लिंग-जनित हिंसा पर चुप्पी तोड़ें

[English] लखनऊ विधान सभा के सामने अंबेडकर महासभा में आज लिंग-जनित भेदभाव और हिंसा के मुद्दे पर खुला संवाद और उसके पश्चात मोमबत्ती प्रदर्शन का आयोजन हुआ। संवाद में दिल्ली में हुए सामूहिक यौन हिंसा पर बिना विलंब कारवाई की मांग हुई और यह बात भी स्पष्ट रूप से जाहिर हुई कि ऐसी महिलाओं की संख्या अत्याधिक है जिनको लिंग-जनित हिंसा के बाद न्याय नहीं मिला है और वें भी न्याय की प्रतीक्षा कर रही हैं।

यौनिक हिंसा के मामले चिंताजनक अनुपात में हमारे समाज में घटित हो रहे हैं। आदिवासी और दलित महिलाएं, ऐसी महिलाएं जो असंगठित क्षेत्र में मजदूरी करती हैं, हिजरे, यौनकर्मी, आदि की अधिकांश यौनिक हिंसा की शिकायतें नज़रअंदाज़ कर दी जाती हैं। अनेक प्रदेश जैसे कि छत्तीसगढ़, कश्मीर या उत्तरी-पूर्वी राज्यों आदि में अनेक ऐसे मामले हैं जहां हिरासत में महिलाओं के साथ वीभत्स यौनिक हिंसा हुई और न्याय की सभी अपील अनसुनी की गईं। हमारी मांग है कि ऐसे मामलों में भी बिना विलंब सख्त कारवाई हो। इस संवाद का सारांश जस्टिस जेएस वर्मा कमेटी को भेजा जाएगा।

कानून में क्या संशोधन किया जाये जिससे कि वीभत्स यौनिक हिंसा करने वालों के खिलाफ कारवाई हो सके, इस मुद्दे पर आम जनता से सुझाव जस्टिस वर्मा कमेटी 5 जनवरी 2013 तक स्वीकार कर रही है – आप अपने सुझाव ईमेल द्वारा भेज सकते हैं: justice.verma@nic.in .

यौन हिंसा और अन्य प्रकार की लिंग जनित हिंसा और भेदभाव सिर्फ महिला मुद्दा नहीं है बल्कि राजनीतिक मुद्दा भी है और हर इंसान को प्रभावित करता है। हमें यौनिक हिंसा करने वालों के खिलाफ ऐसी ठोस कारवाई करनी चाहिए जो सही मायनों में इस अमानवीय कृत पर अंकुश लगा सके। हमारा मानना है कि मृत्यु दंड देना न ही ऐसे मामलों पर अंकुश लगाएगा और न ही यह इस लिंग जनित भेदभाव और हिंसा से निबटने के लिए नैतिक या प्रभावकारी तरीका है।

लड़कियों और महिलाओं के साथ रोज़मर्रा की ज़िंदगी में छेड़छाड़ या बदतमीजी होने पर चुप्पी रखना भी यौनिक हिंसा को बढ़ावा देता है। हमारी मांग है कि समाज लड़कियों और महिलाओं के जीवन को ‘पुलिस’ या नियंत्रित करना बंद करे और उन्हे सम्मान, बराबरी, अधिकार और बिना भेदभाव के साथ अपना जीवन यापन करने दे। जिन महिलाओं के साथ यौनिक हिंसा हो उन्हें बिना विलंब न्यायिक, चिकित्सकीय, आर्थिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए से सहयोग प्राप्त होना चाहिए और उनके गरीमापूर्ण पुनर्स्थापन की ज़िम्मेदारी भी सरकार को लेनी चाहिए। पुलिस को संवेदनशीलता के साथ यौनिक हिंसा रपट करने वाली महिलाओं की एफ़आईआर दर्ज़ और सख्त कारवाई करनी चाहिए। कुछ मामलों में सामने आया है कि जो महिलाएं यौन हिंसा की शिकायत दर्ज़ करने पहुंची हों उनके साथ हिंसा पुलिसकर्मी स्वयं ही करते पाये गए। पुलिस स्टेशन में सीसीटीवी कैमरे लगे हों और जो पुलिसकर्मी शिकायत कराने आई महिलाओं के साथ अनैतिक व्यवहार करे उनके खिलाफ सख्त कारवाई हो। यौनिक हिंसा के मामलों के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट बने और सज़ा 6 माह के अंदर हो।

बाबी रमाकांत, सिटीजन न्यूज़ सर्विस - सीएनएस 

No comments: