मेरी चीन यात्रा

(फैज जमाल द्वारा अंग्रेजी में लिखे गए लेख का शोभा शुक्ला द्वारा हिंदी अनुवाद)

18 जून 2010 की उस सुहानी सुबह को में किस तरह भूल सकता हूँ। में अपनी पहली विदेश यात्रा शुरू करने के लिए हौंग कांग हवाई अडडे पर खड़ा था। अप्रवास की औपचारिकताएं पूरी करने के बाद में एक पब्लिक फोन बूथ की तरफ बढ़ा। मुझे शेन जेन निवासी अलेक्स से बात करनी थी, जिसे मेरे परम मित्र शुन मियां ने वहां मेरी अगवानी के लिए प्रयुक्त किया था। शुन मियाँ से मैं एक साल पहले मिला था। दिल्ली के हिन्दू कालेज में वह मेरे फिलोसोफी आनर्स क्लास का सहपाठी था। हम लोग शीघ्र ही अभिन्न मित्र बन गए थे। दशहरे की छुट्टियों में, मैं उसके गाइड और दुभाषिये के रूप में उसके साथ बनारस, सारनाथ, कोलकाता, पटना, बोध गया और लखनऊ घूमा। उसने मुझसे वायदा किया कि जब कभी भी मैं चीन आऊँगा तो वो भी मेरी मेजबानी करेगा। यह प्रस्ताव वाकई में आकर्षक था, और पहला मौका मिलते ही मैंने इसका लाभ उठाने का निश्चय हैं ।

हांग कांग हवाई अडडे से मैंने अलेक्स को फोन करने की कई बार नाकामयाब कोशिश की। पर फोन था कि लग ही नहीं रहा था और मेरा पर्स भी इस कोशिश में हल्का हो रहा था। मेरी इस परेशानी को वहां खड़ी एक काली महिला ने शायद भाँप लिया। उसने अपना मोबाइल फोन मेरी तरफ बढ़ा दिया। मैंने वाकई राहत की सांस ली, उस अनजान महिला का तहेदिल से शुक्रिया अदा किया और अलेक्स से बात करने में सफल हो गया। बात चीत के दौरान उस महिला ने बताया कि वो एक मेक्सिकन एयर लाइन में काम करती है। मुझे नौसिखिया जान कर उसने मुझे कुछ हिदायतें भी दीं। मसलन कि मुझे अपना पर्स सामने वाली जेब में रखना चाहिए, तथा सावधान रह कर यात्रा करनी चाहिए, क्योंकि काले लोगों के लिए यह दुनिया बहुत बेदर्द है। शायद यह सच उसकी भी आपबीती थी।

मैं बस द्वारा शयूंग शुई पहुँच गया, जो हौंग कांग की ईस्ट रेल लाइन का एक रेलवे स्टेशन था तथा एअरपोर्ट से एक घंटे की दूरी पर था। सुबह की ठंडी हवा और ऊँची अट्टालिकाओं के पीछे पहाड़ियों के अदभुत नजारे ने मन को खुशी भर दिया। शयूंग शुई से मुझे हौंग कांग और चीन की सीमा पर स्थित लो वू नामक स्थान पर पहुँचने के लिए दूसरी ट्रेन पकड़नी थी। चीन से आने जाने वाले यात्रियों के लिए लो वू काफी प्रचलित इमिग्रेशन कंट्रोल पाइंट है। अलेक्स ने मुझे बताया था कि शयूंग शुई से लो वू अगला स्टेशन है तथा वहां पहुँचने में मुझे केवल 6 मिनट का समय लगेगा। परन्तु मैं शायद गलत ट्रेन में बैठ गया था। जब मैं ट्रेन से उतरा तो वो तो कोई और ही स्टेशन निकला। मैं दुबारा जल्दी से उसी ट्रेन में, जो शयूंग शुई वापस जा रही थी, चढ़ गया। फिर सही ट्रेन में बैठ कर लो वू पहुंचा। वहां इमिग्रेशन चेकपोस्ट पर मेरे पासपोर्ट पर स्टैम्प लग गया, और लो वू पुल पार करके मैं मेनलैंड चाइना में शेन जौन पहुँच गया ।

शेन जौन वास्तव में चीन के उदारीकरण काल का ज्वलंत उदाहरण है। विगत में मछुआरों का जो एक छोटा सा गाँव था, वो चीन का प्रथम विशेष आर्थिक जौन बन कर आज दुनिया का एक तेज रफ्तार महानगर है। इसके विस्तार के वर्णन में कहा जाता है कि ‘प्रतिदिन एक गगनचुम्बी इमारत, और तीन दिनों में एक मुख्या मार्ग’, इस शहर में २०० मीटर से अधिक ऊँची १३ इमारतें हैं, जिनमे से शुन हिंग स्क्वैर विश्व भर में नवीं सबसे ऊँची इमारत हैं , यहाँ विश्व की बड़ी बड़ी हाई टेक कंपनियों के दफ्तर हैं, तथा अनेकों विदेशी आई. टी. कम्पनियां भी यहाँ से कारोबार करती हैं। यहाँ मुझे कई भारतीय भी दिखाई पड़े, जिनमें कुछ तो पर्यटक थे और कुछ व्यापारी लग रहे थे। एक गुजराती व्यापारी श्री शंकर ने तो मुझसे मेरे बिजनेस के बारे में भी पूछा, जब मैंने उन्हें बताया कि मैं तो केवल घूमने और नए-नए लोगों से मिलने के उददेश्य से आया हूँ तो वे बहुत प्रभावित हुए, उनके अनुसार इतनी कम उमर में अकेले घूमने के लिए बहुत साहस चाहिए ।

अलेक्स ने फोन पर मुझे बताया कि चे मिन नामक व्यक्ति मुझे स्टेशन से ले जायेगा। कुछ समय बाद मुझे एक चीनी व्यक्ति किसी को ढूँढता हुआ सा दिखाई दिया, मेरे पास आकर उसने मुझसे पहले तो मेरे भारतीय होने की पुष्टि की, फिर बताया कि वो शुन मियाँ का दोस्त है तथा मुझे लेने के लिए आया है। मेरी संतुष्टि के लिए उसने शुन मियाँ का नाम और फोन नंबर अपने मोबाइल पर दिखाया। चे मिन के साथ बुलेट ट्रेन में बैठ कर हम 147 किलोमीटर की यात्रा एक घंटे से भी कम समय में पूरी करके अपने गंतव्य पर पहुंचे। चे मिन को अंग्रेजी न के बराबर आती थी, पर मैं यह तो जान ही गया कि वो भी एक महीने के बाद मेरे और शुन मियाँ के साथ भारत आकर दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाला था।

स्टेशन से शुन मियाँ के घर तक पहुँचने में 2 घंटे लग गए। परन्तु शुन मियाँ तो नदारद थे, वे अपने होम टाउन गए हुए थे तथा 7 दिनों के बाद लौटने वाले थे। तब तक मुझे उनके बड़े भाई शुन हुआंग के साथ रहना था, जो बढ़िया अंग्रेजी जानते थे। हम सबने एक ढाबे में 700 युआन में भरपेट स्वादिष्ट कैंटोनिस स्टाइल सी फूड भोजन किया। अगली सुबह मैं प्रान्त की राजधानी इस शहर में घूमने निकला। मेरे गाइड शुन हुआंग थे। यह शहर पर्ल नदी (जो दक्षिण चाइना सी में जाकर मिलाती है) पर बसा हुआ एक मुख्य बंदरगाह है, मैंने कहीं पढ़ा था कि यह चीन का तीसरा सबसे घनी आबादी वाला शहर है, परन्तु सडकों पर ऐसी कोई भीड़ भाड़ नहीं थी, छुट्टी का दिन न होने पर भी सडकों पर बहुत कम यातायात था। दिल्ली के ट्रेफिक जामों से त्रसित होने के बाद यह मेरे लिए एक सुखद आश्चर्य था। सड़कें साफ सुथरी थीं। कहीं पर भी कोई कूड़ा करकट नजर नहीं आ रहा था। एक धनी महानगर होने के कारण आस पास के गाँवों से कई किसान यहाँ की फैक्टरियों में काम की तलाश में आते हैं, पर मुझे कोई भी शक्स मैले कुचैले कपड़े पहने नहीं दिखाई दिया, न ही कोई भिखारी या झुग्गी झोपड़ी दिखाई पड़े।

एक दिन के बाद शुन मियाँ अपनी माँ और एक चचेरी बहन के साथ वापस लौट आये। उनकी माँ को मैं बहुत पसंद आया, और वो मुझसे मिल कर बहुत खुश हुई। अगले 10 दिन मैंने इस हंसमुख और बातूनी महिला के साथ बहुत खुशगवार बिताये, वे खाना भी बहुत ही उमदा पकाती थीं, अंग्रेजी न जानते हुए भी वो लगातार मुझसे चीनी भाषा में बात करती थीं, और शुन मियाँ की बहन अनुवादक का काम करती थी। एक सच्चे पर्यटक की तरह मैं बरसाती और चिपचिपे मौसम की परवाह किये बगैर रोज नई-नई जगहों पर घूमने जाता। शुन मियाँ तो हमेशा अपने दोस्तों से घिरे रहते, क्योंकि वो दो साल बाद घर लौटे थे। एक दिन मैं उनके साथ उनके एक दोस्त के घर गया जो पुराने शहर की तंग गलियों के बीच था, जो मुझे चांदनी चौक की याद दिला रहीं थीं। परन्तु बिल्डिंग के मुख्य द्वार पर पहुँचते ही नजारा बदल गया। घरों के दरवाजों पर इलेक्ट्रोनिक स्मार्ट कार्ड वाले ताले थे जैसे बड़े बड़े होटलों में हुआ करते हैं। नागरिक रख रखाव भी बहुत बढ़िया था।

मैंने यह भी पाया कि अधिकतर लोगों का आर्थिक स्तर उच्च मध्यम वर्गी अथवा उच्च वर्गी तथा न तो कोई भिखारी नजर आया न ही कोई आडम्बरपूर्ण धनाडय- अधिकतर लोग सरकारी आवासों में किराए पर रहते हैं। मेरे दोस्त के भाई के पास 3 बेडरूम का बड़ा मकान था जिसका किराया 700 रुपये मासिक था। मुख्य मेहमानों को पिलाना अपने लघु कालिक चीन प्रवास में मैं चायनीज चाय एवं उसको पेश करने की रोचक प्रणाली से अत्यधिक प्रभावित हुआ। चीन में चाय पीना एवं मेहमानों को पिलाना एक ललित कला ही है। किसी भी होटल में जाने पर, पानी के बजाय, पारंपरिक ढंग से चाय पेश की जाती है। पर यह बिना ढूढ़ की चाय होती है, जो स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभप्रद है। इस चाय का इस्तेमाल, चीनी खाने में प्रयुक्त होने वाले बाउल और चौप स्टिक्स धोने के लिए भी किया जाता है। वहां की चायदानी का आकार हमारे यहाँ प्रयुक्त होने वाली शक्कर दानी से काफी मिलता जुलता है। खौलता हुआ पानी, चाय दानी में पड़ी चाय की पत्ती में डालने के लिए हमेशा तैयार मिलता है। चायदानी और हमारे यहाँ के मिटटी के कुल्लहड़ के आकार के छोटे प्याले एक विशेष प्रकार की लकड़ी की छिद्रित ट्रे में रख कर मेहमानों को परोसा जाता है। प्यालों को पहले ताजा तैयार हुई चाय से ही खंगाला जाता है। यह चाय ट्रे के छिद्र से बह कर, नीचे लगी हुई एक दूसरी ट्रे में एकत्रित करके फेंक दी जाती है। लकड़ी की ट्रे को कभी धोया नहीं जाता, क्योंकि चीन में यह मान्यता है कि जब उस लकड़ी में चाय की सुगंध आ जाती है तब वो बहुत शुभ हो जाती है। मेरे दोस्त ने मुझे भी, चाय पत्ती समेत, एक पारंपरिक टी सेट भेंट में दिया है, और मैं उस ट्रे के शुभ होने का इंतजार कर रहा हूँ ।

कभी कभी मैं केवल घर पर रह कर या तो कोई फिल्म देखता, या फिर शुन मियाँ की माँ से संकेत भाषा में बात करता। जब वो अपना हैण्ड बैग मेरे सामने लहरातीं तो मैं समझ जाता कि आज मुझे उनके साथ सब्जी और मछली खरीदने बाजार जाना है। सब्जी मंडी में भी वो मेरी पसंद पूछे बिना न रहती। ओ। के। शब्द का अर्थ वो समझती थीं- अधिकाँश चीनी बतख का गोश्त खाना पसंद करते हैं। परन्तु उन्हें पता था कि मुझे मुर्गी अधिक पसंद है। इसलिए वो मुर्गी और बतख दोने ही खरीदतीं ? इस प्रकार हम एक दूसरे की भाषा न जानते हुए भी मजे में सांकेतिक वार्तालाप का आनंद उठाते।

शुन मियाँ के दोस्तों, रिश्तेदारों और परिवार के सदस्यों से चाय के अनगिनत प्यालों के साथ बढ़िया गपशप होती। हमें एक दूसरे की संस्कृति एवं सामाजिक मूल्यों को जानने समझने के अनेक अवसर मिले। भारत-चीन के राजनैतिक सम्बन्ध भले ही बहुत अच्छे न रहे हों, पर चीन के नागरिकों का व्यवहार हम भारतीयों के प्रति बहुत ही सहृदय एवं सम्मानजनक है। वे हमारे यहाँ के स्वामित्व अधिकार ढाँचे को समझने के लिए काफी उत्सुक दिखे। वे हमारी टाटा कम्पनी से बहुत ही प्रभावित थे, क्योंकि यह कम्पनी स्टील, मोटर कार और दूर संचार जैसे विभिन्न क्षेत्रों से जुड़ी हुई हैं।

मुझे वहां एक और आश्चर्यजनक बात पता चली, पाश्चात्य देशों को भेजा जाने वाला चीनी सामान, भारत के बाजारों में बिकने वाले सस्ते और घटिया चीनी सामानों के मुकाबले कहीं अधिक उत्तम कोटि का होता है। यहाँ तक कि हमारे देश में बिकने वाले सस्ते चीनी मोबाइल फोन तो चीन में भी कहीं नहीं मिलते।

चीनवासियों के मन में भारतीय डॉक्टर द्वारकानाथ कोटनिस, (जो सन 1938 में दूसरे चीनी-जापानी युद्ध के दौरान चिकित्सीय सहायता प्रदान करने के लिए चीन भेजे गए थे) के प्रति बहुत श्रद्धा है। वे एक अच्छे डॉक्टर होने के साथ साथ चीन भारत के बीच मैत्री सम्बन्ध एवं सहकारी को बढ़ावा देने में भी अग्रणी थे। अपने पर्यटन के दौरान मैंने एक पहाड़ी पर अनेकों लाल झंडे एक डंडे से बंधे हुए देखे जो चीनियों द्वारा अपनी मन्नत पूरी हों एक लिए बांधे गए थे। एक ट्रांसमिशन टोंवर के नीचे मैंने कई ताले भी बंधे देखे, क्योंकि स्थानीय मान्यता के अनुसार अगर नव विवाहित जोड़ा वहा ताला लगाता है तो उसका वैवाहिक जीवन सुरक्षित और दुरुस्त रहता हैं।

मैंने पर्ल नदी और guangzhou शहर में स्थित सन यात सेन विश्वविद्यालय और प्राणी उद्यान के भी दर्शन किये, इसी शहर में सोलहवें एशियन गेम्स आगामी 12-27 नवम्बर को होने वाले हैं, जो दिल्ली में होने वाले कॉमनवेल्थ गेम्स के करीब एक महीने बाद होंगे परन्तु जहाँ हम अभी तक सड़के बनाने, मलबा हटाने, एक दूसरे पर दोषारोपण करने और बाकी तैयारियाँ पूरी करने में लगे हुए हैं, वही guangzhou शहर बहुत पहले से ही पूरे साजो सामान के साथ नवम्बर आने की प्रतीक्षा कर रहा है। प्रत्येक स्पर्धा स्थल और भवन नए अंदाज में चमक रहा है, और फूल पौधे खिलाडियों के स्वागत में प्रतीक्षारत हैं- गेम्स का प्रतीक चिन्ह शहर के मुख्य केंद्र पर प्रदर्शित किया जा चुका है, और उसके पास एक डिजिटल घड़ी भी लगी है जो गेम्स के भव्य आरम्भ में बचे हुए समय की सूचना निरंतर दे रही हैं।

मेरा चीन का 15 दिवसीय प्रवास वास्तव में अद्वितीय एवं अविस्मरणीय था। मुझे एक स्नेही परिवार के मध्य रहने का मौका मिला, और यह सुखद अनुभव मैं जीवन पर्यंत नहीं भूलूंगा। वहां रह कर मैंने चीनी रहन सहन को बहुत बारीकी से देखा और परखा- जिस प्रकार वहां आधुनिकता और परंपरा का समन्वय किया गया है वह वास्तव में अनुकरणीय है। भारत और चीन का लक्ष्य तो कदाचित एक ही है, जन साधारण का कल्याण एवं समृद्धि, परन्तु शायद हमारे रास्ते अलग अलग हैं।

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