मधुमेह से ग्रसित लोगों में तपेदिक की संभावना अधिक है

मधुमेह से ग्रसित लोगों में तपेदिक की संभावना अधिक है

वैश्विक स्तर पर मधुमेह तथा तपेदिक से ग्रसित लोगों की संख्या में दिन प्रतिदिन बढ़ोतरी हो रही है। विश्व मधुमेह संघ की एक रिपोर्ट के मुताबिक पूरे विश्व में वर्ष २००७ में करीब २४६,000,000 लोग मधुमेह की बीमारी से ग्रसित थे, वहीँ ६० लाख नए मरीजों की पहचान की गयी, तथा ३५ लाख लोगों की मौत मधुमेह की बीमारी से हो गयी। वर्ष २००७ में ही विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से ‘ तपेदिक नियंत्रण अभियान’ के तहत कराये गए सर्वेक्षण के मुताबिक पूरे विश्व में करीब १ करोड़ ४४ लाख लोग तपेदिक या टी. बी. की बीमारी से ग्रसित थे तथा करीब ९२ लाख नए टी.बी. के मरीजों की पहचान की गई। वहीं १७ लाख लोगों की मौत टी.बी. की बीमारी से हो गई।

उपरोक्त आंकडों से यह पता चलता है कि यदि मधुमेह और तपेदिक की बीमारी पर नियंत्रण नहीं पाया गया तो विश्व की स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने नई चुनौती खड़ी हो सकती है। यह स्वरुप विकासशील देशों के लिए और भी भयंकर हो सकता है। एक शोध के अनुसार, पूरे विश्व में तपेदिक से ग्रसित कुल मरीजों में से करीब ९५ प्रतिशत लोग विकासशील देशों में रहते है। किंतु कई सारी रिपोर्टों से यह बात पता चलती है कि आगे -आने वाले दिनों में मधुमेह के साथ जीवित सबसे ज्यादा लोग विकाससील देशों में होंगे।

तपेदिक की बीमारी पर बने अंतर्राष्ट्रीय संगठन (जो फ्रांस की राजधानी पेरिस में स्थित है) के वरिष्ठ सलाहकार अन्थोनी हैरिस के मुताबिक 'ऐसे लोग जो मधुमेह की बीमारी से ग्रसित हैं यदी उनको तपेदिक की बीमारी हो जाती है तो उनमें तपेदिक के उपचार की औषधियों का असर काफी कम हो जाता है। इसके साथ ही साथ वे मरीज जिन्हें टाईप -२ मधुमेह और तपेदिक दोनों हैं , उनमें औषधि प्रतिरोधक बीमारी होने की संभावनाएं कहीं ज्यादा बढ़ जाती हैं, क्योंकि टाईप -२ मधुमेह से रक्त में शर्करा की मात्र बढ़ जाती है तथा उससे रोग-प्रतिरोधक शक्ति कम हो जाती है। यद्यपि पूरे विश्व के मुकाबले भारत के पास सबसे मजबूत तपेदिक रोग नियंत्रण कार्यक्रम है, किंतु यह प्रभावी रूप से काम नहीं कर रहा है। यदि सार्वजनिक तथा निजी संस्थान दोनों मिलकर काम करें तो इन बीमारियों पर नियंत्रण पाया जा सकता है। '

गरीबी, अपर्याप्त साफ़-सफाई, धूम्रपान का सेवन, उचित पोषण का अभाव, इत्यादि की वजह से भारत में तपेदिक और मधुमेह के रोगियों की संख्या दिन- प्रतिदिन बढ़ रही है। तपेदिक की बीमारी, टाईप -१ मधुमेह के साथ जी रहे लोगों में भी हो सकती है। अक्सर लोग यह समझते हैं कि मधुमेह सिर्फ़ अमीरों की बीमारी है, किंतु यह अमीरों और गरीबों दोनों में ही तेजी से फ़ैल रही है। कई सारे शोधों से यह पता चलता है कि मधुमेह की बीमारी अब ग्रामीण इलाकों में भी अपने पैर फैला रही है।

अन्थोनी हैरिस का आगे कहना है कि भारत को तपेदिक के मरीजों से निपटनें के लियी तपेदिक रोग नियंत्रण कार्यक्रम को तीन स्तरों पर मजबूत बनाना होगा--- (१ ) प्राथमिक अवस्था में ही तपेदिक के मरीजों की पहचान की जाए। ( २)- मरीजों का पंजीकरण करा कर उनको नियमित दवाएं उपलब्ध कराई जायें। (३)- बलगम के द्वारा उनकी जाँच की जाए।

तपेदिक संक्रमणों द्वारा फैलने वाली बीमारी है जबकि मधुमेह बिना संक्रमण द्वारा फैलने वाली बीमारी है। भारत जैसे देशों में दोनों प्रकार की बीमारियों के फैलने का ख़तरा है। सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्य के गोल ६ के ८ उद्देश्यों में इस बात का ज़िक्र किया गया है कि वर्ष २०१५ तक विश्व में संक्रमित बीमारियों, जैसे तपेदिक इत्यादी, के प्रकोप को कम करने का प्रयास किया जायेगा। यदि हम वास्तव में इन देशों में तपेदिक के प्रकोप को कम करना चाहतें हैं तो इसके लिए हमें व्यापक प्रबंध करनें होंगे।

अमित द्विवेदी

लेखक सिटिज़न न्यूज़ सर्विस के विशेष संवाददाता हैं

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