न्यायालय का निर्णय : केन्द्रीय सूचना आयोग की स्वंतत्रता का अतिक्रमण

प्रो एस एस अंसारी
केन्द्रीय सूचना आयुक्त
केन्द्रीय सूचना आयोग
हाल में मीडिया ने केन्द्रीय सूचना आयोग जजों सहित सरकारी सेवकों की संपत्ति संबधी दिये गए निर्णय को काफी प्रचारित किया था। नागरिक समाज और मीडिया को ऐसे निर्णयों में न्यायपालिका और अन्य क्षेत्रों में भ्रष्टाचार पर रोक लगने की संभावना की किरण दिखाई देती है। इसके विपरीत न्यायलय ने आयोग द्वारा अधिनियम के प्रावधानों को अब तक तरीके द्वारा लागू करने पर रोक लगा दी हैदिल्ली हाई कोर्ट ने हाल में डब्ल्यू पी सी १२७१४/2009 दिनांकित 12.5.2010 में दिए गए निर्णय के अनुसार अधिनियम की धारा 12 (4) के अन्तर्गत सरकार के क्रिया-कलापों के पारदर्शिता और उत्तर दायित्व को बढ़ावा देने के कर्तव्य के निर्वहन हेतु केन्द्रीय सूचना आयोग द्वारा बनाई गई प्रंबधन नियमावली को रदद कर दिया है। असल में केन्द्रीय सूचना आयोग द्वारा अपीलों के निस्तारण हेतु अपनाई गई प्रक्रिया को अवैध घोषित कर दिया गया है जिसका तात्पर्य यह है कि आयोग की सिंगल या डिवीजन बैंच पीठ अपने सामने प्रस्तुत अपील पर निर्णय नही दे सकता केन्द्रीय सूचना आयोग की कार्य करने की स्वतंत्रता का ही अतिक्रमण हुआ है बल्कि सूचना मांगने वालों के अधिकारों की सुरक्षा करने का मार्ग भी अवरूद्ध हो गया है, जिससे नागरिक समाज तथा यू.पी.डा. सरकार द्वारा पूरी तरह समर्थित सूचना का अधिकार अभियान को भी धक्का लगा हैं ।

आर.टी.आई.एक्ट तथा उसकी धारा 27 के अधीन सक्षम सरकार द्वारा बनाए गए नियमों में मामलों के निस्तारण हेतु बैंच बनाने का बिल्कुल कोई भी उल्लेख नहीं है। एक्ट की धारा 18 (३) के अंतर्गत
केन्द्रीय सूचना आयोग को सिविल कोर्ट की सभी शक्तियाँ उपलब्ध है। एक्ट की धारा 12 (४) के अन्तर्गत केन्द्रीय सूचना आयोग को किसी भी अन्य अथोरिटी के दिशा-निर्देशों से मुक्त रह कर स्वतंत्र रूप से अपनी शक्तियों का प्रयोग करने का अधिकार दिया गया है। तदानुसार, केन्द्रीय सूचना आयोग द्वारा प्रबंधकीय नियमावली अपनाई गयी थी। इस प्रकार आयोग न्यायालयों में चालू पद्धति का अनुसरण कर रहा हैं । आयोग में बैंच बनाने के बारे में अधिनियम में कोई स्पष्ट प्रावधान के न होने तथा सक्ष्म सरकार यानि कि डी.ओ.पी.टी. कार्मिक तथा प्रशिक्षण, विभाग द्वारा सुसंगत नियम न बनाने की स्थिति में आयोग द्वारा कार्य संचालन हेतु बनाए गए दिशा-निर्देशों को किस तरह के गैर कानूनी कहा जा सकता हैं । प्रसंगवश, आयोग द्वारा सुसंगत नियमों के अंतर्गत मामलों के निस्तारण संबंधी प्रक्रिया की वैधता का मुददा न्यायालय के समक्ष विचाराधीन भी नही था। केन्द्रीय तथा राज्य आयोगों के बहुत सारे निर्णयों को न्यायालयों के चुनौती दी जाती रही है। परन्तु दिल्ली हाई कोर्ट सहित किसी भी न्यायालय ने आयोग द्वारा अपनायी जा रही प्रक्रिया पर कभी भी सवाल नहीं उठाया था ।

अब क्योंकि न्यायालय ने आयोग द्वारा बैंच (पीठ) बनाकर मामलों का निस्तारण करने के तरीके को अवैध ठहरा दिया है अत: अब आयोग के सामने केंद्र तथा राज्य स्तर पर सभी आयुक्तों (1 मुख्य आयुक्त जोड़ 10 आयुक्त) को एक साथ बैठकर मामलों की सुनवाई करने के सिवाये कोई चारा नहीं हैं। क्योंकि आर. टी.आई . एक्ट तथा नियमों में बैंच बनाने का कोई प्रावधान नहीं हैं और विशेष करके उक्त निर्णय के अनुसार आयोगों को इस संबंध में नियमावली बनाने का कोई अधिकार नहीं है। क्या इस का यह अर्थ है कि जब तक आर.टी.आई.एक्ट में संशोंधन करके बैंच बनाने का प्रावधान न कर दिया जाए तब तक आयोग अपना काम बंद कर दें।
प्रश्न है कि क्या पूर्ण पीठ (फुल बैंच) द्वारा अपीलों का निस्तारण व्यवहारिक है ? पहली बात यह है कि केन्द्रीय सूचना आयोग (सी.आई.सी.) के पास भौतिक व्यवस्था जैसे कि हाल या बड़ा कमरा जिसके कि सभी सूचना आयुक्त एक साथ बैठ कर वादियों को सही प्रकार से सुन सके नहीं दूसरे सूचना मांगने वालों द्वारा बहुत बड़ी संख्या के दायर की गई अपीलों के सापेक्ष मामलों का निस्तारण बहुत धीमा हो जाएगा जिस के परिणाम स्वरूप बहुत अधिक मामले लंबित हो जाएंगे जो कि सूचना के स्वंतत्र और तेज प्रवाह के विचार पर धब्बा होगा।सूचना और नए ज्ञान द्वारा संचालित तेजी से बदल रहे समाज और अर्थव्यवस्था में 10 वर्ष या उससे देरी से मिली सूचना का कोई फायदा नहीं होगा बल्कि उल्टा होगा क्योंकि सूचना का समय से कोई उपयोग नही हो सकेगा।

नियम बनाने या आर.टी.आई. एक्ट बनाने वालों का मामलों के निस्तारण हेतु पूर्ण पीठ
(१ जोड़ 10 आयुक्त) बनाने पर बल देने का कभी भी मंशा नहीं रहा है। एक्ट तथा नियमों में स्पष्ट प्रावधान के अभाव में आंतरिक कार्य को चलाने हेतु दिशा-निर्देश बनाने को असंगत ठहराना किसी भी तरह से उचित नहीं है। इस संदर्भ में उच्च न्यायालय द्वारा सी.आई.सी. के बैंच बनाकर काम करने को गलत ठहराने से एक बड़ा संकट पैदा हो गया है। इसमें विकल्प सीमित हैं। जब तक आर.टी.आई. एक्ट में संशोंधन द्वारा बैंच बनाने का प्रावधान नहीं कर दिया जाता तब तक आयोग को फूल बैंच बनाकर ही अपीलों का निस्तारण करना पड़ेगा। ऐसा नहीं लगता है कि धारा 27 के अंतर्गत सरकार बैंच बनाने का सुसंगत प्राविधान कर पाएगी। फिर अब तक ऐसा क्यों नहीं किया गया है ?

कार्मिक एवं
प्रशिक्षण (डी. ओ. पी. टी.) में पहले विभागीय सरकारी वकीलों की राय से आयोग के सम्मुख कुछ मामलों के आपत्ति उठाई थी और आयोग द्वारा एक्ट की धारा 12 (4) के अंतर्गत बैच बनाने की अनुचित या अवैधानिक कहा था। यदि डी. ओ. पी. डी. ने एक्ट की धारा 27 के अंतर्गत बैंच बनाने के बारे में नियम बनाने की शक्ति का प्रयोग किया होता तो वर्तमान संकट से बचा जा सकता था। यह डी. ओ. पी. डी ही था जिसने लोक प्राधिकारी एवं आर.टी.आई.एक्ट को लागू कराने वाले प्राधिकारी के रूप में बैंच बनाने पर आपत्ति की थी। बाद में बैंच बनाने को न्यायलय ही रदद कर दिया। सूचना के युग में लोक प्राधिकारियों को क्या कष्ट हैं। इसे सब लोग जानते है। सरकार और अब न्यायालय द्वारा आयोग के स्वतंत्र रूप से कार्य करने में दखल देना उसकी स्वंतत्रता का हनन है जबकि उसे सरकार के पास उपलब्ध सूचना प्राप्त करने के लोगों के अधिकार का सुनिश्चिनत कराने का अधिकार हैं ।

अत: एक्ट के
संशोंधन जरूरी है। नागरिक समाज को इस परिवर्तन का विरोध नहीं करना चाहिए। जैसा कि पूर्व में किया गया था। अन्यथा केंद्रीय सूचना आयोग का कार्य, दुरूह हो जाएगा। परिणाम स्वरूप, आम आदमी को तत्परता सूचना दिलाने के कार्य से होने वाला लाभ समाप्त हो जाएगा। इसके अतिरिक्त सहभागी विकास और सुशासन को बढ़ावा देने हेतु जानने के अधिकार के औजार का इस्तेमाल करने पर भी बुरा प्रभाव पड़ेगा। न्यायालय द्वारा उत्पन्न किये गए अवरोध को दूर करने के लिये सरकार द्वारा तेजी से कदम उठाने की आवश्यकता हैं ।

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