युवाओं को निशाना बनाती है तम्बाकू कंपनियाँ

तम्बाकू उद्योग अपने उत्पाद की बिक्री के लिए युवाओं को अनेक प्रकार से आसान निशाना बनाता है यही कारण है कि अधिकांश युवा सिगरेट और तम्बाकू का प्रयोग किशोरावस्था के दौरान से ही शुरू कर देते हैं। दुनिया भर में हर दिन 80,000 से 100,000 बच्चे धूम्रपान शुरू करते हैं जिसमे आधे से ज्यादा बच्चे एशिया में रहते है तथा भारत में हर रोज 5500 युवा किसी न किसी रूप में तम्बाकू का सेवन प्रारम्भ कर कर देते हैं। इन्टर्नैशनल यूनियन अगेन्स्ट ट्युबरक्लोसिस एंड लंग डिज़ीज़ (द यूनियन) के क्षेत्रीय समन्वयक तंबाकू नियंत्रण मिरता मोलिनरी का कहना है कि "सबूत आधारित संकेत कहते है कि दोस्तों की संगत और तम्बाकू के आकर्षक विज्ञापन युवा और किशोरों को तंबाकू के प्रयोग के लिए प्रेरित करते हैं। तंबाकू उद्योग नित नए और लुभावने तरीकों से, विज्ञापन और अन्य प्रयोजन के माध्यम से अपने उत्पादों को बढ़ावा देता है। उदाहरण के तौर पर संगीत समारोहों, मुक्त सिगरेट नमूनों, और प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष विज्ञापन आदि के रूप।"      

भारत सरकार ने 2003 में ‘सिगरेट व अन्य तम्बाकू उत्त्पाद अधिनियम’ को पारित किया जिसके तहत भारत में तम्बाकू उत्पाद पर सभी प्रकार के प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष प्रचार पर प्रतिबंध है, परंतु तम्बाकू कंपनियाँ इस नियम का धड़ल्ले से उल्लंघन करती हैं तथा कई प्रकार के अप्रत्यक्ष प्रचार के माध्यम से युवाओं को अपना शिकार बनाने की कोशिश करती रहती हैं। द यूनियन के तंबाकू नियंत्रण के निदेशक डॉ. एहसान लतीफ का कहना है कि "तम्बाकू कंपनियाँ इस बात को भली भांति समझती हैं कि जो युवा समाज में अपनी पहचान बनाने में लगा है उसको किसी भी चीज की आदत लगवाना आसान है और यदि यह वर्ग तम्बाकू का प्रयोग शुरू कर दे तो आगामी 20 से 30 सालों तक या जब तक जीवित हैं तब तक उनके ग्राहक बने रहेंगे। अतः युवा वर्ग तम्बाकू कंपनियों के नजर में एक बहुत बड़ी मार्केट है।" 

तम्बाकू कंपनियां फिल्मों के माध्यम से युवाओं को धूम्रपान के प्रति प्रेरित करती हैं।  चूंकि भारत एक ऐसा देश है जहां पर युवा अपने चहेते कलाकार के हर कार्य का अनुसरण करते हैं, अतः यहाँ पर फिल्मों में धूम्रपान का युवाओं पर बहुत ही प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और यही कारण है कि अधिकांश धूम्रपान करने वाले लोगों में धूम्रपान की शुरुवात 18 वर्ष की आयु से पहले होती है। इस संदर्भ में डॉ. एहसान लतीफ का कहना है कि "हर युवा का एक रोल मॉडल होता है जिसके स्वरूप को वह अपने जेहन में बसाये रहता है और जब वह रोल मॉडल को धूम्रपान करते हुए देखता है तो उसके व्यक्तित्व से प्रभावित होकर खुद भी धूम्रपान करने लगता है कि शायद ऐसा करके वह उसके रोल मॉडल जैसा सफल बन सकेगा"  

तम्बाकू उद्योग के बढ़ते स्वरूप और स्वास्थ्य नीतियों में तम्बाकू उद्योग के बढ़ते हस्तक्षेप पर रोक लगाने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस वर्ष विश्व तम्बाकू निषेध दिवस का विषय “तम्बाकू उद्योग हस्तक्षेप को रोकिए" रखा है। अपने विकट आर्थिक और राजनीतिक संसाधनों के साथ, तम्बाकू उद्योग दुनिया भर में नई तंबाकू नियंत्रण कानून और नीतियों के क्रियान्वयन को रोकने के लिए लड़ रहा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन टोबैको कंट्रोल संधि का अनुच्छेद 5.3 सभी पार्टियों को, सार्वजनिक स्वास्थ्य को कमजोर करने वाले,  इन प्रयासों का विरोध के लिए बाध्य करता है। दिल्ली में एक गैर-सरकारी संस्था द्वारा सूचना का अधिकार नियम के तहत पूछे गए सवालों के जवाब में सरकार ने यह बात स्वीकारी है कि तंबाकू उद्योग हम पर तंबाकू नियंत्रण कानून के संचालन को सही ढंग से लागू न करने के लिए दबाव डालती है। इससे यह स्पष्ट होता है कि तम्बाकू उद्योग तम्बाकू विरोधी जन हितैषी कार्यक्रमों के संचालन में बाधा उत्पन्न करती है।
  
अतः हमे एक बेहतर युवा कार्यक्रम की जरूरत है जिससे कि समाज में ज्यादा से ज्यादा युवाओं को तम्बाकू उद्योग के चंगुल से बचाया जा सके। द यूनियन के क्षेत्रीय समन्वयक मिरता मोलिनरी के अनुसार "युवाओं में तम्बाकू प्रयोग की शुरुआत को रोकने के लिए कार्यस्थलों और सार्वजनिक स्थानों पर तम्बाकू उत्पादों के प्रयोग पर प्रतिबंध लगाने के साथ साथ, करों में बढ़ोतरी करना भी आवश्यक है। कीमतें बढ़ने से बच्चों के तम्बाकू उत्पादों को खरीदने के सामर्थ्य में कमी आएगी। फलस्वरूप बच्चों में तम्बाकू उत्पाद की खपत कम हो जाएगी। प्रायोजन और विज्ञापन तथा मजबूत स्वास्थ्य और सचित्र चेतावनी बच्चों में तंबाकू के इस्तेमाल को कम करने के अतिरिक्त उपाय है"।  

युवाओं को तम्बाकू के प्रयोग से बचाने के लिए कई देशों ने तम्बाकू उत्पाद पर करों को बढ़ाया है साथ ही धूम्रपान मुक्त वातावरण भी लागू किया है। एक व्यापक तम्बाकू नियंत्रण के उपायों की जरूरत है जिसके माध्यम से युवाओं तथा किशोरों को तम्बाकू के बुरे आदत से बचाया जा सकता है। 

राहुल द्विवेदी- सी.एन.एस 
(लेखक  "स्वास्थ्य को वोट दें अभियान"  का समन्वयक है और सिटीज़न न्यूज़ सर्विस के लिए लिखते हैं)  

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