आखिर हड़बड़ी किस बात की है?

पहले दिन से ही आप यह महसूस करा रही थी कि यह सरकार तो गिराने के लिए ही बनाई गई थी। अब गिरी-तब गिरी करते करते 49 दिन उन्होंने पूरे किये। रोज कोई न कोई ऐसी सनसनीखेज चीज करने की कोशिश की कि यह संदेश जाए कि सरकार बनने के बाद भी आप की क्रांतिकारिता में कोई कमी नहीं आई और जरूरत पड़ने पर सरकार में रहते हुए भी आंदोलन किया जाएगा। आप ने कई महत्वपूर्ण कार्य किए भी। कई स्थापित मानकों को तोड़ा। मुख्य मंत्री भी सड़क पर धरने पर बैठ सकता है यह अरविंद ने दिखाया।

आंदोलन में बड़ी पाटिर्यों के शीर्ष नेताओं पर निशाना साधा तो सरकार बना कर शीर्ष उद्योगपति मुकेश अंबानी के खिलाफ कार्यवाही की। यह बात सही है कि देश में और कोई मुख्य धारा का राजनीतिक दल ऐसा नहीं है जो अंबानी के खिलाफ कोई कार्यवाही करता। अंबानी का सरकारों-नौकरशाही में इतना दबदबा और दखलंदाजी है कि उसके खिलाफ भूमिका लेना आसान नहीं। यह अरविंद केजरीवाल ही हिम्मत कर सकते थे कि अंबानी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई और इसके लिए उनकी जितनी प्रशंसा की जाए कम है।

आत्मघाती कदम उठाते हुए और जनता को यह संदेश देते हुए कि जन लोकपाल बिल पारित करने के लिए वे अपनी सरकार कुर्बान कर रहे हैं अरविंद ने सत्ता त्याग दी। किंतु सवाल यह उठता है कि आखिर अरविंद केजरीवाल इतनी जल्दीबाजी क्यों कर रहे हैं? जब सदन में बहुमत उनके साथ नहीं था तो वे कैसे जन लोकपाल बिल पारित करा लेते? यह थोड़ी सी अव्यवहारिक बात लगती है।

रोज कोई न कोई सनसनीखेज मुद्दा उठाने के कारण उन्हें तसल्ली से शासन चलाने का मौका ही नहीं मिला। जन लोकपाल बने बिना भी बहुत सारा भ्रष्टाचार रोका जा सकता था। खास कर के आम इंसान की जिंदगी में रोज घटने वाले काफी भ्रष्टाचार पर तो तुरंत अंकुश लगाया जा सकता है। उदाहरण के लिए आम इंसान की दिलचस्पी की योजना है सार्वजनिक वितरण प्रणाली, यानी राशन की दुकान। क्या अरविंद केजरीवाल यह नहीं कर सकते थे कि राशन की दुकान पर होने वाले भ्रष्टाचार पर पूर्णतया रोक लगा देते। सबको ठीक से सही मात्रा व मूल्य पर राशन मिलने लगता। जिनके राशन कार्ड नहीं बने हैं उनके राशन कार्ड बन जाते। जिन अपात्र लोगों के गलत श्रेणी के कार्ड बने हैं उन्हें निरस्त कर सही लोगों के कार्ड बन जाते। यदि वे सिर्फ राशन की व्यवस्था को ही ठीक कर के दिखा देते तो आम इंसान को बड़ी राहत मिल जाती। याद रहे अरविंद ने दिल्ली की झुग्गी बस्तियों में अपना काम राशन व्यवस्था को सुधारने से ही शुरु किया था।

अब अंबानी के भ्रष्टाचार या ऊपरी स्तर के भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्यवाही तो बहुत जरुरी है क्योंकि इसने हमारे देश की व्यवस्था को पूंजीपतियों का गुलाम बना दिया है किंतु आम इंसान की जिंदगी पर इससे सीधे फर्क नहीं पड़ता। ऊपर के स्तर का भ्रष्टचार खत्म होगा तो शासन व्यवस्था जन पक्षीय बनेगी किंतु आम इंसान का पाला को नीचे की व्यवस्था से ज्यादा पड़ता है।

अरविंद केजरीवाल को यह सरकार कुछ दिन और चला कर दिखाना चाहिए था कि आदर्श तरीके से सरकार कैसे चलाई जा सकती है। सरकारी कार्यालयों में होने वाले रोजाना भ्रष्टाचार पर वे अंकुश लगा सकते थे। गरीबों के लिए जितनी कल्याणकारी योजनाएं हैं उन्हीं का पूरा-पूरा लाभ प्रत्येक पात्र गरीब को मिल जाता तो बहुत बड़ी उपलब्धी होती। मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा के अधिकार कानून को लागू करा देते तो प्रत्येक गरीब बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अवसर मिलता। सरकारी अस्पतालों की हालत सुधर जाती तो गरीब इंसान को मुफ्त या बहुत कम कीमत पर गुणवत्तापूर्ण इलाज की सुविधा मिल जाती। आप के साथ जो वर्ग ज्यादा जुड़ा है, यानी नवजवान, उनके रोजगार के लिए कोई ठोस कदम उठाते तो हजारों-लाखों नवजवानों-नवयुवतियों का भला होता और राष्ट्र के विकास में उनकी भागीदारी होती। लोगों की दिन-प्रतिदिन की शिकायतों के निपटारे की एक समयबद्ध निवारण व्यवस्था चला कर दिखाते तो आम इंसान के काम आसानी से होने लगते। आप के पास ऐसे कई लोग हैं जो आम इंसानों की दिन-प्रतिदिन की समस्या के रचनात्मक समाधान निकाल सकते थे। किंतु इसकी पहले कि कुछ लोगों की समस्याओं के समाधान की दिशा में कोई रचनात्मक पहल होती सरकार ही गिर गई। कभी ऐसा लगा भी नहीं कि सरकार गम्भीरता से लागों की समस्याओं को हल करने का कोई प्रयास भी कर रही है। हमेशा प्राथमिकता ज्यादा खबर बनने वाले मुददे ही रहे।

अब यह पूछा जाना चाहिए कि आप जो मुद्दे उठाती है क्या उन सभी पर जनता की राय ली जाती है? सरकार बनाते समय तो जनता की राय ली गई लेकिन यह प्रक्रिया अरविंद केजरीवाल के इस्तीफे के पहले भी क्यों नहीं अपनाई गई? या जो अन्य मुद्दे उठाए गए क्या वे जनता से पूछ कर उठाए गए? उदाहरण के लिए जनता से यह क्यों नहीं पूछा गया कि सोमनाथ भारती को इस्तीफा देना चाहिए अथवा नहीं? उनसे अपेक्षा भी नहीं की जाती कि हरेक मुद्दे पर जनता से पूछ कर ही निर्णय लेंगे लेकिन फिर इस बात को स्वीकार किया जाना चाहिए कि मुख्य रुप से पार्टी के निर्णय अरविंद केजरीवाल ही ले रहे हैं और वह भी केन्द्रीयकृत ढंग से। यह बात अलग है कि अब तक के उनके निर्णय ज्यादातर जन-पक्षीय ही रहे हैं। यदि कहीं थोड़ा सा वे भटके हैं तो जनता की पैनी नजर ने उन्हें वापस सही रास्ते पर ला दिया।

यदि कुछ दिन और वे सरकार चला कर कुछ रचनात्मक काम कर दिखाते तो जनता का भरोसा उनमें दृढ़ होता कि ये सिर्फ संघर्ष की राजनीति में ही माहिर नहीं हैं बल्कि जनता का काम करने वाली अच्छी सरकार भी चला सकते हैं। आम इंसान को सरकारी व्यवस्था से जो राहत की उम्मीद रहती है उसमें उन्होंने जनता को निराश किया।

ऐसा प्रतीत होता है कि जल्दी-जल्दी वे कुछ चीजें, जो उन्होंने पहले से ही मन में तय की हुईं थी, कर लेना चाहते थे ताकि उसका पार्टी को लोक सभा चुनाव में फायदा मिले। पर जनता यह कैसे मान ले कि जब आप दिल्ली की सरकार ठीक से नहीं चला पाई तो देश की सरकार चला लेगी?

डॉ संदीप पाण्डेय, सीएनएस स्तम्भ लेखक
फरवरी २०१४

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