एमडीआर-टीबी: एक नई महामारी

डॉ सूर्य कान्त
जैसा की हम सभी जानते हैं कि टी0बी0 सदियों से मानव जाति के लिए एक अभिशाप की तरह रही है। जहाँ तक चिकित्सा इतिहास की नजर जाती है वहाँ तक टी0बी0 के प्रमाण मौजूद हैं और शायद टी0बी0 आज तक पता लगी बीमारियों में सबसे पुरानी है। वेदों में भी टी0बी0 के प्रमाण मोजूद हैं जिनमें इसे ‘‘राज्यक्षमा’अर्थात शरीर को गलाने वाला कहा गया है। चरक संहिता में भी इसे ‘‘यक्षमा’कहा गया है। इसे ‘‘कैप्टन आफ मैन आफ डेथ’कहा जाता है। पहले टी0बी0 का कोई कारगर इलाज नही था। उस समय अच्छे खानपान व शुद्ध वातावरण के सहारे इसका इलाज करने का प्रयास किया जाता था । परन्तु जैसे-जैसे अधुनिक दवाईयों का अविष्कार हुआ इसका इलाज सम्भव माना जाने लगा।

सबसे पहले सन् 1944 में ‘स्टेप्टोमाइसिन’व उसके उपरान्त ‘आइसोनियाजाइड’ (1952) के ईजाद होने के उपरान्त धीरे-धीरे और अच्छी दवाईयाँ उपलब्ध होती गयी और एक समय ऐसा आया जब ये समझा जाने लगा कि टी0बी0 का इलाज पूर्णतया किया जा सकता है परन्तु टी0बी0 के कीटणु में दवाईयों के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता पैदा करने का गुण होता है। जिसके कारण ड्रग रेजिस्टेन्ट टी0बी0 का फैलाव शुरु हुआ।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार विश्व की जनसंख्या के एकचौथाई लोग टी0बी0 के बैक्टीरिया से ग्रसित हैं व दस में से एक व्यक्ति जो टी0बी0 बैक्टीरिया से ग्रसित है आपने जीवन काल में टी0बी0 की बीमारी से ग्रस्त हो जाता है। सन् 2012 की विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट में 9.5 मिलियन नए टी0बी0 के रोगी उत्पन्न हुए और जिनमें से भारत में 2 मिलियन टी0बी0 जीवाणु से ग्रसित मरीज हैं।

ड्रग रजिस्टेन्ट टी0बी0 के आने से स्थिति और भी विकट हो गयी। 100 में से 5 प्रतिशत टी0बी0 के रोगी एम0डी0आर0 टी0बी0 से ग्रसित हैं। 100 देशों में किए गए सर्वेक्षण के अनुसार 5 लाख नए एम0डी0आर0 टी0बी0 के मरीज पैदा हुए उनमें से 27 देश 85 प्रतिशत एम0डी0आर0टी0बी0 अपने में समेटे हुए हैं। विश्व के 5 देश जिनमें सर्वाधिक एम0डी0आर0 टी0बी0 के मरीज हैं उनमें भारत, चीन, रूस, साउथ अफ्रीका एवं बांगला देश हैं। रिवाइज्ड नेशनल ट्यूबरकुलोसिस कन्ट्रोल प्रोग्राम (आर0एन0टी0सी0पी0) की 2012 की रिपोर्ट में अब तक 64000 नए एम0डी0आर0 टी0बी0 के मरीज अपने देश में हैं। भारत सबसे ज्यादा एम0डी0आर0 टी0बी0 के मरीज रखने के कारण शीर्षस्थ है।

ड्रग रजिस्टेन्ट टी0बी0 मानव के द्वारा स्वतः बनाई हुयी परेशानी है। यदि टी0बी0 का सही इलाज व सही समय तक पूरा इलाज किया जाए तो ड्रग रजिस्टेन्श से बचा जा सकता है। ड्रग रजिस्टेन्ट टी0बी0 के  होने के मुख्य कारण हैं -

1. सही दवाईयों का इस्तेमाल न होना व गलत दवाईयों का लम्बे समय तक उपयोग।
2. दवाईयों का प्रयोग यदि अनियमित तरीके से किया जाये।
3. दवाईयाँ मरीज के शारीरिक वजन के मुताबिक न होकर कम मात्रा में चलाई गयी हों।
4. सही समय तक पूरा कोर्स न किया गया हो।
5. खराब गुणवत्ता वाली टी0बी0 की दवाईयों का उपयोग करना।

ड्रग रजिस्टेन्ट टी0बी0 कई तरह की होती है-
1. मोनो ड्रग रजिस्टेन्ट - टी0बी0 की उपलब्ध सभी दवाईयों में से किसी एक दवा से प्रतिरोधक क्षमता का होना।
2. मल्टी ड्रग रजिस्टेन्ट - टी0बी0 की 2 मुख्य दवाईयाँ जिन्हें क्रमशः ‘‘रिफेम्पसिन’व ‘‘आइसोनियाजाइड’कहते हैं। इन दोनों से एक साथ रजिस्टेन्ट होना।
3. पॉली ड्रग रजिस्टेन्ट - ‘‘रिफेम्पसिन’व ‘‘आइसोनियाजाइड’से एक साथ रजिस्टेन्ट न होकर टी0बी0 की किन्हीं 2 या 2 से अधिक दवाईयों से रजिस्टेन्ट होना।
4. एक्स0डी0आर0 टी0बी0 - ’’एम0डी0आर0 टी0बी0 के साथ-साथ टी0बी0 की अन्य दवाओं उदाहरण के लिए इंजेक्शन (केनामाइसिन, एमिकासिन या केपरियोमाइसिन) तथा क्वीनो लोन दवाइयों (जैसे सिप्रोफ्लाकसेसिन, ओफ्लाकसेसिन या लिवोफ्लाकसेसिन) से भी रजिस्टेन्ट होना।
5. टी0डी0आर0 टी0बी0 - जिसमें टी0बी0 सभी उपलब्ध दवाओं के प्रति रजिस्टेन्ट हो जाता है।

हम ड्रग रजिस्टेन्स से निम्न प्रकार से बच सकते हैं-
1. लोगों में जगरुकता वा ज्ञान पैदा करके ।
2. सही प्रकार की टी0बी0 का सही इलाज व सही दवाईयाँ देकर ।
3. मरीजों को दवा सही प्रकार से खाने की हिदायत देकर।
4. पूरा कोर्स सही प्रकार से करके ।
5. सही दवाईयों का प्रयोग उचित रूप से प्रशिक्षित चिकित्सक के द्वारा कराकर।

साधारण टी0बी0 व ड्रग रजिस्टेन्ट टी0बी0 के इलाज में काफी फर्क होता है। टी0बी0 की सबसे अच्छी दवाईयाँ ‘फर्स्ट लाइन ड्रग्स’आर्थत् प्रारम्भिक दवाईयाँ होती हैं। साधारण टी0बी0 के इलाज में 4 मुख्य दवाओं का प्रयोग सामान्यतया 6 महीने के लिए किया जाता है। जिन मरीजों ने पहले इलाज लिया है व उन्हें उनसे जयादा फायदा नहीं हुआ या दोबारा टी0बी0 होगयी है उन्हें एक इंजेक्शन व 4 दवाईयों के प्रयोग से 8 से 9 महीने के इलाज के द्वारा ठीक किया जा सकता है। परन्तु यदि टी0बी0 ड्रग रजिस्टेन्ट प्रकार की है तो इलाज में दवाईयों की संख्या बढ़ानी पड़ती है, दवाईयाँ और ज्यादा साईडइफेक्ट वाली होती हैं व इलाज की समय सीमा भी बढ़ानी पड़ती है।

अभी एम0डी0आर0 टी0बी0 का इलाज करीब 2 साल का होता है जिसमें करीबन 6 से 9 महीने तक इंजेक्शन रोजाना लगवाना पड़ता है। इन दवाईयों से मरीज को और भी ज्याद साइडइफेक्ट का सामना करना पड़ता है। व इलाज भी काफी मँहगा पड़ता है। अतः बचाव ही बेहतर है।

डा0 सूर्य कान्त, सिटिज़न न्यूज़ सर्विस - सीएनएस
(लेखक, किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के सर्जरी विभाग के प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष हैं और इंडियन चेस्ट सोसाइटी के उत्तरी इकाई के अध्यक्ष हैं)

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