आदि) के साथ मिलजुल कर सैन्यीकरण और परमाणु कार्यक्रम बढ़ा रही है।

डॉ संदीप पाण्डेय ने कहा कि भारत सरकार ने एक जर्मन नागरिक को जिसने शांतिपूर्वक कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा विरोधी अभियान में भाग लिया था, उसको पकड़ कर वापिस जर्मनी भेज दिया। 8 मार्च 2012 को भारत सरकार ने एक जापानी नागरिक का वीसा भी रद्द कर दिया। ‘ग्रीनपीस’ के निमंत्रण पर फुकुशिमा,जापान में 11 मार्च 2011 को हुई परमाणु दुर्घटना झेले हुए माया कोबायाशी को भारत सरकार ने 15 फरवरी 2012 को ‘बिजनेस’ वीसा दिया था जिससे कि वो भारत में एक सप्ताह आ कर जगह-जगह आयोजित कार्यक्रमों में परमाणु विकिरण आदि खतरों के बारे में बता सकें। परंतु 8 मार्च 2012 को भारत ने उनका वीसा ही रद्द कर दिया।

डॉ संदीप पाण्डेय ने कहा कि हाल ही में तमिल नाडु मुख्य मंत्री द्वारा डॉ एस.पी. उदयकुमार को नक्सलवादी करार करने का प्रयास यह ज़ाहिर करता है कि सरकार परमाणु कार्यक्रम को लागू करने के लिए कितनी मजबूर है। हम सरकार के आम लोगों को गुमराह करने का और परमाणु कार्यक्रम में पारदर्शिता नहीं रखने का भरसक विरोध करते हैं।

अब विकसित दुनिया यह मानने लगी है कि निम्न चार कारणों से नाभिकीय ऊर्जा का कोई भविष्य नहीं हैः (1) इसका अत्याधिक खर्चीला होना, (2) मनुष्य स्वास्थ्य व पर्यावरण के लिए खतरनाक, (3) नाभिकीय शस्त्र के प्रसार में इसकी भूमिका से जुड़े खतरे, व  (4) रेडियोधर्मी कचरे के दीर्घकालिक निपटारे की चुनौती।

भारत को नाभिकीय ऊर्जा का विकल्प ढूँढना चाहिए जो इतने खर्चीले व खतरनाक न हों। पुनर्प्राप्य ऊर्जा के संसाधन, जैसे सौर, पवन, बायोमास, बायोगैस, आदि, ही समाधान प्रदान कर सकते हैं यह मान कर यूरोप व जापान तो इस क्षेत्र में गम्भीर शोध कर रहे हैं। भारत को भी चाहिए कि इन विकसित देशों के अनुभव से सीखते हुए नाभिकीय ऊर्जा के क्षेत्र में अमरीका व यूरोप की कम्पनियों का बाजार बनने के बजाए हम भी पुनर्प्राप्य ऊर्जा संसाधनों पर ही अपना ध्यान केन्द्रित करें। भारत को ऐसी ऊर्जा नीति अपनानी चाहिए जिसमें कार्बन उत्सर्जन न हो और परमाणु विकिरण के खतरे भी न हो।

डॉ संदीप पाण्डेय ने कहा कि हम भारत सरकार से अपील करते हैं कि परमाणु ऊर्जा के मुद्दे पर लोकतान्त्रिक तरीके से खुली बहस करवाए और जब तक यह सर्व सम्मति से निर्णय नहीं होता कि भारत को परमाणु कार्यक्रम चलना चाहिए या नहीं, परमाणु कार्यक्रम को स्थगित करे।

बाबी रमाकांत - सी.एन.एस.

सी.एन.एस. विडियो: बाल टीबी की वास्तविकता

गैर लोकतान्त्रिक ढंग से परमाणु ऊर्जा थोपने के प्रयास का विरोध

[English] अखिल भारतीय विद्युत् अभियंता संघ के महासचिव श्री शैलेन्द्र दुबे ने कहा कि १२ लाख से अधिक उनके कार्यकर्ता, जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय और नर्मदा बचाओ आन्दोलन के साथ, आन्दोलन करेंगे यदि भारत सरकार ने लोकतान्त्रिक तरीके से उर्जा के मुद्दे पर खुली बहस न होने दी. आज (१० मार्च २०१२) को लखनऊ में आयोजित प्रेस वार्ता में यह ज्ञापन जारी किया गया:

गैर लोकतान्त्रिक ढंग से परमाणु ऊर्जा थोपने के प्रयास का विरोध

हम भारत सरकार के गैर लोकतान्त्रिक ढंग से परमाणु ऊर्जा थोपने के प्रयास का विरोध करते हैं। अमरीका और यूरोप में जब भारी संख्या में आम लोग सड़क पर उतार आए तब उनकी सरकारों को परमाणु ऊर्जा त्यागनी पड़ी परंतु भारत में जब आम लोग परमाणु ऊर्जा पर सवाल उठा रहे हैं तो उनकी आवाज़ दबाने का प्रयास किया जा रहा है। कुडनकुलम, तमिल नाडु के डॉ उदयकुमार के नेतृत्व में परमाणु ऊर्जा के विरोध में जन अभियान को भारत सरकार ने भ्रामक आरोपों आदि द्वारा दबाने का पूरा प्रयास किया है। जब कि डॉ उदयकुमार ने अपनी संपत्ति का ब्योरा सार्वजनिक किया है और उनके पास ‘एफ.सी.आर.ए.’ ही नहीं है जिससे ‘विदेशी पैसा’ लिया जा सके। यह भी साफ ज़ाहिर है कि भारत सरकार स्वयं ‘विदेशी’ ताकतों (जैसे कि अमरीका, रूस, आदि) के साथ मिलजुल कर सैन्यीकरण और परमाणु कार्यक्रम बढ़ा रही है। 

भारत सरकार ने एक जर्मन नागरिक को जिसने शांतिपूर्वक कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा विरोधी अभियान में भाग लिया था, उसको पकड़ कर वापिस जर्मनी भेज दिया। 8 मार्च 2012 को भारत सरकार ने एक जापानी नागरिक का वीसा भी रद्द कर दिया। ‘ग्रीनपीस’ के निमंत्रण पर फुकुशिमा,जापान में 11 मार्च 2011 को हुई परमाणु दुर्घटना झेले हुए माया कोबायाशी को भारत सरकार ने 15 फरवरी 2012 को ‘बिजनेस’ वीसा दिया था जिससे कि वो भारत में एक सप्ताह आ कर जगह-जगह आयोजित कार्यक्रमों में परमाणु विकिरण आदि खतरों के बारे में बता सकें। परंतु 8 मार्च 2012 को भारत ने उनका वीसा ही रद्द कर दिया।

अब विकसित दुनिया यह मानने लगी है कि निम्न चार कारणों से नाभिकीय ऊर्जा का कोई भविष्य नहीं हैः (1) इसका अत्याधिक खर्चीला होना, (2) मनुष्य स्वास्थ्य व पर्यावरण के लिए खतरनाक, (3) नाभिकीय शस्त्र के प्रसार में इसकी भूमिका से जुड़े खतरे, व  (4) रेडियोधर्मी कचरे के दीर्घकालिक निपटारे की चुनौती।

भारत को नाभिकीय ऊर्जा का विकल्प ढूँढना चाहिए जो इतने खर्चीले व खतरनाक न हों। पुनर्प्राप्य ऊर्जा के संसाधन, जैसे सौर, पवन, बायोमास, बायोगैस, आदि, ही समाधान प्रदान कर सकते हैं यह मान कर यूरोप व जापान तो इस क्षेत्र में गम्भीर शोध कर रहे हैं। भारत को भी चाहिए कि इन विकसित देशों के अनुभव से सीखते हुए नाभिकीय ऊर्जा के क्षेत्र में अमरीका व यूरोप की कम्पनियों का बाजार बनने के बजाए हम भी पुनर्प्राप्य ऊर्जा संसाधनों पर ही अपना ध्यान केन्द्रित करें। भारत को ऐसी ऊर्जा नीति अपनानी चाहिए जिसमें कार्बन उत्सर्जन न हो और परमाणु विकिरण के खतरे भी न हो।

शैलेंद्र दुबे (महासचिव, अखिल भारतीय विद्युत अभियंता संघ), आलोक अग्रवाल (नर्मदा बचाओ आंदोलन), डॉ संदीप पांडे (जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय), अरुंधती धुरु (नर्मदा बचाओ आंदोलन/ जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय), बाबी रमाकांत, शोभा शुक्ल, राहुल कुमार द्विवेदी, आशा परिवार, परमाणु निशस्त्रिकरण एवं शांति के लिए गठबंधन, शांति एवं विकास के लिए चिकित्सकों का गठबंधन, सोशलिस्ट पार्टी

- सी.एन.एस.

Ek Kadam - a documentary film on Apna Ghar (Kanpur), by Mahesh bhai (maheshballia@gmail.com)