सरकार द्वारा टीबी दवाओं के विक्रय को विधिवत नियंत्रित करना जन-हितैषी कदम

1 मार्च 2014 से भारत सरकार ने ड्रग्स एवं कॉस्मेटिक अधिनियम 1940 में संशोधन करके 46 ऐन्टीबाइओटिक दवाओं को, बिना चिकित्सकीय परामर्श के बेचने पर प्रतिबंध लगा दिया है। इन 46 ऐन्टीबाइओटिक दवाओं में टीबी की दवाएं भी शामिल हैं। टीबी नियंत्रण के लिए उत्तर प्रदेश राज्य टास्क फोर्स के अध्यक्ष एवं इंडियन चेस्ट सोसाइटी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ सूर्य कान्त का कहना है कि “सरकार इस जन हितैषी और जन-स्वास्थ्य हितैषी कदम के लिए बधाई का पात्र है। टीबी दवाओं की बे-रोकटोक बिक्री पर बहुत पहले ही प्रतिबंध लगना चाहिए था। अनियमित टीबी दवाएं लेने से दवा-प्रतिरोधक टीबी उत्पन्न हो सकती है इसलिए टीबी दवाओं के साथ-साथ 45 अन्य ऐन्टीबाइओटिक दवाओं को “शैड्यूल एच1” में शामिल करके, उनको बिना चिकित्सकीय परामर्श के बेचने पर रोक लगाने का यह कदम सराहनीय है”।

सरकारी गैजेट के अनुसार, दवा विक्रेता को टीबी दवाएं बेचने से पहले चिकित्सकीय परामर्श देखना है, उसकी एक प्रति भी रखनी है और अन्य जानकारी भी रेकॉर्ड करनी है जैसे कि रोगी का विवरण, चिकित्सक का नाम, आदि। इन दवाओं के डिब्बे या लेबल पर लाल रंग से यह चेतावनी लिखी होनी चाहिए जिसके उल्लंघन पर ड्रग्स एवं कॉस्मेटिक अधिनियम के तहत कानूनी कारवाई भी होने का प्रावधान है।

लखनऊ के जिला टीबी अधिकारी डॉ सुशील चतुर्वेदी ने बताया कि भारतीय टीबी कार्यक्रम हर रोगी को सेवाएँ देने की दिशा में बढ़ रहा है। वर्तमान में 1/3 टीबी रोगियों को पर्याप्त मानक के अनुसार सेवाएँ नहीं मिल पाती हैं। जब तक हर टीबी रोगी को सेवाएँ नहीं मिलेंगी टीबी नियंत्रण की चुनौती बनी रहेगी। यदि टीबी रोगी को इलाज न मिले तो हर साल 10-15 लोगों को वह टीबी रोग फैला सकता है, इसीलिए टीबी नियंत्रण सेवाओं का हर रोगी तक जल्द-से-जल्द पहुँचना जन स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

डॉ सूर्य कान्त जो किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के पलमोनरी मैडिसिन विभाग के प्रमुख भी हैं, उन्होने कहा कि भारत सरकार द्वारा पिछले 2 सालों में तेज़ी से दवा-प्रतिरोधक टीबी की रोकधाम के लिए उठाए गए कदम भी सराहनीय हैं। आज भारत के हर प्रदेश में अति-आधुनिक दवा-प्रतिरोधक टीबी जांच प्रयोगशाला है और दवाएं भी उपलब्ध हैं। डॉ सूर्य कान्त ने कहा कि सरकार को सख्ती के साथ सुनिश्चित करना चाहिए कि निजी चिकित्सक आदि टीबी दवाओं का अनुचित इस्तेमाल न कर रहे हों।

लखनऊ जिला टीबी अधिकारी डॉ सुशील चतुर्वेदी ने कहा कि भारत सरकार ने मई 2012 को टीबी “नोटीफ़ाईबिल” घोषित किया था – जिसका मतलब है कि हर निजी चिकित्सक को टीबी रोगी की सूचना टीबी अधिकारी को देना अनिवार्य है। सरकारी चिकित्सक पहले से ही हर टीबी रोगी की जानकारी विधिवत रपट करते हैं। डॉ चतुर्वेदी ने इस कानून को भी सख्ती से लागू करने की अपील की जिससे कि हर टीबी रोगी की जानकारी प्राप्त हो सके।

डॉ सूर्य कान्त ने बताया कि तंबाकू सेवन से भी टीबी होने का खतरा 2-3 गुना बढ़ता है। इसलिए आवश्यक है कि तंबाकू नशा उन्मूलन सेवाएँ और तंबाकू नियंत्रण जागरूकता कार्यक्रम प्रभावकारी ढंग से चलाये जाएँ। उसी तरह अनियंत्रित मधुमेह होने से टीबी होने का खतरा 2-3 गुना बढ़ जाता है। इसलिए जरूरी है कि टीबी और मधुमेह नियंत्रण कार्यक्रमों में तारतम्य बैठना जिससे कि वांछित जन स्वास्थ्य लाभ मिल सके।

सूरज की रौशनी से टीबी बैक्टीरिया मृत हो जाता है। सरकार को झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले गरीब लोगों को ऐसे निवास प्रदान करने चाहिए जो हवादार हों और सूरज की रौशनी घर के भीतर आए। डॉ सूर्य कान्त का मानना है कि इससे न केवल टीबी नियंत्रण बेहतर होगा बल्कि अनेक जन स्वास्थ्य लाभ मिलेंगे।

टीबी दवाओं को बिना-नागे पूरी अवधि लेना अत्यंत आवश्यक है। डॉ सूर्य कान्त का सुझाव है कि जिन लोगों ने टीबी रोग का इलाज सफलता पूर्वक पूरा किया है और अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं को मदद करनी चाहिए जिससे कि  हर टीबी रोगी अपना इलाज सफलतापूर्वक पूरा करे।

राहुल द्विवेदी, सिटिज़न न्यूज़ सर्विस - सीएनएस
मार्च 2014

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