बढ़ते दामों की चुनौती, भुखमरी और हमारे समाज का भविष्य

खाद्य पदाथों के दाम आसमान छू रहे हैं, और अर्थ शास्त्रियों व आंकड़ाविदों को अर्थ व्यवस्था पर मुद्रास्फिती के प्रभाव की चिन्ता है। 10-20 प्रतिशत तक की खाद्य दामों में बढ़ौतरी हफ्ते दर हफ्ते चली आ रही है और विशेषज्ञों का अन्दाजा है कि यह सिलसिला साल के अन्त तक ही थमेगा, वह भी अगर इस वर्ष मानसून मेहरबान रही तो पिछले वर्ष देश में व्यापक स्तर पर सूखे की स्थिति रही है और वह फिलहाल जारी हैं। दामों के मद्देनजर केन्द्रीय मन्त्रीमण्डल ने गरीबी रेखा के नीचे आने वाले परिवारों (बी.पी.एल.) के लिये सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत प्रतिमाह 10 किग्रा अनाज की बढ़ौतरी मंजूर की है। परन्तु आने वाले महीनों में भूख व भूखमरी, कुपोषण व बढ़ती शिशु मृत्युदर का मण्डराता साया सामाजिक चिन्तन में कहीं नजर नहीं आ रहा। या यू कहें कि वह चर्चा का विषय नहीं बना है, शायद इसलिये कि हम 8-9 प्रतिशत वृद्धि दर के साकार होते सपने को धुंधला होता नहीं देखना चाहते।

नैशनल न्यूट्रीशन माँनिटरिंग ब्यूरों के अनेक सर्वेक्षण व अन्य सर्वे सभी दिखाते हैं कि देश में 50-60 प्रतिशत 0-5 वर्ष के बच्चे मध्यम और गम्भीर स्तर के कुपोषण से ग्रसित है । 30-40 प्रतिशत व्यस्कों में भी यह कभी पाई जाती है यानि इन परिवारों में मूल खाने की कमी हैं। ऐसी परिस्थिति में जब जमीन में पानी के भण्डार और घरों में खाद्यान्न के भण्डार विलीन हों रहे है, और बाजार में दाम अधिकांश की जेब के बाहर होते जा रहे हैं, तब यह बताने के लिये किसी भविष्यवाणी की आवश्यकता नहीं कि गरीबी रेखा के नीचे की 30-40 प्रतिशत आबादी व उसके बस ऊपर झूलती अन्य 30-40 प्रतिशत आबादी और भुखमरी बढ़ेगी ही। देश के कई इलाकों से, अखबारों व सामाजिक कार्यकर्ताओं के माध्यम से, भूख से मौतों की इक्का-दुक्का रिपोर्ट आने लगीं हैं। छत्तीसगढ़ के दो-तिहाई जिलों में पिछले दो साल में बच्चों में कुपोषण बढ़ने के आँकड़े सरकारी स्त्रोत से मिलते हैं। अन्य स्थानों से भी स्वास्थ्य कर्मियों को बढ़ते कुपोषण के लक्षण मिलने लगे हैं। यह केवल संकेत भर है कि स्थिति किस ओर बढ़ सकती है। अगर जल्द ही अनेक ठोस व कारगर कदम नहीं उठाये गए तो अनुमान लगाया जा सकता है कि इस साल नवम्बर के बाद से भुखमरी बेतहाशा बढ़ेगी। ऐसे भी कई इलाके/जिले हैं जहाँ स्थिति में सुधार होता दिख रहा है, बच्चों में कुपोषण की दर घटी है। परन्तु गैरबराबरी की खाई भी बढ़ी है और हर इलाके में कुछ तबके व अनेक इलाकों में व्यापक तौर पर, घरों में खाने की मात्रा व गुणवत्ता में गिरावटा आई है। शहरी गरीब को विकास के फायदे भी मिले हैं परन्तु दाम की मार भी उनको ज्यादा परेशान कर सकती है। अच्छा हो अगर भूख और भुखमरी की परिस्थिति उतनी व्यापक व गंभीर न हो जितनी उसकी सम्भावना है। परन्तु अभी से इस समस्या की रोकथाम की कोशिश होनी आवश्यक है, और साथ ही गंभीरतम परिस्थिति का सामना करने की तैयारी भी।

यह स्पष्ट है कि दीर्घकालिक हल आर्थिक नीतियों की पुनरर्चना व ग्रामीण विकास और रोजगार को बढ़ावा जैसी प्रक्रिया बिना नहीं निकल सकते। समग्रता से खाद्यान सुरक्षा, छोटे किसान, भूमिहीन मजदूर व कारीगरों के रोजगार, स्थानीय पर्यावरण के अनुकूल खेती, और दामों पर नियन्त्रण की नीतियों को अपनानी होंगी। परन्तु इस सब के लिये बहुसंख्य जनता इन्तजार करती रही तो तात्कालिक संकट से कैसे जूझेगी ?

सम्भव तात्कालिक कारगर उपाय

1. सार्वजनिक वितरण प्रणाली द्वारा महीने का बी.पी.एल. परिवारों को 35 किलो. बेचने का प्रावधान था जिसको हाल में 45 किलो. किया गया। परन्तु यह अभी भी अपर्याप्त है और आवश्यकता है कि 100 किलो. अनाज दिया जाए ताकि 5 व्यक्तियों के परिवार को बाजार से खरीदना न पड़े। गरीबी रेखा के नीचे वाले परिवारों के अलावा अन्य के लिये भी यह प्रावधान खोल दिया जाय। राजस्थान सरकार के एक सर्वेक्षण ने दिखाया था कि कुपोषण ग्रसित बच्चों में एक तिहाई ही बी.पी.एल. थे और दो तिहाई तो गरीबी रेखा के ऊपर वाले थे। (ए.पी.एल.) हालांकि बी.पी.एल. में 80 प्रतिशत कुपोषित थे और ए.पी.एल. में लगभग 20 प्रतिशत ही।

२. जिला का प्रशासन भुखमरी से हुई मौत के प्रमाणित होने पर मृतक के परिवार को मुआवजा, खाद्यान अथवा रोजगार देता है। हालांकि प्रमाण इकट्ठे करना जो प्रशासन को मान्य हो, यह अक्सर विवादित रहता है।

3. सूखा ग्रस्त जिलों को चिन्हित कर प्रशासन उनमें रिलीफ का काम चालू करता है। परन्तु यह खाद्यानों के दाम बढ़ने पर लागू नहीं होता, जब तक भुखमरी से मौत का प्रमाण न मिलें।

4. आमतौर पर भी पर्याप्त खानों के दाम 30-40 प्रतिशत आबादी की क्रय शक्ति के बाहर रहते हैं। ऐसे में करोड़ों भारतीय भूखे ही सो जाते है, बहुसंख्य बचपन से ही छोटे कद के व दुर्बल रह जाते है। ऐसे दुर्बल बच्चे व बुजुर्ग बढ़ती खाद्यान की कमी के सबसे पहले शिकार बनते हैं। इस समस्या के हल के लिये सार्वजनिक वितरण प्रणाली द्वारा खाद्यान्न का प्रावधान है, और बच्चों व गर्भवती माँओं के लिये आँगनवाड़ी पर पोषण की व्यवस्था है।
स्पष्ट है कि यह उपाय कितने अपर्याप्त साबित हो साबित हो रहे हैं।

ऐसी परिस्थिति मेंकोई भूखा सोएअभियान की सम्भावना

- नागरिक प्रशासन को 9 प्रतिशत की आर्थिक बढ़ोतरी के फल को बांटना पड़ेगा, कम से कम हर परिवार को न्यूनतम भोजन मौहयया कराने के लिये।

- कुपोषण और भुखमरी बढ़ाने के संकेत शुरू में ही पहचानने की व्यवस्था बनानी होगी, ताकि कारगर कदम उठाकर भूख की व्यापकता कम की जा सके।

- चिन्हित इलाकों, समुदायों व परिवारों के लिये, परिस्थिति अनुरूप, कम दरों पर खाद्यान्न, रिलीफ के लिये मजदूरी के काम और समुदायिक रसोई जैसी व्यवस्थाऐं करी जाये।

- स्वास्थ्य विभाग एवं आंगनवाड़ी (आई.सी.डी.एस.) के कार्यकर्ता लगभग हर गाँव व कस्बे में तैनात हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य योजना के तहत हर 1000 या उससे भी कम की आबादी पर एक ‘आशा’ है-आठवीं पास गाँव की बहू जिसकों ट्रेनिंग देकर स्वास्थ्य के मुद्दों पर जागरूकता बढ़ानें एवं प्राथमिक उपचार देने के लिये तैयार किया गया है। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता व आशा को मिलकर माह में एक दिन ग्रामीण स्वास्थ्य पोषण दिवस मनाना होता है। वहीं बच्चों का वजन मापा जाता है। ए.एन.एम. (डेढ़ साल की ट्रेनिंग पाई नर्स) गर्भवती महिलाओं की जाँच और माँओं व बच्चों का टीकाकरण भी करती है। खेद की बात है कि पोषण पर ध्यान घटता जा रहा है। बच्चों के वजन द्वारा कुपोषण मापने पर कारगर कदम उठाना तो दूर, कुपोषण दर्ज करने पर ही पाबन्दी हैं। अब स्वास्थ्य मंत्रालय व महिला व बाल विकास डिपार्टमेंट के अफसर और नीतिनिर्थाक भी इससे चिन्तित है, और कुछ कारगर उपाय खोज रहे हैं। पोषण व स्वास्थ्य के काम में तालमेंल बढ़ाना इसका एक तरीका है।

- इस संयुक्त काम को इस साल अगर मुहिम के तौर पर उठाया जाए तो प्रशासन, स्वास्थ्य सेवा व आई.सी.डी.एस. तीनों को कुपोषण की समस्या पर फिर ध्यान केन्द्रित करना होगा। सरकार व राजनैतिक पार्टियां लोगों की एक प्रमुख समस्या पर कुछ ठोस काम करती नजर आएंगी।

- बच्चों के वजन पर महीनेवार सख्त निगरानी रखने से पता लगाया जा सकता है कि किस इलाके या आबादी में 20 प्रतिशत से अधिक बच्चों का वजन घटा है। इसकों समुदाय में बिगड़ती खाद्य परिस्थिति और सम्भावित भुखमरी का द्योतक माना जा सकता है। ऐसी स्थिति की रिपोर्ट तुरन्त पंचायत व जिला कलेक्टर को दी जाए, और वह उपरोक्त कदम लेने के लिये तैयार रहें, तो भुखमरी के कारण मौतों की रोकथाम हो सकती है।

-जहाँ अब तक आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को ज्यादा कुपोषण रिपोर्ट न करने की मौखिक हिदायत दी जाती है, जरूरी है कि अब कुपोषित बच्चे चिन्हित करने पर उन्हें (व आशा को) इनाम दिया जाए।

- ग्राम स्वास्थ्य एवं स्वच्छता समिति व पंचायत मिलकर इसका ध्यान रखे कि क्या गाँव के परिवारों में खाने का अभाव है, और यदि हाँ तो कौन भूख का शिकार हैं। इसका वह प्रशासन से उपाय मांगें। इससे आगे, वह सरकार द्वारा दिया सालाना रू. 10,०००/- व अन्य चन्दा इकट्ठा करके ‘कोई भूखा न सोए’ अभियान चला सकते हैं।

- स्वयंसेवी व विभिन्न आंदोलन समूह भी इस काम में जुड़े। सरकारी कार्यक्रमों में उन्हें जोड़ा जाए ताकि ग्राम स्वास्थ्य एवं स्वच्छा समिति कारगर बनें, आशा व आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के काम में मजबूती लाएं। परन्तु सरकारी कार्यक्रम हो या न हो, स्वयंसेवी आन्दोलन समूह अगर अपने-अपने क्षेत्र में अपने ही कार्यकर्ताओं के माध्यम से यह कार्य शुरू कर दें और गाँव व मौहल्ले के स्तर पर ‘कोई भूखा न सोए’ अभियान चालू कर दें तो उसका कुछ तो असर होगा।

- मन्दिर-मस्जिद-गुरूद्वारे, व्यापारी मण्डल और कॉर्पोरेट सोशल रिस्पोंन्सिबिलिटि निभाने वाले समूह सभी इस बुनियादी अभाव को दूर कर देश को इस कलंक से मुक्ति दिलाने के लिये एक लक्ष्य की ओर अग्रसर हो सकते हैं।

इसके लिये राजनैतिक संकल्प की आवश्यकता है और ऐसे प्रशासनिक अधिकारियों की जो समाज की त्रासदी और लोगों की पीड़ा के कारगर निदान के लिये कदम लेने को तत्पर हो। अगर हम अभी बड़े पैमाने पर ऐसे कदम नही उठाएंगे तो देश ‘मिलेनियम डिवेल्पमेन्ट गोल्ज’ व राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के लक्ष्यों की चुनौती से और दूर चला जाएगा।

आज हमारा देश और समाज जिस चौराहे पर खड़ा है, हमारे भविष्य की शक्ल ऐसी चुनौतियों से ही निर्णायक रूप लेगी। हम सब एक जुट होकर कैसे इस चुनौती का सामना करते है, उससे तय होगा कि हमारा समाज एक जिंदा, मजबूत, संवेदनशील और मानव अधिकारों को मानवीयता और जरूरतमंद की सेवा से जोड़ने वाले समाज के रूप में उभरेगा, या अपने सदस्यों को भूख से तड़पने को छोड़ बेमुरव्वत, गैरजिम्मेवार, बंटा हुआ व संवेदनशून्य समाज बनेगा।

डॉ. रितु प्रिया

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