नाभिकीय मुक्त दुनिया की ओर

यह पुस्तक वस्तुतः तीन स्वतंत्र अध्यायों का संकलन है। पहले अध्याय में भारतीय नाभिकीय तंत्र के बारे में तथ्यात्मक जानकरी प्रस्तुत है। यह जानकारी उपलब्ध साहित्य एवं भारत सरकार के नाभिकीय विद्युत कार्पोरेशन की वेबसाइट आदि से संग्रहित की गयी है। इस अध्याय में दी गयी चीजों को समझना किसी गैर-वैज्ञानिक या प्रोद्योगिकीय पृष्ठभूमि के व्यक्ति के लिए कठिन हो सकता है। शायद विद्यालय स्तर के विज्ञान की पुस्तक का सहारा लेना पड़े। किन्तु इस अध्याय को पढे़ बिना भी आगे के दो अध्याय पढे़ जा सकते हैं। दूसरे अध्याय में नाभिकीय विषय से संबन्धित प्रचलित भ्रमों का स्पष्टीकरण दिया गया है। नाभिकीय विषय की समझ बनाने की द्रष्टि से यह अध्याय सबसे महत्वपूर्ण है। तीसरे अध्याय में देश में नाभिकीय विरोधी आन्दोलनों का प्रस्तुतीकरण है।

दक्षिण एशिया में नाभिकीय हथियार जल्दी खत्म नहीं होने वाले हैं। क्षेत्रीय महाशक्ति बनने की भारत की आकांक्षाओं में अभी भी पंख लगे हुए हैं और वे उपमहाद्वीप की परमाणु होड़ को संचालित करती हैं, जबकि पाकिस्तान यह सोचते हुए अभी भी बमों की इबादत करने में जुटा हुआ है कि ये इसकी भयंकर मुश्किलों से निकालने की कोई जादू भरी राह बना देगा। विडम्बना है कि,  हाल के वक्त में अपेक्षाकृत अच्छे सम्बन्धों के बावजूद ये दोनों देश अन्धाधुन्ध तरीकों से नाभिकीय शस्त्र हेतु विघटीय सामाग्री बनाए जा रहे हैं। साथ ही, ये अपनी मध्यम दूरी तक मार करने वाले बैलिस्टिक प्रक्षेपास्त्रों का परीक्षण कर रहे हैं, उनकी क्षमता बढ़ा रहे हैं और उनका विस्तार कर रहे हैं। अन्तरिक्ष के लिए होड़ अभी-अभी शुरू हुई है।

यह वैसी स्थिति नहीं है जैसा सोचा गया था। भारत और पाकिस्तान में सत्ता समर्थक विश्लेषकों ने, एक-दूसरे के साथ एकता का अनोखा प्रदर्शन करते हुए, लंबे समय से नाभिकीय होड़ की धारणा की अनदेखी की है। उनका कहना था कि दक्षिण एशियाई शासक सोवियतों और अमरीकियों जैसे मूर्ख और सनकी नहीं हैं, जिन्होने अपने झगड़े के चरम पर अकल्पनीय 70,000 नाभिकीय शस्त्र बना लिए थे।

रियेक्टर से तबाही पैदा करना आसान नहीं है, लेकिन यह कोई मुश्किल भी नहीं है। एक तेज गति का हवाई जहाज या बख़तर को भेदने वाला प्रक्षेपास्त्र रियेक्टर को भेद सकता है। रेडियोधर्मी गैसों और बारीक टुकड़ों के गुच्छे तब हवा द्वारा फैल जाएँगे,  जिससे रेडियोधर्मी तत्व सॉंस और भोज्य-पदार्थों के जरिए  फेफड़े और पेट में पहुँच जाएँगे। कराची और मुंबई जैसे शहर,  खासतौर से खतरों में हैं,  जहां हवाएँ समुद्र से धरातल की ओर बहती हैं। विकसित देशों के शहरों में विभिन्न तरह के नाभिकीय आपातकाल से निपटने के लिए शहर को खाली कराने के लिए की योजनाएं हैं। लेकिन हमारे उपमहाद्वीप के बड़े शहरों में यह साधारणतया संभव नहीं है। यहाँ भयंकर नुकसान होंगे। अधिकारियों के पास नाभिकीय विनाश से निपटने का कोई तरीक़ा नहीं है। यहाँ तक कि समान्य प्राक्रतिक आपदाएँ, जैसे भूकंप और बाढ़,  ही उन्हे पूरी तरह से नंगा कर देती हैं।

यह जानकार कि नाभिकीय ऊर्जा में स्वभावतः ख़तरे निहित हैं,  निम्न सवाल पूछना हर जगह के जागरूक नागरिकों का एक अधिकार है। नाभिकीय कचरे और रसायनों को नष्ट करने के लिए वर्तमान में कोई व्यवस्था है क्या? उपयोग हो चुकी ईंधन छड़ों को कैसे नष्ट किया जाता है?  कोई कचरे के उपचार हेतु संयन्त्र अस्तित्व में है क्या? कौन सी आपदा प्रबंधन योजनाएँ अस्तित्व में हैं?

लेखक डॉ संदीप पाण्डेय का संछिप्त परिचय: 
संदीप जी का जन्म 22 जुलाई 1965 को लखनऊ में हुआ था। इन्होंने काषी हिन्दु विश्वविघालय से 1986 में यान्त्रिक अभियान्त्रिकी में शिक्षा प्राप्त कर कैलिफोर्निया विश्वविघालय,  बर्कले से 1992 में पीएच.डी. की डिग्री प्राप्त की। 1999 में इन्होंने पोकरण से सारनाथ तक विश्व शान्ति यात्रा के नाम से वैश्विक नाभिकीय निशस्त्रीकरण के उद्देश्य से एक पदयात्रा आयोजित की। तब से विभिन्न नाभिकीय विरोधी अभियानों से जुड़े हैं।

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