एड्स कार्यक्रम में ढील से ख़तरे में पड़ेंगी अबतक की उपलब्धियाँ

(सीएनएस) नीदरलैड्स में सम्पन्न हुए 22वें अंतरराष्ट्रीय एड्स अधिवेशन (एड्स 2018) के एक सत्र की अध्यक्षता करते हुए डॉ ईश्वर गिलाडा ने कहा कि पिछले 15 सालों में एड्स कार्यक्रम ने उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल की हैं। भारत सरकार अन्य 194 देशों के साथ संयुक्त राष्ट्र महासभा 2015 में सतत विकास लक्ष्य हासिल करने का वादा भी कर चुकी है जिसमें 2030 तक  एड्स समाप्ति शामिल है (एड्स से मृत्यु दर और नए एचआईवी संक्रमण दर, दोनों शून्य हों; और सब एचआईवी पॉज़िटिव लोगों को एंटीरेट्रोवाइरल (एआरवी) दवा मिले और उनका वाइरल लोड नगण्य रहे)।


हर एचआईवी पॉजिटिव व्यक्ति को एआरवी दवा मिले 

डॉ गिलाडा ने बताया कि विश्व में 3.69 करोड़ एचआईवी पॉज़िटिव लोगों में से वर्तमान में 2.17 करोड़ को एंटीरेट्रोवाइरल (एआरवी) दवा मिल रही है। यदि एड्स समाप्ति का सपना पूरा करना है तो यह ज़रूरी है कि हर एचआईवी पॉज़िटिव व्यक्ति को एआरवी दवा मिले और उसका वाइरल लोड नगण्य रहे।

1986 में जब भारत में पहला एचआईवी संक्रमण पाया गया  था तो जिन चिकित्सकों ने आगे बढ़ कर सर्वप्रथम एड्स सम्बंधित चिकित्सकीय सेवा देना आरम्भ किया उनमें डॉ ईश्वर गिलाडा प्रमुख थे। डॉ ईश्वर गिलाडा वर्त्तमान में एड्स सोसाइटी ऑफ़ इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं (एचआईवी सम्बंधित चिकित्सकीय विशेषज्ञों का राष्ट्रीय नेटवर्क है एड्स सोसाइटी ऑफ़ इंडिया).

एचआईवी रोकथाम को आइना 

डॉ गिलाडा ने कहा कि एड्स समाप्ति के लिए जितना ज़रूरी हर एचआईवी पॉज़िटिव व्यक्ति तक पक्की जाँच और एंटीरेट्रोवाइरल दवा पहुँचाना है उतना ही ज़रूरी है कि एचआईवी को संक्रमित होने से रोकना। एचआईवी अभी भी नए लोगों को, नवजात शिशुओं को, संक्रमित हो रहा है जो हमारी एचआईवी रोकथाम को आइना दिखाता है। एचआईवी रोकथाम को अधिक प्राथमिकता देनी होगी जिससे कि वाइरस कोई भी नया व्यक्ति, जिनमें नवजात शिशु शामिल हैं, संक्रमित न हो। वैश्विक स्तर पर एचआईवी से संक्रमित नए लोगों के दर में सिर्फ़ 18% गिरावट आयी है: 2010 में 22 लाख नए लोग एचआईवी से संक्रमित हुए, और 2017 में 18 लाख नए लोग एचआईवी से संक्रमित हुए थे। यदि एड्स समाप्ति का स्वप्न पूरा करना है तो नए संक्रमण के दर को तेज़ी से शून्य की ओर गिरना चाहिए।

भारतीय जेनेरिक दवा निर्माताओं की अहम् भूमिका

डॉ ईश्वर गिलाडा ने कहा कि विश्व की सभी सरकारें 2030 तक एड्स समाप्ति का सपना इसलिए देख पा रही हैं क्योंकि भारतीय जेनेरिक दवा निर्माताओं ने एंटीरेट्रोवाइरल दवाओं की क़ीमत वैश्विक बाज़ार की क़ीमत से सिर्फ़ 1-3% कर दिया है जिसके कारणवश यह सम्भव हो पाया है कि सभी एचआईवी पॉज़िटिव लोगों को बिना विलम्ब सरकारें उचित दवाएँ दे सकें जिससे वह स्वस्थ रहें और उनसे किसी अन्य को एचआईवी संक्रमित न हो। आज दुनिया में जितनी एंटीरेट्रोवाइरल दवा की आवश्यकता है उसकी पूर्ति करने के लिए 92% भारत को श्रेय जाता है। 

वैश्विक एड्स कार्यक्रम एक नाज़ुक मोड़ पर  

एड्स 2018 के सत्र का संचालन करते हुए सीएनएस (सिटिज़न न्यूज़ सर्विस www.citizen-news.org) की महानिदेशक शोभा शुक्ला ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र के एड्स कार्यक्रम (UNAIDS) ने भी हाल ही में चेतावनी दी कि वर्तमान में वैश्विक एड्स कार्यक्रम एक नाज़ुक मोड़ पर है: क्योंकि एड्स समाप्ति के लक्ष्य को पूर्ण करने के लिए जितना काम ज़रूरी है, उतना काम नहीं हो रहा है।

इंटरनेशनल एड्स सुसाइटी (आईएएस) की संचालन समिति के सदस्य और जर्मनी के बॉन यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर (डॉ) जुरगेन रॉकस्ट्रोह ने कहा कि पूर्वी यूरोप और केंद्रीय ऐशिया में 2016 तक कुल अनुमानित एचआईवी पॉज़िटिव लोगों में से मात्र 28% को एंटीरेट्रोवाइरल दवा प्राप्त हो पा रही थी, जबकि पश्चमी और केंद्रीय यूरोप में 76% एचआईंवी पॉज़िटिव लोगों को दवा मिल रही है और वैश्विक स्तर पर 53% को! एड्स समापन के लिए ज़रूरी है कि हर एचआईवी पॉज़िटिव व्यक्ति को बिना विलम्ब एंटीरेट्रोवाइरल दवा मिले।

प्रोफ़ेसर (डॉ) जुरगेन रॉकस्ट्रोह ने कहा कि यह और भी ज़्यादा चिंताजनक है कि लगभग 50% लोग जो एचआईवी पॉज़िटिव मिलते हैं वो अत्यंत देर से चिन्हित होते हैं जिसके परिणामवश उन्हें जीवनरक्षक दवाएँ देर से मिलती हैं। यदि जीवनरक्षक दवाएँ देर से मिलेंगी तो पॉज़िटिव व्यक्ति के स्वास्थ्य को अधिक क्षति पहुँचती है और विकृति, अवसरवादी संक्रमण और मृत्यु दर, अधिक हो जाता है।

कुछ 'फ़ास्ट-ट्रैक' शहरों ने 90-90-90 के लक्ष्य को पूरा किया

अमरीका स्थित आईएपीएसी/ IAPAC (इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ़ प्रोवाइडर्स ऑफ़ एड्स केयर) के अध्यक्ष डॉ जोसे एम् ज़ुनिगा ने बताया कि संयुक्त राष्ट्र के एड्स कार्यक्रम (UNAIDS) का लक्ष्य है 2020 तक एचआईवी का 90:90:90 का लक्ष्य पूरा करना: 2020 तक 90% एचआईवी पॉजिटिव लोगों को यह पता हो कि वे एचआईवी पॉजिटिव हैं; जो लोग एचआईवी पॉजिटिव चिन्हित हुए हैं उनमें से कम-से-कम 90% को एंटीरेट्रोवायरल दवा (एआरटी) मिल रही हो; और जिन लोगों को एआरटी दवा मिल रही है उनमें से कम-से-कम 90% लोगों में ‘वायरल लोड’ नगण्य हो. उन्होंने कहा कि 250 फ़ास्ट ट्रैक शहर इन लक्ष्य की ओर सराहनीय प्रगति कर रहे हैं, और इनमें कुछ ऐसे शहर हैं जिन्होंने 90-90-90 का लक्ष्य पूरा भी कर लिया है - जो अन्य शहरों के लिए अनुकर्णीय मिसाल है.
प्रोफ़ेसर (डॉ) आर सज़ीथ कुमार

एड्स सुसाइटी ऑफ़ इंडिया के संचालन समिति के सदस्य और केरल में सर्वप्रथम एड्स सम्बंधित चिकित्सकीय देखरेख शुरू करने वालों में से एक, प्रोफ़ेसर (डॉ) आर सज़ीथ कुमार, के कहा कि भारत में लगभग 50% एचआईवी पॉज़िटिव लोगों की जाँच निजी स्वास्थ्य केंद्रों पर होती है हालाँकि एचआईवी पॉज़िटिव होने की पुष्टि होने के पश्चात अधिकांश लोग सरकारी एड्स कार्यक्रम से एंटीरेट्रोवाइरल दवा प्राप्त कर रहे हैं। प्रो० सज़ीथ कुमार ने कहा कि भारतीय स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में सरकारी और निजी दोनों सेवाएँ मिश्रित हैं और एड्स कार्यक्रम इसका सजीव उदाहरण है। उन्होंने बताया कि एड्स सुसाइटी ऑफ़ इंडिया के माध्यम से वाइरल लोड जाँच और दवा प्रतिरोधकता, दोनों से सम्बंधित शोध कार्य आगे बढ़ रहा है, जो एक महत्वपूर्ण योगदान है।

भारत सरकार के केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय में सह-महानिदेशक डॉ आरएस गुप्ता ने कहा कि यह आशावादी बात है कि भारत देश में एड्स मृत्यु दर और नए एचआईवी पॉज़िटिव लोगों के दर में गिरावट आयी है। परन्तु सभी एचआईवी पॉज़िटिव लोगों तक पहुँचना, विशेषकर कि उन लोगों तक पहुँचना जो सामाज के हाशिए पर हैं, एक बड़ी जटिल चुनौती है. राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति और संयुक्त राष्ट्र के 90-90-90 लक्ष्यों को पूरा करना तभी मुमकिन है जब एचआईवी सम्बंधित सेवाएँ सभी पॉजिटिव लोगों तक पहुंचे.


बॉबी रमाकांत, सीएनएस (सिटीजन न्यूज़ सर्विस)
1 अगस्त 2018

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