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सूचना अधिकार अधिनियम सेक्शन 4(1)(बी) और जनता सूचना केंद्र पर संवाद

[English] टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज, मुंबई में पढ़ाई कर रहे शैलेन्द्र कुमार और आशा परिवार के साथ जुड़े कार्यकर्ता मुदित शुक्ला ने सूचना का अधिकार अधिनियम, २००५ की धारा ४ (१)(बी) के उत्तर प्रदेश में अनुपालन की स्थिति और प्रदेश में जनता सूचना केन्द्रों के बारे में लोहिया मजदूर भवन, नरही में एक व्याख्यान दिया और प्रेस वार्ता संबोधित की।

वित्त मंत्री को सामाजिक क्षेत्र के प्रतिनिधियों ने दिए बजट पूर्व सुझाव

[English] भारत के वित्त मंत्री प्रणब मुख़र्जी ने सामाजिक क्षेत्र के प्रतिनिधियों के साथ १७ जनवरी २०१२ को दिल्ली में बजट पूर्व संवाद आयोजित किया. इस समिति में डॉ0 संदीप पाण्डेय ने भी भाग लिया. डॉ संदीप पाण्डेय, मैगसेसे पुरूस्कार से सम्मानित वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता हैं और लोक राजनीति मंच, जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय और आशा परिवार से जुड़े हैं।

डॉ संदीप पाण्डेय ने वित्त मंत्री को बजट पूर्व यह सुझाव दिए:

कृषि क्षेत्र को सबसे अहम प्राथमिकता दी जानी चाहिए, सम्भव हो तो कृषि का अलग बजट ही होना चाहिए। फसली व गैर-फसली ऋण का अंतर समाप्त किया जाना चाहिए। ऋण ब्याज रहित होना चाहिए। ब्याज किसी भी परिस्थिति में 4 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए और यह साधारण ब्याज होना चाहिए। किसानों के ऊपर चक्रविधि ब्याज नहीं लगना चाहिए। यदि पुरुष ऋण हेतु आवेदन कर रहा है तो पत्नी की सहमति आवश्यक होनी चाहिए। बल्कि सरकार की सभी कल्याणकारी योजनाओं हेतु जिसमें कोई परिवार लाभार्थी है महिला को परिवार का प्रमुख माना जाना चाहिए जैसा कि खाद्य सुरक्षा कानून में प्रस्तावित है। न्यूनतम समर्थन मूल्य की जगह लाभकारी मूल्य लागू होना चाहिए जो किसान की लागत से अधिक होना चाहिए। खाद, बीज व डीजल के मूल्यों पर नियंत्रण होना चाहिए या सरकार की तरफ से छूट मिलनी चाहिए। किसानों को सजीव खेती की दिशा में प्रेरित किया जाना चाहिए ताकि उनकी बाजार पर निर्भरता कम हो सके। सम्भव हो तो ग्राम सभा स्तर पर गोदामों के निर्माण से भण्डारण क्षमता बढ़ाई जानी चाहिए ताकि अनाज को बरबाद होने से बचाया जा सके और किसान अपनी मर्जी से उसे बेच पाए। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने हेतु कुटीर उद्योगों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना में मजदूरी 250 रु. प्रति दिन होनी चाहिए जो हरेक मूल्य वृद्धि और सरकारी कर्मचारियों के वेतन वृद्धि के साथ संशोधित होनी चाहिए। सारी कृषि मजदूरी ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना से दी जानी चाहिए। मजदूरी की गारण्टी प्रत्येक व्यक्ति न कि परिवार को होनी चाहिए तथा यह पूरे साल के लिए होनी चाहिए।

शहर और गांवों में क्रमशः 32 व 26 रुपए प्रति दिन के खर्च के गरीबी रेखा के मानक को वापस लिया जाना चाहिए। गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वालों की सूचियां या तो ग्राम सभाओं में बननी चाहिए अथवा गरीब को सरकारी विकास एवं कल्याणकारी योजनाओं से लाभ प्राप्त करने हेतु स्वयं को सूची में शामिल कराने की छूट होनी चाहिए।

सरकारी खाद्य सुरक्षा व्यवस्था के साथ-साथ गुरुद्वारों में लंगर की व्यवस्था की तर्ज पर प्रत्येक धार्मिक व सार्वजनिक स्थल पर लंगर की व्यवस्था को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए ताकि कुपोषण की समस्या से निजात पाया जा सके।

शादी, सामाजिक, राजनीतिक आयोजनों के अवसर पर धन के भौंडे प्रदर्शन पर उसी तरह रोक लगनी चाहिए जिस तरह चुनाव खर्च पर लगी है।

80 प्रतिशत बिजली व अन्य संसाधन गांवों में जाने चाहिए।

शराब पर पूर्ण प्रतिबंध लगना चाहिए।

विद्यालयों व प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर पर्याप्त संख्या व विविधता में क्रमशः शिक्षक व चिकित्सक नियुक्त होने चाहिए। यह बड़ी विचित्र बात है कि एक ओर हमारे सामने बेरोजगारी की भीषण समस्या है तो दूसरी तरफ शिक्षकों, चिकित्सकों, ग्राम पंयायत विकास अधिकारियों या खण्ड विकास अधिकारियों, जिनकी विकास में अहम भूमिका है, जैसे कर्मचारियों की भारी कमी है।

समाज में विभिन्न वर्गों की आय में दस गुणा से ज्यादा का फर्क नहीं होना चाहिए। खर्च पर सीमा तय होनी चाहिए। गरीबी रेखा के बजाए अमीरी रेखा तय होनी चाहिए और सिर्फ अमीरों पर कर लगना चाहिए।

भ्रष्टाचार रोकने के लिए आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक सम्पत्ति के मामले में नियमित जांच एवं दोषी व्यक्तियों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही होनी चाहिए। शहरी हदबंदी कानून दोबारा बनना चाहिए तथा ऐसी सारी सम्पत्तियां जिनका आंकलन सही कीमत से काफी कम किया गया है सरकार द्वारा अधिग्रहित कर ली जानी चाहिए ताकि काले धन का सम्पत्ति व भूमि में निवेश न हो सके। आवास हेतु प्रस्तावित सीमा है प्रति परिवार एक 300-500 वर्ग मीटर का प्लॉट या एक 3500-4000 वर्ग फीट का फ्लैट। काले धन पर अंकुश लगाने हेतु 500 व 1000 रु. के बड़े नोट अर्थव्यवस्था से वापस लिए जाने चाहिए।

भ्रष्टाचार सिर्फ पैसों का अवैध लेन-देन नहीं होता। निर्णय की प्रक्रिया में कोई अनियमितता भी भ्रष्टाचार की परिभाषा में आनी चाहिए। उदाहरण के लिए पुलिस ने किसी निर्दोष व्यक्ति के खिलाफ झूठा मुकदमा लिखा। वह व्यक्ति गिरफ्तार हो गया। पुलिस ने फर्जी सबूत जुटाए व चार्जशीट दाखिल कर दी। न्यायालय में लम्बी सुनवाई के बाद आरोपी बरी हो जाता है। किन्तु तब तक उसके जीवन की एक अवधि वह कारागार में बिता चुका होता है। झूठे मामले में फंसाने के लिए दोषी व्यक्तियों को भी सजा होनी चाहिए। इसी तरह गलत आख्या देना, निर्णय में देरी करना, या जानकारी छुपाना जिससे समय रहते कार्यवाही न हो सके, आदि, भी भ्रष्टाचार की श्रेणी में आने चाहिए।

विशिष्ट व्यक्ति या अति विशिष्ट व्यक्ति जैसी श्रेणी खत्म कर देनी चाहिए। यह अवधारणा लोकतंत्र के खिलाफ है। यदि संविधान में बराबरी का अधिकार दिया गया है तो कुछ लोग महत्वपूर्ण कैसे हो सकते हैं? नेताओं और नौकरशाहों को आम इंसानों की तरह रहना सीखना होगा। यह आपत्तिजनक बात है कि इन जन प्रतिनिधियों व जन सेवकों से यदि सचिवालय, विधान सभा या संसद में मिलना हो तो जब तक ये दरबान को सूचित नहीं कर देंगे तब तक इन परिसरों में प्रवेश हेतु ‘पास‘ भी नहीं मिल सकता। यानी कि यदि किसी आम इंसान की शासक वर्ग में कोई जान-पहचान नहीं हो तो उसका इनसे मिल पाना भी मुश्किल है। किसी नौकरशाह से उसके घर पर मिलना को कल्पना से बाहर की चीज है। हमारे जन प्रतिनिधियों व जन सेवकों ने अपने आप को जनता की पहुंच से बाहर रखने का पुख्ता इंतजाम किया हुआ है। क्या लोकतंत्र में इसकी इजाजत मिलनी चाहिए? वे जिस जनता के संसाधनों का उपभोग करते हैं उसी से मिलने से बचना चाहते हैं। उनकी ज्यादातर सुविधाएं वापस ले ली जानी चाहिए। या तो उन्हें बड़ी तनख्वाह मिले और वे अपनी सुविधाओं जैसे घर, वाहन, आदि, की व्यवस्था खुद करें, अथवा यदि वे सुविधाओं का उपभोग करना चाहते हैं तो उन्हें कम तनख्वाह स्वीकार करनी चाहिए। वे चाहते हैं कि राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना में काम करने वाला परिवार रु. 33 प्रति दिन (सौ दिन की मजदूरी का साल भर का औसत) तथा पेंशन पाने वाला परिवार रु. 400 प्रति माह में अपना गुजारा करे लेकिन वे अपनी तनख्वाह या सुविधाओं पर कोई सीमा नहीं तय करना चाहते। एम्बुलेंस को छोड़ किसी भी गाड़ी पर लाल-नीली बत्ती नहीं होनी चाहिए। सुरक्षा कर्मी या निजी सेवा के लिए रखे गए कर्मियों को हटा लिया जाना चाहिए। सरकारी खर्च पर कोई व्यक्ति किसी दूसरे बालिग व्यक्ति की सुरक्षा या सेवा करे यह सामंती व गैर-लोकतांत्रिक व्यवस्था है।

विधायक एवं सांसद निधि खत्म होनी चाहिए।

रेल व हवाई जहाज में विभिन्न श्रेणियां समाप्त होनी चाहिए। रेल में साधारण श्रेणी जिसमें अक्सर इंसान जानवर की भांति सफर करते हैं समाप्त होनी चाहिए। जो पहले आरक्षण करा ले उसे सीट मिलनी चाहिए। सिर्फ चिकित्सा हेतु या परीक्षा देने जा रहे व्यक्तियों के लिए कुछ सीटें सुरक्षित रखनी चाहिएं। इसी तरह विद्यालयों व चिकित्सालयों का फर्क भी समाप्त किया जाना चाहिए। शिक्षा का अधिकार अधिनियम तो लागू है किन्तु समान शिक्षा प्रणाली व पड़ोस के विद्याालय की अवधारणा को भारत का शासक वर्ग मानने को तैयार नहीं है। चिकित्सकों को कम्पनियों के दिए गए नाम से दवा लिखने के बजाए दवा की किस्म लिखनी चाहिए और दवाओं की दुकानें भी राशन की दुकानों की तरह लोगों की पहुंच, दोनों दूरी तथा मूल्य की दृष्टि से, में होनी चाहिएं। एक ही गुणवत्ता वाली सेवा सभी नागरिकों के लिए उपलब्ध होनी चाहिए। ज्यादा मूल्य चुका कर बेहतर सेवाएं हासिल करने की बात गैर-लोकतांत्रिक है। यह भ्रष्टाचार को कानूनी जामा पहनाना है। आखिर पैसा देकर अपने लिए सुविधा हासिल करने को ही भ्रष्टाचार कहते हैं।

किसी दस्तावेज की प्रति को अधिकृत अधिकारी द्वारा प्रमाणित कराने की अब जरूरत नहीं पड़नी चाहिए। इससे काफी समय व उर्जा की बचत होगी। पहले जब फोटोकॉपी की सुविधा उपलब्ध नहीं थी तो प्रमाणित किए जाने की जरूरत थी क्योंकि हस्तलिखित दस्तावेज को जांचने की जरूरत होती थी। किन्तु फोटोकॉपी की सुविधा आ जाने से अब प्रार्थी द्वारा स्वतः प्रमाणित प्रतिलिपि उसी तरह स्वीकार की जानी चाहिए जैसे प्राथमिक विद्यालय में दाखिले के समय माता-पिता द्वारा प्रमाणित जन्म प्रमाण पत्र स्वीकार किया जाता है।

निर्माण मजदूर एक जगह काम पूरा होने पर दूसरी जगह काम तलाशते हैं। यदि किसी निर्माण मजदूर ने किसी भवन को बनाया है तो उसके योगदान के सम्मान में उसी परिसर में उसे स्थाई आवास का विकल्प दिया जाना चाहिए। इसी तरह अन्य कारीगरों एवं मजदूरों को भी सम्मान मिलना चाहिए। घरेलू काम करने वालों को भी जिन घरों में वे काम करती हैं वहीं आवास का विकल्प होना चाहिए। इसी तरह कृषि मजदूर जिस खेत में काम करती हैं उसमें उनकी एक स्थाई हिस्सेदारी होनी चाहिए। सामाजिक सुरक्षा की योजनाएं सिर्फ सरकारी कर्मचारियों या सेवा क्षेत्र के लोगों के लिए न होकर सभी के लिए होनी चाहिए। हरेक नागरिक को पेंशन की गारण्टी होनी चाहिए ताकि वह बुढ़ापा सम्मानजनक तरीके से बिता सके।

खुदरा व्यापार के क्षेत्र में विदेशी पूंजी निवेश नहीं होना चाहिए।

कोई भी सरकारी सम्मेलन या बैठकें होटलों में नहीं होनी चाहिएं जबकि सरकार के पास पर्याप्त सुविधा है। जनता के धन के दुरुपयोग को हर हाल में रोका जाना चाहिए। गणतंत्र दिवस के अवसर पर हथियारांे के प्रदर्शन तथा रोजाना शाम वाघा सीमा पर आक्रामक तेवर वाले आयोंजन की पराम्परा समाप्त की जानी चाहिए। इनकी जगह दोस्ती व शांति को बढ़ाने वाले कार्यक्रम होने चाहिए।

विशाल खुली जगह वालें भवनों, जैसे आधुनिक हवाई अड्डों, में रात को बेघर लोगों को शरण दी जानी चाहिए।

सरकारी कार्यालयों में कई स्तरीय व्यवस्था, जैसे कनिष्ठ लिपिक, वरिष्ठ लिपिक, अधीक्षक, आदि, समाप्त की जानी चाहिए क्योंकि निर्णय की प्रक्रिया में काफी समय लगता है और किसी की जवाबदेही भी सुनिश्चित नहीं होती। इसलिए क्षमता देखते हुए कोई काम किसी अधिकारी/कर्मचारी को दिया जाना चाहिए और समयबद्ध तरीके से पूरा करने की जवाबदेही होनी चाहिए। इसी तरह गरीबी निवारण की सिर्फ योजनाएं नहीं चलानी चाहिए बल्कि उनके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी लिए अधिकारियों की तनख्वाह काम संतोषजनक तरीके से होन पर ही मिलनी चाहिए। यदि सरकारी अधिकारी निजी क्षेत्र के समतुल्य तनख्वाहें चाहते हैं तो उन्हें काम के प्रति अपनी जवाबदेही भी सुनिश्चित करनी पड़ेगी। गरीबी, भुखमरी, कुपोषण, किसानों की आत्महत्या, बाल एवं मातृत्व मृत्यु दर, स्वास्थ्य सेवाओं की खस्ता हालत, शिक्षा का निम्न दर, इन सब के लिए आखिर कौन जिम्मेदार है? 

(ये सुझाव 17 जनवरी, 2012, को वित्त मंत्री द्वारा सामाजिक क्षेत्र के साथ बजट पूर्व चर्चा हेतु डॉ0 संदीप पाण्डेय द्वारा तैयार किए गए। डॉ0 संदीप पाण्डेय, मैगसेसे पुरूस्कार से सम्मानित वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता हैं और लोक राजनीति मंच, जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय और आशा परिवार से जुड़े हैं।)

सी.एन.एस.

गरीब-हितैषी नीतियों की मॉंग के समर्थन में उपवास का तीसरा दिन

- देश के कई क्षेत्रों में काली दीवाली -
   योजना आयोग द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल याचिका में गरीबी रेखा की हास्यास्पद परिभाषा दी गई है। सरकार ने ऐसी नीतियां अपनाई हैं कि गरीब की कीमत पर पहले से ही सम्पन्न लोगों को ज्यादा लाभ मिला है। गरीबी या महंगाई पर कैसे काबू पाया जाए इसका उसे कोई अंदाजा नहीं है जिसकी वजह से गरीब का जीना बहुत ही मुश्किल हो गया है। सरकार किसानों की आत्महत्या, भुखमरी से मौतें, बच्चों का कुपोषण या प्रसव के दौरान मां की मृत्यु दर पर काबू पाने में नाकाम रही है। जबकि मंत्रियों ने भ्रष्टाचार में करोड़ों कमाए हैं सरकार गरीबों के प्रति संवेदनहीन रही है।

इन्हीं मॉंगों के समर्थन में मैगसेसे पुरूस्कार से सम्मानित वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता डॉ0 संदीप पाण्डेय एवं सैकड़ों अन्य नागरिक पांच दिवसीय उपवास पर हैं जिसका आज तीसरा दिन है - 22 अक्टूबर से 26 अक्टूबर, 2011 तक यह उपवास रहेगा। डॉ0 संदीप पाण्डेय उपवास पर आशा आश्रम, ग्राम लालपुर, पोस्ट अतरौली, जिला हरदोई, उ.प्र. में बैठे हैं। हरदोई के अलावा लखनऊ, अहमदाबाद, मुरादाबाद, आदि में भी लोग भारी मात्रा में उपवास पर हैं।

नर्मदा बचाव आंदोलन का नेतृत्व कर रहे आलोक अग्रवाल ने भी आशा आश्रम में उपवास में भाग लिया। तीन ग्राम प्रधानों ने भी इसका समर्थन किया कि गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वालों की सूचियां ग्राम सभाओं व वार्ड सभाओं में तैयार हों।

हमारी मांगें हैं किः
(1) योजना आयोग अपना गरीबी का मानक - शहर में प्रति दिन 32 रु. व गांवों में 26 रु. खर्च करने वाला - वापस ले, (2) गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वालों की सूचियां ग्राम सभाओं व वार्ड सभाओं में तैयार हों, (3) सार्वजनिक वितरण प्रणाली का लोक व्यापीकरण हो यानी हर गरीब को कम कीमत पर अनाज मिले जैसे उसे रोजगार गारण्टी योजना में काम मिल सकता है, (4) अनाज के बदले जो नकद देने की योजना बनी है उसे वापस लिया जाए, (5) राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना में न्यूनतम मजदूरी 250 रु. प्रति दिन हो जो हरेक मूल्य वृद्धि व सरकारी कर्मचारियों के वेतन वृद्धि के साथ संशोधित हो तथा सारी कृषि मजदूरी रोजगार गारण्टी योजना से दी जाए और (6) समान शिक्षा प्रणाली को शिक्षा के अधिकार अधिनियम का हिस्सा बनाया जाए।

यह बहुत जरूरी हो गया है कि गरीब के मुद्दे उठाए जाएं क्योंकि अभिजात्य शासक वर्ग लगातार उसके साथ खिलवाड़ करता जा रहा है और मध्य वर्ग इस पर चुुप रहता है। अमीर व गरीब के बीच बढ़ते अंतर के साथ अब पहले से ज्यादा विभिन्न वर्गों के लिए मुहैया कराई जाने वाली सेवाओं, जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, आदि, की गुणवत्ता में अंतर दिखाई पड़ने लगा है जो किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में जायज नहीं ठहराया जा सकता।

इस बार हम काली दीवाली मनाएंगे। जो हालात सरकार की आर्थिक नीतियों ने पैदा किए हैं उसमें गरीब के लिए दीवाली मनाने की बहुत गुंजाइश नहीं रही है। यह उपवास गरीबों व ग्रमीण इलाकों के साथ होने वाले भेदभाव के विरुद्ध है।

आशा परिवार, जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय, लोक राजनीति मंच

दीवाली काली मनाएं

[English] [हस्ताक्षर अभियान] योजना आयोग द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल याचिका में गरीबी रेखा की हास्यास्पद परिभाषा दी गई है। सरकार ने ऐसी नीतियां अपनाई हैं कि गरीब की कीमत पर पहले से ही सम्पन्न लोगों को ज्यादा लाभ मिला है। गरीबी या महंगाई पर कैसे काबू पाया जाए इसका उसे कोई अंदाजा नहीं है जिसकी वजह से गरीब का जीना बहुत ही मुश्किल हो गया है। सरकार किसानों की आत्महत्या, भुखमरी से मौतें, बच्चों का कुपोषण या प्रसव के दौरान मां की मृत्यु दर पर काबू पाने में नाकाम रही है। जबकि मंत्रियों ने भ्रष्टाचार में करोड़ों कमाए हैं सरकार गरीबों के प्रति संवेदनहीन रही है।

हमारी मांगें हैं कि 
(1) योजना आयोग अपना गरीबी का मानक - शहर में प्रति दिन 32 रु. व गांवों में 26 रु. खर्च करने वाला - वापस ले,
(2) गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वालों की सूचियां ग्राम सभाओं व वार्ड सभाओं में तैयार हों,
(3) सार्वजनिक वितरण प्रणाली का लोक व्यापीकरण हो यानी हर गरीब को कम कीमत पर अनाज मिले जैसे उसे रोजगार गारण्टी योजना में काम मिल सकता है,
(4) अनाज के बदले जो नकद देने की योजना बनी है उसे वापस लिया जाए,
 (5) राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना में न्यूनतम मजदूरी 250 रु. प्रति दिन हो जो हरेक मूल्य वृद्धि व सरकारी कर्मचारियों के वेतन वृद्धि के साथ संशोधित हो तथा सारी कृषि मजदूरी रोजगार गारण्टी योजना से दी जाए और
(6) समान शिक्षा प्रणाली को शिक्षा के अधिकार अधिनियम का हिस्सा बनाया जाए।

यह बहुत जरूरी हो गया है कि गरीब के मुद्दे उठाए जाएं क्योंकि अभिजात्य शासक वर्ग लगातार उसके साथ खिलवाड़ करता जा रहा है और मध्य वर्ग इस पर चुप रहता है। अमीर व गरीब के बीच बढ़ते अंतर के साथ अब पहले से ज्यादा विभिन्न वर्गों के लिए मुहैया कराई जाने वाली सेवाओं, जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, आदि, की गुणवत्ता में अंतर दिखाई पड़ने लगा है जो किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में जायज नहीं ठहराया जा सकता।

इस बार हम काली दीवाली मनाएंगे। जो हालात सरकार की आर्थिक नीतियों ने पैदा किए हैं उसमें गरीब के लिए दीवाली मनाने की बहुत गुंजाइश नहीं रही है।

यह कार्यक्रम गरीबों व ग्रमीण इलाकों के साथ होने वाले भेदभाव के विरुद्ध है इसलिए एक गरीब गांव में पांच दिवसीय उपवास का कार्यक्रम भी किया जा रहा है जो 22 अक्टूबर, 2011 से प्रारम्भ होगा व दीवाली की अगली सुबह अर्थात 26 अक्टूबर, 2011 तक चलेगा। कार्यक्रम "आशा आश्रम, ग्राम जलालपुर, पोस्ट अतरौली, जिला हरदोई, उत्तर प्रदेश" में किया जायेगा |

कृपया उपवास स्थल पर पधार कर इस अभियान को अपना समर्थन दें व इस तरह के प्रतिरोध के कार्यक्रम अन्य जगहों पर भी करें।

डॉ संदीप पाण्डेय
(लेखक मग्सय्सय पुरुस्कार से सम्मानित वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता हैं और वर्तमान में भारतीय प्रोद्योगिकी संस्थान गांधीनगर (गुजरात) में प्रोफेसर हैं)

कृषि और किसान का संकट

कृषि और किसान का संकट

श्री बी.डी.शर्मा जो भूतपूर्व आई..एस अधिकारी हैं, और छत्तीसगढ़ में जनजातियों के अधिकारों के लिए संघर्षरत हैं, और कृषि एवं किसान से जुड़े हुए मुद्दों के विशेषज्ञ हैं, वो लखनऊ में २६ सितम्बर २००९ को गाँधी भवन के पुस्तकालय में व्याख्यान देंगेसभी आमंत्रित हैं

तिथि: २६ सितम्बर २००९
समय: ११ बजे सुबह से बजे दोपहर
स्थान: पुस्तकालय, गाँधी भवन, शहीद स्मारक के सामने, लखनऊ


अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें:
एस.आर.दारापुरी (९४१५१६४८४५), संदीप पाण्डेय (२३४७३६५)

प्रधान की रहमत नहीं! ये नरेगा कानून है मेरे मजदूर साथियों!

प्रधान की रहमत नहीं!
ये नरेगा क़ानून है मेरे मजदूर साथियों!

चुन्नीलाल

नरेगा कानून को लागू हुए इतना समय हो गया है कि कई गरीब मजदूरों की मौत भूख से हो गई तो कई ने इसे पाने के लिए अपनी जिन्दगी ही गवां दी बाकी बचे भी तो, इसे प्रधान की रहमत ही समझते हैं । क्योंकि मजदूर/ग्रामीण लोग आज भी इस कानून से अनजान हैं और इसे अन्य योजनाओं की तरह ही समझते हैं जो सिर्फ ग्राम प्रधान और ग्राम सचिव की झोली तक ही सिमट कर रह जाती है। इनकी झोली तक जिसका हाथ पहुंच गया वही पा सकता है ग्राम विकास की योजनाओं का लाभ!

इस जानकारी ने हमें उस समय आश्चर्य में डाल दिया जब हम जिला सीतापुर के एक गांव में अपने साथी शकील अहमद जो उसी गांव के निवासी है, के साथ गये। यह गांव इन्दिरा नहर और केवानी नदी के बीच में बसा है । एक तरफ इन्दिरा नहर और दूसरी तरफ केवानी नदी है जिसकी खुशी इस गांव को दुःख और भुखमरी में बदल देती है। इस गांव का नाम मुर्थना है जो स्वयं ग्राम सभा भी है । यह जिला सीतापुर के बिसवां तहसील और ब्लाक सकरन से संबंधित है । मजदूरों से मिलने और बातचीत करने पर पता चला कि यह मजदूर तो नरेगा कानून से अनजान हैं । इस ग्राम सभा में लगभग 2000 हजार से ज्यादा मजदूर हैं लेकिन सिर्फ 350 जॉबकार्ड बनाये गये हैं वो भी प्रधान के रहमों करम पर !

इस गांव के ग्राम प्रधान रामलखन (अनुसूचित जाति), ग्रामपंचायत मित्र संतोष कुमार (अनुसूचित जाति), ग्राम सचिव श्याम किशोर (सामान्य) हैं । इस गांव में मार्च 2009 को करीब 50-60 मजदूरों ने नरेगा के तहत काम किया था लेकिन उन्हें अब भी इसका भुगतान नहीं हुआ है। मजदूरों ने इसके लिए जिला मुख्यालय पर धरना भी दिया था । लेकिन अभी भी इनके लिए किसी अधिकारी ने सुध नहीं ली है।


इसी गांव का एक पुरवा है जो नदी में बाढ़ आने पर पूरा डूब जाता है तो इस पुरवा के लोग मुर्थना गांव चले आते हैं । इन्हें कई-कई दिनों तक भूखे रहना पड़ता है । इनको न तो ग्राम प्रधान रामलखन और न ही सरकार की तरफ से किसी योजना का लाभ मिला है । किसी के पास बी0पी0एल0 कार्ड तक नहीं है । इनका भी जॉबकार्ड नहीं बना है । सब लोग इतने परेशान हैं कि जब मैं इस गांव में पहुंचा तो लोगों का जमावड़ा इकट्ठा हो गया और यह जमावड़ा एक बैठक में बदल गया !

गांव के मजदूरों के साथ एक बैठक करने का मौका मिला जिसमें नरेगा के मुद्दे पर चर्चा हुयी । लोगों के दिलों में तमाम सवाल थे जैसे-
ऽ जॉबकार्ड प्रधान नहीं बना रहे हैं तो हम क्या करें ?
ऽ जॉबकार्ड बन भी जाता है तो काम नहीं मिलता है क्योंकि प्रधान जिसको चाहते हैं उन्हीं लोगों को काम देते हैं।
ऽ काम करते हैं तो मजदूरी नहीं मिलती है इसके लिए किसके पास जाये या शिकायत करें ?
ऽ अगर प्रधान काम भी देते हैं तो ऐसे मौके पर जब हम अपने कृषि कामों को कर रहे होते हैं ?
ऽ जॉबकार्ड कहाँ और कैसे बनवायें ?
ऽ काम पाने के लिए हम क्या करे ?
ऽ जॉबकार्ड प्रधान अपने पास ही रखे है ?
ऽ ग्राम पंचायत मित्र बिना प्रधान के कोई काम नहीं करते हैं ? इसकी शिकायत किससे करें ?
ऽ हम तो अनपढ़ हैं तो हम अपने जॉबकार्ड बनवाने के लिए कैसे आवेदन लिखें ?
ऽ अगर हम गरीबी रेखा के नीचे नहीं है तो क्या हम काम नहीं कर सकते हैं ? हमारा जॉबकार्ड नहीं बनेगा ?

इन तमाम सवालों के जवाब में मैंने बताया कि पहली बात तो यह है कि यह कोई योजना नहीं है कि सरकार की तरह बनती बिगड़ती रहती है बल्कि यह एक कानून है जो सरकारें बदलने पर भी नहीं बदलेगा । इसमें किसी गरीब और अमीर का भेदभाव नहीं है भेदभाव है तो ! बस, इस बात का , कि कौन काम करेगा और कौन नहीं करेगा, जो काम करेगा उसे काम मिलेगा तथा जो नहीं करना चाहता है उसे काम नहीं मिलेगा । प्रधानों, ग्राम पंचायत मित्र, ग्राम सचिव, सरकारी अफसर, सरकारें जरूर एक न एक दिन चली जानी हैं लेकिन यह कानून को कहीं नहीं जाना है सिवाय मजदूरों के पास ।

रही बात कि जॉबकार्ड बनने कि तो यह प्रधान के घर का कागज नहीं है और न ही उसकी रबड़ स्टैम्प है जो उसकी मर्जी के बिना नहीं लगेगी ! यदि प्रधान आपका जॉबकार्ड नहीं बना रहे हैं तो आप एक सादे कागज पर जॉबकार्ड बनवाने का आवेदन लिखें और उस पर उन मजदूरों का नाम और हस्ताक्षर करायें जो जॉबकार्ड बनवाना चाहते है। फिर इसे ग्राम प्रधान, पंचायत मित्र, ग्राम सचिव, या खण्ड विकास अधिकारी को दें । आवेदन पत्र देने की रसीद जरूर ले लें । यदि आप आवेदन लिखना नहीं जानते हैं तो यह जिम्मेदारी खण्ड विकास अधिकारी की है कि वह स्वयं या अपने सहयोगी से आपका जॉबकार्ड बनाने का फार्म भरे और फोटो खिचवाकर लगवाये । आपको अपने पास से फोटो का पैसा नहीं देना होगा । आपका जॉबकार्ड जब बन जायेगा तो आपको सूचित या आपके घर पहुंचा दिया जायेगा ।

जॉबकार्ड बनने के बाद आप एक आवेदन काम के लिए लिखें और उस पर भी उन मजदूरों का नाम, हस्ताक्षर समेत लिखें जो काम करना चाहते हैं और इसे ग्राम प्रधान, पंचायत मित्र, ग्राम सचिव, या खण्ड विकास अधिकारी को प्राप्त करा दें साथ में प्राप्ति रसीद जरूर ले लें यह रसीद आप को काम न मिलने के बाद मजदूरी भत्ता दिलाने के लिए मदद करेगी। यदि आपको काम का आवेदन देने के 15 दिनों तक काम नहीं मिलता है तो आप मजदूरी भत्ता पाने के हकदार उस तारिख से हो जायेगें जिस तारीख में आपने काम के लिए आवेदन/अर्जी दी है । यह भत्ता मजदूरी का एक चैथाई यानी 25 रूपये 30 दिनों तक मिलेगा इसके बाद भी काम न देने पर यह भत्ता एक चैथाई से बढ़कर मजदूरी का आधा यानी 50 रूपये प्रतिदिन हो जायेगा और यह तब तक मिलेगा जब तक काम नहीं मिलता है । इस कानून में यह भी प्रावधान है कि गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले मजदूर अपने खेतों को सुधारने के लिए भी आवेदन कर सकते हैं और उन्हें भी पूरी मजदूरी यानी 100 रूपये मिलेंगें । इसमें महिला, पुरूष, विकलांग, बृद्ध भी काम कर सकते हैं और उन्हें भी 100 रूपये ही मजदूरी मिलेगी । इसमें अन्य योजनाओं की अपेक्षा अनेक सुविधाएं भी हैं जो मजदूरी करने वाले मजदूर के लिए उपयोगार्थ हैं जैसे-छाया, पानी, आंगनबाड़ी, चिकित्सा, मुआवजा आदि ।

अब बात आई कि जॉबकार्ड तो प्रधान जी के पास है उन्हें हम कैसे लें । तो मैंने बताया कि जॉबकार्ड प्रधान, ग्राम पंचायत मित्र, सचिव या कोई अन्य व्यक्ति बिलकुल नहीं रख सकता है सिवाय मजदूर के ! और अगर आपके जॉबकार्ड प्रधान के पास हैं तो आप धारा 25 के तहत प्रधान के खिलाफ एफ0आई0आर0 कर सकते हैं । रही बात काम के समय की तो आप जब अपने कृषि कामों से खाली हों तो आप काम का आवेदन देकर काम मांग सकते हैं और आपको काम मिलेगा । अब मजदूरी का पैसा आपके बैंक खाते में आयेगा अगर मजदूरी नहीं मिलती है तो आप सीधे ग्राम्य विकास आयुक्त से इसकी शिकायत कर सकते हैं ।

यह मीटिंग करीब दोपहर से शुरू होकर शाम 5 बजे तक चली तथा इसी के साथ गांव का भ्रमण भी किया गया । इस मीर्टिग में शकील अहमद, जाबिर अली, रमेश, सूर्यप्रताप, गप्पू, विजय, राजू, रामप्रसाद, जितेन्द्र, नीरज तिवारी, रामू, रामकुमार, रामस्वरूप, रामभरोसे, बलिराम, मैनुद्दीन, आदित्य, अनिल, साज़िद अली, निसार अहमद, संजय, केशन, विमलेश तिवारी, सहित गांव के तमाम लोग मौजूद थे ।

अब सवाल यह है कि यह जिम्मेदारी किसकी है जो इन मजदूरों को नरेगा कानून के विषय में बताये और इसे लागू करवाये ताकि यह भी प्रधान के पैर पड़ने की बजाय काम और कानून के पैर पड़े जिनसे इनका पेट भर सके इनकी जीविका चल सके और गुलामी का दाग इनके बदन से छूटे ! उपरोक्त सवाल करने के साथ ही मैं ही इसका जवाब, लोगों से अपील करने के साथ देना चाहता हूँ कि यह जिम्मेदारी हमारी लोगों यानी पढ़े लिखे और कानून जानकारों और मजदूरों के संगठित होने की है जो इतना जानते हुए कि यह देश किसी अमीर से नहीं बल्कि इन्हीं मजदूरों के संगठन से ही विजयी हुआ था, विजयी होता रहा है और विजयी होता रहेगा । जिस तरह हम मजदूर लोग मिलकर किसी सरकार को बना सकते हैं तो उसी तरह हम इसे गिरा भी सकते हैं । बस जरूरत है तो सिर्फ हौसला आफजाई करने वालों की, समाजसेवियों की, समाज के जागते हुए लोगों की, जो इनकी खोपड़ी और दिल से यह भरम निकालें कि यह कानून नेताओं, सरकारी कर्मचारियों का नहीं जो हमारे नौकर हैं बल्कि काम करने वाले मजदूरों का हक है न कि प्रधान की रहमत !

लेखक: आशा परिवार एवं जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय से जुड़कर शहरी झोपड़-पट्टियों में रहने वालेगरीब, बेसहारा लोगों के बुनियादी अधिकारों के लिए संघर्षरत हैं तथा सिटिज़न न्यूज़ सर्विस के घुमंतू लेखक हैं|
chunnilallko@gmail.com, मो० ०९८३९४२२५२१

योजना आयोग का ‘ मिड टर्म ’ मूल्यांकन

योजना आयोग का ‘ मिड टर्म ’ मूल्यांकन

लखनऊ,17 सितम्बर। योजना आयोग ने ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में महिलाओं, बच्चों, अल्पसंख्यकों, स्वास्थ्य
तथा एड्स/एच आई वी आदि योजनाओं का लाभ लाभार्थियों तक पहुंचाने, लाभार्थियों की योजनाओं तक पहुंच और इन योजनाओं के सफल क्रियान्वयन के लिये जमीनी स्तर पर आंकलन शुरू कर दिया है। इसके लिए योजना आयोग द्वारा स्वयं सेवी संगठनों के सहयोग से क्षेत्रीय, प्रदेशीय और राष्ट्रीय स्तर पर कार्यशालाओं का आयोजन किया जा रहा है। इसी सन्दर्भ में आज यहां पथ, नावो और विहाई ने एक कार्यशाला का आयोजन किया जिसमें उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों से दो दर्जन प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इसमें स्वयं सेवी संगठनों के अलावा हिन्दु, मुस्लिम, सिख, इसाई आ साथ ही दि समुदाय के लोगों ने भाग लिया। इन कार्यशालाओं में यूनीसेफ विशेषरूप से सहयोग दे रहा है। इस अवसर पर पथ की अध्यक्षा डॉ. मंजू अग्रवाल ने बताया कि योजना आयोग अपनी ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजनाओं का ‘ मिड टर्म ’ मूल्यांकन कर रहा है। इसमें स्वयं सेवी संगठन विभिन्न समुदाय के लाभार्थियों की आवाज को योजना आयोग तक पहुंचायेगा। ये एनजीओ आयोग को बतायेगे कि सरकारी योजनाओं की वस्तुस्थित क्या है, क्या यह योजनाएं लाभार्थियों तक पहुंच रही है, उसकी गुणवत्ता क्या है और उसमें समुदाय की भागीदारी कितनी है। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि ऐसा पहली बार हो रहा है कि सरकार समुदाय के लोगो की आवाज को महत्व दे रही है साथ ही स्वयं सेवी संगठनों को भी अपने साथ जोड़ने महत्व दे रही है और सरकार ने उनको अपने साथ जोड़ने का काम किया है। अब स्वयं सेवी संगठनों ने भी बीड़ा उठाया है कि वह सरकार के इस जनहित के कार्यों में पूरी तरह से सहयोग करेंगे। उन्होंने उम्मीद जतायी - इस तरह की कार्यशालाओं से सरकार को एक दृप्टिकोण मिलेगा और सरकार को इन योजनाओं को और अच्छी तरह क्रियान्वयन करने में मदद मिलेगी। उन्होंने बताया कि यह कार्यशाला राज्य स्तर पर हो रही है। इसमें समुदाय की भागीदारी, उसकी योजनाओं तक पहुंच, योजनाओं की गुणवत्ता, वस्तुस्थित और जमीनी हकीकत की रिर्पोट तैयार करके उसकी सिफारिश को रीजन स्तर पर भेजा जायेगा और वहां से राष्ट्रीय स्तर पर एकत्र करके योजना आयोग तक पहुंचेगी। इस तरह की कार्यशालाओं का आयोजन हर प्रदेश में हो रहे है। उत्तर प्रदेश, पंजाब,हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, उतराखण्ड और हरियाण उत्तरी क्षेत्र में आते है और इस क्षेत्र की कार्यशाला 23 व 24 सितम्बर को चंड़ीगढ़ में होगी।

यू पी वालिटरी हेल्थ एसोसिएशन के एक प्रतिनिधि ने बताया कि योजना आयोग चाहता है कि जो योजनायें
क्रियांवित हो रही है उनका लाभ लाभर्थियों को कितना पहुंच रहा है और उसकी क्या स्थिति है। उन्होंने बताया कि हरियाण, दिल्ली हिमाचल में इस प्रकार की कार्यशालाओ का आयोजन किया जा रहा है। 21 अगस्त 09 को वालिटरी हेल्थ एसोसिएशन आफ इंडिया की दिल्ली में राष्ट्रीय स्तरीय बैठक हुई थी जिसमें कार्यशाल के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला गया। यह उद्देश्य है- ग्यारहवी पंचवर्शीय योजना के अन्र्तगत सामुदायिक स्वास्थ्य, बाल एवं महिला तथा अल्पसंख्यक कार्यक्रम सम्बन्धी मुद्दों पर चर्चा, राष्ट्र स्तरीय योजनाओं के विभिन्न मुद्दों पर सामुदायिक सदस्यों की जानकारी, योजनाओं का लाभ सही लाभार्थियों तक पहुचं रहा है कि नहीं, अल्पसंख्यकों को योजनाओं का कितना लाभ मिल रहा है और केन्द्रीय सरकारी कार्यक्रमो में सामुदायिक स्तर पर सहभागिता। उन्होंने बताया कि योजना आयोग यह जानना चाहता है कि उनकी योजनाओं- जननी सुरक्षा योजना, परिवार नियोजन, गा्रमीण स्वास्थ्य एवं पोषण दिवस, सुरक्षित प्रसव, सुरक्षित गर्भपात, बाल स्वास्थ्य, आशा,की भूमिका, स्तनपान की जानकारी टीकाकरण, ;छह जानलेवा बीमारियां- गलाघेटू, काली खांसी, टिटनेस, खसरा, पोलियो और क्षय रोगद्धै से कितने बच्चें लाभार्थियों हो रहे है और विभिन्न समुदायों की कितनी पहुंच इन योजनाओं तक है। स्वास्थ्य सेवाओ की देखभाल कितनी कारगर है, उनको क्या-क्या सरकारी सुविधाएं मिल रही है और अल्पसंख्यकों की सरकारी योजनाओं तक कितनी पहुंच है।

नरेगा (NREGA) में ही अनियमितताओं की जांच शुरू

नरेगा (NREGA) में ही अनियमितताओं की जांच शुरू

बराण्डा ग्राम पंचायत में नरेगा (NREGA) के कामों में हो रही अनियमितताओं के खिलाफ वहां के मजदूरों के संघर्ष को कानपुर जिलाधिकारी ने गम्भीरता से लेते हुए, कानपुर नगर के बिल्हौर ब्लाक के बराण्डा ग्राम पंचायत के ऊपर जांच का आदेश करते हुए, कानपुर नगर के जिला मत्स्य अधिकारी राजेश कुमार सिंह को जांच सौंप कर 3 दिनों के भीतर रिर्पोट प्रस्तुत करने को कहा।

दिनांक 27 अगस्त 2009 को जांच अधिकारी राजेश कुमार सिंह ने करीब 12 बजे दिन में बराण्डा ग्राम पंचायत में पहुंच कर जांच शुरू कर दी। जांच के दौरान सैकड़ो की संख्या में ग्राम वासी और नरेगा (NREGA) मजदूरों के साथ आशा परिवार बिल्हौर के के0 के0 कटियार, मेवाराम, रमाकान्त, महेश चन्द्र धीरज और शंकर सिंह वहां मौजूद थे।

जांच के दौरान जांच अधिकारी ने ग्राम पंचायत सचिव महेन्द्र कुमार गौतम से कार्यवाही रजिस्टर मांगा। सचिव ने जब रजिस्टर उपलब्ध कराई तो उस रजिस्टर में कोई कार्यवाही दर्ज नहीं थी, और कार्यवाही रजिस्टर पूरी खाली थी। उसके बाद जांच अधिकारी ने कार्य प्रस्ताव रजिस्टर देखा वो भी पूरी तरह खाली थी और कार्य प्रस्ताव रजिस्टर में कोई भी कार्य का प्रस्ताव दर्ज नहीं था जबकि इस ग्राम पंचायत में अब तक नरेगा (NREGA) के तहत 5 कार्य पूरे किये जा चुके है। जांच अधिकारी द्वार जांच में ये भी पाया गया कि अभी तक किसी भी काम की एम0 बी0 (Measurement Book) नहीं बनी है। खुली बैठक का रजिस्टर देखने पर पता चला कि ये रजिस्टर भी पूरी खाली है। मस्टर रोल समरी रजिस्टर जांच अधिकारी द्वारा मांगने पर सचिव ने बताया कि अभी तक बना नहीं है।

गांव में 384 बी0पी0एल0 (BPL) कार्ड धारक मगर जाब कार्ड सिर्फ 189

जांच अधिकारी ने ग्राम पंचायत सचिव से जब ये सवाल पूछा कि अब तक कुल कितने जाब कार्ड बने है। सचिव ने बताया 189 जाब कार्ड बने है। जांच अधिकारी ने पूछा कि इस गांव में कुल कितने बी0पी0एल0 (BPL) कार्ड धारक र्है। सचिव ने बताया 384 बी0पी0एल0 (BPL) कार्ड धारक र्है। जांच अधिकारी ने इस बात पर फटकार लगाते हुए बहुत नाराजगी दिखाई कि जिस गांव में 384 बी0पी0एल0 (BPL) कार्ड धारक र्है वहां अब तक सिर्फ 189 जाब कार्ड बने है। मस्टर रोल मांगने पर सचिव ने बताया कि अभी मस्टर रोल नहीं है डाटा फिडिंग के लिए गया हुआ है किसी भी काम का मस्टर रोल दिखाने में सचिव असमर्थ रहे। एकाउन्ट खोलने के बाबत जांच अधिकारी द्वारा सवाल पूछने पर बताया कि अभी तक सिर्फ 100 खातों के ही एकाउन्ट खुल पाये है। नरेगा (NREGA) का परिवार रजिस्टर के बारे में जब जांच अधिकारी ने जानना चाहा तो सचिव ने बताया कि अभी तक नरेगा परिवार रजिस्टर नहीं बना हैं।

मजदूरों के साथ जांच अधिकारी ने बैठक कर उनकी समस्याओं के बारे में जानना चाहा। मजदूरों ने बताया कि जाब कार्ड बने एक साल हो गया मगर अभी तक उनके हाथों में जाब कार्ड नहीं मिला है सभी जाब कार्ड प्रधान के पास रहता है। सचिव ने करीब 70 जाब कार्ड जो अपने पास रखे थे दिये । जांच अधिकारी ने सचिव को जमकर फटकार लगाई अब तक जाब कार्ड मजदूरों को न सौंपे जाने के बाबत, सचिव ने कहा कि अभी तक हस्ताक्षर नहीं हो पाये है। मैं कल तक करा के सबको सौप दूंगा। 22 लोगों ने लिखित शिकायत कि नवम्बर 2008 से दिस्मबर 2008 तक नरेगा (NREGA) में करीब 97 मजदूरों ने 35 दिन मकनपुर रोड से जूनियर प्राइमरी सम्पर्क मार्ग तक जो काम किया है उसका आज तक भुगतान नहीं हुआ है। जांच अधिकारी द्वारा पूछने पर ग्राम सचिव ने ये माना कि इस काम का अभी तक कोई भुगतान नहीं हुआ र्है। सचिव ने कहा कि जल्द ही करा दूंगा मेरी तो बस कुछ ही महीने पहले यहां पर पोस्टिंग हुई है।

लोगों ने ये भी शिकायत की कि काम मांगने पर ग्राम पंचायत सचिव काम नहीं देते है। जांच अधिकारी ने जब सचिव से ये पूछा कि रोजगार मांग फार्म कहा है तब सचिव बगले झांकते हुए बोला कि अभी तक ब्लाक से लाये नहीं हैं। 10 लोगो ने लिखित शिकायत किया कि हम लोगो से नरेगा (NREGA) के तहत जनवरी 2009 में कार्य कराया गया, मगर आज से दो दिन पहले घर आकर प्रधान पति अशोक कटियार ये कह कर हम लोगों को नगद भुगतान किया कि वो कार्य मैने व्यक्तिगत कराया है।

जांच अधिकारी द्वारा ये सवाल पूछने पर कि महिलाओं को कितने जाब कार्ड बने है। ग्राम सचिव ने बताया कि अभी तक एक भी महिला का जाब कार्ड नहीं बना है। जांच अधिकारी राजेश कुमार सिंह ने ग्राम सचिव महैन्द्र कुमार गौतम को डांट लगाते हुए कहा कि कल 28 अगस्त शाम तक सारे रिकार्ड लेकर हमारे ऑफिस में आकर मिलो और जो भी रजिस्टर पूरा नहीं है वो सभी लेकर आना। इसके बाद जांच अधिकारी ने आज की अपनी जांच प्रक्रिया को बन्द करके कानपुर रवाना हो गये। इसके बाद शंकर सिंह ने सभी मजदूरों के साथ बैठकर आगे की संघर्ष की भावी रणनीति पर चर्चा की और उसकी योजना बनाई।

लेखक: महेश एवं शंकर सिंह
"आशा परिवार" एवं "अपनाघर", कानपुर

नरेगा (NREGA) मजदूरों की जीत, रूका काम शुरू

नरेगा (NREGA) मजदूरों की जीत, रूका काम शुरू


बगदौधी बागर के ग्राम प्रधान राजू दिवाकर ने अन्ततः नरेगा (NREGA) मजदूरों के काम रोको संघर्ष के आगे झुकते हुए उनकी तीनों मांगे स्वीकार कर लीं , आखिरकार पिछले दो दिनों से नरेगा(NREGA) के तहत रामनगर तलाब की जो खुदाई बन्द हो गई थी आज फिर से शुरू हो गई। कानपुर नगर के चैबेपुर ब्लाक के बगदौधी बांगर ग्राम पंचायत में नरेगा(NREGA) के तहत तलाब का खुदाई में करीब 35 मजदूर लगे थे। ग्राम प्रधान उनसे मानक से ज्यादा 80 से 90 घन फुट खुदाई करके 200 फीट दूर फेकने का दबाव देने लगा। 2 दिनों तक दबाव में मजदूरों ने 80 घनफुट मिट्टी खोदकर करीब 200 फीट दूर तक फेंका। तीसरे दिन मजदूरों ने मानक से ज्यादा काम करने से मना कर दिया। प्रधान ने उन्हे काम से निकाल देने कि धमकी दी, मजदूरों ने आशा परिवार के साथियों से सम्पर्क किया। अगले दिन आशा परिवार के साथी जब तालाब पर सभी मजदूरों के साथ बैठक कर रहे थे, तभी ग्राम प्रधान अपने साथियों के साथ पहुचां। प्रधान को भी बैठक में शामिल कर नरेगा(NREGA) कानून और मजदूरों के हक और काम के मानकों के बारे में आशा परिवार के साथियों ने विस्तार से चर्चा किया। मजदूरों ने अपनी तीन समस्यायें बैठक के दौरान सामने रखी, साथ ही कहा ये मांगे प्रधान पूरी करें नहीं तो, हम लोग इस लड़ाई को आगे तक ले जायेंगे।

* नरेगा (NREGA) के मानक के अनुसार 70 घनफुट खुदाई और 15 मीटर तक मिट्टी फेंकने का काम लिया जाय, इससे ज्यादा नहीं !

* मजदूरों का जो मेट है वह दूसरे ग्राम पंचायत का है उसे हटाकर इसी ग्राम पंचायत का जो काबिल आदमी है उसे मेट रखा जाय ! राम कुमार जो 12 वीं पास है और इसी ग्राम पंचायत के हैं, इस समय नरेगा (NREGA) में काम कर रहे हैं उन्हे मेट बनाया जाय !

* पानी पीने के लिए अलग से एक मजदूर लगाया जाय, जो हम लोगों को काम के दौरन पानी पिलाये !

मजदूरों और प्रधान के साथ करीब 2 घंटे तक चले गरमा-गरम बहस के बाद जब मजदूरों ने अन्ततः अपनी मांगे नहीं छोड़ी तो प्रधान राजू दिवाकर ने मजदूरों की तीनों मागें मान ने ली। मिट्टी फेकने की दूरी चूँकि 80 फीट थी इसलिए खुदाई 60 घनफुट तय हुई। प्रधान ने बाहरी मेट को हटाकर उसी गांव के राम कुमार को जो इसी काम में मजदूरी का काम कर रहे थे उन्हे मेट बनाया। मजदूरों में से एक मजदूर को अलग से सिर्फ पानी पिलाने की व्यवस्था पर लगाया गया। मजदूरों के तीनों मांगों को ग्राम प्रधान के मानने के बाद आज से राम नगर तालाब पर फिर से खुदाई का काम शुरू हो गया। मजदूरों के संगठित होने के बाद एक बार फिर जहां मजदूरों की टूटी आस जुड़ गयी वहीं दूसरी और उनका नरेगा (NREGA) पर विश्वास मजबूत होता दिखाई पड़ा।

लेखक: महेश एवं शंकर सिंह
"आशा परिवार" एवं "अपनाघर" कानपुर

जब एक गांव ने एक सामाजिक संगठन को खड़ा किया कठघरे में

जब एक गांव ने एक सामाजिक संगठन को खड़ा किया कठघरे में

हरदोई जिले की सण्डीला तहसील की ग्राम पंचायत सिकरोरिहा का गांव है नटपुरवा। यहां नट बिरादरी के लोग रहते हैं जिनमें से कुछ परिवार वेष्यावृत्ति में लिप्त हैं। बताते हैं यह परम्परा है यहां करीब तीन सौ सालों से है। कुछ परिवारों में लड़कियों या बहनों को इस धंधे में धकेल दिया जाता है। परिवार के पुरुषों के लिए यह अत्यंत सुविधाजनक है क्योंकि इससे आसान कमाई हो जाती है।

इन्हीं परिवारों में से एक के एक नवजवान जो एक सामाजिक संस्था के क्षेत्रीय आश्रम से जुड़े थे ने यह फैसला किया कि वह अपने गांव की उपर्युक्त समस्या से लड़ने के लिए अपने गांव में ही काम करेगा। यह माना गया कि यदि गांव की लड़कियों को वेष्यावृत्ति के व्यवसाय में जाने से रोकना है तो एक रास्ता हो सकता है शिक्षा का। नटपुरवा में कोई प्राथमिक विद्यालय नहीं था। अगल-बगल के गांवों में नटपुरवा के बच्चों के लिए जाने में उन्हें अपमान झेलना पड़ता था क्योंकि नट बिरादरी के लोगों को उनके व्यवसाय के कारण हेय दृष्टि से देखा जाता था।

अतः नीलकमल ने 2001 में अपने गांव में एक विद्यालय की नींव डाली। गांव के ही लोगों को शिक्षण कार्य में लगाया। धीरे-धीरे विद्यालय में बच्चे बढ़ने लगे। एक पुस्तकालय भी शुरू किया गया।

गांव के लोग ग्राम प्रधान के द्वारा कराए गए विकास कार्यों से असंतुष्ट थे। एक अन्य नवजवान श्रीनिवास ने पंचायती राज अधिनियम का इस्तेमाल कर ग्राम पंचायत के आय-व्यय का ब्यौरा मांगा। यहां के निर्वाचित प्रधान थे रुदान लेकिन असल में ग्राम प्रधानी चला रहे थे भूतपूर्व प्रधान हरिकरण नाथ द्विवेदी। रुदान हरिकरण नाथ द्विवेदी के खेत में काम करते थे। असल में आजादी के बाद से हमेशा ग्राम प्रधान द्विवेदी के परिवार का ही कोई व्यक्ति रहा। किन्तु यहां आरक्षण लागू हो जाने की वजह से उन्हें अपने दलित नौकर को ग्राम प्रधान बनवाना पड़ा।

गांव का आय-व्यय का ब्यौरा निकलने के बाद गांव की जनता जांच हुई। यानी जनता ने आय-व्यय के ब्यौरे के आधार पर कार्यों का भौतिक सत्यापन किया। १,६९,१०२रु0 रुपयों का घपला निकला। रपट जिलाधिकारी को सौंपी गई। जिलाधिकारी ने अपने स्तर से जांच कराई। उन्होंने यह कहते हुए कि इस ग्राम का प्रधान रबर स्टैंम्प प्रधान है उसे निलंबित कर दिया। किन्तु जिले के ही तत्कालीन कृषि मंत्री अशोक वाजपेयी की सिफारिश पर प्रधान बहाल हो गए। इस घटना की उपलब्धि यह रही कि द्विवेदी परिवार की दबंगई पर कुछ अंकुष लगा। अपने मौलिक अधिकार को लेकर लोग मुखरित हुए।

सामाजिक संगठन आशा परिवार से एक भूतपूर्व वेष्या चंद्रलेखा भी जुड़ीं। वे भी गांव में बदलाव चाहती थीं। एक बार उनके बारे में एक राष्ट्रीय स्तर की पत्रिका में छपा। जिलाधिकारी ने उन्हें मिलने के लिए बुलाया। जब जिलाधिकारी ने उनसे पूछा कि वे अपने गांव के लिए क्या चाहती हैं तो उन्होंने एक प्राथमिक विद्यालय की मांग की। इस तरह से गांव में एक प्राथमिक विद्यालय बन गया। यह एक बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी।

किन्तु धीरे-धीरे सामाजिक संगठन का काम शिथिल पड़ता गया। कार्यकर्ताओं के व्यवहार में भी कुछ गड़बड़ियों की शिकायत आने लगी। गांव वालों का भरोसा संगठन से उठ गया तो उन्होंने गांव में विकास न होने के मुद्दे पर आम चुनाव का बहिष्कार किया। फिर चुनाव के बाद जिला मुख्यालय पर धरना देकर गांव में एक पक्की नाली तथा राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना के तहत एक तालाब खुदाई का कार्य कराया।

27 अगस्त, 2009, को गांव वालों ने एक सार्वजनिक बैठक कर सामाजिक संगठन आशा परिवार के कार्यकर्ताओं को कठघरे में खड़ा किया। सवाल किए गए कि इस संगठन के लोगों ने गांव में ठीक से विकास कार्य कराने में दिलचस्पी क्यों नहीं ली? आखिर ऐसी नौबत क्यों आई कि गांव वालों का संगठन से विश्वास उठ गया तथा उन्हें अपना काम कराने के लिए खुद पहल करनी पड़ी?

आशा परिवार के कार्यकर्ताओं ने यह माना कि उनके कामों में कमी रही है। हलांकि उनके खिलाफ लगाए गए भ्रष्टाचार के कोई आरोप साबित नहीं हो पाए। संगठन ने किसी को भी अपना हिसाब-किताब देखने की खुली छूट दी। लेकिन अपने गलत व्यवहार के लिए उन्होंने गांव वालों से माफी मांगी।

गांव वालों ने निर्णय लिया कि चूंकि लोगों का विश्वास सामाजिक संगठन में खत्म हो गया है अतः वह अब इस गांव में काम न करे। संगठन की तरफ से दो कार्यकत्रियाँ जो प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाने जाती थीं उनको भी जाने से मना किया गया। चूंकि एक खुली बैठक में यह गांव वालों का सामूहिक निर्णय था इसलिए सामाजिक संगठन ने इस फैसले का सम्मान करते हुए नटपुरवा गांव में अपना काम स्थगित करने का निर्णय लिया।

हलांकि बैठक के दौरान काफी तनाव रहा और तीखी बहस भी हुई, ऐसी आशंका होने के बावजूद कि लड़ाई-झगड़े के साथ बैठक समाप्त होगी, दोनों पक्षों ने सयम बरता। एक स्वस्थ्य लोकतांत्रिक तरीके से बातचीत सम्पन्न हुई। यह भी महसूस किया गया कि जैसे एक सामाजिक संगठन को कठघरे में खड़ा किया गया उसी तरह शासन-प्रशासन की व्यवस्था में जो लोग जनता के विकास कार्यों के लिए जिम्मेदार हैं उन्हें भी जवाबदेह बनाया जाना चाहिए।

असल में यही लोगतंत्र का मौलिक स्वरूप होना चाहिए। जहां बहस के जरिए चीजें तय हों। जहां जो जिम्मेदार लोग हैं, जैसे जन-प्रतिनिधि, प्रशासनिक अधिकारी, सार्वजनिक उपक्रम, जनता के संसाधनों का इस्तेमाल करने वाली निजी कम्पनियां और विभिन्न सामाजिक, धार्मिक संगठन व राजनीतिक दल जो जनता से चंदा लेकर अपना काम करते हैं, उन्हें जनता के प्रति अपनी जवाबदेही सुनिश्चित करनी चाहिए। सूचना के अधिकार के कानून आने के बाद भी अभी हमारे समाज में जवाबदेही व पारदर्शिता की संस्कृति जड़ नहीं पकड़ पा रही है। उसके बिना लोगतंत्र सही मायनों में कभी साकार नहीं हो पाएगा।

लेखक :डॉ.संदीप पाण्डेय


(लेखक, मग्सय्सय पुरुस्कार से सम्मानित वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय (एन।ए।पी.एम्) के राष्ट्रीय समन्वयक हैं, लोक राजनीति मंच के राष्ट्रीय अध्यक्षीय मंडल के सदस्य हैं। सम्पर्क:ईमेल:(asha@ashram@yahoo-com, website: www-citizen&news-org )

एक गांव के सामूहिक संघर्ष की प्रेरणादायक कहानी

एक गांव के सामूहिक संघर्ष की प्रेरणादायक कहानी

हरदोई जिले की पंचायत रामपुर अटवा का गांव है जमुनीपुर। गांव के सभी 424 मतदाताओं ने आम चुनाव का पूर्ण बहिष्कार किया। उनका कहना था कि पिछले नौ वर्षों से गांव में कोई भी विकास का कार्य नहीं हुआ था। चुनाव के दिन सभी गांववासी मतदाता केन्द्र के सामने बैठे रहे।

वैसे तो चुनाव बहिष्कार इस इलाके के ग्यारह गांवों ने किया किन्तु जमुनीपुर के लोग चुनाव के बाद भी चुप नहीं बैठे । 13 जून, 2009, को उन्होंने गांव के अन्दर ही धरना शुरू दिया। उन्हें कहीं जाने की जरूरत महसूस नहीं हुई - न तो खण्ड विकास कार्यालय, न ही तहसील और न ही जिला मुख्यालय। उनका विश्वाश कि उनकी बात गांव में ही सुनी जाएगी। सारे फैसले ग्रामीण खुद ही ले रहे थे। उनके धरने की खबर आखिर समाचारपत्रों के माध्यम से अधिकारियों तक पहुंची। तीन बार वार्ता के लिए खण्ड विकास अधिकारी आए और आखिर में उप जिलाधिकारी आए। दोनों अधिकारियों के गांव में विकास कार्य शुरू के आश्वाशन देने के बाद धरना 3 जुलाई को समाप्त हुआ।

जमुनीपुर के साथ मुख्य दिक्कत यह है कि जिस पंचायत से यह गांव जुड़ा हुआ है उस गांव की दूरी यहां से दस किलोमीटर है। ग्राम प्रधान इतनी दूर रहता है कि उसे गांव के विकास में कोई रुचि ही नहीं है। इस गांव के मतों के बगैर भी वह ग्राम प्रधान का चुनाव जीत जाता है तो उसे इस गांव की कोई परवाह भी नहीं। प्रधान का नाम है दया शंकर। इससे पहले उन्हीं की पत्नी प्रधान थीं।

धरना देने के बाद गांव में रोजगार गारण्टी योजना के तहत काम शुरू हो गया। गांव वालों ने खुद ही फैसला करके एक तालाब खोदने का निर्णय लिया। करीब डेढ़ सौ मजदूरों ने 19 दिन काम किया जिसकी पूरी मजदूरी करीब ढाई लाख रुपए वितरित हुई। मुख्य बात यह है कि ग्राम प्रधान की इच्छा के विरुद्ध यहां काम हुआ। धरने के दबाव में ग्राम प्रधान को अधिकारियों की बात मान कर यहां के काम में सहयोग करना पड़ा। चूंकि काम लोगों ने तय करके अपनी पहल पर किया था इसलिए उसकी गुणवत्ता बहुत अच्छी रही। एक खास बात यहां यह रही कि गांव की महिलाओं ने धरने में व रोजगार गारण्टी के काम में भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। आमतौर पर इस इलाके में रोजगार गारण्टी में 33 प्रतिशत के काम करने के मानक का पालन नहीं हो पाता। किन्तु जमुनीपुर में 33 प्रतिशत से अधिक महिलाओं ने काम किया।

गांव वालों की मांग पर चालीस शौचालय कागज पर बने दिखाए गए थे किन्तु वास्तव में नहीं बने थे पर भी जांच का काम शुरू हो गया। खण्ड विकास अधिकारी ने इन शौचालयों के पैसे को ग्राम पंचायत के खाते में वापसी की कार्यवाही प्रारम्भ कर दी है।

उधर गांव के ही एक निवासी श्रीपाल ने ग्राम पंचायत के आय-व्यय के ब्यौरे की नकल सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत मांग ली है। नियत समय बीत जाने के बाद जब यह नहीं मिला तो प्रथम अपीलीय अधिकारी के यहां अपील की गई। वहां भी जब बात नहीं बनी तो अंततः राज्य सूचना आयोग में द्वितीय अपील की गई है। इस बीच ग्राम पंचायत विकास अधिकारी का एक पत्र प्राप्त हुआ कि रु0 1226 शुल्क जमा कर मांगी गई सूचना प्राप्त कर लें। हलांकि सूचना के अधिकार अधिनियम के अनुसार यदि सूचना देने में एक माह से अधिक का विलम्ब होता है तो सूचना निःशुल्क मिलनी चाहिए। फिर भी गांव वालों में सामूहिक कार्यवाही का इतना उत्साह है कि उन्होंने चंदा करके यह पैसे भी जुटा लिए हैं। लेकिन अफसोस यह है कि वे जब ग्राम पंचायत विकास अधिकारी या खण्ड विकास कार्यालय से सूचना प्राप्त करने की कोशिश करते हैं तो उन्हें असफलता हाथ लगती है। ग्राम पंचायत विकास अधिकारी ने तो साफ कह दिया है कि सूचना नहीं मिलेगी।

फिलहाल लोगों का संघर्ष जारी है। रोजगार गारण्टी का काम कर कर उन्हें सूखे के समय में मजदूरी के रूप में कुछ नकद हासिल हो गए। प्राथमिक विद्यालय पर एक शौचालय का निर्माण शुरू हो गया है। पहले के विकास कार्यों में हुई गड़बड़ी की जांच शुरू हो गई है। उम्मीद है जल्दी ही गांव के आय-व्यय का ब्यौरा भी मिल जाएगा।

जमुनीपुर के लोगों ने दिखा दिया है कि किसी राजनीतिक दल के भरोसे बैठे रहना जरूरी नहीं है। न ही कियी भय, प्रलोभन या किसी जाति के प्रभाव में मत देना जरूरी है। यदि लोग खुद अपने दिमाग से फैसले लेने लगें और दलाल राजनीतिक व्यक्तियों से दूर रहें तो वे अपने दम पर अपना काम करा सकते हैं। जमुनीपुर अन्य गांवों के लिए भी, जहां विकास के काम न होने की शिकायत हो, प्रेरणा का स्रोत बन सकता है।

लेखकः संदीप पाण्डेय

(लेखक, मग्सय्सय पुरुस्कार से सम्मानित वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय (एन.ए.पी.एम्) के राष्ट्रीय समन्वयक हैं, लोक राजनीति मंच के राष्ट्रीय अध्यक्षीय मंडल के सदस्य हैं। सम्पर्क:ईमेल:(asha@ashram@yahoo-com, website: www-citizen&news-org )

कुशी नगर जिले में प्रधान ने किया ५५ लाख का घोटाला, इसे उजागर करने वाले को पहुंचा दिया मौत के करीब !

कुशी नगर जिले में प्रधान ने किया ५५ लाख का घोटाला, इसे उजागर करने वाले को पहुंचा दिया मौत के करीब !
चुन्नीलाल

३० अगस्त, २००९ को बाजार से लौटते समय जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय से जुड़े सामाजिक कार्यकर्त्ता श्री कन्हैया पाण्डेय पर ग्राम पंचायत गौरखोर ब्लाक फाजिलनगर, के ग्राम प्रधान गौतम लाल ने अपने साथियों के साथ मिलकर जानलेवा हमला किया | लाठी डंडों से इतना मारा कि नाक की हड्डी टूट गई और सिर फूट गया तथा पूरे शरीर पर लाठियाँ चलाई, जो अब जिला हॉस्पिटल कुशीनगर में मौत से लड़ रहे हैं | हालत गम्भीर है, बचने की उम्मीद कम |

इस घटना को अंजाम तक पहुँचाने की कोशिश में ग्राम प्रधान गौतम लाल ने ग्राम विकास का ५५ लाख रूपये का घोटाला किया | यह घोटाला तब उजागर हुआ जब जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता ने सूचना के अधिकार अधिनियम २००५ के तहत ग्राम पंचायत गौरखोर के विकास पर खर्च किये गए सरकारी धन का हिसाब-किताब माँगा | गांव के विकास के नाम पर खर्च किया गया सरकारी धन केवल कागजों तक ही पहुंचा था और कागजों पर ही गांव का विकास हो गया | गांव के विकास का पैसा ग्राम प्रधान ने केवल अपने विकास में खर्च किया था |

५५ लाख के घोटाले की जाँच ग्रामीण उच्च अधिकारियों से कराने की मांग को लेकर "एन.ए.पी.एम." के राज्य समन्वयक केशव चंद बैरागी के नेतृत्व में ग्रामीणों ने ५ दिवशीय धरना ग्राम पंचायत गौरखोर की ब्लाक फाजिलनगर पर शुरू कर दिया | यह धरना २१ अगस्त २००९ से २५ अगस्त २००९ तक ब्लाक पर चलता रहा | ५ दिनों में किसी सरकारी अधिकारी,कर्मचारी ने इन लोगों की सुध नहीं ली | जब ५ दिन के बाद भी किसी अधिकारी के कान पर जूं नहीं रेंगी तब यह धरना जिलाधिकारी कुशीनगर के आवास पर पहुँच कर भूख हड़ताल में बदल गया |

२५ अगस्त, २००९ से केशव चंद बैरागी के साथ कन्हैया पाण्डेय, पौहारी सिंह, कृष्ण, नसरुल्लाह और तमाम ग्रामीणवासियों ने जिलाधिकारी कार्यालय के सामने भूख हड़ताल शुरू कर दिया | चार दिन बाद यानि 29 अगस्त,२००९ को मौके पर पहुँचे जिलाधिकारी कुशीनगर, एस.डी.एम. व अन्य अधिकारियों ने भूख हड़ताल पर बैठे लोगों को जाँच का आश्वासन देकर भूख हड़ताल ख़त्म करवाई थी | सभी ग्रामीण इस बात से ख़ुशी थे कि हमने अपने हक़ के लिए लड़ाई लड़ी है और अब इस घोटाले की जाँच होगी |

यह क्या था ? जाँच अभी शुरू नहीं हुई कि कातिलाना हमला शुरू हो गया | ३० अगस्त,२००९ की शाम ब्लाक फाजिल नगर की बाजार से लौटते समय ग्राम प्रधान और उसके साथियों ने जाँच घोटाले की जाँच कराने की आवाज उठाने वाले सामाजिक कार्यकर्ता कन्हैया पाण्डेय पर जान लेवा हमला कर दिया | कन्हैया पाण्डेय इस समय जिला हॉस्पिटल में जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं | फिर कानून ग्राम प्रधान को दोषी नहीं ठहरा रहा है उल्टे कन्हैया पाण्डेय पर ही एस.सी.एस.टी. एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज करने की सोंच रहा है |
अब देखना यह है कि समाज के इन सेवकों को न्याय कौन दिलाता है ?
कौन वसूल कर्ता है ग्राम विकास के घोटाले का धन ? ग्राम प्रधान से !


लेखक - आशा परिवार एवं जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय से जुड़कर शहरी झोपड़-पट्टियों में रहने वाले गरीब, बेसहारा लोगों के बुनियादी अधिकारों के लिए संघर्षरत हैं तथा सिटिज़न न्यूज़ सर्विस के घुमंतू लेखक हैं|
chunnilallko@gmail.com

नरेगा (NREGA) में खुदाई के मानक की प्रधान ने उड़ाई धज्जियां

नरेगा (NREGA) में खुदाई के मानक की प्रधान ने उड़ाई धज्जियां

नरेगा (NREGA) के तहत चल रहे कार्य में ग्राम पंचायत मंधना बगदौधी बांगर के ग्राम प्रधान राजू दिवाकर ने खुदाई के मानक की धज्जियां उड़ा कर रख दी है। ग्राम पंचायत मंधना बगदौधी बांगर के रामनगर मजरा में पिछले कुछ दिनों से नरेगा (NREGA) के तहत 35 मजदूरों द्वारा तलाब खुदाई का काम किया जा रहा है। कई दिनों से प्रधान मजदूरों से 80 से 90 फुट मिट्टी खोद कर करीब 120 फुट दूर फेंकने के लिए दबाव बना रहा था। कल 25 अगस्त को जब मजदूर काम पर पहुंचे तब प्रधान ने उनसे कहा कि अगर 80 से 90 फुट मिट्टी खोदोगे तभी काम होगा नहीं तो आज से काम बन्द। मजदूरो ने कहा कि जब ग्राम्य विकास विभाग ने 72 से 75 घन फुट मिट्टी निकाल कर 50 फुट दूर तक मिट्टी फेंकने का मानक तय किया हुआ है, तब आप मानक क्यों बदल रहे हैं। हम लोग इसी मानक पर काम करेगें। प्रधान राजू दिवाकर ने तालाब का काम बन्द करके मजदूरों को कह दिया कि आज से अब काम बन्द अब कोई काम नहीं होगा। अगर तुम लोग 80 से 90 फुट काम करोगे तभी अब काम मिलेगा नहीं तो किसी को कोई काम नहीं मिलेगा। जिससे चाहो जाकर हमारी शिकायत कर दो मगर मै काम नहीं दूंगा। उस तलाब में नरेगा (NREGA) के तहत काम कर रहे मजदूर राम कुमार कुरील और उनके साथियों ने यह भी बताया कि यहां पर कराये जा रहे कार्य में भ्रष्टाचार के साथ-साथ बहुत अनियमिततायें बरती जा रही है। नरेगा (NREGA) के तहत कराये जा रहे काम में अपने गांव में मेट के होते हुए भी उनको मेट का काम न देकर दूसरे ग्राम पंचायत के आदमी को मेट पर रखते हैं। 20 दिन काम के हो जाने के बावजूद अभी तक मजदूरी का भुगतान नहीं हुआ है। कार्य स्थल पर न दवा न पानी कोई सुविधा नहीं रहती है। कार्य स्थल पर कार्य के दौरान मस्टर रोल भी नहीं रखा जाता है। प्रधान राजू दिवाकर ने करीब 25 फर्जी जाब कार्ड बनाकर रखे हैं | जो कभी काम करने नहीं आते हैं उनके नाम पर नरेगा (NREGA) का काम दिखाकर उन्हे कुछ पैसे देकर सारा प्रधान अपने पास रख लेता है। मजदूर राम कुमार कुरील ने दो व्यक्तियों श्री कान्त चैहान और रज्ज्न सिंह के बारे में बताया कि प्रधान ने इनके नाम पर फर्जी जाब कार्ड बनाकर रखे है और इनके नाम पर भुगतान करते है जबकि ये लोग आज तक कभी नरेगा (NREGA) में काम नहीं किये है। सभी मजदूर मिलकर इस अन्याय के खिलाफ लड़ने का तय किया है और अपना हक लेने के लिए संघर्ष करने का तय किया है। आज एक तरफ जहां सरकारें आम जन मानस के दबाव के आगे नरेगा (NREGA) कानून में और सहूलियत लाने के साथ-साथ नरेगा (NREGA) में काम के 100 दिन से बढ़ा कर 365 दिन करने की कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी तरफ राजू दिवाकर जैसे भ्रष्ट प्रधान आम जनता के पसीने की कमाई को लूटकर अपना पेट भरने की जुगत लगा रहे हैं।

रिपोर्ट : महेश और शंकर सिंह
"आशा परिवार"कानपुर
(लेखक: आशा परिवार जन संगठन के वरिष्ठ कार्यकर्ता और सी.एन.एस के स्तम्भ लेखक हैं |)

मजदूरों के संघर्ष के आगे झुका दबंग प्रधान पति

मजदूरों के संघर्ष के आगे झुका दबंग प्रधान पति
बराण्डा ग्राम पंचायत में नरेगा के तहत किये गये काम के भुगतान के लिए छेड़ा गया संघर्ष अन्ततः रंग लाया और बराण्डा के दबंग प्रधानपति अशोक कटियार ने छः महीने से रूके पैसे का नकद भुगतान किया। बराण्डा ग्राम पंचायत ब्लाक बिल्हौर जिला कानपुर नगर के करीब बराण्डा ग्राम पंचायत के करीब 40 मजदूरों को जनवरी 2009 में करीब 22 दिन नरेगा के तहत अपने खेत के किनारे नाला खुदवाने का कार्य वहां के ग्राम प्रधान श्रीमति रेनू कटियार ने करवाया, लेकिन अभी तक उनकी मजदूरी का भुगतान नहीं हुआ हैं। मजदूरों ने जब भी प्रधान पति अशोक कटियार से अपनी मजदूरी की बात की उन्होंने टाल दिया । चूकिं अशोक कटियार उस क्षेत्र के एक दबंग व्यक्ति के रूप में जाने जाते हैं, इसलिए मजदूरों ने डर से इस बात की कहीं शिकायत नहीं की । जुलाई महीने में सामाजिक कार्यकर्ता शंकर सिंह के सम्पर्क में ये मजदूर आये और उन्होंने नरेगा के तहत हुए काम की मजदूरी भुगतान न होने की बात बताई । बैठक के बाद सभी मजदूरों ने संगठित होकर इस अन्याय के खिलाफ संघर्ष छेड़ दिया। इसी संघर्ष के दौरान मजदूरों को पता चला कि जो कार्य उन्होंने किया है वो नरेगा के तहत न कराके ग्राम प्रधान ने अपना व्यक्तिगत काम कराया है। इस बात को लेकर मजदूरों ने प्रमुख सचिव ग्राम्य विकास, आयुक्त ग्राम्य विकास, जिलाधिकारी कानपुर को शिकायती पत्र लिखा साथ ही कानपुर की मीडिया ने इस बात को अपने अखबार में प्रमुखता से उठाया। कार्यवाही होने के डर से कल 20 अगस्त से ग्राम प्रधान पति अशोक कुमार कटियार ने मजदूरों के घर जाकर उनके द्वारा किये 22 दिन के काम का नकद भुगतान किया और उनसे मिन्नत की कि आगे अब कोई कार्यवाही न करें । आखिरकार संगठित संघर्ष के कारण उनकी मेहनत का पैसा आज उन्हें मिल गया। इस जीत से मजदूरों को आगे संघर्ष करने की प्रेरणा के साथ-साथ लोकतंत्र में विश्वास मजबूत हुआ है।

रिपोर्टर : महेश एवं शंकर सिंह
"आशा परिवार एवं "अपना घर"
कानपुर

यह कैसी आजादी है?

यह कैसी आजादी है?
डॉ संदीप पाण्डेय

जाजूपुर उ.प्र. के हरदोई जिले के अतरौली थाना क्षेत्र व सण्डीला तहसील का एक गांव है। 1976 में 107 भूमिहीन दलित परिवारों को ग्राम सभा की ओर से जमीन के पट्टों का आवंटन हुआ था। बगल के गांव माझगांव का एक दबंग सामंती परिवार है जिसकी इलाके में तूती बोलती है। रामचन्द्र सिंह के भाई श्रीराम सिंह तोमर ब्लाक प्रमुख रह चुके हैं। तीसरे भाई रामेन्द्र सिंह हैं। चचरे भाई नागेश्वर सिंह जो वकील हैं की पत्नी जाजूपुर की ग्राम प्रधान भी हैं, हलांकि ये लोग रहते माझगांव में हैं। इस परिवार ने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से दलितों को आज तक अपनी भूमि पर कब्जा नहीं करने दिया है।

जैसे ही दलितों के नाम पट्टा हुआ, दबंग जमींदार परिवार ने इन जमीनों पर अपना कब्जा कायम रखने के लिए पेड़ लगा दिए। आज तक इन पेड़ों के बहाने वे इन जमीनों को छोड़ने को तैयार नहीं हैं। बहुत दलित परिवार ऐसे भी हैं जिनके पूवर्जों में से किसी ने जमींदार परिवार के पूर्वजों से कभी कर्ज लिया होगा। उस कर्ज के बहाने भी कई दलितों को उनकी वाजिब जमीन पर काबिज नहीं होने दिया जा रहा।

जब भी प्रशासनिक अधिकारियों से शिकायत की जाती है, नए सिरे से भूमि नपनी शुरू हो जाती है। भूमि नापने के बाद दलितों को सौंप दी जाती है। किन्तु या तो वे अपनी जमीन पर बो ही नहीं पाते अथवा बोने के बाद काट नहीं पाते। जमीन वापस दबंग लोगों के पास चली जाती है। राजस्व विभाग के अधिकारी यह हिम्मत दिखाते नहीं कि दबंग परिवार के खिलाफ जमींदारी उन्मूलन अधिनियम के तहत मुकदमा लिखे जाने की सिफारिश करें और न ही पुलिस यह हिम्मत दिखाती है कि एक बार नाप कर दलितों की दी गई जमीन पर किसी और को कब्जा करने से रोके।

हाल ही में एक दलित युवा राजेश ने अपनी जमीन पर खड़े नीम के दो पेड़ काट लिए। घर में तीन वर्ष का बच्चा बीमार चल रहा था तथा इलाज के लिए पैसों की आवश्यकता थी। चार लोगों के खिलाफ पुलिस की अनुमति बिना हरे पेड़ काटने के जुर्म में मुकदमा दर्ज हो गया। जिस ट्रैक्टर से पेड़ कट के जाने थे उसके चालक व सहायक, जो दोनों दलित हैं, को रामचन्द्र सिंह, रामेन्द्र सिंह और सुखदेव सिंह ने घर ले जाकर उनके साथ मार-पीट कर उन्हें जेल भी भिजवा दिया। राजेश की गिरफ्तारी के लिए पुलिस ने उसके घर पर दबिश भी दी। दरोगा एम.पी. सिंह ने राजेश के घर जाकर तोड़-फोड़ की। जब उप जिलाधिकारी, सण्डीला, से पूछा गया कि क्या पेड़ काटना इतना बड़ा जुर्म है कि पुलिस घर जाकर ताण्डव करें तो उनका कहना था कि यही पुलिस बाग के बाग कटने के बावजूद उन्ही के आदेश की अवहेलना कर प्राथमिक सूचना रपट तक नहीं दर्ज करती। अंततः राजेश को जमानत मिलने के बाद ही राहत मिली। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में राजेश का बीमार बच्चा चल बसा क्योंकि इसका कोई इलाज कराने वाला ही नहीं था।

थाने पर रामचन्द्र सिंह, रामेन्द्र स्रिह व सुखदेव सिंह के खिलाफ अनुसूचित जाति व जनजाति उत्पीड़न निरोधक अधिनियम तथा जमींदारी उन्मूलन अधिनियम के तहत प्राथमिकी दर्ज कराने की मांग की गई। किन्तु जमींदार परिवार का इतना दबदबा है कि कानूनों का उल्लंघन करने के बावजूद उनके खिलाफ कोई रपट तक दर्ज नहीं की जाती और दलितों पर अपने ही खेतों में खड़े अपने ही पेड़ों को काटने पर उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज हो जाता है। ऐसा तब है जब उ.प्र. में दलित हितैषी सरकार है तथा पुलिस महानिदेशक का स्पष्ट आदेश है कि किसी भी दलित की जमीन पर यदि किसी अन्य ने कब्जा किया हुआ है तो दोषी व्यक्ति के खिलाफ तुरंत मुकदमा दर्ज हो।

करीब दो वर्ष पहले राजस्व विभाग ने रामचन्द्र सिंह, चंद्रप्रकाश सिंह, नागेश्वर सिंह व अन्य कुछ लोगों पर ग्राम सभा की पट्टे की हुई जमीन पर कब्जा करने के जुर्म में रुपए 14 लाख से ऊपर का जुर्माना किया था। किन्तु इन प्रभावशाली लोगों ने न्यायालय से अपने पक्ष में स्थगनादेश प्राप्त कर अपने खिलाफ होने वाली कार्यवाही को रुकवा लिया।

जब दलितों ने देखा कि इस व्यवस्था से न्याय की उम्मीद नहीं की जा सकती तो अंततः हार मान कर वे इस बात के लिए तैयार हुए हैं कि जमींदारों ने जो पेड़ उनकी जमीनों पर लगाए हैं वे काट कर ले जाएं भले ही पेड़ों पर कानून अधिकार दलितों का ही बनता है और जमींदार दलितों को उनकी जमीनों पर खेती करने दें। जमींनदारों ने इस बात की गारण्टी मांगी हैं कि पेड़ काटने में उनके खिलाफ कोई कार्यवाही न की जाए भले ही यह गैर कानूनी है कि हरे पेड़ों को काटा जाए।

सभी अधिकारियों-कर्मचारियों का कहना है कि इससे बेहतर व्यवहारिक फैसला फिलहाल कोई नहीं हो सकता। दलित भी यही मानने पर विवश हैं कि यही फैसला उनके हित में हैं क्योंकि पेड़ों के साथ उनको जमीनें मिल जाएं इसकी सम्भावना वर्तमान परिस्थितियों में तो दिखाई पड़ती नहीं। 35 वर्षों बाद वे जमीन के मालिक बनेंगे यही उनके लिए बहुत बड़ी बात है। किन्तु यह जमींनदारों की गुण्डागर्दी की जीत कही जाएगी और भारतीय संविधान व कानून व व्यवस्था की हार। पुलिस-प्रशासन ने सामंती ताकतों के आगे समर्पण कर दिया है तथा एक दलित हितैषी सरकार में दलितों के हित सुरक्षित नहीं हैं।
आजादी के 62 साल बाद यह कैसी आजादी है?


डॉ संदीप पाण्डेय

(लेखक, मग्सय्सय पुरुस्कार से सम्मानित वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय (एन.ए.पी.एम्) के राष्ट्रीय समन्वयक हैं, लोक राजनीति मंच के राष्ट्रीय अध्यक्षीय मंडल के सदस्य हैं। संपर्क: ईमेल: asha@ashram@yahoo.com, website: www.citizen-news.org )


बी.पी.एल. शौचालय के नाम पर प्रधानों व सचिवों ने डकारे अठहत्तर लाख रूपये वर्ष २००७-०८ में

बी.पी.एल. शौचालय के नाम पर प्रधानों व सचिवों ने डकारे अठहत्तर लाख रूपये वर्ष २००७-०८ में

संडीला विकास खण्ड, जनपद-हरदोई में ९७ राजस्व गांव में बी.पी.एल. व ए.पी.एल. परिवारों के लिए व्यक्तिगत परिवारों को शौचालयों का निर्माण हुआ | यह निर्माण वर्ष २००७ व २००८ में सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान के तहत यह कार्य ग्राम पंचायत के सचिव व प्रधानों ने करवाया | इस कार्य के लिए सरकार द्वारा पन्द्रह सौ रूपये का अनुदान बी.पी.एल. परिवारों को दिया जाना था और ए.पी.एल. परिवारों को भी पन्द्रह सौ रूपये का अनुदान प्रति परिवार दिया जाना था | इस अनुदान की राशिः विकास खण्ड संडीला में अठहत्तर लाख चार हजार रुपया आई थी | यह राशिः बी.पी.एल. परिवारों को शौचालयों के नाम खर्च होनी थी जिसमें गरीब परिवारों व गांवों में गंदगी न हो |

खण्ड विकास अधिकारी संडीला से सूचना के अधिकार के तहत यह जानकारी माँगी तो खण्ड विकास अधिकारी ने बताया कि ब्लाक में सभी ग्राम पंचायतों में मैंने ५२०३ शौचालय बनवा दिए हैं जिसके तहत बी.पी.एल. परिवारों को, लगभग सभी को यानी हर परिवार में शौचालय निर्मित हो गये हैं | इस बात से आश्चर्य लगा कि ऐसा तो सम्भव नहीं होगा | आशा परिवार के कार्यकर्ता और हमने ब्लाक से अभिलेख निकलवा कर जाँच का कार्य शुरू कर दिया | मैं, आशा परिवार की एक टीम बनाकर गांव-गांव जाना शुरू किया | पहले ग्राम पंचायत उत्तरकोध में देखा कि १०८ शौचालय कागज पर बने दिखाए गए | यहाँ बी.पी.एल. परिवारों की संख्या भी १५१ है | यहाँ सभी बी.पी.एल परिवारों को शौचालय निर्मित हैं, यहाँ के सचिव कन्हैयालाल ने बताया कि हमारे ग्राम पंचायत में सभी बी.पी.एल. परिवारों को शौचालय बने हैं जबकि बी.पी.एल. परिवारों के यहाँ गए और जानकारी की तो गांव वालों ने कहा कि यहाँ शौचालय बनने की आप लोग बात करते हैं, यहाँ किसी को जानकारी तक नहीं है | सभी १५१ बी.पी.एल. परिवारों ने कसम खाकर कहा कि मैंने कोई शौचालय नहीं बनवाया है और न ही हमें पता है | बी.पी.एल परिवारों को तो पता नहीं है फिर हम लोगों ने ग्राम पंचायत के सदस्यों से यह जानकारी किया कि क्या पंचायत में शौचालय बनवाये गये हैं ? तो पंचायत सदस्यों ने यह लिखकर दिया कि इस पंचायत में एक भी शौचालय वर्ष २००७-२००८ में किसी का नहीं बना है और न तो इस सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान के बारे में सचिव ने किसी पंच को बताया है | सभी पंचायत के सदस्यों का कहना है कि अगर हमारी पंचायत में शौचालयों के नाम से धन निकाला गया है तो यह गलत है, गलत ही नहीं खुला भ्रष्टाचार है | इस एक पंचायत उत्तरकोध में दो लाख चालीस हजार का पूरा भ्रष्टाचार देखने को मिला |

इसी प्रकार ग्राम पंचायत मांझगांव में दो सौ शौचालयों का निर्माण दिखाया गया जबकि यहाँ एक भी शौचालय नहीं बना पाया गया | मैंने गांव के लोगों से पूछा तो पता चला कि यह शौचालय वर्ष २००६ में आये थे जिनका निर्माण भी नहीं करा सका था | वही शौचालयों का निर्माण करवा रहा हूँ | इस पंचायत में भी गांव के लोग व पंचायत मित्र की बातों से साफ़ खुलासा हो गया कि यहाँ के दो सौ शौचालयों का निर्माण नहीं हुआ है |

इसी प्रकार बराही ग्राम पंचायत में भी शौचालयों का निर्माण नहीं हुआ | यहाँ के प्रधान ने स्वीकार किया कि मैं शौचालय नहीं बनवा पाया हूँ क्योंकि हमें धन नहीं मिल पाया है केवल सीटें मिली थीं वो पड़ी हैं | सामग्री न मिलने से यह कार्य मेरा अधूरा है यहाँ भी दो सौ शौचालय कागज पर निर्मित हैं |

इसी प्रकार से ग्राम पंचायत मंडौली में तीन सौ शौचालय निर्मित बताए गये जहाँ पर एक भी शौचालय नहीं है, यहाँ भी बी.पी.एल. परिवारों से सम्पर्क किया तो लोगों ने बताया कि हमारे यहाँ वर्ष २००७-२००८ में कोई शौचालय नहीं बने हैं | यहाँ के बी.डी.सी. सदस्य से बातचीत हुई तो यह बताया कि हमारे यहाँ वर्ष २००५ व २००६ में १५ शौचालय बने थे इसके बाद मेरी पंचायत में कोई शौचालय नहीं बने हैं और प्रधानपति श्रीराम से हुई बात से पता चला कि यहाँ पर कोई शौचालय नहीं बने हैं क्योंकि प्रधानपति ने कहा कि मैंने कुछ सीटें बटवा दिया है | सामग्री न मिलने के कारण यह कार्य अधूरा ही है, यह कार्य अभी हो नहीं पाया है |

जब मैं ग्राम पंचायत ककराली में शौचालयों की जानकारी करने गया तो वहां पर पंचायत सचिव कन्हैयालाल से मुलाकात हुई तो उन्होंने कहा कि आप लोग हमारे पीछे पड़े हैं मैं पांच पंचायतों का सचिव हूँ | अप्प लोग मेरी ही पांच पंचायत देख रहे हैं, मैंने तो शौचालय ही नहीं बनवाये हैं, विधायक से जानकारी करो तो आपको पता चलेगा | पंचायत सचिव की बात से स्पष्ट हो गया कि ब्लाक की किसी भी पंचायत में शौचालय जमीन पर तो नहीं, कागज पर जरुर बने हैं |

आशा आश्रम की टीम गांव-गांव जाकर अनेक लोगों से जानकारी किया जिससे यह स्पष्ट हुआ कि सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान सफ़ेद हाथी नजर आया, नमूने के तौर पर उत्तरकोध, मांझ-गांव, बराही, ,ककराली, मंडौली आदि पंचायतों का सर्वे किया गया जहाँ पर एक भी शौचालय निर्मित नहीं हैं |

वर्ष २००७-२००८ में बी.पी.एल परिवारों के नाम से शौचालय बनवाये जाने के लिए ७८ लाख ४ हजार ५०० रूपये का खुला भ्रष्टाचार साबित हुआ जिसकी जाँच के लिए प्रशासन व जिला प्रशासन को भी अवगत कराया जा चुका है | उपरोक्त तथ्यों से हमें लगता है कि सरकारी कर्मचारियों को गन्दगी जमीन पर कम, कागज में ज्यादा करनी पड़ती है| इसलिए सरकारी कर्मचारी शौचालय कागज पर होना ज्यादा जरुरी समझते हैं बजाय जमीन पर |

अशोक भारती
सिटिज़न न्यूज़ सर्विस (सी.एन.एस)
आशा आश्रम,लालपुर बंजरा,अतरौली,हरदोई

बदलाव के लिए एस.आर.दारापुरी

बदलाव के लिए एस.आर.दारापुरी

लोक राजनीति मंच के लखनऊ संसदीय छेत्र के प्रत्याशी एस.आर.दारापुरी, सामाजिक कार्यकर्ता एवं पूर्व पुलिस महानिरीक्षक का संछिप्त परिचय:

एस.आर.दारापुरी – १९७२ बैच के उत्तर प्रदेश कैडर के आई.पी.एस अधिकारी रहे हैं. इसके पूर्व शिक्षक, राष्ट्रीय बचत संगठन, वित्त मंत्रालय एवं कस्टम विभाग (भारत सरकार) में सेवारत रहे. इस प्रकार उन्हें लगभग ४० वर्षों का प्रशासनिक अनुभव प्राप्त है. सेवा में रहते हुए जनपक्षीय, इमानदार एवं कुशल प्रशासनिक छमता का परिचय दिया. सेवा निवृत्ति के उपरांत एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में मानवाधिकार, दलित, अल्पसंख्यक, पिछडों, महिला, मजदूर, बुनकरों, किसानों, छात्रों, नौजवानों, के अधिकारों के लिए व गरीब एवं वंचित समुदाय के सशक्तिकरण के लिए निरंतर कार्यरत हैं. वर्त्तमान में विभिन्न सामाजिक/ राजनीतिक मंचों/ संगठनों जैसे:

१. उपाध्यक्ष – पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबरटीस (पी.यु.सी.एल), उत्तर प्रदेश
२. उपाध्यक्ष – डॉ आंबेडकर महासभा
३. राज्य समन्वयक – लोक राजनीति मंच, उत्तर प्रदेश
४. सदस्य – संयोजक मंडल, जनसंघर्ष मोर्चा, उत्तर प्रदेश
५. सदस्य – सूचना का अधिकार अभियान समिति, उत्तर प्रदेश
६. संयोजक – दलित मुक्ति मोर्चा
७. संयोजक – वर्ल्ड कांफ्रेंस ऑन रिलिजन एंड पीस, लखनऊ शाखा
८. सदस्य – भोजन का अधिकार समिति, उत्तर प्रदेश
९. राज्य प्रतिनिधि – एशियन सेण्टर फॉर ह्यूमन राइट्स
१०. अध्यक्ष – सोसाइटी फॉर प्रोमोटिंग बुद्धिस्ट नॉलेज

आदि में योगदान दे रहे हैं. हाल ही में आतंकवादी घटनायों में फसाए गए निर्दोष युवाओं के पक्ष में भूमिका निभाई.

हमारे मुख्य मुद्दे
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१. समता मूलक आर्थिक नीति बने ताकि गरीब और अमीर के बीच का फर्क ख़त्म हो.
२. प्राकृतिक संसाधनों (जल, जंगल, जमीन, खनिज आदि) पर जनता का अधिकार हो और इसे निजी कंपनियों को न सौंपा जाए.
३. शौपिंग माल बंद हों ताकि छोटे उत्पादक, खुदरा व्यापारी, फेरीवाले और पटरी दूकानदारों को खतरा पैदा न हो.
४. रोज़गार को मौलिक अधिकार बनाया जाए और रुपया ५००० प्रतिमाह बेरोज़गारी भत्ते की व्यवस्था की जाए
५. स्विस बैंक में जमा काला धन व देश के अन्दर मौजूद काले धन को चिन्हित कर जब्त किया जाए तथा इसके अपराधियों को चिन्हित कर दण्डित किया जाए. सभी प्रकार का भ्रष्टाचार रोका जाए.
६. महंगाई पर प्रभावी नियंत्रण हेतु आवश्यक खाद्य वस्तुओं का अधिकतम मूल्य सरकार द्वारा निर्धारित किया जाए.
७. सांसद निधि और विधायक निधि समाप्त की जाए.
८. 'सेज', शहरीकरण और औद्योगीकरण के नाम पर कृषि भूमि का अधिकरण बंद हो
९. कृषि नीति ऐसी हो कि किसान आत्महत्या और मजदूर भुखमरी से छुटकारा पा सकें. कृषि आधारित उद्योगों को बढ़ावा दिया जाए.
१०. साम्प्रदायिकता और आतंकवाद जैसे मुद्दों पर राजनीति बंद हो. सभी प्रकार की हिंसा (नाक्सालवाद, अलगाववाद और आतंकवाद) का सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक हल ढूंढा जाए.
११. सूचना का अधिकार और राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी एक्ट को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए.
१२. महिलाओं, दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ हिंसा और उनके उत्पीड़न पर रोक लगे.
१३. कोठारी आयोग की सिफारिशों के अनुसार देश में समान शिक्षा प्रणाली लागू हो. शिक्षा के निजीकरण और व्यवसायीकरण पर रोक लगे.
१४. सभी महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में छात्रसंघ के चुनाव लिंघदोह कमिटी की सिफारिशों के अनुसार कराएँ जाएँ.
१५. वास्तविक गरीबों को बी.पी.एल कार्ड मिलें ताकि वे शहरी गरीब आवास योजना के पात्र बन सकें.
१६. शहर केंद्रित विकास की नीति बदल कर गाँव में रोज़गार के अवसर पैदा किए जाएँ ताकि ग्रामीण छेत्र से पलायन रुक सके.
१७. यातायात की व्यवस्था सार्वजनिक हो ताकि निजी वाहनों के प्रयोग की कम से कम जरुरत पड़ें तथा ग्लोबल वार्मिंग की समस्या को कम करने में हम योगदान दे सकें.
१८. वैकल्पिक उर्जा जैसे सौर उर्जा, बाओ उर्जा और पवन उर्जा को अपनाया जाए ताकि गाँव-गाँव में बिजली उपलब्ध हो सके
१९. स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण रोका जाए तथा सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए.
२०. कानून के सामने सभी व्यक्ति बराबर हैं. अतिविशिष्ट व्यक्ति की श्रेणी समाप्त की जाए.
२१. भारत की विदेश नीति ऐसी बने कि पड़ोसी देशों के साथ दोस्ती और शान्ति स्थापित हो. रक्षा बजट कम कर आपसी विश्वास के आधार पर सुरक्षा स्थापित की जाए.
२२. पुलिस को कार्य स्वतंत्रता देने और उत्तरदायी बनाने के लिए पुलिस सुधार तुंरत लागू किए जाएँ
२३. यूरोपियन यूनियन की तरह दक्षिण एशिया संघ बने ताकि लोग पासपोर्ट के बिना सभी देशों में आ जा सकें.
२४. विशेष अवसरों का दायरा सरकारी नौकरी और शिक्षा से ज्यादा बढाया जाए और आरक्षण के साथ अन्य औजार भी जोडें जाएँ.
२५. डॉ बी.आर.आंबेडकर के जातिविहीन एवं वर्गविहीन समाज की स्थापना के सपने को जल्दी से जल्दी साकार किया जाए ताकि देश में सही मायनों में लोकतंत्र की स्थापना हो सके
२६. सभी मुकदमों का फ़ैसला निश्चित समय सीमा में हो.
२७. बच्चों के अधिकारों से सम्बंधित कानून अक्षरश: लागू हों

निवेदक
कुलदीप नैयर, जस्टिस राजिंदर सच्चर, सुरेन्द्र मोहन, मेधा पाटकर, अरुणा रॉय, स्वामी अग्निवेश, बनवारी लाल शर्मा, ब्रह्मदेव शर्मा, शमशेर सिंह बिष्ट, रविकिरण जैन, योगेन्द्र यादव, डॉ रूपरेखा वर्मा, डॉ संदीप पाण्डेय

लखनऊ के लिए हमारे मुद्दे:
- सभी गरीबों को पक्के सस्ते मकान उपलब्ध कराये जाएँ
- झुग्गी झोंपड़ी वासियों के पुनर्वास की व्यवस्था हो जाने पर ही उन्हें हटाया जाए
- पटरी दुकानदारों, गुमटी वालों के लिए सस्ती पक्की बाज़ार बनाई जाए
- सभी बस्तियों में बिजली, पानी, नाली व सड़क की व्यवस्था की जाए
- रिक्शा चालकों के लाईसेन्स बनाने में तथा ऑटो चालकों से अवैध वसूली रोकी जाए
- गोमती नदी की सफाई हेतु अलग से एक एजेन्सी बनाई जाए
- मेट्रो रेल सेवा को दो साल में चालू किया जाए और शहरी सार्वजनिक यातायात की सुविधाएँ सस्ती व बेहतर बनाई जाएँ
- लखनऊ की ऐतिहासिक धरोहर का संप्रदायीकरण एवं विद्रूपण रोका जाए

संपर्क
- एस.आर.दारापुरी, १८/४५५, इंदिरा नगर, लखनऊ - २२६०१६
फ़ोन: ०५२२ २३५४६६१, मोबाइल ९४१५१६४८४५
ईमेल: srdarapuri@yahoo.co.in

- डॉ संदीप पाण्डेय, अ-८९३, इंदिरा नगर, लखनऊ - २२६०१६
फ़ोन: ०५२२ २३४७३६५, ईमेल: ashaashram@yahoo.com

ऑफिस:
नवीन – ८३, हलवासिया मार्केट, हजरतगंज, लखनऊ. फ़ोन: ०५२२ ३०१२३८५

चुनाव पर नज़र यात्रा दिल्ली पहुंची

चुनाव पर नज़र यात्रा दिल्ली पहुंची

मुंबई, गाजियाबाद, हिमाचल प्रदेश, रांची, छिंदवाडा, आदि जगहों से होती हुई और लोगों से जुड़े हुए मुद्दों को उठती हुई 'चुनाव पर नज़र यात्रा' १५ अप्रैल २००९ को दिल्ली पहुंची है. इस यात्रा के माध्यम से शहरों में रहने वाले लाखों गरीबों के, अव्यवस्थित छेत्र में कार्यरत लोगों के, बस्तियों में रहने वालों के, जमीन-रहित किसानों के, और अन्य समाज के हाशिए पर जीवित लोगों के जीवन से जुड़े हुए मुद्दें उठ रहे हैं.

दिल्ली में १५ अप्रैल २००९ को लोक मंच का आयोजन हुआ जिसमें धरना स्थल पर हज़ारों लोग एकत्रित हुए और खंज़वाला भूमि बचाओ आन्दोलन, जो १७०० से बसा हुआ गाँव है, के प्रति समर्थन व्यक्त किया. इस गाँव पर भूमि-माफियाओं की नज़र गड़ी हुई है.

इन लोगों ने टेकरी कला, कराला और टेकरी खुर्द गाँव जो ९०० साल पुराने हैं, उनके लोगों के साथ भूमि माफियाओं का खंडन किया और विभिन्न राजनीति दलों के प्रतिनिधियों से यह पूछा कि आगामी लोक सभा चुनाव २००९ में किस तरह से उनके जीवन और रोज़गार से जुड़े हुए मुद्दे उठ रहे हैं. इन लोगों ने राजनीतिक प्रतिनिधियों को उनके खोखले वादों की भी याद दिलाई जो उन्होंने २००४ में दिल्ली विकास प्राधिकरण और डी.एस.आई.डी.सी से सम्बंधित अनियंत्रित और मनमाना भूमि अधिग्रहण के मामले में किए थे.

यह अभियान अनेकों संस्थाओं के सामूहिक योगदान का फल है, जिसमें जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय, जन संघर्ष वाहिनी, राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन, दिल्ली सोलिडरिटी ग्रुप, बंधुआ मुक्ति मोर्चा, राष्ट्रीय कर्मचारी संगठन, राष्ट्रीय घर-में कार्यरत लोगों के संगठन, दिल्ली फोरम, CACIM, युवाओं का संगठन, स्थायी लोकतंत्र का संस्थान, शहरों में कार्यरत महिलाओं का संगठन, जन संघर्ष संयुक्त मोर्चा और अन्य संगठन भी शामिल हैं.

अनेकों लोगों ने इस 'लोक मंच' कार्यक्रम में भाग लिया जिसमें मध्य प्रदेश सरकार के भूतपूर्व प्रमुख सचिव, श्री शरद चंद्र बहार, इंडियन सोशल साइंस अकेडमी के डॉ मेहर इंजीनियर, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के अर्थनीति विभाग के डॉ अमित बहादुरी, मग्सय्सय पुरुस्कार से सम्मानित और सूचना के अधिकार पर कार्यरत अरविन्द केजरीवाल, नर्मदा बचाओ आन्दोलन और जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय की मेधा पाटकर, दिल्ली यूनिवर्सिटी के आचार्य अजित झा, राजनीतिक अर्थनीति विशेषज्ञ आचार्य अरुण कुमार, वरिष्ठ पत्रकार सुहास बोरकर, जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय से राजेंद्र रवी आदि शामिल थे.

विभिन्न शहरों में इस अभियान से चुनाव आयोग के भूतपूर्व सलाहाकार, के जगन्नाथ राव, असोसिअशन फॉर डेमोक्रेटिक रेफोर्म के त्रिलोचन शास्त्री जो भारतीय प्रबंधन संस्थान के 'डीन' भी हैं, मुंबई हाई कोर्ट के सेवा निवृत न्यायाधीश सुरेश, रांची विश्वविद्यालय के भूतपूर्व कुलपति आचार्य राम दयाल मुंडा, इंसाफ से दयामनी बिरला, किसान संघर्ष समिति से डॉ सुनीलम, जंगल बचाओ अभियान से संजय बासु मल्लिक, आई.ए.एस अधिकारी आभा सिंह और अन्य लोग भी जुड़े.

कांग्रेस पार्टी की श्रीमती कृष्ण तीरथ, भारतीय जनता पार्टी की श्रीमती मीरा कावारिया, और बहुजन समाज पार्टी से श्री राकेश हंस ने लोगों से जुड़े हुए मुद्दों के प्रति अपनी-अपनी पार्टी की भूमिका रखी.

हमारा मानना है कि असली लोकतंत्र तभी मुमकिन है जब विकेंद्रीकरण हो. बस्ती सभा, जिनमें हर शहर से ३००० परिवार जुड़े होते हैं, और ग्राम सभा, ही हर निर्णय-लेने की प्रक्रिया का आधार होने चाहिए.

हम सामाजिक आंदोलनों ने जन भागीदारी बिल प्रस्तावित किया है और हर राजनीतिक दल से हमारा अनुरोध है कि वोह अपनी टिपण्णी इस पर दें.

वर्त्तमान विकास की अवधारणा जिसमें गरीब लोगों का विस्थापन हो रहा है और उनके रोज़गार के अवसर समाप्त हो रहे हैं, हम लोगों के जन आन्दोलन, इन्हीं विस्थापित और बेरोजगार हुए लोगों के लिए संघर्ष करके और उनके लिए निर्माण की नीति को अपना कर ही सशक्त होते आए हैं.

निर्मला बहन, मधुरेश, अनीता कपूर, भूपेंद्र रावत, नान्हू गुप्ता