हॉर्न ध्वनि-तीव्रता कम करना ठीक है पर सोचने की बात है कि हमें हॉर्न बजाने की जरुरत क्यों है?

हिंदुस्तान टाइम्स (अंग्रेजी दैनिक)
हाल ही में केंद्रीय सरकार के सड़क-परिवहन मंत्रालय की संभावित नीति समाचार में थी कि दो-चार पहिया और अन्य मोटर-गाड़ियों के 'हॉर्न' की ध्वनि-तीव्रता कम होनी चाहिए और ध्वनि-तीव्रता पर अधिकतम उपरी सीमा को कम किया जाए. यह प्रयास ध्वनि-प्रदूषण और सड़क सुरक्षा दोनों की दृष्टि से नि:संदेह जरुरी कदम है पर अधिक जरुरी यह है कि क्या यह पर्याप्त है? अधिक गंभीर प्रश्न यह है कि हमें हॉर्न बजाने की जरुरत क्यों पड़ती है जबकि अधिकाँश विकसित देशों में बिना हॉर्न बजाये सड़क सुरक्षा बेहतर है और परिवहन व्यवस्था भी. विकसित देशों में हॉर्न सम्बंधित नीति सही है कि हॉर्न का उपयोग सिर्फ आकास्मक कारणों में ही हो (जैसे कि ट्रेन की चैन) और आम आवागमन के लिए प्रतिबंधित हो.

हाईटि देश में 2010 तक हैजा था ही नहीं: विश्व शांति, सैन्य और स्वास्थ्य नीतियों में तालमेल जरुरी

2010 तक हाईटि देश में हैजा था ही नहीं पर संयुक्त राष्ट्र के शांति बनाये रखने वाले सैन्य बल के जरिये से यहाँ हैजा फैला. हाल ही में समाचार के अनुसार, भारत सरकार ने यह प्रमाणित किया था कि उसके शांति बनाये रखने वाले सैन्य बल को हाईटि भेजने से पहले हैजा-टीका दिया गया है, पर जब पूछ-ताछ हुई तो पता चला कि भारतीय सुरक्षाकर्मी को हैजा टीका नहीं दिया गया था. गौर हो कि हाईटि में हैजा फ़ैलाने के लिए संयुक्त राष्ट्र प्रमुख डॉ बन-की मून ने, पिछले महीने ही, शांति बनाये रखने के लिए भेजी गयी सैन्य बल की ओर से ऐतिहासिक माफ़ी भी मांगी थी.

विभिन्न सरकारी संस्थाएं और वर्ग एकजुट हो समन्वयन करें कि हर प्रकार की लिंग जनित हिंसा समाप्त हो

सिटीजन न्यूज सर्विस - सीएनएस
अनेक सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के लखनऊ कार्यालय में युवाओं के लिए स्वास्थ्य सेवाएँ बेहतर करने के आशय से कैसे अंतर-विभागीय और अंतर-वर्गीय समन्वयन में सुधार हो इस पर चर्चा की. हर प्रकार की लिंग जनित हिंसा को समाप्त करने के लिए फॅमिली प्लानिंग एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया ने राष्ट्रीय स्तर पर पहल ली हुई है. स्वास्थ्य को वोट अभियान और अन्य संस्थाओं ने इस पहल को समर्थन दिया है और सरकार से अपील की कि बिना अंतर-विभागीय समन्वयन में सुधार हुए लिंग जनित हिंसा पर विराम लगाना मुश्किल होगा.

पांच साल से कम उम्र के बच्चों को निमोनिया-मृत्यु से बचाने के लिए बेहतर स्वास्थ्य सेवाएँ आवश्यक

सिटीजन न्यूज सर्विस - सी एन एस
निमोनिया से बचाव मुमकिन है और इलाज भी संभव है. इसके बावजूद भी निमोनिया 5 साल से कम उम्र के बच्चों में मृत्यु का सबसे बड़ा कारण है. लखनऊ के नेल्सन अस्पताल के निदेशक और बाल-रोग विशेषज्ञ डॉ अजय मिश्र ने वेबिनार में बताया कि "निमोनिया से बचाव और इलाज दोनों संभव है पर इसके बावजूद निमोनिया 5 साल से कम उम्र के बच्चों में मृत्यु का सबसे बड़ा कारण है. 2015 में 760000 बच्चों की मृत्यु निमोनिया से हुई.

दीपा कर्माकर का सराहनीय फैसला

रियो ओलम्पिक में जिम्नास्टिक में शानदार प्रदर्शन करने के लिए दीपा कर्माकर को भी पी.वी. सिन्धू व साक्षी मलिक, जिन दोनों ने पदक जीते थे, के साथ हैदराबाद बैडमिंटन एसोशिएसन ने सचिन तेन्दुलकर के हाथों दुनिया की मंहगीं कारों में से एक बी.एम.डब्लू. का उपहार देने के लिए चुना। बी.एम.डब्लू. गाड़ी की कीमत पचास लाख से लेकर एक करोड़ तक हो सकती है। दीपा ने खुद कहा है कि बी.एम.डब्लू. जैसी गाड़ियों के लिए त्रिपुरा, जहां वह रहती हैं, की सड़कें उपयुक्त नहीं हैं और न ही वहां इस गाड़ी की मरम्मत करने वाला कोई मिस्त्री। इसलिए उसने कम कीमत की एक गाड़ी खरीदने का फैसला लिया है। बी.एम.डब्लू. लौटाने का फैसला लेते हुए दीपा ने हैदराबाद बैडमिंटन एसोशिएसन के अध्यक्ष वी. चामुण्डेश्वरनाथ, जिन्होंने असल में गाड़ी दी थी, से कहा कि यदि वे बी.एम.डब्लू. के बदले उसकी कीमत दे सकें तो दे दें अथवा जो भी वह देना चाहें दे दें।

बढ़ती सड़क दुर्घटनाएं और मृत्युदर ने सरकारी वादे पर उठाये सवाल

भारत सरकार समेत दुनिया के अन्य 192 देशों की सरकारों ने संयुक्त राष्ट्र महासभा 2015 में सतत विकास लक्ष्य (Sustainable Development Goals या SDGs) को 2030 तक पूरा करने का वादा किया है. इन सतत विकास लक्ष्यों में से एक है (SDG 3.6) कि 2020 तक, सड़क दुर्घटनाओं और मृत्युदर को आधा करना. पर आंकड़ों को देखें तो ये चिंता की बात है कि सड़क दुर्घटनाओं और मृत्युदर में गिरावट नहीं बढ़ोतरी हो रही है.

गंभीर जन स्वास्थ्य चुनौती हैं फेफड़े सम्बंधित रोग

शोभा शुक्ला, सीएनएस (सिटीजन न्यूज़ सर्विस)
भारत में फेफड़े सम्बंधित रोगों के बढ़ते हुए दर ने जन-स्वास्थ्य के समक्ष एक गंभीर चुनौती उत्पन्न कर दी है. यदि मजबूत, पर्याप्त और समोचित कदम नहीं उठाये गए तो स्वच्छ हवा और स्वस्थ फेफड़े हम लोगों के लिए दुर्लभ हो जायेंगे. 18वें फेफड़े रोगों पर राष्ट्रीय अधिवेशन (नेपकॉन 2016) के आयोजक अध्यक्ष, डायरेक्टर प्रोफेसर (डॉ) केसी मोहंती ने बताया, कि “हाल ही में उत्तर-केन्द्रीय भारत में, ‘स्मोग’ ने आम जन-जीवन कुंठित कर दिया था और उसका अत्याधिक आर्थिक व्यय भी सबको उठाना पड़ा था. यह जन स्वास्थ्य के लिए अत्यंत जरुरी है कि आकस्मिक ठोस कदम लिए जाएँ जिससे कि सभी जन मानस स्वच्छ हवा में स्वस्थ फेफड़े से सांस ले और पूर्ण रूप से देश निर्माण में सहयोग कर सके.”

संधि-वार्ता में तम्बाकू उद्योग हस्तक्षेप को रोकने के लिए सरकारें प्रतिबद्ध

विश्व स्वास्थ्य संगठन तम्बाकू संधि वार्ता के उद्घाटन सत्र में सरकारों ने उद्योग के हस्तक्षेप को रोकने की मांग की: आज 18 देशों की सरकारों ने, जो 5.7 करोड़ लोगों का प्रतिनिधित्व कर रही हैं, जन स्वास्थ्य निति में तम्बाकू उद्योग के हस्तक्षेप को मजबूती से रोकने की मांग की. इन देशों की अपील एक खुले पत्र के रूप में आज विश्व स्वास्थ्य संगठन की अंतर्राष्ट्रीय तम्बाकू नियंत्रण संधि वार्ता के पहले दिन जारी की गयी. 18 देशों की सरकारों के इस पत्र के साथ ही 115 गैर-सरकारी संगठनों ने भी विश्व स्वास्थ्य संगठन अंतर्राष्ट्रीय तम्बाकू नियंत्रण संधि से तम्बाकू उद्योग के हस्तक्षेप पर पूर्ण: रोक लगाने की मांग करते हुए पत्र को पिछले सप्ताह जारी किया था.

ASICON 2016 का आहवान: वास्तविकता में एचआईवी को मात्र एक स्थाई-प्रबंधनीय रोग बनायें

शोभा शुक्ला, सीएनएस (सिटीजन न्यूज़ सर्विस)
एड्स सोसाइटी ऑफ़ इंडिया और 9वें एड्स सोसाइटी ऑफ़  इंडिया के राष्ट्रीय अधिवेशन (ASICON 2016) ने भारत सरकार द्वारा एचआईवी/एड्स बिल को संस्तुति देने की सराहना की क्योंकि इस अधिनियम के बनने से एचआईवी के साथ जीवित लोगों के साथ भेदभाव और उनके शोषण पर अंकुश लगेगा. ASICON 2016 मुंबई में 7-9 अक्टूबर २०१६ के दौरान आयोजित हो रही है.

श्री लंका मलेरिया मुक्त घोषित हुआ: पर चौकन्ना रहे!

श्री लंका के मलेरिया-उन्मूलन कार्यक्रम की निरंतरता और दृढ़ता को आज वैश्विक प्रशंसा प्राप्त हो रही है क्योंकि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ६ सितम्बर २०16 को श्री लंका को मलेरिया मुक्त देश का दर्जा दिया है. श्री लंका को मलेरिया मुक्त होने की सफलता दशकों चली मलेरिया नियंत्रण की एक लम्बी लड़ाई के बाद मिली है.

माहवारी से किशोरी मन क्यों घबराये

बृहस्पति कुमार पांडेय, सिटीजन न्यूज सर्विस - सीएनएस
[सर्व-प्रथम मुक्ता पत्रिका में प्रकाशित]
किशोरावस्था यानी बचपन से बडे होने की अवस्था। यह अवस्था लडकियों के जीवन का ऐसा समय होता है जिसमें उन्हें तमाम तरह के शारीरिक बदलाव से गुजरना पडता है। इस दौरान किशोरियां अपने शरीर में होने वाले परिवर्तनों के बारे में अंजान होती है। जिसकी वजह से उन्हें तमाम तरह की समस्याओ से गुजरना पडता है जिसमें उलझन, चिन्ता, और बेचैनी के साथ-साथ हर चीज के बारे में जान लेने की उत्सुंकता जन्म लेती है। किशोरियों को उनके परिवार के सदस्यों द्वारा न ही उन्हें बच्चा समझा जाता है और न ही बडा। ऐसे में उनके प्रति केाई भी लापरवाही किशोरियों के लिए घातक हो सकती है।

एचआईवी नियंत्रण के लिए आया पैसा बैंक में बंद है या प्रभावी ढंग से व्यय हो रहा है?

जिन लोगों को एचआईवी से संक्रमित होने का खतरा अधिक है, उनकी गिनती क्यों सही नहीं? जिन देशों में एड्स सबसे अधिक चुनौती बना हुआ है उन्ही देशों में जिन लोगों को एचआईवी से संक्रमित होने का खतरा अधिक है उनकी गिनती सही नहीं होती है और सरकारी अनुमान काफी कम होते हैं. दूसरी चौकाने वाली बात यह है कि इन देशों में जहाँ एड्स चुनौती बना हुआ है और जहाँ एचआईवी संक्रमण होने वाले समुदाओं का अनुमान काफी कम किया जाता है ऐसे देशों में अक्सर कितने लोगों को एचआईवी सम्बंधित सेवा मिल रही है इसका प्रतिशत काफी बढ़चढ़ कर रिपोर्ट किया जाता है.

दक्षिण अफ्रीका और भारतीय संगठनों ने पत्रकार अशोक रामस्वरूप को सम्मानित किया

डॉ गिलाडा, अशोक रामस्वरूप जी, इला गाँधी जी, शोभा शुक्ला जी
अंतर्राष्ट्रीय नेल्सन मंडेला दिवस (१८ जुलाई २०१६) के उपलक्ष्य में, दक्षिण अफ्रीका और भारतीय संगठनों ने मिल कर वरिष्ठ पत्रकार अशोक रामस्वरूप को सम्मानित किया. अशोक रामस्वरूप, डरबन स्थित साउथ अफ्रीका ब्राडकास्टिंग कारपोरेशन (एसएबीसी) और अन्य मीडिया में ४ दशक से अधिक कार्यरत रहे हैं और सतत विकास से जुड़े समाचार को रिपोर्ट करते आये हैं.

भेदभाव से जूझ रहे एचआईवी/एड्स के साथ जीवित लोग

वृहस्पति कुमार पाण्डेय, सिटीजन न्यूज सर्विस - सी एन एस
[सर्व-प्रथम सरस-सलिल में प्रकाशित]
देश में बढ रहे एचआईवी/एड्स के साथ जीवित लोगों की संख्या को देखते हुए सरकार द्वारा व्यापक स्तर पर न केवल प्रचार प्रसार किया जा रहा है बल्कि सरकारी व गैर सरकारी स्तर पर सघन रूप से ऐसी गतिविधियां भी संचालित की जा रही हैं जिससे एचआईवी/एड्स को फैलने से रोका जा सके। सरकार द्वारा चलाये जा रहे जागरूकता गतिविधियों का एक उद्देश्य एड्स को फैलने से रोकने के अलावा इसको लेकर समाज में फैली भ्रान्तियों व भेदभाव को खत्म करना भी है, लेकिन सरकार का यह प्रयास आज भी इस मामले में नाकाफी साबित हो रहा है।