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दुनिया की पहली मलेरिया वैक्सीन अत्यंत महत्वपूर्ण पर रोग उन्मूलन के लिए काफ़ी नहीं

[English] तीस साल के निरंतर शोध के बाद आख़िरकार, दुनिया की पहली मलेरिया वैक्सीन, “आटीएस,एस”, को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बच्चों में उपयोग के लिए संस्तुति दे दी। इस मलेरिया वैक्सीन टीके से बच्चे सबसे घातक क़िस्म की मलेरिया से बचेंगे जो मलेरिया कीटाणु, "प्लैज़्मोडीयम फ़ेलकीपेरम", के कारण रोग ग्रस्त होते हैं। यह मलेरिया टीका अत्यंत लाभकारी तो है परंतु मलेरिया नियंत्रण और उन्मूलन के लिए कदापि पर्याप्त नहीं है।

विश्व भर में तीसरा सबसे बड़ा मलेरिया दर भारत में: पर 2030 तक मलेरिया उन्मूलन का दावा

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, विश्व में तीसरा सबसे अधिक मलेरिया दर भारत में है. भारत में 1 करोड़ 80 लाख लोगों को हर वर्ष मलेरिया रोग से जूझना पड़ता है. पिछले अनेक सालों में, भारत ने मलेरिया नियंत्रण के लिए प्रगति तो की पर चुनौतियाँ भी जटिल होती गयीं. भारत सरकार ने 2030 तक मलेरिया उन्मूलन का वादा किया है. एशिया पैसिफ़िक देशों के प्रमुखों ने जब 2030 तक समस्त एशिया पैसिफ़िक से मलेरिया उन्मूलन करने का आहवान किया तो भारत के प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी उनमें शामिल थे. हाल ही में लन्दन में संपन्न हुई “कामनवेल्थ हेड्स ऑफ़ गवर्नमेंट” मीटिंग में, भारत समेत अन्य देशों ने वादा किया कि, 2023 तक सभी 53 कामनवेल्थ देशों से, मलेरिया दर को आधा करेंगे. भारत सरकार ने मलेरिया उन्मूलन के लिए राष्ट्रीय फ्रेमवर्क (2016-2030) को फरवरी 2016 में जारी किया था जो मलेरिया-मुक्त भारत के लिए सरकारी परियोजना है.

श्री लंका मलेरिया मुक्त घोषित हुआ: पर चौकन्ना रहे!

श्री लंका के मलेरिया-उन्मूलन कार्यक्रम की निरंतरता और दृढ़ता को आज वैश्विक प्रशंसा प्राप्त हो रही है क्योंकि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ६ सितम्बर २०16 को श्री लंका को मलेरिया मुक्त देश का दर्जा दिया है. श्री लंका को मलेरिया मुक्त होने की सफलता दशकों चली मलेरिया नियंत्रण की एक लम्बी लड़ाई के बाद मिली है.

टीबी, मलेरिया, डेंगू और काला अजार के नियंत्रण के लिए शोध में निवेश

डॉ बीटी स्लिंग्सबी
जीएचआईटी-फण्ड
[English] टीबी, मलेरिया, डेंगू और काला अजार के प्रभावकारी नियंत्रण और अंतत: उन्मूलन के लिए शोध कार्य में, जापान के ग्लोबल हेल्थ इनोवेटिव टेक्नोलॉजी फण्ड (जीएचआईटी-फण्ड) ने अमरीकी डालर १०.७ मिलियन का निवेश किया है. जीएचआईटी-फण्ड के निदेशक डॉ बीटी स्लिंग्सबी ने सीएनएस को साक्षात्कार में बताया कि जीएचआईटी-फण्ड पिछले ढाई साल से इन रोगों से सम्बंधित शोध कार्य में निवेश कर रहा है. टीबी और मलेरिया की दवाएं बेअसर होती जा रही हैं क्योंकि दवा प्रतिरोधकता बढ़ रही है. उदाहरण के तौर पर, ग्रेटर-मेकोंग सब-रीजन जो दक्षिण पूर्वी एशिया का क्षेत्र है, वहाँ दवा प्रतिरोधक मलेरिया का प्रकोप है. डेंगू का भी प्रकोप बढ़ रहा है. ७० साल बाद जापान में २ साल पहले डेंगू महामारी फैली थी. इन रोगों से निजात पाने के लिए आवश्यक है कि हमारे पास अधिक प्रभावकारी जांच, वैक्सीन और दवाएं हों, इसीलिए हम इस क्षेत्र में निवेश कर रहे हैं.

मलेरिया उन्मूलन क्षेत्रीय एशिया-पैसिफिक नेटवर्क से अब भारत भी जुड़ा

भारत अब क्षेत्रीय एशिया पैसिफिक मलेरिया उन्मूलन नेटवर्क से जुड़ गया है जिसमें अभी तक 16 देश प्रतिभागी थे। भारत ने भी मलेरिया उन्मूलन के प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया है। क्षेत्रीय मलेरिया उन्मूलन नेटवर्क के सदस्य के रूप में भारत पहली बार 24 मार्च को वियतनाम में होने वाली 7वीं सालाना बैठक में भाग लेगा। एशिया पैसिफिक क्षेत्र में मलेरिया पीड़ित लोगों के आंकड़े देखते हुए भारत दूसरे नंबर पर है जो अत्यंत चिंताजनक है। क्षेत्रीय नेटवर्क से जुडने से भारत ने भी 2030 तक मलेरिया समाप्त करने के लिए समर्पित है।

भारत एवं अन्य पूर्वी एशिया देशों ने 2030 तक मलेरिया समाप्ति का वादा किया

फोटो क्ष्रेय: एपीएलएमए
[English] 18 पूर्वी एशिया देशों के प्रमुखों के साथ भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने 2030 तक पूरे एशिया-पैसिफिक क्षेत्र से मलेरिया को समाप्त करने का वादा किया। यह निर्णय स्वास्थ्य सुरक्षा के प्रति नेतृत्व दर्शाता है कि मलेरिया उपचार की प्रमुख दवा आर्टीमिसिनीन से बढ़ती प्रतिरोधकता पर संभवत: अंकुश लग सकेगा।

सुनियोजित एवं समन्वयित मलेरिया कार्यक्रम आवश्यक

[English] विश्व स्वास्थ्य संगठन की नयी 2012 मलेरिया रिपोर्ट जारी करते हुए रोल बैक मलेरिया संगठन ने मलेरिया का विकास और स्वास्थ्य प्रणाली से संबंध पर प्रकाश डाला। मलेरिया से मृत्यु तक हो सकती है यदि समोचित इलाज न मिले। हर साल सिर्फ भारत समेत एशिया में 2 अरब लोग मलेरिया इस प्रभावित होते हैं। इस 2012 मलेरिया रिपोर्ट पर मीडिया संवाद में चर्चा आयोजित हुई थी। इस मीडिया संवाद को स्वास्थ्य को वोट अभियान, सिटिज़न न्यूज़ सर्विस (सीएनएस), हेल्थ राइटर्स, आशा परिवार, जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय ने संयुक्त रूप से आयोजित किया था। आरबीएम की फिल्म का भी चित्रण किया गया।

मलेरिया से निबटने के लिए अधिक संसाधन और राजनीतिक समर्थन जरुरी

विश्व मलेरिया दिवस (२५ अप्रैल)
[English] लखनऊ के प्रख्यात सर्जन एवं विश्व स्वास्थय संगठन के अंतर्राष्ट्रीय पुरुस्कार प्राप्त प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने बताया कि मलेरिया एक ऐसा रोग है जिससे बचाव मुमकिन है और उपचार भी, परन्तु ठोस राजनीतिक समर्थन के और संसाधनों के अभाव में मलेरिया रोकधाम कार्यक्रम सफल नही रहे हैं.

प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त, जो छत्रपति शाहूजी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय के भूतपूर्व मुख्य चिकित्सा अधीक्षक और सर्जरी विभाग के विभागाध्यक्ष रहे हैं, उन्होंने बताया कि दक्षिण पूर्वी एशिया में मलेरिया का दर एक जबरदस्त चुनौती दे रहा है जहाँ ८३ प्रतिशत जनसंख्या को मलेरिया रोग होने का खतरा रहता है. लगभग २ करोड़ लोगों को प्रति वर्ष मलेरिया रोग होता है और इनमे से १००,००० लोग मलेरिया के कारणवश मृत्यु के शिकार हो जाते हैं.

सी-ब्लाक चौराहे पर स्थित पिल्स (बवासीर) टू स्माइल्स क्लिनिक के महानिदेशक प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने बताया कि आज हमारे पास मलेरिया की रोकधाम के लिए प्रभावकारी नए तरीके हैं और कार्यक्रम भी. परन्तु आर्थिक अभाव के कारणवश और पर्याप्त राजनीतिक समर्थन न होने के कारण मलेरिया कार्यक्रम प्रभावकारी ढंग से लागु नही किए जा रहे हैं. आवश्यकता है कि आर्थिक संसाधनों को मलेरिया कार्यक्रमों में निवेश के लिए एकजुट किया जाए और राजनीतिक समर्थन भी इन कार्यक्रमों को प्रदान किया जाए. ढीले-ढाले रवैये से मलेरिया कार्यक्रम लाभकारी नही सिद्ध होंगे.

प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने बताया कि जिन लोगों को मलेरिया का विशेष खतरा रहता है उनमें शामिल हैं: शहरों के स्लम में रहने वाले लोग, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग, जन-जाति, जो लोग काम के लिए एक जगह से दूसरी जगह पलायन करते हैं, कम आयु के लोग और जो लोग बॉर्डर पर रहते हैं.

प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने कहा कि दक्षिण-पूर्वी एशिया में अनेकों बार मलेरिया महामारी की तरह फैला है, जो जन-स्वास्थ्य को एक भायावाही चुनौती प्रस्तुत करता रहा है. इसमें से एक बड़ी मात्र में ऐसा मलेरिया है जो जंगल में रहने वाले मच्छरों से फैलता है और संक्रमित लोग जन-स्वास्थ्य कार्यक्रमों के लाभ से अक्सर वंचित रह जाते हैं.

दक्षिण-पूर्वी एशिया के सारे देशों में, सिवाय माल्दीव्स के, मलेरिया महामारी के रूप में फैला हुआ है और मलेरिया की रोकधाम अत्याधिक मुश्किल होती जा रही है.

प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने कहा कि इस छेत्र में ऐसे दो प्रकार के प्रमुख मलेरिया पाये जाते हैं - घातक मलेरिया प्लास्मोदियम फल्सिपरुम और ऐसा मलेरिया जिससे दुबारा मलेरिया होने का खतरा रहता है: प्लास्मोदियम विवक्स. इनसे न केवल स्वास्थ्य को नुकसान होता है बल्कि मलेरिया से लोगों के रोज़गार पर प्रभाव पड़ता है और आर्थिक रूप से भी लोग इस रोग का कु-प्रभाव झेलते हैं.

प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने कहा कि ऐसा मलेरिया जब मलेरिया की दवा - क्लोरो-कुयिन - उसपर असरदायक नही रहती, उसे मलेरिया दवा-प्रतिरोधकता कहते हैं, और यह पूरे दक्षिण पूर्वी एशिया में फ़ैल चुका है. क्लोरो-कुयिन सबसे प्रचलित और सस्ती मलेरिया की दवा है.

प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने कहा कि दवा प्रतिरोधक मलेरिया से खतरा कई गुणा बढ़ता जा रहा है. जरुरत है कि हर सम्भव प्रयास किया जाए जिससे मलेरिया रोकधाम के कार्यक्रम अधिक-से-अधिक प्रभावकारी बन सके.
सी.एन.एस

तपेदिक या टीबी समाचार सारांश: १२ जून २००८: अंक ६०

तपेदिक या टीबी समाचार सारांश
अंक ६०
गुरूवार, १२ जून २००८
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International Union Against Tuberculosis and Lung Disease (IUATLD, The Union, www.iuatld.org), या तपेदिक या टीबी और अन्य फेफडे की बीमारियों के उन्मूलन के लिये अंतर्राष्ट्रीय संगठन - ने एक रपट जारी की है कि कैसे गैर-संक्रामक रोगों के नियंतरण को प्रभावकारी बनाया जाए - यह रपट खासकर इसलिए महत्व की है क्योंकि २१ मई २००८ को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वर्ल्ड हैल्थ स्तातिस्तिक रपट २००८ जारी की थी जिसके अनुसार गैर संक्रामक रोगों का मृत्यु दर संक्रामक रोगों की तुलना में कहीं अधिक है - उदाहरण के तौर पर टीबी, एच.आई.वी, आदि जैसे संक्रामक रोगों से कही अधिक मृत्युदर है गैर-संक्रामक रोगों का जैसे की ह्रदय रोग, डायबिटीज़ या मधुमेह, या तम्बाकू-जनित और मोटापा जनित बीमारियाँ. परन्तु विश्व में अधिकांश ध्यान और संसाधन संक्रामक रोगों पर व्यय हो रहे हैं, और गैर संक्रामक रोगों के कार्यक्रम अभाव में संघर्ष कर रहे हैं। इस वर्ल्ड हैल्थ स्तातिस्तिक रपट २००८ को डाउनलोड करने या पढ़ने के लिये यहाँ पर क्लिक्क कीजिये

यूनियन का कहना है कि गैर संक्रामक रोग जैसे कि डायबिटीज़, उच्च रक्त का दबाव या हाई बी.पी, ऐस्थामा या दमा का रोग, एपिलेपसी या मिर्गी का दौरा आदि के जन-स्वास्थ्य कार्यक्रमों को प्रभावकारी बनाने के लिये टीबी या तपेदिक के कार्यक्रमों से बहुत कुछ सीखने को मिलता है. तपेदिक या टीबी कार्यक्रमों को राजनीतिक समर्थन मिलने से और अत्यन्त सरल टीबी या तपेदिक की जांच हर सम्भव जगह पर उपलब्ध कराने से, एक ही प्रकार का टीबी या तपेदिक का मान्यता प्राप्त इलाज जिसे डोट्स कहते हैं, नियमित रूप से टीबी या तपेदिक के इलाज के लिये दवाइयों को मुहैया करना और टीबी या तपेदिक के इन कार्यक्रमों का ठीक से मूल्यांकन करना आदि इसको सफल बनने में कारगर रहे हैं.

यूनियन की इस रपट को डाउनलोड करने या पढ़ने के लिये, यहाँ पर क्लिक्क कीजिये

First HIV TB Global Leaders' Forum या पहला एच.आई.वी टीबी पर लीडर्स के लिये अंतर्राष्ट्रीय अधिवेशन ९ जून २००८ को न्यू यार्क में आयोजित हुआ. इस अधिवेशन में, दुनिया के लगभग सभी देशों के सरकारों के वरिष्ठ प्रतिनिधि या राष्ट्रपति/ प्रधानमंत्री आदि ने भाग लिया.

इस अधिवेशन में सभी देशों के प्रतिनिधियों ने एक कॉल फॉर एक्शन पर हस्ताक्षर किया कि एच.आई.वी और टीबी या तपेदिक नियंतरण के कार्यक्रमों को मिलजुल कर चलाया जाए जिससे की एच.आई.वी और टीबी दोनों का मृत्यु दर कम हो सके.

एच.आई.वी से ग्रसित लोगों में टीबी या तपेदिक सबसे बड़ा अवसरवादी संक्रमण है, और मृत्यु का सबसे बड़ा कारण भी. जब कि टीबी या तपेदिक का इलाज मुमकिन है, डोट्स के माध्यम से नि:शुल्क है, इसलिए टीबी से होने वाली मृत्यु नि:संदेह चिंता की बात है. एच.आई.वी की जांच-इलाज की सुविधाएँ और टीबी या तपेदिक की जांच-इलाज की सुविधाएँ अभी तक अलग अलग कार्य कर रही हैं, जबकि एच.आई.वी और टीबी से ग्रसित व्यक्ति अक्सर एक ही होता है, खासकर कि उन छेत्रों में जहाँ एच.आई.वी का अनुपात अधिक है.

फर्स्ट HIV टीबी ग्लोबल लीदेर्स' फॉरम का कॉल फॉर एक्शन को डाउनलोड करने के लिये यहाँ पर क्लिक्क कीजिये

तपेदिक या टीबी समाचार सारांश: २० मई २००८: अंक ४८

तपेदिक या टीबी समाचार सारांश
अंक ४८
मंगलवार, २० मई २००८


विश्व स्वास्थ्य संगठन की नई रपट (वर्ल्ड हैल्थ स्तातिस्टिक २००८ या विश्व के स्वास्थ्य आकडें २००८) १९ मई २००८ को विमोचित हुई है.

इस रपट से साफ जाहिर है कि विश्व में आने वाले सालों में संक्रामक रोगों से खतरा कम और क्रोनिक या लंबे-देखभाल वाले गैर-संक्रामक रोगों का अनुपात सबसे अधिक होगा. उदाहरण के तौर पर टीबी या तपेदिक, एच.आई.वी, मलेरिया आदि से कही ज्यादा अनुपात होगा ह्रदय रोगों का, मधुमेह का, तम्बाकू जनित कु-प्रभावों का...


अभी तक 'बम' का आतंक तो सुना होगा, पर अमरीका में टीबी या तपेदिक के आतंक की ख़बर अनोखी है. अमरीका में एक व्यक्ति जिसने किराये पर ली कार को वापस नही किया था, उसको पुलिस ने थाने में सुबह सुनवाई तक बंद करने का प्रयास किया, तो उसने 'मुझे टीबी है' का शोर मचा दिया. हकीकत में यह व्यक्ति थाने के अन्य कैदियों के साथ रात नही गुज़ारना चाहता था, इसलिए उसने ऐसा झूठ बोला.

पुलिस थाने में खलबली मच गई, स्वास्थ्य विभाग ने थाना सील कर दिया, सभी कैदियों और करमचारियों की टीबी या तपेदिक की जांच हुई और अंत में यह पता चला कि न उस व्यक्ति को टीबी या तपेदिक है और न ही किसी भी कैदी या कर्मचारी को.

अमरीकी कोर्ट ने इस व्यक्ति को 'संगीन जुर्म और बदमाशी' के लिये सजा सुनाई है.

एच.आई.वी की तुलना में हेपेटाइटिस से दस गुणा अधिक लोग संक्रमित होते हैं. ऐसा वर्ल्ड हेपेटाइटिस काउंसिल या विश्व हेपेटाइटिस संगठन ने आकडें प्रस्तुत करते हुए कहा.

काउंसिल ने मांग की कि हेपेटाइटिस नियंतरण कार्यक्रमों को कम-से-कम उतना ध्यान तो मिलना चाहिए जितना एच.आई.वी, टीबी या तपेदिक और मलेरिया को मिलता है.

लगभग १५ लाख लोगों की मृत्यु प्रति वर्ष हेपेटाइटिस से होती है.

तपेदिक या टीबी समाचार सारांश: ७ मई २००८

तपेदिक या टीबी समाचार सारांश
७ मई २००८

पिछले महीनों में युगांडा में ग्लोबल फंड के पैसे को, जो एड्स, टीबी या तपेदिक और मलेरिया नियंत्रण के लिये आया था, कुछ संस्थाओं ने और व्यक्तियों की मिलीभगत से हजम कर लिया गया था। मई २००८ के प्रारम्भ में युगांडा सरकार ने यह कहा कि इन लोगों के ख़िलाफ़ कानूनी करवाई करने के लिये उसके पास धन राशी नही है। परन्तु कल ६ मई २००८ को युगांडा के एकजिले के मजिस्ट्रेट ने कहा कि वह इन लोगों के ख़िलाफ़ कानूनी करवाई करेगा और इनको गिरफ्तार भी। ऐसा शायद इसलिए भी हुआ हो क्योकि युगांडा को पुन: ग्लोबल फंड का पैसा मिल गया है।

वहीं कैलिफोर्निया में गाय-भैंस में होने वाली टीबी या तपेदिक का दर बढ़ता जा रहा है। यह भी देखने में आया है कि मनुष्यों को भी यही टीबी या तपेदिक ग्रसित कर रही है, खासकर कि हिस्पनिक लोगों को मेक्सिको से आए हैं। यह लोग इन टीबी या तपेदिक ग्रसित गाय-भैंस का कच्चा या बिना पस्तयूरिज़े किया हुआ दूध पीते हैं।

गाय-भैंस में होने वाली टीबी या तपेदिक मनुष्य को या तो पशु से सम्पर्क से या कच्चा दूध पीने से ही फैलती है। पस्तयूरिज़े दूध पीने से मनुष्य को यह टीबी या तपेदिक होने का खतरा नही होता है।

नैजेरिया में जिन लोगों को टीबी या तपेदिक है और वो एच.आई.वी से भी ग्रसित हैं, उनका दर बढ़ता जा रहा है। २५ प्रतिशत ऐसे लोगो हैं जिनको टीबी और एच.आई.वी दोनों है. यह इसलिए भी हो रहा है क्योकि अब जो लोगो एच-आई.वी की चिकित्सकिये देखभाल के लिये अस्पताल आते हैं, उनको टीबी या तपेदिक की जांच कराने के लिये प्रेरित किया जाता है। यदि उनमें सक्रिय टीबी या तपेदिक न निकले तो उनको इसोनिअजिद (INH ) ठेराप्य पर रखा जाता है, जिसके ६ माह उपरांत इनको टीबी या तपेदिक होने का खतरा नगण्य हो जाता है।

एक प्रारंभिक शोध में यह भी स्थापित हुआ है कि एयर फिल्टर इस्तेमाल करने से टीबी या तपेदिक जैसे रोगों के फैलने पर अंकुश लग सकता है। यह लाभकारी उपलब्धि होगी क्योकि इन्फेक्शन कंट्रोल या संक्रमण के नियंत्रण के लिये अस्पतालों में, और अन्य स्थानों पर जहाँ रोगी इक्काठ्ठे होते हैं, वहाँ संक्रमण को नियंत्रित करने की बहुत आवश्यकता है जिससे रोग आपस में न फैले।

अमरीका के मिन्नेसोता में गाय-भैंस में टीबी या तपेदिक नियंत्रण के लिये जो निति बनी थी, उसको कानूनी अधिनियम में परिवर्तित कर दिया गया है। अब कानूनन १५ जुलाई तक किसानों को दीद पर हस्ताक्षर करने होंगे कि यदि उनके गाय-भैंस को टीबी या तपेदिक निकली तो उन पशुओं को मार दिया जाएगा, और किसान को अमरीकी डालर ५०० हर्जाना दिया जाएगा।

तपेदिक या टीबी समाचार: ३ मई २००८

तपेदिक या टीबी समाचार
३ मई २००८

इंग्लैंड में गनीमत है कि शोधकर्ताओं ने यह कबूला है कि यदि इंग्लैंड देश में प्रभावकारी टीबी नियंत्रण करना है तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर टीबी नियंत्रण को प्रभावकारी करना होगा।

क्योकि टीबी ऐसा संक्रमण है जो एक देश, शहर या कसबे या घर में नियंत्रित नही किया जा सकता। यदि प्रभावकारी टीबी नियंत्रण करना है तो सबको एकजुट हो कर टीबी नियंत्रित करने में शामिल होनाचाहिए।

इंग्लैंड में न केवल मालती-ड्रग रेसिस्तंत टीबी बढ़ रही है बल्कि एक्स्तेंसिवली ड्रग रेसिस्तंत टीबी भीबढोतरी की ओर है। नए शोध के आधार पर यह तथ्य सामने आया है कि इंग्लैंड के नए टीबी रोगियों में से लगभग ८ प्रतिशत पहले से ही कम-से-कम एक टीबी की दवा से रेसिस्तंत होते हैं।

वहीं अमरीका के फ्लोरिडा प्रदेश में कुछ दिन पहले यह विवाद चल रहा था कि वहाँ का एकमात्र टीबीअस्पताल बंद होने को था, अब अगले सप्ताह पेश होने वाला बजट फ्लोरिडा प्रदेश के लिये खट्टी-मीठी ख़बर ले के आया है - इस बजट में अमरीकी डालर ११ मिलियुन इस अस्पताल को प्रदान करने का प्रस्ताव है।

अफ्रीका के युगांडा देश में ग्लोबल फंड के पैसे को भ्रष्टाचार के कारण एड्स, टीबी या मलेरिया के कार्यक्रमों पर खर्च करने के बजाय कुछ सामाजिक संगठनों और व्यक्तियों ने धांधली से पैसा हड़प लिया था। अबयुगांडा का कहना है कि युगांडा सरकार के पास इतना पैसा है ही नही कि वह एन सामाजिक संगठनोंऔर व्यक्तियों के विरोध में कानूनी करवाई कर सके! यानि कि धांधली से जो ग्लोबल फंड का पैसा हड़पा है वह हजम?

मई माह के पहले मंगलवार को हर वर्ष विश्व दमा दिवस (World Asthma Day) मानते हैं। इस वर्ष विश्व दमा दिवस ६ मई को पड़ रहा है। विश्व दमा दिवस Global Initiative for Asthma के संयोजन से मनाया जाता है।

तपेदिक या टीबी समाचार: शनिवार, २६ अप्रैल २००८

तपेदिक या टीबी समाचार
शनिवार, २६ अप्रैल २००८


अफ्रीका के युगांडा देश के एक समाचार पत्र में छपे लेख में पत्रकार ने संगीन सवाल उठाया है: कि सदियों बाद भी क्यों संक्रामक रोग नियंत्रण नही हो पा रहा है जब कि इन संक्रामक रोगों का इलाज सैकडों सालों से सस्ता और उपलब्ध है।

उदाहरण के तौर पर मलेरिया, कुष्ठ रोग या लेप्रोसी, तुबेर्चुलोसिस या तपेदिक या टीबी, येलो फीवर, आदि।

इन सब बीमारियों से न केवल बचाव के प्रभावकारी तरीके आज हम सबको मालूम हैं, बल्कि इनके इलाज के लिये भी पुष्ट दवायों का इजात हुए सैकडों साल बीत चुके हैं। इसके बावजूद भी इन बीमारियों से आज भी युगांडा के लोगों को जूझना पड़ रहा है, और मलेरिया
कई सालों से युगांडा में मृत्यु का सबसे बड़ा कारण है। मलेरिया से युगांडा में ७०,००० - १,१०,००० लोगों की मृत्यु प्रति वर्ष होती है। युगांडा के स्वास्थ्य विभाग के अनुसार ९५% मलेरिया देश में पेरेनिअल है, यानी कि मच्छर का मौसम हो न हो, मलेरिया रोग का संक्रमण फ़ैल रहा है और लोग मर रहे हैं, और मात्र ५% मलेरिया ऐसा है जो मौसमी है!

युगांडा के स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि २०-२५% जो लोग अस्पताल में जाते हैं, उसका कारण मलेरिया है! और २०% अस्पताल में भरती होने वाले लोग भी मलेरिया के कारणवश भरती होते हैं। इनमे से ९-१४% मरीजों की मृत्यु जो अस्पताल में होती है, उसका कारण भी मलेरिया है।

मलेरिया से मृत्यु होने वालों में से अधिकांश बच्चे हैं। बच्चों में मौत का सबसे बड़ा कारण आज भी मलेरिया के साथ साथ कु-पोषण, बच्चों में होने
वाली अनीमिया या खून में लौह की कमी, है जिससे बच्चे मानसिक रूप से कुंठित रह सकते हैं।

मलेरिया और तपेदिक या टीबी के लिए प्रभावकारी दवाओं से लोगों को रेसिस्तंस हो रही है यानि कि ये दवाएं उनपर कारगर नही रहती।

पौष्टिक अहार लेने से जो लोग एच.आई.वी से संक्रमित हैं या जिनको टीबी या तपेदिक है, वो कई बीमारियों से बचते हैं जिनमे पेरिफेरल नयूरोपैथी विशेष है।

अमरीका के ओहियो छेत्र में लोगों को ये लगने लगा है कि तपेदिक या टीबी टू १९वी सदी में खत्म हो चुकी है! जबकि ओहियो में ही लोग टीबी या तपेदिक से ग्रसित हैं और जूझ रहे हैं। अब ओहियो के स्वास्थ्य अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि लोग टीबी या तपेदिक की रोकधाम के लिए चौकन्ना रहे और हर सम्भव प्रयास करें कि टीबी या तपेदिक ओहियो में फैले नही और जो लोग इससे संक्रमित हैं, उनका पर्याप्त इलाज हो।

विश्व मलेरिया दिवस (२५ अप्रैल २००८): मलेरिया से निबटने के लिए अधिक संसाधनों की और राजनीतिक समर्थन की आवश्यकता है

विश्व मलेरिया दिवस (२५ अप्रैल २००८)

मलेरिया से निबटने के लिए अधिक संसाधनों की और राजनीतिक समर्थन की आवश्यकता है

विश्व मलेरिया दिवस, २५ अप्रैल २००८ के उपलक्ष्य में, विश्व स्वास्थ्य संगठन के दक्षिण-पूर्वी एशिया कार्यालय की विज्ञप्ति के अनुसार, मलेरिया एक ऐसा रोग है जिससे बचाव मुमकिन है और उपचार भी, परन्तु ठोस राजनीतिक समर्थन के और संसाधनों के अभाव में मलेरिया रोकधाम कार्यक्रम सफल नही रहे हैं.

दक्षिण पूर्वी एशिया में मलेरिया का दर एक जबरदस्त चुनौती दे रहा है जहाँ ८३ प्रतिशत जनसंख्या को मलेरिया रोग होने का खतरा रहता है. लगभग २० मिलियुन लोगों को प्रति वर्ष मलेरिया रोग होता है और इनमे से १००,००० लोग मलेरिया के कारणवश मृत्यु के शिकार हो जाते हैं.

आज हमारे पास मलेरिया की रोकधाम के लिए प्रभावकारी नए तरीके हैं और कार्यक्रम भी. परन्तु आर्थिक अभाव के कारणवश और पर्याप्त राजनीतिक समर्थन न होने के कारण मलेरिया कार्यक्रम प्रभावकारी ढंग से लागु नही किए जा रहे हैं. आवश्यकता है कि आर्थिक संसाधनों को मलेरिया कार्यक्रमों में निवेश के लिए एकजुट किया जाए और राजनीतिक समर्थन भी इन कार्यक्रमों को प्रदान किया जाए. ढीले-ढाले रवैये से मलेरिया कार्यक्रम लाभकारी नही सिद्ध होंगे, कहना है डॉ सम्ली प्लिंबंग्चंग का, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन के दक्षिण-पूर्वी एशिया के कार्यालय के छेत्रिये निदेशक हैं.

जिन लोगों को मलेरिया का विशेष खतरा रहता है उनमें शामिल हैं: शहरों के स्लम में रहने वाले लोग, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग, जन-जाति, जो लोग काम के लिए एक जगह से दूसरी जगह पलायन करते हैं, कम आयु के लोग और जो लोग बॉर्डर पर रहते हैं.

दक्षिण-पूर्वी एशिया में अनेकों बार मलेरिया महामारी की तरह फैला है, जो जन-स्वास्थ्य को एक भायावाही चुनौती प्रस्तुत करता रहा है. इसमें से एक बड़ी मात्र में ऐसा मलेरिया है जो जंगल में रहने वाले मच्छरों से फैलता है और संक्रमित लोग जन-स्वास्थ्य कार्यक्रमों के लाभ से अक्सर वंचित रह जाते हैं.

दक्षिण-पूर्वी एशिया के सारे देशों में, सिवाय माल्दीव्स के, मलेरिया महामारी के रूप में फैला हुआ है और मलेरिया की रोकधाम अत्याधिक मुश्किल होती जा रही है.

इस छेत्र में ऐसे दो प्रकार के प्रमुख मलेरिया पाये जाते हैं - घातक मलेरिया प्लास्मोदियम फल्सिपरुम और ऐसा मलेरिया जिससे दुबारा मलेरिया होने का खतरा रहता है: प्लास्मोदियम विवक्स. इनसे न केवल स्वास्थ्य को नुकसान होता है बल्कि मलेरिया से लोगों के रोज़गार पर प्रभाव पड़ता है और आर्थिक रूप से भी लोग इस रोग का कु-प्रभाव झेलते हैं.

ऐसा मलेरिया जो मलेरिया की दवा से रेसिस्तंत हो जाता है, यानि कि मलेरिया की दवा - क्लोरो-कुयिन - उसपर असरदायक नही रहती, इस पूरे दक्षिण पूर्वी एशिया में फ़ैल चुका है. क्लोरो-कुयिन सबसे प्रचलित और सस्ती मलेरिया की दवा है.

मुलती - ड्रग रेसिस्तंत मलेरिया से खतरा कई गुणा बढ़ता जा रहा है. जरुरत है कि हर सम्भव प्रयास किया जाए जिससे मलेरिया रोकधाम के कार्यक्रम अधिक-से-अधिक प्रभावकारी बन सके.