[ऑनलाइन पोस्टर प्रदर्शनी देखें] [English] ला मार्टिनियर गर्ल्स कॉलेज, लोरेटो कॉन्वेंट इंटर कॉलेज, क्राइस्ट चर्च इंटर कॉलेज, सिटी मोंटेसरी स्कूल, लखनऊ विश्वविद्यालय, राम स्वरुप स्मारक पब्लिक
स्कूल, डैबल कॉलेज, डैफोडिल्स कॉन्वेंट इंटर कॉलेज, इरम इंटर कॉलेज,
यूनिटी कॉलेज, बाल भारती स्कूल, शेरवुड कॉलेज, अरविन्द अकादेमी, नवयुग
पब्लिक स्कूल, स्प्रिंग डेल कॉलेज, अवध विश्वविद्यालय आदि शैक्षिक
संस्थानों के छात्रों द्वारा “जापान से सीख” विचार पर बनाए हुए पोस्टर आज
हिरोशिमा दिवस के उपलक्ष्य में लखनऊ स्थित डेफोड़िल्स
कान्वेंट इंटर कॉलेज में प्रदर्शित किए गए।
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युवाओं ने शांति, परमाणु निशास्त्रिकरण और पुनर्प्राप्य ऊर्जा का दिया संदेश
[ऑनलाइन पोस्टर प्रदर्शनी देखें] [English] ला मार्टिनियर गर्ल्स कॉलेज, लोरेटो कॉन्वेंट इंटर कॉलेज, क्राइस्ट चर्च इंटर कॉलेज, सिटी मोंटेसरी स्कूल, लखनऊ विश्वविद्यालय, राम स्वरुप स्मारक पब्लिक
स्कूल, डैबल कॉलेज, डैफोडिल्स कॉन्वेंट इंटर कॉलेज, इरम इंटर कॉलेज,
यूनिटी कॉलेज, बाल भारती स्कूल, शेरवुड कॉलेज, अरविन्द अकादेमी, नवयुग
पब्लिक स्कूल, स्प्रिंग डेल कॉलेज, अवध विश्वविद्यालय आदि शैक्षिक
संस्थानों के छात्रों द्वारा “जापान से सीख” विचार पर बनाए हुए पोस्टर आज
हिरोशिमा दिवस के उपलक्ष्य में लखनऊ स्थित डेफोड़िल्स
कान्वेंट इंटर कॉलेज में प्रदर्शित किए गए।नाभिकीय मुक्त दुनिया की ओर
यह पुस्तक वस्तुतः तीन स्वतंत्र अध्यायों का संकलन है। पहले अध्याय में भारतीय नाभिकीय तंत्र के बारे में तथ्यात्मक जानकरी प्रस्तुत है। यह जानकारी उपलब्ध साहित्य एवं भारत सरकार के नाभिकीय विद्युत कार्पोरेशन की वेबसाइट आदि से संग्रहित की गयी है। इस अध्याय में दी गयी चीजों को समझना किसी गैर-वैज्ञानिक या प्रोद्योगिकीय पृष्ठभूमि के व्यक्ति के लिए कठिन हो सकता है। शायद विद्यालय स्तर के विज्ञान की पुस्तक का सहारा लेना पड़े। किन्तु इस अध्याय को पढे़ बिना भी आगे के दो अध्याय पढे़ जा सकते हैं। दूसरे अध्याय में नाभिकीय विषय से संबन्धित प्रचलित भ्रमों का स्पष्टीकरण दिया गया है। नाभिकीय विषय की समझ बनाने की द्रष्टि से यह अध्याय सबसे महत्वपूर्ण है। तीसरे अध्याय में देश में नाभिकीय विरोधी आन्दोलनों का प्रस्तुतीकरण है।
गैर लोकतान्त्रिक ढंग से परमाणु ऊर्जा थोपने के प्रयास का लखनऊ में विरोध
ओम प्रकाश पाण्डेय, महासचिव, अखिल भारतीय विद्युत अभियंता संघ, उत्तर प्रदेश इकाई, पूर्व पुलिस महानिरीक्षक एस.आर.दारापुरी, पूर्व पुलिस महानिदेशक इश्वर चन्द्र द्विवेदी, जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता नवीन तिवारी, वरिष्ठ पत्रकार शैलेन्द्र सिंह, सूचना अधिकार कार्यकर्ता उर्वशी शर्मा और अखिलेश सक्सेना, हमसफ़र की कार्यकर्ता ममता सिंह, नर्मदा बचाओ आंदोलन और जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय की वरिष्ठ कार्यकर्ता अरुंधति धुरु, आशा परिवार से चुन्नीलाल, शोभा शुक्ला, राहुल द्विवेदी, रितेश आर्या, किरण जैसवार, नदीम सलमानी, नीरज मैनाली, जीतेन्द्र द्विवेदी, बाबी रमाकांत एवं अन्य शामिल थे.
प्रदर्शनकारियों का कहना था कि: हम भारत सरकार के गैर लोकतान्त्रिक ढंग से परमाणु ऊर्जा थोपने के प्रयास का विरोध करते हैं। अमरीका और यूरोप में जब भारी संख्या में आम लोग सड़क पर उतार आए तब उनकी सरकारों को परमाणु ऊर्जा त्यागनी पड़ी परंतु भारत में जब आम लोग परमाणु ऊर्जा पर सवाल उठा रहे हैं तो उनकी आवाज़ दबाने का प्रयास किया जा रहा है। कुडनकुलम, तमिल नाडु के डॉ एस.पी. उदयकुमार के नेतृत्व में परमाणु ऊर्जा के विरोध में जन अभियान को भारत सरकार ने भ्रामक आरोपों आदि द्वारा दबाने का पूरा प्रयास किया है। जब कि डॉ उदयकुमार ने अपनी संपत्ति का ब्योरा सार्वजनिक किया है और उनके पास ‘एफ.सी.आर.ए.’ ही नहीं है जिससे ‘विदेशी पैसा’ लिया जा सके। यह भी साफ ज़ाहिर है कि भारत सरकार स्वयं ‘विदेशी’ ताकतों (जैसे कि अमरीका, रूस, आदि) के साथ मिलजुल कर सैन्यीकरण और परमाणु कार्यक्रम बढ़ा रही है।
भारत सरकार ने एक जर्मन नागरिक को जिसने शांतिपूर्वक कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा विरोधी अभियान में भाग लिया था, उसको पकड़ कर वापिस जर्मनी भेज दिया। 8 मार्च 2012 को भारत सरकार ने एक जापानी नागरिक का वीसा भी रद्द कर दिया। ‘ग्रीनपीस’ के निमंत्रण पर फुकुशिमा,जापान में 11 मार्च 2011 को हुई परमाणु दुर्घटना झेले हुए माया कोबायाशी को भारत सरकार ने 15 फरवरी 2012 को ‘बिजनेस’ वीसा दिया था जिससे कि वो भारत में एक सप्ताह आ कर जगह-जगह आयोजित कार्यक्रमों में परमाणु विकिरण आदि खतरों के बारे में बता सकें। परंतु 8 मार्च 2012 को भारत ने उनका वीसा ही रद्द कर दिया।
अब विकसित दुनिया यह मानने लगी है कि निम्न चार कारणों से नाभिकीय ऊर्जा का कोई भविष्य नहीं हैः (1) इसका अत्याधिक खर्चीला होना, (2) मनुष्य स्वास्थ्य व पर्यावरण के लिए खतरनाक, (3) नाभिकीय शस्त्र के प्रसार में इसकी भूमिका से जुड़े खतरे, व (4) रेडियोधर्मी कचरे के दीर्घकालिक निपटारे की चुनौती।
भारत को नाभिकीय ऊर्जा का विकल्प ढूँढना चाहिए जो इतने खर्चीले व खतरनाक न हों। पुनर्प्राप्य ऊर्जा के संसाधन, जैसे सौर, पवन, बायोमास, बायोगैस, आदि, ही समाधान प्रदान कर सकते हैं यह मान कर यूरोप व जापान तो इस क्षेत्र में गम्भीर शोध कर रहे हैं। भारत को भी चाहिए कि इन विकसित देशों के अनुभव से सीखते हुए नाभिकीय ऊर्जा के क्षेत्र में अमरीका व यूरोप की कम्पनियों का बाजार बनने के बजाए हम भी पुनर्प्राप्य ऊर्जा संसाधनों पर ही अपना ध्यान केन्द्रित करें। भारत को ऐसी ऊर्जा नीति अपनानी चाहिए जिसमें कार्बन उत्सर्जन न हो और परमाणु विकिरण के खतरे भी न हो।
सी.एन.एस.
कूड़ंकुलम परमाणु विरोधी अभियान के समर्थन में देश में जगह-जगह विरोध
इडिंठकरई में चल रहे उपवास के समर्थन में सात दिवसीय देश व्यापी उपवास
[English] कूड़ंकुलम परमाणु बिजलीघर के विरोध में इडिंठकरई, तमिल नाडु में चल रहे उपवास के समर्थन में, जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय, परमाणु निशस्त्रीकरण और शांति के लिए गठबंधन, और लोक राजनीति मंच ने संयुक्त रूप से जंतर मंतर, दिल्ली, पर 26 मार्च से 1 अप्रैल 2012 तक सात दिवसीय उपवास का आह्वान दिया है। मग्सेसे पुरुस्कार से सम्मानित वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता डॉ संदीप पाण्डेय जंतर मंतर दिल्ली में उपवास पर रहेंगे और परमाणु कार्यक्रम के ऊपर लोकतान्त्रिक और खुली बहस की मांग को लेकर आन्दोलनरत रहेंगे.

कूड़ंकुलम परमाणु बिजलीघर के विरोध में चेन्नई में भी लोग उपवास पर हैं और मुंबई में प्रख्यात फिल्म निर्माता आनंद पटवर्धन दादर रेलवे स्टेशन के सामने विरोध का नेतृत्व करेंगे।
कूड़ंकुलम परमाणु बिजली घर के विरोध में, 27 मार्च 2012 को एक दिवसीय उपवास का आयोजन देश में जगह जगह होगा।
डॉ संदीप पाण्डेय ने कहा कि यह विडम्बना ही तो है कि एक तरफ भारत ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में, श्री लंका में तमिल लोगों के ऊपर हुए अत्याचार का मुद्दा उठाया है, परंतु देश के भीतर तमिल नाडु में परमाणु बिजली घर बनाने की जिद्द पर भारत अड़ा हुआ है जिसकी वजह से तमिल नाडु में रह रहे लोग खतरनाक परमाणु दुष्परिणामों को आने वाले सालों में भुगत सकते हैं।
डॉ संदीप पाण्डेय ने कहा कि हम भारत सरकार के गैर लोकतान्त्रिक ढंग से परमाणु ऊर्जा थोपने के प्रयास का विरोध करते हैं। अमरीका और यूरोप में जब भारी संख्या में आम लोग सड़क पर उतार आए तब उनकी सरकारों को परमाणु ऊर्जा त्यागनी पड़ी परंतु भारत में जब आम लोग परमाणु ऊर्जा पर सवाल उठा रहे हैं तो उनकी आवाज़ दबाने का प्रयास किया जा रहा है। कुडनकुलम, तमिल नाडु के डॉ उदयकुमार के नेतृत्व में परमाणु ऊर्जा के विरोध में जन अभियान को भारत सरकार ने भ्रामक आरोपों आदि द्वारा दबाने का पूरा प्रयास किया है। जब कि डॉ उदयकुमार ने अपनी संपत्ति का ब्योरा सार्वजनिक किया है और उनके पास ‘एफ.सी.आर.ए.’ ही नहीं है जिससे ‘विदेशी पैसा’ लिया जा सके। यह भी साफ ज़ाहिर है कि भारत सरकार स्वयं ‘विदेशी’ ताकतों (जैसे कि अमरीका, रूस, आदि) के साथ मिलजुल कर सैन्यीकरण और परमाणु कार्यक्रम बढ़ा रही है।
डॉ संदीप पाण्डेय ने कहा कि भारत सरकार ने एक जर्मन नागरिक को जिसने शांतिपूर्वक कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा विरोधी अभियान में भाग लिया था, उसको पकड़ कर वापिस जर्मनी भेज दिया। 8 मार्च 2012 को भारत सरकार ने एक जापानी नागरिक का वीसा भी रद्द कर दिया। ‘ग्रीनपीस’ के निमंत्रण पर फुकुशिमा,जापान में 11 मार्च 2011 को हुई परमाणु दुर्घटना झेले हुए माया कोबायाशी को भारत सरकार ने 15 फरवरी 2012 को ‘बिजनेस’ वीसा दिया था जिससे कि वो भारत में एक सप्ताह आ कर जगह-जगह आयोजित कार्यक्रमों में परमाणु विकिरण आदि खतरों के बारे में बता सकें। परंतु 8 मार्च 2012 को भारत ने उनका वीसा ही रद्द कर दिया।
डॉ संदीप पाण्डेय ने कहा कि हाल ही में तमिल नाडु मुख्य मंत्री द्वारा डॉ एस.पी. उदयकुमार को नक्सलवादी करार करने का प्रयास यह ज़ाहिर करता है कि सरकार परमाणु कार्यक्रम को लागू करने के लिए कितनी मजबूर है। हम सरकार के आम लोगों को गुमराह करने का और परमाणु कार्यक्रम में पारदर्शिता नहीं रखने का भरसक विरोध करते हैं।
अब विकसित दुनिया यह मानने लगी है कि निम्न चार कारणों से नाभिकीय ऊर्जा का कोई भविष्य नहीं हैः (1) इसका अत्याधिक खर्चीला होना, (2) मनुष्य स्वास्थ्य व पर्यावरण के लिए खतरनाक, (3) नाभिकीय शस्त्र के प्रसार में इसकी भूमिका से जुड़े खतरे, व (4) रेडियोधर्मी कचरे के दीर्घकालिक निपटारे की चुनौती।
भारत को नाभिकीय ऊर्जा का विकल्प ढूँढना चाहिए जो इतने खर्चीले व खतरनाक न हों। पुनर्प्राप्य ऊर्जा के संसाधन, जैसे सौर, पवन, बायोमास, बायोगैस, आदि, ही समाधान प्रदान कर सकते हैं यह मान कर यूरोप व जापान तो इस क्षेत्र में गम्भीर शोध कर रहे हैं। भारत को भी चाहिए कि इन विकसित देशों के अनुभव से सीखते हुए नाभिकीय ऊर्जा के क्षेत्र में अमरीका व यूरोप की कम्पनियों का बाजार बनने के बजाए हम भी पुनर्प्राप्य ऊर्जा संसाधनों पर ही अपना ध्यान केन्द्रित करें। भारत को ऐसी ऊर्जा नीति अपनानी चाहिए जिसमें कार्बन उत्सर्जन न हो और परमाणु विकिरण के खतरे भी न हो।
डॉ संदीप पाण्डेय ने कहा कि हम भारत सरकार से अपील करते हैं कि परमाणु ऊर्जा के मुद्दे पर लोकतान्त्रिक तरीके से खुली बहस करवाए और जब तक यह सर्व सम्मति से निर्णय नहीं होता कि भारत को परमाणु कार्यक्रम चलना चाहिए या नहीं, परमाणु कार्यक्रम को स्थगित करे।
बाबी रमाकांत - सी.एन.एस.
गैर लोकतान्त्रिक ढंग से परमाणु ऊर्जा थोपने के प्रयास का विरोध
[English] अखिल भारतीय विद्युत् अभियंता संघ के महासचिव श्री शैलेन्द्र दुबे ने कहा कि १२ लाख से अधिक उनके कार्यकर्ता, जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय और नर्मदा बचाओ आन्दोलन के साथ, आन्दोलन करेंगे यदि भारत सरकार ने लोकतान्त्रिक तरीके से उर्जा के मुद्दे पर खुली बहस न होने दी. आज (१० मार्च २०१२) को लखनऊ में आयोजित प्रेस वार्ता में यह ज्ञापन जारी किया गया:
गैर लोकतान्त्रिक ढंग से परमाणु ऊर्जा थोपने के प्रयास का विरोध
हम भारत सरकार के गैर लोकतान्त्रिक ढंग से परमाणु ऊर्जा थोपने के प्रयास का विरोध करते हैं। अमरीका और यूरोप में जब भारी संख्या में आम लोग सड़क पर उतार आए तब उनकी सरकारों को परमाणु ऊर्जा त्यागनी पड़ी परंतु भारत में जब आम लोग परमाणु ऊर्जा पर सवाल उठा रहे हैं तो उनकी आवाज़ दबाने का प्रयास किया जा रहा है। कुडनकुलम, तमिल नाडु के डॉ उदयकुमार के नेतृत्व में परमाणु ऊर्जा के विरोध में जन अभियान को भारत सरकार ने भ्रामक आरोपों आदि द्वारा दबाने का पूरा प्रयास किया है। जब कि डॉ उदयकुमार ने अपनी संपत्ति का ब्योरा सार्वजनिक किया है और उनके पास ‘एफ.सी.आर.ए.’ ही नहीं है जिससे ‘विदेशी पैसा’ लिया जा सके। यह भी साफ ज़ाहिर है कि भारत सरकार स्वयं ‘विदेशी’ ताकतों (जैसे कि अमरीका, रूस, आदि) के साथ मिलजुल कर सैन्यीकरण और परमाणु कार्यक्रम बढ़ा रही है।
भारत सरकार ने एक जर्मन नागरिक को जिसने शांतिपूर्वक कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा विरोधी अभियान में भाग लिया था, उसको पकड़ कर वापिस जर्मनी भेज दिया। 8 मार्च 2012 को भारत सरकार ने एक जापानी नागरिक का वीसा भी रद्द कर दिया। ‘ग्रीनपीस’ के निमंत्रण पर फुकुशिमा,जापान में 11 मार्च 2011 को हुई परमाणु दुर्घटना झेले हुए माया कोबायाशी को भारत सरकार ने 15 फरवरी 2012 को ‘बिजनेस’ वीसा दिया था जिससे कि वो भारत में एक सप्ताह आ कर जगह-जगह आयोजित कार्यक्रमों में परमाणु विकिरण आदि खतरों के बारे में बता सकें। परंतु 8 मार्च 2012 को भारत ने उनका वीसा ही रद्द कर दिया।
अब विकसित दुनिया यह मानने लगी है कि निम्न चार कारणों से नाभिकीय ऊर्जा का कोई भविष्य नहीं हैः (1) इसका अत्याधिक खर्चीला होना, (2) मनुष्य स्वास्थ्य व पर्यावरण के लिए खतरनाक, (3) नाभिकीय शस्त्र के प्रसार में इसकी भूमिका से जुड़े खतरे, व (4) रेडियोधर्मी कचरे के दीर्घकालिक निपटारे की चुनौती।
भारत को नाभिकीय ऊर्जा का विकल्प ढूँढना चाहिए जो इतने खर्चीले व खतरनाक न हों। पुनर्प्राप्य ऊर्जा के संसाधन, जैसे सौर, पवन, बायोमास, बायोगैस, आदि, ही समाधान प्रदान कर सकते हैं यह मान कर यूरोप व जापान तो इस क्षेत्र में गम्भीर शोध कर रहे हैं। भारत को भी चाहिए कि इन विकसित देशों के अनुभव से सीखते हुए नाभिकीय ऊर्जा के क्षेत्र में अमरीका व यूरोप की कम्पनियों का बाजार बनने के बजाए हम भी पुनर्प्राप्य ऊर्जा संसाधनों पर ही अपना ध्यान केन्द्रित करें। भारत को ऐसी ऊर्जा नीति अपनानी चाहिए जिसमें कार्बन उत्सर्जन न हो और परमाणु विकिरण के खतरे भी न हो।
शैलेंद्र दुबे (महासचिव, अखिल भारतीय विद्युत अभियंता संघ), आलोक अग्रवाल (नर्मदा बचाओ आंदोलन), डॉ संदीप पांडे (जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय), अरुंधती धुरु (नर्मदा बचाओ आंदोलन/ जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय), बाबी रमाकांत, शोभा शुक्ल, राहुल कुमार द्विवेदी, आशा परिवार, परमाणु निशस्त्रिकरण एवं शांति के लिए गठबंधन, शांति एवं विकास के लिए चिकित्सकों का गठबंधन, सोशलिस्ट पार्टी
- सी.एन.एस.
शांति एवं लोकतंत्र पर होगा भारत-पाकिस्तान संयुक्त लोकमंच का इलाहाबाद अधिवेशन
१. दक्षिण एशिया के देशों के बीच दोस्ती और सहयोग में सुधार हो और मेल बढ़े. इसके लिये इन देशों को वीसा-मुक्त होना चाहिए जिससे कि इस छेत्र के लोग पूरी स्वतंत्रता के साथ एक दुसरे से मिल सकें, और इस छेत्र की मिलीजुली सांस्कृतिक धरोहर की जड़ें मजबूत हों, और व्यापर बढ़े.
२. इन देशों में लोकतान्त्रिक एवं मानवीय मूल्यों को सशक्त किया जाए और समाज के हाशिये पर रह रहे वर्गों के लिये सामाजिक एवं कानूनी सुरक्षा प्रदान की जाए, जिनमें महिलाएं, दलित, और अन्य धार्मिक और प्रजातीय अल्प-संख्यक वर्ग शामिल हैं. हमारा मानना है कि सक्रियता से इन वर्गों का शोषण करने वाले कानूनों और सामाजिक प्रथाओं को ख़त्म किया जाये.
३. भारत और पाकिस्तान को एक निश्चित समय-काल में अपने परमाणु अस्त्र-शास्त्र को ख़त्म करना आरंभ करना चाहिए जिससे कि दोनों देश मिल कर परमाणु मुक्त दक्षिण एशिया छेत्र स्थापित करने में पहल ले सकें.
४. जापान में घटित परमाणु आपदा के बाद तो यह और भी स्पष्ट हो गया है कि परमाणु शक्ति का सैन्य या ऊर्जा दोनों में ही इस्तेमाल नहीं होना चाहिए.
५. लोकतान्त्रिक मूल्य और शासन प्रणाली सम्पूर्ण दक्षिण एशिया छेत्र में कायम होनी चाहिए.
६. दक्षिण एशिया छेत्र की सभी सरकारों द्वारा बिना-विलम्ब सैन्यकरण को रोकने के लिये कदम उठाये जाने चाहिए और सैन्य बजट को पारदर्शी तरीकों से जन-हितैषी कार्यक्रमों में निवेश करना चाहिए जैसे कि शिक्षा एवं स्वास्थ्य.
७. चूँकि इस छेत्र की सांस्कृतिक धरोहर मिलीजुली है, सक्रियता के साथ हमें शांति और आपसी सौहार्द बढ़ाने के लिये सांप्रदायिक ताकतों पर अंकुश लगाना चाहिए.
८. हमारा मानना है कि इस छेत्र के सभी सरकारों को कदम उठाने चाहिए कि प्राकृतिक संसाधन जैसे कि जल, जंगल और जमीन, पर स्थानीय लोगों का ही अधिकार कायम रहे, और गैर-कानूनी और विध्वंसकारी तरीकों से जल,जंगल और जमीन को वैश्वीकरण ताकतों से बचाना चाहिए क्योंकि यह जन-हितैषी नहीं है.
बाबी रमाकांत - सी.एन.एस.
परमाणु-मुक्त,वीसा-मुक्त,साफ़ ऊर्जा नीतियाँ 'सार्क' देशों में लागू हों: लखनऊ घोषणापत्र २०११
[English] 10 जुलाई 2011 को ‘शांति एवं लोकतंत्र के लिये पाकिस्तान-भारत लोकमंच’ के दूसरे उत्तर प्रदेश अधिवेशन में लखनऊ घोषणापत्र २०११ पारित किया गया. यह इस प्रकार है:
"शांति एवं लोकतंत्र के लिये पाकिस्तान-भारत लोकमंच" के दूसरे उत्तर प्रदेश प्रादेशिक अधिवेशन के हम प्रतिभागियों का मानना है कि दक्षिण एशिया के नागरिकों को और सरकारों को निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए:
१. दक्षिण एशिया के देशों के बीच दोस्ती और सहयोग में सुधार हो और मेल बढ़े. इसके लिये इन देशों को वीसा-मुक्त होना चाहिए जिससे कि इस क्षेत्र के लोग पूरी स्वतंत्रता के साथ एक दूसरे से मिल सकें, और इस क्षेत्र की मिलीजुली सांस्कृतिक धरोहर की जड़ें मजबूत हों, और व्यापर बढ़े. हमारा मानना है कि 'सार्क' आर्थिक यूनियन बने. उपरोक्त तथ्यों को नज़र में रखते हुए बच्चों, बुजुर्गों, जन-संगठनों, छात्रों, शिक्षकों, आदि को वीसा मिलने में प्राथमिकता मिले.
२. इन देशों में लोकतान्त्रिक एवं मानवीय मूल्यों को सशक्त किया जाए और समाज के हाशिये पर रह रहे वर्गों के लिये सामाजिक एवं कानूनी सुरक्षा प्रदान की जाए, जिनमें महिलाएं, दलित, और अन्य धार्मिक और प्रजातीय अल्प-संख्यक वर्ग शामिल हैं. हमारा मानना है कि सक्रियता से इन वर्गों का शोषण करने वाले कानूनों और सामाजिक प्रथाओं को ख़त्म किया जाये.
३. भारत और पाकिस्तान को एक निश्चित समय-काल में अपने परमाणु अस्त्र-शास्त्र को ख़त्म करना आरंभ करना चाहिए जिससे कि दोनों देश मिल कर परमाणु मुक्त दक्षिण एशिया क्षेत्र स्थापित करने में पहल ले सकें.
४. जापान में घटित परमाणु आपदा के बाद तो यह और भी स्पष्ट हो गया है कि परमाणु शक्ति का सैन्य या ऊर्जा दोनों में ही इस्तेमाल नहीं होना चाहिए. जो देश परमाणु ऊर्जा बनाने में सबसे आगे थे, जैसे कि जापान और जर्मनी, दोनों देशों ने परमाणु ऊर्जा के इस्तेमाल को बंद करने की भूमिका ली है और वायु, सूर्य ऊर्जा आदि के उपयोग को बढाने का फैसला किया है. जर्मनी ने २०२२ तक सभी परमाणु ऊर्जा घरों को बंद करने की घोषणा की है. जर्मनी में एक आधा बना हुआ परमाणु ऊर्जा घर अब मनोरंजन पार्क बना दिया गया है. हमारा मानना है कि उत्तर प्रदेश में लगे परमाणु ऊर्जा घर, भारत के अन्य राज्यों में लगे हुए परमाणु ऊर्जा घर और पाकिस्तान में लगे परमाणु ऊर्जा घरों को भी जल्द-से-जल्द निश्चित समय-अवधि के भीतर बंद करना चाहिए.
५. हमारा मानना है कि भारत-अमरीका परमाणु समझौता असल में ऊर्जा-सुरक्षा प्रदान नहीं करता है. सही मायनों में किसी भी देश के लिए ऊर्जा सुरक्षा के मायने यह हैं कि वर्तमान और भविष्य की ऊर्जा आवश्यकता की पूर्ति इस तरीके से हो कि सभी लोग ऊर्जा से लाभान्वित हो सकें, पर्यावरण पर कोई कु-प्रभाव न पड़े, और यह तरीका स्थायी हो, न कि लघुकालीन. इस तरह की ऊर्जा नीति अनेकों वैकल्पिक ऊर्जा का मिश्रण हो सकती है जैसे कि, सूर्य ऊर्जा, पवन ऊर्जा, छोटे पानी के बाँध आदि, गोबर गैस इत्यादि. परमाणु दुर्घटनाओं की त्रासदी संभवत: कई पीढ़ियों को झेलनी पड़ती है जैसे कि भोपाल गैस काण्ड और हिरोशिमा नागासाकी की त्रासदी को लोगों ने इतने बरस तक झेला. हमारी मांग है कि भारत बिना विलम्ब, शांति के प्रति सच्ची आस्था का परिचय देते हुए भारत-अमरीका परमाणु समझौते को रद्द करे, और सभी परमाणु कार्यक्रमों को बंद करे. भारत को अमरीका का साथी बनने के बजाय अपनी पहले वाली गुट निरपेक्ष आन्दोलन वाली भूमिका लेनी चाहिए. अमरीका का साथी बनने का अंजाम पाकिस्तान भुगत चुका है. भारत और पाकिस्तान दोनों को आपसी संबंधों को प्रगाढ़ और मधुरमय करने के लिये प्रयास बद्ध होना चाहिए और कश्मीर एवं अफ-पाक क्षेत्रों में शांति कायम करनी चाहिए. दोनों देशों में आतंकवाद पर अंकुश लगाने के लिये भारत और पाकिस्तान को मिलजुल कर कार्य करना चाहिए. ऐसा संभव करने के लिये यह आवश्यक है कि सांप्रदायिक सद्भावना, समानता, न्याय, लोकतान्त्रिक सोच, धर्म-निरपेक्षता जैसे मूल्यों को प्राथमिकता दी जाए और धार्मिक कट्टरपंथी वर्गों पर अंकुश लगे.
६. लोकतान्त्रिक मूल्य और शासन प्रणाली सम्पूर्ण दक्षिण एशिया क्षेत्र में कायम होनी चाहिए.
७. दक्षिण एशिया क्षेत्र की सभी सरकारों द्वारा बिना-विलम्ब सैन्यकरण को रोकने के लिये कदम उठाये जाने चाहिए और सैन्य बजट को पारदर्शी तरीकों से जन-हितैषी कार्यक्रमों में निवेश करना चाहिए जैसे कि शिक्षा एवं स्वास्थ्य.
८. चूँकि इस क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर मिलीजुली है, सक्रियता के साथ हमें शांति और आपसी सौहार्द बढ़ाने के लिये सांप्रदायिक ताकतों पर अंकुश लगाना चाहिए.
९. हमारा मानना है कि इस क्षेत्र की सभी सरकारों को कदम उठाने चाहिए कि प्राकृतिक संसाधन जैसे कि जल, जंगल और जमीन, पर स्थानीय लोगों का ही अधिकार कायम रहे, और गैर-कानूनी और विध्वंसकारी तरीकों से जल,जंगल और जमीन को वैश्वीकरण ताकतों से बचाना चाहिए क्योंकि यह जन-हितैषी नहीं है. हम अपना समर्थन फिर से दोहराते हैं कि हमसब जन-हितैषी आंदोलनों में सक्रियता से सहयोग प्रदान करते रहेंगे जिससे कि वैश्वीकरण ताकतों पर रोक लगे जो WTO, विश्व बैंक, IMF, ADB जैसी संस्थाओं के इशारों पर चलती हैं.
सी.एन.एस.
"शांति एवं लोकतंत्र के लिये पाकिस्तान-भारत लोकमंच" के दूसरे उत्तर प्रदेश प्रादेशिक अधिवेशन के हम प्रतिभागियों का मानना है कि दक्षिण एशिया के नागरिकों को और सरकारों को निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए:
१. दक्षिण एशिया के देशों के बीच दोस्ती और सहयोग में सुधार हो और मेल बढ़े. इसके लिये इन देशों को वीसा-मुक्त होना चाहिए जिससे कि इस क्षेत्र के लोग पूरी स्वतंत्रता के साथ एक दूसरे से मिल सकें, और इस क्षेत्र की मिलीजुली सांस्कृतिक धरोहर की जड़ें मजबूत हों, और व्यापर बढ़े. हमारा मानना है कि 'सार्क' आर्थिक यूनियन बने. उपरोक्त तथ्यों को नज़र में रखते हुए बच्चों, बुजुर्गों, जन-संगठनों, छात्रों, शिक्षकों, आदि को वीसा मिलने में प्राथमिकता मिले.
२. इन देशों में लोकतान्त्रिक एवं मानवीय मूल्यों को सशक्त किया जाए और समाज के हाशिये पर रह रहे वर्गों के लिये सामाजिक एवं कानूनी सुरक्षा प्रदान की जाए, जिनमें महिलाएं, दलित, और अन्य धार्मिक और प्रजातीय अल्प-संख्यक वर्ग शामिल हैं. हमारा मानना है कि सक्रियता से इन वर्गों का शोषण करने वाले कानूनों और सामाजिक प्रथाओं को ख़त्म किया जाये.
३. भारत और पाकिस्तान को एक निश्चित समय-काल में अपने परमाणु अस्त्र-शास्त्र को ख़त्म करना आरंभ करना चाहिए जिससे कि दोनों देश मिल कर परमाणु मुक्त दक्षिण एशिया क्षेत्र स्थापित करने में पहल ले सकें.
४. जापान में घटित परमाणु आपदा के बाद तो यह और भी स्पष्ट हो गया है कि परमाणु शक्ति का सैन्य या ऊर्जा दोनों में ही इस्तेमाल नहीं होना चाहिए. जो देश परमाणु ऊर्जा बनाने में सबसे आगे थे, जैसे कि जापान और जर्मनी, दोनों देशों ने परमाणु ऊर्जा के इस्तेमाल को बंद करने की भूमिका ली है और वायु, सूर्य ऊर्जा आदि के उपयोग को बढाने का फैसला किया है. जर्मनी ने २०२२ तक सभी परमाणु ऊर्जा घरों को बंद करने की घोषणा की है. जर्मनी में एक आधा बना हुआ परमाणु ऊर्जा घर अब मनोरंजन पार्क बना दिया गया है. हमारा मानना है कि उत्तर प्रदेश में लगे परमाणु ऊर्जा घर, भारत के अन्य राज्यों में लगे हुए परमाणु ऊर्जा घर और पाकिस्तान में लगे परमाणु ऊर्जा घरों को भी जल्द-से-जल्द निश्चित समय-अवधि के भीतर बंद करना चाहिए.
५. हमारा मानना है कि भारत-अमरीका परमाणु समझौता असल में ऊर्जा-सुरक्षा प्रदान नहीं करता है. सही मायनों में किसी भी देश के लिए ऊर्जा सुरक्षा के मायने यह हैं कि वर्तमान और भविष्य की ऊर्जा आवश्यकता की पूर्ति इस तरीके से हो कि सभी लोग ऊर्जा से लाभान्वित हो सकें, पर्यावरण पर कोई कु-प्रभाव न पड़े, और यह तरीका स्थायी हो, न कि लघुकालीन. इस तरह की ऊर्जा नीति अनेकों वैकल्पिक ऊर्जा का मिश्रण हो सकती है जैसे कि, सूर्य ऊर्जा, पवन ऊर्जा, छोटे पानी के बाँध आदि, गोबर गैस इत्यादि. परमाणु दुर्घटनाओं की त्रासदी संभवत: कई पीढ़ियों को झेलनी पड़ती है जैसे कि भोपाल गैस काण्ड और हिरोशिमा नागासाकी की त्रासदी को लोगों ने इतने बरस तक झेला. हमारी मांग है कि भारत बिना विलम्ब, शांति के प्रति सच्ची आस्था का परिचय देते हुए भारत-अमरीका परमाणु समझौते को रद्द करे, और सभी परमाणु कार्यक्रमों को बंद करे. भारत को अमरीका का साथी बनने के बजाय अपनी पहले वाली गुट निरपेक्ष आन्दोलन वाली भूमिका लेनी चाहिए. अमरीका का साथी बनने का अंजाम पाकिस्तान भुगत चुका है. भारत और पाकिस्तान दोनों को आपसी संबंधों को प्रगाढ़ और मधुरमय करने के लिये प्रयास बद्ध होना चाहिए और कश्मीर एवं अफ-पाक क्षेत्रों में शांति कायम करनी चाहिए. दोनों देशों में आतंकवाद पर अंकुश लगाने के लिये भारत और पाकिस्तान को मिलजुल कर कार्य करना चाहिए. ऐसा संभव करने के लिये यह आवश्यक है कि सांप्रदायिक सद्भावना, समानता, न्याय, लोकतान्त्रिक सोच, धर्म-निरपेक्षता जैसे मूल्यों को प्राथमिकता दी जाए और धार्मिक कट्टरपंथी वर्गों पर अंकुश लगे.
६. लोकतान्त्रिक मूल्य और शासन प्रणाली सम्पूर्ण दक्षिण एशिया क्षेत्र में कायम होनी चाहिए.
७. दक्षिण एशिया क्षेत्र की सभी सरकारों द्वारा बिना-विलम्ब सैन्यकरण को रोकने के लिये कदम उठाये जाने चाहिए और सैन्य बजट को पारदर्शी तरीकों से जन-हितैषी कार्यक्रमों में निवेश करना चाहिए जैसे कि शिक्षा एवं स्वास्थ्य.
८. चूँकि इस क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर मिलीजुली है, सक्रियता के साथ हमें शांति और आपसी सौहार्द बढ़ाने के लिये सांप्रदायिक ताकतों पर अंकुश लगाना चाहिए.
९. हमारा मानना है कि इस क्षेत्र की सभी सरकारों को कदम उठाने चाहिए कि प्राकृतिक संसाधन जैसे कि जल, जंगल और जमीन, पर स्थानीय लोगों का ही अधिकार कायम रहे, और गैर-कानूनी और विध्वंसकारी तरीकों से जल,जंगल और जमीन को वैश्वीकरण ताकतों से बचाना चाहिए क्योंकि यह जन-हितैषी नहीं है. हम अपना समर्थन फिर से दोहराते हैं कि हमसब जन-हितैषी आंदोलनों में सक्रियता से सहयोग प्रदान करते रहेंगे जिससे कि वैश्वीकरण ताकतों पर रोक लगे जो WTO, विश्व बैंक, IMF, ADB जैसी संस्थाओं के इशारों पर चलती हैं.
सी.एन.एस.
एक दूसरे पर विश्वास करने से ही शांति प्रक्रिया आगे बढ़ती है: दीप
बी-ब्लाक इंदिरा नगर स्थित स्प्रिंग डेल कॉलेज और डी-ब्लाक इंदिरा नगर स्थित डैफोडील्स कॉन्वेंट इंटर कॉलेज में सईदा दीप छात्रों एवं शिक्षकों के साथ दोनों देशों के लोगों के बीच शान्ति और दोस्ती बढ़ाने पर संवाद कर रही थी. इस परिचर्चा में डैफोडील्स के प्रधानाचार्य पियूष मिश्रा, आशा परिवार की सामाजिक कार्यकर्ता शोभा शुक्ला, एवं स्प्रिंग डेल की प्रधानाचार्य श्रीमती खन्ना उपस्थित थीं.
दीप ने कहा कि "यदि हम चाहते हैं कि राजनैतिक स्तर पर हो रहे शांति प्रयास सफल हों, तो हमें आम लोगों को इस प्रक्रिया से जोड़ना होगा. लोगों में आपसी विश्वास और समझ को प्रोत्साहित करना होगा".
दीप अनेकों भारत-पाकिस्तान लोगों को जोड़ते हुए शांति प्रयासों में शामिल रही हैं जिनमें अमन के बढ़ते कदम (२०१०), भारत पाकिस्तान शांति पदयात्रा (२००५), वीसा-मुक्त और शांत दक्षिण एशिया सम्मलेन आदि प्रमुख हैं.
दीप ने लखनऊ शहर में 'लेसन्स फ्रॉम जापान २०११' (जापान से सीख २०११) अभियान भी जारी किया जो लखनऊ नागरिकों द्वारा ६ अगस्त तक युवाओं को जोड़ने के लिये चलाया जायेगा. ६ अगस्त, हिरोशिमा डे, पर, डॉ राम मनोहर लोहिया इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेस में एक सेमिनार के रूप में इस अभियान का समापन होगा. यह 'जापान से सीख २०११' अभियान, आशा परिवार, जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय एवं 'नागरिकों का स्वस्थ लखनऊ' अभियान के संयुक्त तत्वावधान में चलाया जा रहा है.
'जापान से सीख २०११' अभियान का मानना है कि जापान में घटित परमाणु आपदा के बाद तो यह और भी स्पष्ट हो गया है कि परमाणु शक्ति का सैन्य या ऊर्जा दोनों में ही इस्तेमाल नहीं होना चाहिए. जो देश परमाणु ऊर्जा बनाने में सबसे आगे थे, जैसे कि जापान और जर्मनी, उन देशों ने परमाणु ऊर्जा के इस्तेमाल को बंद करने की भूमिका ली है और वायु, सूर्य ऊर्जा आदि के उपयोग को बढ़ाने का फैसला लिया है. जर्मनी ने २०२२ तक सभी परमाणु ऊर्जा घरों को बंद करने की घोषणा की है. जर्मनी में एक आधा बना हुआ परमाणु ऊर्जा घर अब मनोरंजन पार्क बना दिया गया है. हमारा मानना है कि उत्तर प्रदेश में लगे परमाणु ऊर्जा घर, और भारत के अन्य राज्यों में लगे हुए १९ परमाणु ऊर्जा घर जल्द-से-जल्द निश्चित समय-अवधि के भीतर बंद करना चाहिए.
'जापान से सीख २०११' अभियान का मानना है कि सही मायनों में किसी भी देश के लिए ऊर्जा सुरक्षा के मायने यह हैं कि वर्तमान और भविष्य की ऊर्जा आवश्यकता की पूर्ति इस तरीके से हो कि सभी लोग ऊर्जा से लाभान्वित हो सकें, पर्यावरण पर कोई कु-प्रभाव न पड़े, और यह तरीका स्थायी हो, न कि लघुकालीन. इस तरह की ऊर्जा नीति अनेकों वैकल्पिक ऊर्जा का मिश्रण हो सकती है जैसे कि, सूर्य ऊर्जा, पवन ऊर्जा, छोटे पानी के बाँध आदि, गोबर गैस इत्यादि.
अगर पाकिस्तान के पास परमाणु बम न होता तो क्या होता?
डाक्टर अब्दुल कादिर, जो अपने आपको पाकिस्तान के परमाणु बम का जनक मानते हैं, पिछले कुछ सालों से पाकिस्तानी सेना की निगरानी में अपने इस्लामाबाद स्थित आलीशान मकान में ज़िन्दगी गुज़ार रहे हैं. उनका अधिकतर समय अखबारों के लिए साप्ताहिक कॉलम लिखने में व्यतीत होता है. अपने हाल ही के एक लेख में उन्होंने कहा है कि, " यदि हमारे पास १९७१ के पहले आणविक क्षमता होती तो हमें एक शर्मनाक हार का सामना करते हुए अपना आधा देश (वर्त्तमान बांगला देश) खोना नहीं पड़ता."
ऐसा लिखते समय वे शायद यह भूल गए कि ३०,००० आणविक हथियार भी सोवियत यूनियन को पतन, विघटन, और हार से नहीं बचा पाए. तो फिर क्या एक बम पाकिस्तान को १९७१ की हार से बचा पाता? क्या वर्त्तमान में भी बचा पायेगा?
चलिए एक बार फिर से १९७१ की यादें ताज़ा करते हैं. हमारे जैसे लोग जो उस दौर में पले बढ़े, वे सभी यह जानते हैं कि पूर्वी एवम् पश्चिमी पाकिस्तान एक ही देश के हिस्से ज़रूर थे, पर वे कभी भी एक राष्ट्र नहीं बन पाए. आज की युवा पीढी इस बात का अंदाजा भी नहीं लगा सकती कि उन दिनों, पश्चिम पाकिस्तान में बंगालियों के प्रति कितना जातीय विरोध व्याप्त था. आज मैं शर्म से सर झुका कर यह बात स्वीकार करता हूँ, कि उस समय मेरे बाल मन में भी पूर्वी पाकिस्तान के छोटे और काले बाशिंदों के प्रति घृणा के ही भाव थे. हम सभी को यह भ्रम था कि कद्दावर, गोरे और बढ़िया उर्दू बोलने वाले ही अच्छे पाकिस्तानी और मुसलमान हो सकते हैं. मेरे कुछ स्कूली दोस्त रेडियो पाकिस्तान से बंगाली में प्रसारित होने वाले समाचारों की अजीब भाषा का मज़ाक उड़ाते थे. पश्चिम पाकिस्तान के शासन में बंगाली जनता बहुत प्रताड़ित हुई. वह यह मानती थी कि उसकी ऐतिहासिक नियति एक बंगला भाषी राष्ट्र कि नागरिकता हैं, न कि एक उर्दू भाषी पूर्वी पाकिस्तान की-- जैसा कि जिन्ना चाहते थे.
चलिए एक बार फिर से १९७१ की यादें ताज़ा करते हैं. हमारे जैसे लोग जो उस दौर में पले बढ़े, वे सभी यह जानते हैं कि पूर्वी एवम् पश्चिमी पाकिस्तान एक ही देश के हिस्से ज़रूर थे, पर वे कभी भी एक राष्ट्र नहीं बन पाए. आज की युवा पीढी इस बात का अंदाजा भी नहीं लगा सकती कि उन दिनों, पश्चिम पाकिस्तान में बंगालियों के प्रति कितना जातीय विरोध व्याप्त था. आज मैं शर्म से सर झुका कर यह बात स्वीकार करता हूँ, कि उस समय मेरे बाल मन में भी पूर्वी पाकिस्तान के छोटे और काले बाशिंदों के प्रति घृणा के ही भाव थे. हम सभी को यह भ्रम था कि कद्दावर, गोरे और बढ़िया उर्दू बोलने वाले ही अच्छे पाकिस्तानी और मुसलमान हो सकते हैं. मेरे कुछ स्कूली दोस्त रेडियो पाकिस्तान से बंगाली में प्रसारित होने वाले समाचारों की अजीब भाषा का मज़ाक उड़ाते थे. पश्चिम पाकिस्तान के शासन में बंगाली जनता बहुत प्रताड़ित हुई. वह यह मानती थी कि उसकी ऐतिहासिक नियति एक बंगला भाषी राष्ट्र कि नागरिकता हैं, न कि एक उर्दू भाषी पूर्वी पाकिस्तान की-- जैसा कि जिन्ना चाहते थे.
भाषा के अलगाव के अलावा भी परेशानी वाले कई मुद्दे थे. पूर्वी पाकिस्तान के इलाके में पूरे पाकिस्तान की ५४% आबादी रहती थी, और यही भाग विदेशी पूंजी का सबसे बड़ा अर्जक भी था. परन्तु पश्चिम पाकिस्तान के सेना नायक,अफसर एवम् जुल्फिकार अली भुट्टो जैसे राजनीतिज्ञ इस बात से डरते थे कि प्रजातांत्रिक प्रणाली के रहते सारी राष्ट्रीय सम्पदा, एवम् सत्ता पूर्वी पाकिस्तान के हाथों में चली जाएगी. लोकतंत्र और न्याय से वंचित, पूर्वी पाकिस्तान की असहाय जनता अपने क्षेत्र की पूंजी को पश्चिमी पाकिस्तान के उद्योग, स्कूल, और बाँध बनाने के कार्यों पर खर्च होते हुए बेबसी से देखती रही. १९७० में जब 'भोला साइक्लोन ने ५ लाख लोगों की जान ली, तब भी रावलपिंडी में बैठे हुए राष्ट्रपति याहिया खान एवम् साथी सेनानायकों की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा. ऐसे माहौल में चुनावी नतीजों ने निर्णायक अवसर प्रदान किया. अवामी लीग को पाकिस्तानी संसद में बहुमत प्राप्त हुआ, परन्तु भुट्टो तथा अन्य सेनानायकों ने जनता के निर्णय को नहीं माना. बंगालियों के सब्र का बाँध टूट गया और वे आज़ादी की जंग में कूद पड़े. पश्चिम पाकिस्तान की सेना ने नरसंहार मचा दिया. राजनैतिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी, एवम् विद्यार्थी चुन चुन कर मारे गए. खून कि नदियाँ बहने लगीं और लाखों लोग सरहद पार भाग निकले. जब भारत ने हस्तक्षेप करके पूर्व को सहयोग प्रदान किया, तब सेना ने हथियार डाल दिये और एक नए राष्ट्र बांग्लादेश का जन्म हुआ.
उस समय १९७१ में पाकिस्तान के पास बम न होना एक वरदान से कम नहीं था. पता नहीं डा. खान क्या सोच कर कह रहे हैं कि बम पाकिस्तान को विघटन से बचा सकता था. क्या माननीय डॉक्टर साहब ने ढाका की जनता पर बमबारी करी होती? या फिर कोलकाता और दिल्ली को जला दिया होता, ताकि प्रतिशोध में भारत भी कराची और लाहौर से बदला लेता? या फिर हमने भारत को आणविक हमले की धमकी दे कर उसे युद्ध से बाहर रखने का प्रयत्न किया होता?
बम के बगैर भी हज़ारों की तादाद में निरीह जनता मारी गयी. पाकिस्तान के विघटन को रोकने के लिए और कितने पूर्वी पाकिस्तानियों की कुर्बानी देनी पड़ती ? कुछ लोग यह कह सकते हैं कि विध्वंस के बावजूद भी यदि पाकिस्तान एक राष्ट्र ही बना रहता तो कालांतर में पूर्व पाकिस्तानियों का फायदा ही होता. परन्तु विकास के आंकड़े कुछ और ही कहते हैं. लन्दन स्थित लेगाटुम इंस्टीट्यूट द्वारा ११० देशों के लिए बनायी गयी २०१० की समृद्धि तालिका में बांग्लादेश का स्थान ९६ हैं, जबकि पाकिस्तान १०९ वें स्थान पर है. यह तालिका शासन प्रणाली, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, निजी स्वतंत्रता, एवम् सामाजिक पूंजी के आधार पर बनायी गयी है. इस हिसाब से तो पूर्व की जनता को स्वतंत्रता से लाभ ही हुआ है. यूं.एन.ओ. के १८२ राष्ट्रों के मानवीय विकास सूचकांक में पाकिस्तान का स्थान १४१ है, जो बांग्लादेश के १४६ से कुछ ही ऊपर है. तात्पर्य यह कि यदि बांग्लादेशी पाकिस्तान में ही रहते तो उनका अधिक फायदा न होता.
इसके अलावा, आंकड़े पूरी कहानी नहीं बताते हैं. बांग्लादेश गरीब अवश्य है, परन्तु अधिक सुखी एवम् आशावादी है. वहां, पाकिस्तान के मुकाबले कहीं बेहतर तरीके से संस्कृति पनप रही है, शिक्षा में सुधार हो रहा है, तथा जनसँख्या नियंत्रण प्रयत्न कारगर हो रहे हैं. वहां न तो आत्मघाती बमबारी हो रही है है, न ही सरकारी संस्थानों एवम् सेना पर दैनिक प्रहार.
बम ने पाकिस्तान को क्या फायदा पहुँचाया है? यह कहना बिलकुल गलत होगा कि यदि पाकिस्तान के पास बम न होता तो भारत उसको निगल जाता. भारत तो अपनी ही समस्याओं से जूझ रहा है. आर्थिक रूप से उन्नतिशील होने के बावजूद वह अपनी वर्तमान १.२ बिलियन जनसँख्या (जिसमें से लगभग ५०% बहुत गरीब है) को नियंत्रित करने में प्रयत्नशील है. वह किसी भी हालत में और १८० मिलियन लोगों का भरण पोषण करने में समर्थ नहीं है. और, यदि भूल से वह ऐसा करना भी चाहे तो एक असममित युद्ध के द्वारा जीत असंभव ही है. अमेरिका द्वारा ईराक और अफगानिस्तान में, तथा भारत द्वारा कश्मीर में झेली जा रही मुसीबतें इस बात को साफ़ कर देती हैं.
बम ने पाकिस्तान को क्या फायदा पहुँचाया है? यह कहना बिलकुल गलत होगा कि यदि पाकिस्तान के पास बम न होता तो भारत उसको निगल जाता. भारत तो अपनी ही समस्याओं से जूझ रहा है. आर्थिक रूप से उन्नतिशील होने के बावजूद वह अपनी वर्तमान १.२ बिलियन जनसँख्या (जिसमें से लगभग ५०% बहुत गरीब है) को नियंत्रित करने में प्रयत्नशील है. वह किसी भी हालत में और १८० मिलियन लोगों का भरण पोषण करने में समर्थ नहीं है. और, यदि भूल से वह ऐसा करना भी चाहे तो एक असममित युद्ध के द्वारा जीत असंभव ही है. अमेरिका द्वारा ईराक और अफगानिस्तान में, तथा भारत द्वारा कश्मीर में झेली जा रही मुसीबतें इस बात को साफ़ कर देती हैं.
यह सच है कि १९९८ के बाद तीन बार बम ने ही भारत को पाकिस्तान पर दंडात्मक हमले करने से रोका. १९९९ में पाकिस्तान की कारगिल घुसपैठ के बाद, उसी साल १३ दिसंबर को भारतीय संसद में हमले के बाद, तथा २००८ में लश्करे तैबा द्वारा मुंबई हमले के बाद, भारतीय जनता द्वारा इस प्रकार की क्रोधित मांगें करी गयीं कि भारत को पाकिस्तान स्थित मिलिटेंट ग्रुप्स के कैम्पों पर आक्रमण करना चाहिए. परन्तु यह समस्या केवल इसलिए है क्योंकि बम का इस्तेमाल इन आक्रमणकारी दलों की रक्षा के लिए किया गया है. अपनी इसी आणविक छतरी के कारण पाकिस्तान उन सभी लोगों के लिए एक चुम्बकीय आकर्षण रखता है जो इस्लाम के नाम पर युद्ध करते हैं. यहाँ तक कि वो ओसामा बिन लादेन का भी अंतिम सुरक्षा स्थल बना. पाकिस्तान भी धीरे धीरे वही कष्टपूर्ण पाठ पढ़ रहा है जो सोवियत यूनियन और साउथ अफ्रीका की गोरी सरकार पहले ही सीख चुकी है-- बम किसी भी देश कि जनता को सुरक्षा नहीं प्रदान कर सकता. बल्कि बम के कारण ही आज पाकिस्तान ऐसी मुसीबतज़दा हालत मैं है.
२८ मई को ही पाकिस्तान ने परमाणु बम का विस्फोट किया था. हमें यह दिन उत्सव के रूप में न मना कर इस मुसीबत को ख़त्म करने का प्रण करना चाहिए. बम बनाने एवम् उसकी यश गाथा गाने से कहीं अच्छा होगा अगर हम एक चिरस्थायी और सक्रीय लोकतंत्र का निर्माण करें, हमारी अर्थ व्यवस्था शान्ति न कि युद्ध को बढ़ावा दे, हमारी प्रादेशिक समस्याओं का निवारण हो, एक ऐसे सहनशील समाज की स्थापना हो जहाँ विधि शासन का आदर तथा सामंतवादी व्यवस्था का अन्त हो.
डा. परवेज़ हूदभौय
(लेखक नाभिकीय भौतिकी के प्रोफ़ेसर हैं एवम् इस्लामाबाद और लाहौर में पढ़ाते हैं)
चर्नोबिल दिवस: भारत अपना परमाणु कार्यक्रम बंद करे और खुली जांच करे
चर्नोबिल दिवस: २६ अप्रैल
शांति एवं विकास के लिये भारतीय चिकित्सक संघ के अध्यक्ष और विश्व स्वास्थ्य संगठन के अंतर्राष्ट्रीय पुरुस्कार विजेता प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त और मग्सेसे पुरुस्कार विजेता डॉ संदीप पाण्डेय इस परिचर्चा के मुख्य वक्ता थे.
अखिल भारतीय सर्जनों के संघ के नव-निर्वाचित अध्यक्ष प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने कहा कि "परमाणु रेडियोधर्मिता से कैंसर, विशेषकर खून का कैंसर, आनुवांशिक परिवर्तन, आदि हो जाता है. क्या हमारी चिकित्सकीय व्यवस्था परमाणु आपात स्थिति से निबटने के लिये तैयार है?".
डॉ संदीप पाण्डेय ने कहा कि "जापान में हुई परमाणु आपात स्थिति के बाद तो इस बात पर किसी संदेह का प्रश्न ही नहीं उठता है कि दुनिया में सभी परमाणु कार्यक्रमों को, चाहे वो सैन्य या उर्जा के लिये हों, उनको जितनी जल्दी संभव हो उतनी जल्दी बंद करना होगा."
डॉ संदीप पाण्डेय ने कहा कि "पर्यावरण के लिए लाभकारी तरीकों से उर्जा बनाने के बजाय भारत परमाणु जैसे अत्यंत खतरनाक और नुकसानदायक ऊर्जा उत्पन्न करने के तरीकों को अपना रहा है. विकसित देशों में परमाणु ऊर्जा एक असफल प्रयास रहा है. विश्व में अभी तक परमाणु कचरे को नष्ट करने का सुरक्षित विकल्प नही मिल पाया है, और यह एक बड़ा कारण है कि विकसित देशों में परमाणु ऊर्जा के प्रोजेक्ट ठंडे पड़े हुए हैं. भारत सरकार क्यों भारत-अमरीका परमाणु समझौते को इतनी अति-विशिष्ठ प्राथमिकता दे रही है और इरान-पाकिस्तान-भारत तक की गैस पाइपलाइन को नकार रही है, यह समझ के बाहर है."
डॉ संदीप पाण्डेय ने कहा कि "किसी भी देश क लिए ऊर्जा सुरक्षा के मायने यह हैं कि वर्तमान और भविष्य की ऊर्जा आवश्यकता की पूर्ति इस तरीके से हो कि सभी लोग ऊर्जा से लाभान्वित हो सकें, पर्यावरण पर कोई कु-प्रभाव न पड़े, और यह तरीका स्थायी हो, न कि लघुकालीन. इस तरह की ऊर्जा नीति अनेकों वैकल्पिक ऊर्जा का मिश्रण हो सकती है जैसे कि, सूर्य ऊर्जा, पवन ऊर्जा, छोटे पानी के बाँध आदि, गोबर गैस इत्यादि."
परमाणु दुर्घटनाओं की त्रासदी संभवत: कई पीढ़ियों को झेलनी पड़ती है जैसे कि भोपाल गैस काण्ड और हिरोशिमा नागासाकी त्रसिदियों को लोगों ने इतने बरस तक झेला. हमारी मांग है कि भारत बिना-देरी शांति के प्रति सच्ची आस्था का परिचय दे और सभी परमाणु कार्यक्रमों को बंद करे.
बाबी रमाकांत - सी.एन.एस.
[English] [फोटो] आज २६ अप्रैल २०११ को चर्नोबिल परमाणु दुर्घटना हुए २५ साल हो गए हैं. चर्नोबिल दिवस के उपलक्ष्य में आज, जहांगीराबाद मीडिया इंस्टीटयूट, जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय, आशा परिवार और नागरिकों का स्वस्थ लखनऊ अभियान ने वृत्तचित्र प्रदर्शनी एवं परिचर्चा आयोजित की.
शांति एवं विकास के लिये भारतीय चिकित्सक संघ के अध्यक्ष और विश्व स्वास्थ्य संगठन के अंतर्राष्ट्रीय पुरुस्कार विजेता प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त और मग्सेसे पुरुस्कार विजेता डॉ संदीप पाण्डेय इस परिचर्चा के मुख्य वक्ता थे.
अखिल भारतीय सर्जनों के संघ के नव-निर्वाचित अध्यक्ष प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने कहा कि "परमाणु रेडियोधर्मिता से कैंसर, विशेषकर खून का कैंसर, आनुवांशिक परिवर्तन, आदि हो जाता है. क्या हमारी चिकित्सकीय व्यवस्था परमाणु आपात स्थिति से निबटने के लिये तैयार है?".
डॉ संदीप पाण्डेय ने कहा कि "जापान में हुई परमाणु आपात स्थिति के बाद तो इस बात पर किसी संदेह का प्रश्न ही नहीं उठता है कि दुनिया में सभी परमाणु कार्यक्रमों को, चाहे वो सैन्य या उर्जा के लिये हों, उनको जितनी जल्दी संभव हो उतनी जल्दी बंद करना होगा."
डॉ संदीप पाण्डेय ने कहा कि "पर्यावरण के लिए लाभकारी तरीकों से उर्जा बनाने के बजाय भारत परमाणु जैसे अत्यंत खतरनाक और नुकसानदायक ऊर्जा उत्पन्न करने के तरीकों को अपना रहा है. विकसित देशों में परमाणु ऊर्जा एक असफल प्रयास रहा है. विश्व में अभी तक परमाणु कचरे को नष्ट करने का सुरक्षित विकल्प नही मिल पाया है, और यह एक बड़ा कारण है कि विकसित देशों में परमाणु ऊर्जा के प्रोजेक्ट ठंडे पड़े हुए हैं. भारत सरकार क्यों भारत-अमरीका परमाणु समझौते को इतनी अति-विशिष्ठ प्राथमिकता दे रही है और इरान-पाकिस्तान-भारत तक की गैस पाइपलाइन को नकार रही है, यह समझ के बाहर है."
डॉ संदीप पाण्डेय ने कहा कि "किसी भी देश क लिए ऊर्जा सुरक्षा के मायने यह हैं कि वर्तमान और भविष्य की ऊर्जा आवश्यकता की पूर्ति इस तरीके से हो कि सभी लोग ऊर्जा से लाभान्वित हो सकें, पर्यावरण पर कोई कु-प्रभाव न पड़े, और यह तरीका स्थायी हो, न कि लघुकालीन. इस तरह की ऊर्जा नीति अनेकों वैकल्पिक ऊर्जा का मिश्रण हो सकती है जैसे कि, सूर्य ऊर्जा, पवन ऊर्जा, छोटे पानी के बाँध आदि, गोबर गैस इत्यादि."
परमाणु दुर्घटनाओं की त्रासदी संभवत: कई पीढ़ियों को झेलनी पड़ती है जैसे कि भोपाल गैस काण्ड और हिरोशिमा नागासाकी त्रसिदियों को लोगों ने इतने बरस तक झेला. हमारी मांग है कि भारत बिना-देरी शांति के प्रति सच्ची आस्था का परिचय दे और सभी परमाणु कार्यक्रमों को बंद करे.
बाबी रमाकांत - सी.एन.एस.
नागरिकों की मांग: भारत परमाणु कार्यक्रम बंद हो
लोगों में जापान में हुई परमाणु त्रासदी पर संवेदना जगाने, जापान के लोगों के साथ सहानुभूति व्यक्त करने, और भारत के परमाणु कार्यक्रम को बंद करने के लिये लखनऊ में आज पी.एम.टी कॉलेज, हजरतगंज में परिचर्चा और परिवर्तन चौक पर मोमबत्ती प्रदर्शन आयोजित किया गया.
जापान में हुई परमाणु आपात स्थिति के बाद तो इस बात पर किसी संदेह का प्रश्न ही नहीं उठता है कि दुनिया में सभी परमाणु कार्यक्रमों को, चाहे वो सैन्य या उर्जा के लिये हों, उनको जितनी जल्दी संभव हो उतनी जल्दी बंद करना होगा. इन परमाणु ऊर्जा-घरों में दुर्घटनाओं और सैन्य हमले (हिरोशिमा-नागासाकी पर अटम बम) की वजह से मानवजाति ने सिर्फ अपूर्व, भयानक और अदम्य त्रासदी ही देखी है, जिसको असंख्य प्रभावित लोगों ने सदियों तक झेला है. यह तो स्पष्ट है कि परमाणु शक्ति चाहे वो ऊर्जा बनाने में लगे अथवा बम, यह सबसे खतरनाक विकल्प है. इसमें कोई शक नहीं कि समय रहते बिना विलम्ब दुनिया में परमाणु निशस्त्रीकरण हो जाना चाहिए जिससे कि 'सुरक्षा', 'ऊर्जा पूर्ति' या 'तकनीकि विकास' के नाम पर भयावही परमाणु हादसे मानवजाति को अब और न झेलने पड़ें.
हमारी मांग है कि भारत-अमरीका परमाणु समझौता और अन्य परमाणु कार्यक्रमों को भी मानवता और विश्व शान्ति के लिये तुरंत बंद किया जाए.
हिरोशिमा और नागासाकी पर हुए अटम बम हमले, जो इतिहास के सबसे वीभत्स त्रासदी रहे हैं, के ६५ साल के बाद भी जिस देश ने इन हमलों को अंजाम दिया था, आज तक उस देश अमरीका ने माफ़ी नहीं मांगी है. जिस उत्साह के साथ भारत, भारत-अमरीका परमाणु समझौते को लागू कर रहा है, यह अत्यंत चिंता का विषय है.
पर्यावरण के लिए लाभकारी तरीकों से उर्जा बनाने के बजाय भारत परमाणु जैसे अत्यंत खतरनाक और नुकसानदायक ऊर्जा उत्पन्न करने के तरीकों को अपना रहा है. विकसित देशों में परमाणु ऊर्जा एक असफल प्रयास रहा है. विश्व में अभी तक परमाणु कचरे को नष्ट करने का सुरक्षित विकल्प नही मिल पाया है, और यह एक बड़ा कारण है कि विकसित देशों में परमाणु ऊर्जा के प्रोजेक्ट ठंडे पड़े हुए हैं. भारत सरकार क्यों भारत-अमरीका परमाणु समझौते को इतनी अति-विशिष्ठ प्राथमिकता दे रही है और इरान-पाकिस्तान-भारत तक की गैस पाइपलाइन को नकार रही है, यह समझ के बाहर है.
किसी भी देश क लिए ऊर्जा सुरक्षा के मायने यह हैं कि वर्तमान और भविष्य की ऊर्जा आवश्यकता की पूर्ति इस तरीके से हो कि सभी लोग ऊर्जा से लाभान्वित हो सकें, पर्यावरण पर कोई कु-प्रभाव न पड़े, और यह तरीका स्थायी हो, न कि लघुकालीन. इस तरह की ऊर्जा नीति अनेकों वैकल्पिक ऊर्जा का मिश्रण हो सकती है जैसे कि, सूर्य ऊर्जा, पवन ऊर्जा, छोटे पानी के बाँध आदि, गोबर गैस इत्यादि.
जापान ने कभी भी परमाणु बम नहीं बनाया पर परमाणु शक्ति का ऊर्जा के लिये इस्तेमाल किया था. परमाणु ऊर्जा भी कितनी खतरनाक हो सकती है यह जापान में हुए परमाणु आपात स्थिति से आँका जा सकता है. भारत में न केवल अनेकों परमाणु ऊर्जा-घर हैं बल्कि परमाणु बम भी है - और दुनिया में सबसे अधिक संख्या में गरीब लोग हैं. न केवल परमाणु शक्ति अत्यंत खतरनाक विकल्प है, भारत जैसे देशों के लिये परमाणु शक्ति में निवेश करना, लोगों की मूल-भूत आवश्यकताओं को नज़रंदाज़ करके 'सुरक्षा', 'ऊर्जा' के नाम पर ऐसा समझौता करने जैसा है जिसके कारणवश लोग कई गुना अधिक मार झेल रहे हैं.
भारत में शायद ही कोई ऐसा परमाणु ऊर्जा घर हो जहां कोई न कोई दुर्घटना न हुई हो. जिन स्थानों पर भारत में परमाणु कचरे को डाला जाता है, जहां परमाणु ऊर्जा घर लगे हुए हैं, जहां परमाणु खान हैं, आदि, वहाँ पर रहने वाली आबादी रेडियोधर्मिता का भीषण कुप्रभाव झेल रही है. उदाहरण के तौर पर कुछ महीने पहले ही कईगा परमाणु केंद्र में ५० से अधिक लोग रेडियोधर्मी त्रिशियम का प्रकोप झेले थे.
परमाणु दुर्घटनाओं की त्रासदी संभवत: कई पीढ़ियों को झेलनी पड़ती है जैसे कि भोपाल गैस काण्ड और हिरोशिमा नागासाकी त्रसिदियों को लोगों ने इतने बरस तक झेला. हमारी मांग है कि भारत बिना-देरी शांति के प्रति सच्ची आस्था का परिचय दे और सभी परमाणु कार्यक्रमों को बंद करे.
[एस.आर.दारापुरी, अरुंधती धुरु, रंजित भार्गव, प्रो० रंजित भार्गव, प्रो० एम.सी.पन्त, प्रो० रमा कान्त, डॉ० संदीप पाण्डेय, आनंद त्रिपाठी, एवं अन्य नागरिक]
परमाणु निशस्त्रीकरण और शांति के लिये गठबंधन, शांति एवं लोकतंत्र के लिये लखनऊ चिकित्सकों का समूह, जन-आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय, आशा परिवार एवं लोक राजनीति मंच के संयुक्त तत्वावधान मे आयोजित
भारत-पाकिस्तान शांति कारवाँ २०१० - अमन के बढ़ते क़दम
२००५ में दिल्ली से मुल्तान तक पदयात्रा के बाद अब समय आ गया है कि शांति कारवाँ को पुन: कायम किया जाए. इस भारत-पाकिस्तान शांति कारवाँ का कार्यक्रम अभी तय नहीं हुआ है, और इस बात पर संवाद जारी है. संभवत: यह कारवाँ जुलाई २०१० के अंतिम सप्ताह से ले कर अगस्त २०१० के प्रथम सप्ताह तक आयोजित किया जा सकता है.
इस भारत-पाकिस्तान शांति कारवाँ के लिए संस्थानिक अनुमोदन आमंत्रित हैं.
जो लोग इस भारत पाकिस्तान शांति कारवाँ में हिस्सा लेना चाहें, कृपया कर के अपना पासपोर्ट विवरण और अन्य आवश्यक जानकारी सईदा दीप, पाकिस्तान (saeedadiep@yahoo.com) और राजेश्वर ओझा, भारत (rajeshwar.ojha@gmail.com) को भेजें:
नाम (जैसा कि पासपोर्ट में है):
पिता का नाम:
पासपोर्ट नंबर:
राष्ट्रीयता:
जन्म-तिथि:
पासपोर्ट किस जगह से जारी हुआ:
पासपोर्ट जारी करने की तारीख:
पासपोर्ट की समापन अवधि:
भारत एवं पाकिस्तान के अलावा अन्य देशों के नागरिक भी इस कारवाँ में हिस्सा लेने के लिए आमंत्रित है. अधिक जानकारी के लिए कृपया करके ई-ग्रुप के सदस्य बने. सदस्य बनने के लिए, ई -मेल भेजिए: indopakpeacecaravan-subscribe@yahoogroups.com or send email to: bobbyramakant@yahoo.com
डॉ संदीप पाण्डेय
(समन्वयक: जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय)
-----------------------
भारत-पाकिस्तान शांति कारवाँ - अमन के बढ़ते क़दम
शायद ऐसा दुनिया में कहीं भी नहीं होगा जैसा कि भारत एवं पाकिस्तान में है, कि लोग भावनात्मक रूप से इतनी घनिष्ठता से जुड़े हुए हैं. परन्तु उनपर भी दुश्मनी और वैमनस्य का जहर उडेला जा रहा है. इतिहास का वह एक क्रूर मोड़ था जब राजनीतिक बंटवारा हुआ, जिसकी वजह से खून-खराबा हुआ और असंख्य लोगों की जानें गयीं. इन हादसों ने गहरे घाव दिए हैं और दोनों देशों के चैतन्य में ये जख्म अभी भी हरे हैं.
बंटवारे के बाद भारत पाकिस्तान के अशांत इतिहास में चार युद्ध हुए और अनगिनत मासूमों की जानें गयीं. भारत-पाकिस्तान संबंधों में कश्मीर आज भी एक नाजुक रग़ बना हुआ है जो दोनों देशों को स्व: विनाश की ओर ले जाने के खतरे का कारण भी है. दक्षिण एशिया में जो कट्टरपंथी वर्ग हैं वो ये सुनिश्चित करते हैं कि नफरत और वैरभाव की आग धधकती रहे और दोनों ओर जान-माल का भारी नुक्सान होता रहे.
दोनों ओर के आम लोग, जो हिंसा और वैरभाव के शिकार होते हैं, वे वास्तव में अमन, चैन और शांति चाहते हैं - उनका मत है कि दोनों ओर मैत्री और सामान्य संबंधों का माहौल बने. परन्तु दोनों देशों का जो कुलीन शासक वर्ग है वह एक दूसरे के प्रति शंका का भाव रखता है. परन्तु जब भी भारत पाकिस्तान के लोग आपस में मिलते हैं, तो ये सब दुर्भावनाएं विलिप्त हो जाती हैं और मुहब्बत, आपसी लगाव और सदभावना उमड़ती है - बिलकुल उसी तरह जैसे एक परिवार के लोग बरसों बिछड़ने के बाद आपस में मिल रहे हों. ऐतिहासिक कारणों की वजह से भौगोलिक सरहदें हमपर अवश्य थोपी गयी हैं, परन्तु दोनों देशों में लोगों के एक जैसे ही रीति-रिवाज़ और परम्पराएँ हैं, हमारी भाषा, संगीत, खान-पान, और जीवनशैली तक एक जैसी ही है - जिसके कारण नि:संदेह हो कर ये कहा जा सकता है कि दोनों ओर लोगों के मूल्य और चिंतन एक सा ही है. लोगों को सरहदों ने बांटा तो है, पर उनके दिल एक ही हैं.
हम लोगों का मानना है कि यदि दोनों देशों के मध्य सही अर्थों में शांति और दोस्ती कायम करनी है तो पहल लोगों को ही करनी होगी. अनेकों ऐसे प्रयास पिछले बरसों में हुए हैं जिनमें से भारत-पाकिस्तान (दिल्ली से मुल्तान तक) पदयात्रा २००५ एक है. सूफी संतों और कवियों ने प्रेम गीत गए थे जो आज भी दोनों देशों के लोगों के लिए प्रासंगिक हैं. इसी आपसी लगन और बंधुत्व के तारतम्य को मद्देनज़र रखते हुए २००५ दिल्ली-से-मुल्तान तक की पदयात्रा दिल्ली-स्थित सूफी संत हज़रत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह से आरंभ हुई और मुल्तान-स्थित संत बहाउद्दीन ज़कारिया की दरगाह पर समाप्त हुई थी. इस पदयात्रा ने दोनों देशों के शहरों, गाँव आदि से निकलते हुए प्रेम, शांति और बंधुत्व का सन्देश दिया. इसी के उपरांत अगस्त २००५ में दिल्ली में प्रथम परमाणु-रहित, वीसा-रहित दक्षिण एशिया सम्मलेन हुआ और दूसरा परमाणु-रहित, वीसा-रहित दक्षिण एशिया सम्मलेन २००७ में लाहोर में संपन्न हुआ. इस सम्मलेन को वार्षिक करने के प्रयासों को अनेकों अडचनों ने खंडित किया है, जिनमें से सबसे बड़ी चुनौती है दोनों देशों में व्याप्त वीसा प्रणाली.
जमीनी स्तर पर अनेकों ऐसी पहलों का होना अनिवार्य है जिससे कि दोनों देशों की सरकारों की सोच बदले. जो समस्याएँ दोनों देशों के लोग झेल रहे हैं वो सामान्य हैं - जैसे कि - गरीबी, बेरोज़गारी, वैश्वीकरण और आर्थिक उदारीकरण की नीतियों की मार, स्वास्थ्य एवं शिक्षा से जुड़े हुए संगीन मुद्दे, आदि.
दोनों देशों के बीच व्यापार और वाणिज्य के लिए रुकावटों को क्रमिक रूप से ढीला करना और अंतत: हटाना, आम लोगों का सरहद पार आने-जाने में बढ़ोतरी करना, आदि जैसे कदम नि:संदेह शांति प्रक्रिया को तेज़ी से आगे बढ़ाएंगे. आर्थिक रूप से मजबूत भारत एवं पाकिस्तान ही संपूर्ण दक्षिण एशिया के लिये शांति और समृद्धि का युग ला सकते हैं . लेन-देन एवं आपसी सहयोग से, कट्टर राष्ट्रवाद के बजाय दोस्ती एवं शांति के माहौल से ही दोनों देश विकास एवं उन्नति के मार्ग पर अग्रसर होंगे.
बीते हुए दो सालों में दोनों सरकारों ने शान्ति की ओर कदम बढ़ाए हैं, परन्तु ये प्रयास शिथिल, धीमे, और रुक-रुक के हुए हैं. दोनों देश की सरकारों को आम शांति-प्रिय लोगों की आवाज़ को सुनाने के लिए ही हम सब एक और पहल करने के लिए प्रोत्साहित हुए हैं - "भारत-पाकिस्तान शांति कारवाँ - अमन के बढ़ते क़दम" - जो मुंबई से कराची तक आयोजित किया जायेगा. इस शांति कारवाँ के जरिये, दोनों देशों के आम लोगों को अपनी शांति एवं दोस्ती की बात रखने का अवसर मिलेगा और ऐसा माहौल बनाने में मदद मिलेगी जिसमें दोनों देशों की सरकारों को वाजिब आवाजों पर ध्यान देने के लिए प्रेरित किया जाए.
इस शांति कारवाँ के माध्यम से, हम लोगों से निम्नलिखत बिंदुओं पर सहयोग की अपेक्षा करते हैं:
१. सरहद के आर-पार लोगों के आने-जाने को आसान बनाया जाए. वर्तमान में सरहद के आर-पार आने-जाने पर अनेकों प्रकार के व्यवधान हैं - जिनमें से कुछ तो हास्यास्पद हैं. हम लोग चाहेंगे कि इन व्यवधानों को हटाया जाए, क्योंकि सरहद के आर पार लोगों के बीच प्रगाढ़ लगाव है. लोगों के बीच भावनात्मक जुडाव है - जो दोनों देशों की सरकारों के बीच व्याप्त नफरत और शंका के ठीक विपरीत है! दोनों देशों की सरकारों को लोगों की इच्छाओं एवं अरमानों को अनसुना नहीं करना चाहिए, और लोगों को बिना रोकटोक के आने-जाने और मिलने-जुलने के लिए छूट मिलनी चाहिए. असल में तो वीसा-पासपोर्ट प्रणाली को हटाना चाहिए.
२. आम लोगों की भावना का आदर करते हुए भारत-पाकिस्तान को बिना-शर्त दोस्ती कायम करनी चाहिए और सभी मुद्दों को बात-चीत से सुलझाना चाहिए जिससे कि अमन का वातावरण कायम हो सके. भारत-पाकिस्तान के मध्य सारे संगीन मुद्दों को शांति वार्ता के जरिये ही सुलझाना चाहिए. इन मुद्दों में कश्मीर का मुद्दा भी शामिल है (जिसका हल हमारी राय में जम्मू एवं कश्मीर के लोगों को शामिल करके ही ढूँढा जा सकता है), और आतंक-सम्बंधित गतिविधियाँ भी जिसके शिकार दोनों देश के लोग होते रहे हैं.
३. भारत एवं पाकिस्तान को अपने-अपने परमाणु कारखानों को जल्दी-से-जल्दी दुष्क्रियाशील करना चाहिए. दोनों देशों को बारूदी सुरंगों को नष्ट करना चाहिए और फौजों को वापस बैरकों में भेज देना चाहिए. हमारा मानना है कि दोनों देशों को अपने बहुमूल्य संसाधनों को रक्षा-बजट के नाम पर व्यर्थ गंवाना बंद करना चाहिए और इन संसाधनों से गरीबी हटाने में व्यय करना चाहिए. जो लोग इस शांति कारवाँ का हिस्सा हैं उनका मानना है कि सच्ची सुरक्षा हथियारों के ढेर इकठ्ठे करने से नहीं आती बल्कि सच्ची सुरक्षा आपसी विश्वास और भरोसे पर स्थापित संबंधों से ही आती है. हकीकत यह है कि परमाणु बम एवं बारूदी सुरंगों से 'दुश्मन' को क्षति पहुँचने के बजाय अपने ही लोगों को कहीं अधिक नुक्सान पहुँच रहा है, इसलिए यह कहना अनुचित नहीं होगा की ये हथियार जन-विरोधी हैं.
४. दोनों देशों के बीच लुका-छुपी और लघु-तीव्रता वाला युद्ध समाप्त हो और दोनों देशों की गुप्तचर संस्थाएं पर रोक लगे, ताकि सरहद के पार अशांति उत्पन्न न हो.
शांति और विकास सिर्फ विश्वास और आपसी सद्भावना वाले वातावरण में ही संभव है - इस शांति कारवाँ का यह स्पष्ट सन्देश है. हम भलीभांति जानते हैं कि हमारे लक्ष्य सिर्फ इस प्रयास से नहीं हासिल हो सकते. हम यह भी मानते हैं कि दोनों देशों के लोगों द्वारा किये जा रहे अनेकों शांति प्रयासों में यह शांति कारवाँ एक है. आइये हम सब एकजुट हो कर इस शांति प्रक्रिया को निरंतर बढ़ाते रहे जिससे कि न केवल भारत-पाकिस्तान के मध्य बल्कि संपूर्ण दक्षिण एशिया में भी आपसी विश्वास, सद्भावना और शांति का वातावरण बना रहे.
इस भारत-पाकिस्तान शांति कारवाँ के लिए संस्थानिक अनुमोदन आमंत्रित हैं.
जो लोग इस भारत पाकिस्तान शांति कारवाँ में हिस्सा लेना चाहें, कृपया कर के अपना पासपोर्ट विवरण और अन्य आवश्यक जानकारी सईदा दीप, पाकिस्तान (saeedadiep@yahoo.com) और राजेश्वर ओझा, भारत (rajeshwar.ojha@gmail.com) को भेजें:
नाम (जैसा कि पासपोर्ट में है):
पिता का नाम:
पासपोर्ट नंबर:
राष्ट्रीयता:
जन्म-तिथि:
पासपोर्ट किस जगह से जारी हुआ:
पासपोर्ट जारी करने की तारीख:
पासपोर्ट की समापन अवधि:
भारत एवं पाकिस्तान के अलावा अन्य देशों के नागरिक भी इस कारवाँ में हिस्सा लेने के लिए आमंत्रित है. अधिक जानकारी के लिए कृपया करके ई-ग्रुप के सदस्य बने. सदस्य बनने के लिए, ई -मेल भेजिए: indopakpeacecaravan-subscribe@yahoogroups.com or send email to: bobbyramakant@yahoo.com
डॉ संदीप पाण्डेय
(समन्वयक: जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय)
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भारत-पाकिस्तान शांति कारवाँ - अमन के बढ़ते क़दम
शायद ऐसा दुनिया में कहीं भी नहीं होगा जैसा कि भारत एवं पाकिस्तान में है, कि लोग भावनात्मक रूप से इतनी घनिष्ठता से जुड़े हुए हैं. परन्तु उनपर भी दुश्मनी और वैमनस्य का जहर उडेला जा रहा है. इतिहास का वह एक क्रूर मोड़ था जब राजनीतिक बंटवारा हुआ, जिसकी वजह से खून-खराबा हुआ और असंख्य लोगों की जानें गयीं. इन हादसों ने गहरे घाव दिए हैं और दोनों देशों के चैतन्य में ये जख्म अभी भी हरे हैं.
बंटवारे के बाद भारत पाकिस्तान के अशांत इतिहास में चार युद्ध हुए और अनगिनत मासूमों की जानें गयीं. भारत-पाकिस्तान संबंधों में कश्मीर आज भी एक नाजुक रग़ बना हुआ है जो दोनों देशों को स्व: विनाश की ओर ले जाने के खतरे का कारण भी है. दक्षिण एशिया में जो कट्टरपंथी वर्ग हैं वो ये सुनिश्चित करते हैं कि नफरत और वैरभाव की आग धधकती रहे और दोनों ओर जान-माल का भारी नुक्सान होता रहे.
दोनों ओर के आम लोग, जो हिंसा और वैरभाव के शिकार होते हैं, वे वास्तव में अमन, चैन और शांति चाहते हैं - उनका मत है कि दोनों ओर मैत्री और सामान्य संबंधों का माहौल बने. परन्तु दोनों देशों का जो कुलीन शासक वर्ग है वह एक दूसरे के प्रति शंका का भाव रखता है. परन्तु जब भी भारत पाकिस्तान के लोग आपस में मिलते हैं, तो ये सब दुर्भावनाएं विलिप्त हो जाती हैं और मुहब्बत, आपसी लगाव और सदभावना उमड़ती है - बिलकुल उसी तरह जैसे एक परिवार के लोग बरसों बिछड़ने के बाद आपस में मिल रहे हों. ऐतिहासिक कारणों की वजह से भौगोलिक सरहदें हमपर अवश्य थोपी गयी हैं, परन्तु दोनों देशों में लोगों के एक जैसे ही रीति-रिवाज़ और परम्पराएँ हैं, हमारी भाषा, संगीत, खान-पान, और जीवनशैली तक एक जैसी ही है - जिसके कारण नि:संदेह हो कर ये कहा जा सकता है कि दोनों ओर लोगों के मूल्य और चिंतन एक सा ही है. लोगों को सरहदों ने बांटा तो है, पर उनके दिल एक ही हैं.
हम लोगों का मानना है कि यदि दोनों देशों के मध्य सही अर्थों में शांति और दोस्ती कायम करनी है तो पहल लोगों को ही करनी होगी. अनेकों ऐसे प्रयास पिछले बरसों में हुए हैं जिनमें से भारत-पाकिस्तान (दिल्ली से मुल्तान तक) पदयात्रा २००५ एक है. सूफी संतों और कवियों ने प्रेम गीत गए थे जो आज भी दोनों देशों के लोगों के लिए प्रासंगिक हैं. इसी आपसी लगन और बंधुत्व के तारतम्य को मद्देनज़र रखते हुए २००५ दिल्ली-से-मुल्तान तक की पदयात्रा दिल्ली-स्थित सूफी संत हज़रत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह से आरंभ हुई और मुल्तान-स्थित संत बहाउद्दीन ज़कारिया की दरगाह पर समाप्त हुई थी. इस पदयात्रा ने दोनों देशों के शहरों, गाँव आदि से निकलते हुए प्रेम, शांति और बंधुत्व का सन्देश दिया. इसी के उपरांत अगस्त २००५ में दिल्ली में प्रथम परमाणु-रहित, वीसा-रहित दक्षिण एशिया सम्मलेन हुआ और दूसरा परमाणु-रहित, वीसा-रहित दक्षिण एशिया सम्मलेन २००७ में लाहोर में संपन्न हुआ. इस सम्मलेन को वार्षिक करने के प्रयासों को अनेकों अडचनों ने खंडित किया है, जिनमें से सबसे बड़ी चुनौती है दोनों देशों में व्याप्त वीसा प्रणाली.
जमीनी स्तर पर अनेकों ऐसी पहलों का होना अनिवार्य है जिससे कि दोनों देशों की सरकारों की सोच बदले. जो समस्याएँ दोनों देशों के लोग झेल रहे हैं वो सामान्य हैं - जैसे कि - गरीबी, बेरोज़गारी, वैश्वीकरण और आर्थिक उदारीकरण की नीतियों की मार, स्वास्थ्य एवं शिक्षा से जुड़े हुए संगीन मुद्दे, आदि.
दोनों देशों के बीच व्यापार और वाणिज्य के लिए रुकावटों को क्रमिक रूप से ढीला करना और अंतत: हटाना, आम लोगों का सरहद पार आने-जाने में बढ़ोतरी करना, आदि जैसे कदम नि:संदेह शांति प्रक्रिया को तेज़ी से आगे बढ़ाएंगे. आर्थिक रूप से मजबूत भारत एवं पाकिस्तान ही संपूर्ण दक्षिण एशिया के लिये शांति और समृद्धि का युग ला सकते हैं . लेन-देन एवं आपसी सहयोग से, कट्टर राष्ट्रवाद के बजाय दोस्ती एवं शांति के माहौल से ही दोनों देश विकास एवं उन्नति के मार्ग पर अग्रसर होंगे.
बीते हुए दो सालों में दोनों सरकारों ने शान्ति की ओर कदम बढ़ाए हैं, परन्तु ये प्रयास शिथिल, धीमे, और रुक-रुक के हुए हैं. दोनों देश की सरकारों को आम शांति-प्रिय लोगों की आवाज़ को सुनाने के लिए ही हम सब एक और पहल करने के लिए प्रोत्साहित हुए हैं - "भारत-पाकिस्तान शांति कारवाँ - अमन के बढ़ते क़दम" - जो मुंबई से कराची तक आयोजित किया जायेगा. इस शांति कारवाँ के जरिये, दोनों देशों के आम लोगों को अपनी शांति एवं दोस्ती की बात रखने का अवसर मिलेगा और ऐसा माहौल बनाने में मदद मिलेगी जिसमें दोनों देशों की सरकारों को वाजिब आवाजों पर ध्यान देने के लिए प्रेरित किया जाए.
इस शांति कारवाँ के माध्यम से, हम लोगों से निम्नलिखत बिंदुओं पर सहयोग की अपेक्षा करते हैं:
१. सरहद के आर-पार लोगों के आने-जाने को आसान बनाया जाए. वर्तमान में सरहद के आर-पार आने-जाने पर अनेकों प्रकार के व्यवधान हैं - जिनमें से कुछ तो हास्यास्पद हैं. हम लोग चाहेंगे कि इन व्यवधानों को हटाया जाए, क्योंकि सरहद के आर पार लोगों के बीच प्रगाढ़ लगाव है. लोगों के बीच भावनात्मक जुडाव है - जो दोनों देशों की सरकारों के बीच व्याप्त नफरत और शंका के ठीक विपरीत है! दोनों देशों की सरकारों को लोगों की इच्छाओं एवं अरमानों को अनसुना नहीं करना चाहिए, और लोगों को बिना रोकटोक के आने-जाने और मिलने-जुलने के लिए छूट मिलनी चाहिए. असल में तो वीसा-पासपोर्ट प्रणाली को हटाना चाहिए.
२. आम लोगों की भावना का आदर करते हुए भारत-पाकिस्तान को बिना-शर्त दोस्ती कायम करनी चाहिए और सभी मुद्दों को बात-चीत से सुलझाना चाहिए जिससे कि अमन का वातावरण कायम हो सके. भारत-पाकिस्तान के मध्य सारे संगीन मुद्दों को शांति वार्ता के जरिये ही सुलझाना चाहिए. इन मुद्दों में कश्मीर का मुद्दा भी शामिल है (जिसका हल हमारी राय में जम्मू एवं कश्मीर के लोगों को शामिल करके ही ढूँढा जा सकता है), और आतंक-सम्बंधित गतिविधियाँ भी जिसके शिकार दोनों देश के लोग होते रहे हैं.
३. भारत एवं पाकिस्तान को अपने-अपने परमाणु कारखानों को जल्दी-से-जल्दी दुष्क्रियाशील करना चाहिए. दोनों देशों को बारूदी सुरंगों को नष्ट करना चाहिए और फौजों को वापस बैरकों में भेज देना चाहिए. हमारा मानना है कि दोनों देशों को अपने बहुमूल्य संसाधनों को रक्षा-बजट के नाम पर व्यर्थ गंवाना बंद करना चाहिए और इन संसाधनों से गरीबी हटाने में व्यय करना चाहिए. जो लोग इस शांति कारवाँ का हिस्सा हैं उनका मानना है कि सच्ची सुरक्षा हथियारों के ढेर इकठ्ठे करने से नहीं आती बल्कि सच्ची सुरक्षा आपसी विश्वास और भरोसे पर स्थापित संबंधों से ही आती है. हकीकत यह है कि परमाणु बम एवं बारूदी सुरंगों से 'दुश्मन' को क्षति पहुँचने के बजाय अपने ही लोगों को कहीं अधिक नुक्सान पहुँच रहा है, इसलिए यह कहना अनुचित नहीं होगा की ये हथियार जन-विरोधी हैं.
४. दोनों देशों के बीच लुका-छुपी और लघु-तीव्रता वाला युद्ध समाप्त हो और दोनों देशों की गुप्तचर संस्थाएं पर रोक लगे, ताकि सरहद के पार अशांति उत्पन्न न हो.
शांति और विकास सिर्फ विश्वास और आपसी सद्भावना वाले वातावरण में ही संभव है - इस शांति कारवाँ का यह स्पष्ट सन्देश है. हम भलीभांति जानते हैं कि हमारे लक्ष्य सिर्फ इस प्रयास से नहीं हासिल हो सकते. हम यह भी मानते हैं कि दोनों देशों के लोगों द्वारा किये जा रहे अनेकों शांति प्रयासों में यह शांति कारवाँ एक है. आइये हम सब एकजुट हो कर इस शांति प्रक्रिया को निरंतर बढ़ाते रहे जिससे कि न केवल भारत-पाकिस्तान के मध्य बल्कि संपूर्ण दक्षिण एशिया में भी आपसी विश्वास, सद्भावना और शांति का वातावरण बना रहे.
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