जलवायु- परिवर्तन का कृषि पर प्रभाव


जलवायु- परिवर्तन का कृषि पर प्रभाव

पिछले एक दशक में उत्तर प्रदेश ने विभिन्न प्रकार के जलवायु परिवर्तन देखे हैं। जब पूर्वी उत्तर प्रदेश भयंकर बाढ़ की चपेट में था ठीक उसी समय बुंदेलखंड सूखे की मार झेल रहा था। इस जलवायु परिवर्तन के द्वारा न केवल भारी संख्या में लोग मौत का शिकार हो रहे हैं बल्कि इससे उनकी आजीविका पर भी गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। पूर्वी- उत्तर प्रदेश में जहाँ धान की सारी फसल बरबाद हो गयी वहीं बुंदेलखंड में स्थानीय फसलों पर भी गहरा प्रभाव पड़ा है।

कई सारे शोधों और वैज्ञानिकों का मानना है कि उत्तर-प्रदेश गंभीर जलवायु परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है, जिसका काफी बुरा असर वहाँ के निवासियों पर पड़ सकता है। वर्ष २००१ की जनगणना के अनुसार उत्तर प्रदेश की ६२.१२ प्रतिशत जनसँख्या कृषि कार्य से सम्बंधित गतिविधियों में संलिप्त है। उत्तर प्रदेश देश का तीसरा सबसे बड़ा अनाज उत्पादक प्रदेश है। तथा प्रत्येक वर्ष देश के पूरे उत्पादन में करीब २१ प्रतिशत योगदान देता है। उत्तर प्रदेश की जनसँख्या को जितने अनाज की आवश्यकता प्रत्येक वर्ष होती है उससे कहीं ज्यादा अनाज उत्पादन यह प्रदेश हर साल करता है, किंतु मौसम में परिवर्तन की वजह से पिछले कई वर्षों में अनाज उत्पादन में भी परिवर्तन दृष्टिगत हुआ है।

तापमान में सामान्य वृद्धि की वजह से गेंहूँ की फसल का उत्पादन कम हो सकता है। जबकि धान कम तापमान में भी आसानी से उत्पन्न हो सकता है। यद्यपि सरकार तथा विभिन्न गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा वातावरण में हो रहे इस परिवर्तन को रोकने हेतु प्रयास किए गए हें, किंतु ये प्रयास किसानों को तुंरत राहत प्रदान करने वाले ज्यादा रहे हैं , न कि एक स्थाई लाभ देने वाले । इस सम्बन्ध में गोरखपुर एनवायरमेंटल एक्शन ग्रुप के अध्यक्ष प्रोफेसर डाक्टर शीराज वजीह का कहना है, ' वातावरण में हो रहे इस परिवर्तन की प्रतिकूलता को रोकने हेतु सरकार के साथ-साथ जन- समुदायों को भी स्वदेशी तकनीकी ज्ञान के माध्यम से वैज्ञानिक विधियों को अपनाना चाहिए ।'

ये स्वदेशी ज्ञान स्थानीय स्तर पर आसानी से उपलब्ध रहते हैं तथा इन्हें अपनाने में ज्यादा आर्थिक सहायता की भी जरूरत नहीं पड़ती। गोरखपुर एनवायरमेंटल एक्शन ग्रुप द्वारा प्रकाशित एक शोध के मुताबिक उत्तर प्रदेश में करीब ९० प्रतिशत किसान लघु-और सीमान्त दर्जे के हैं जिनकी आजीविका का साधन केवल कृषि है। इन छोटे जोत के कृषकों द्वारा ही प्रदेश को कृषि में महत्वपूर्ण दर्जा प्राप्त है। यदि ये लघु-और सीमान्त कृषक, वातावरण में हो रहे परिवर्तन का इसी प्रकार शिकार होते रहे तो इससे प्रदेश की आजीविका के लिये एक बड़ी विपत्ति खड़ी हो सकती है।

वातावरण में हो रहे इन परिवर्तनों के अनेक कारण हें । हम निजी स्वार्थों के लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर रहे हैं। नए आर्थिक ज़ोन के नाम पर कृषि योग्य भूमी का औद्योगीकरण किया जा रहा है। सरकार के नीतिगत फैसले कंपनियों के हित में ज्यादा होते हैं। इन सब बातों पर यदि हम गंभीरता पूर्वक नहीं सोचेंगे तो खाद्यान उत्पादन की समस्या गरीबों को और भी गरीबी की तरफ़ धकेलेगी। किसान आत्महत्याओं का दौर और भी बढेगा।

अमित द्विवेदी

लेखक सिटिज़न न्यूज़ सर्विस के विशेष संवाददाता हैं।

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