अब साम्प्रदायिकता की काट बने अरविंद केजरीवाल


देश में नरेन्द्र मोदी की लहर है। उनके प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवारी की घोषणा से जैसे भारतीय जनता पार्टी में जान आ गई है। कांग्रेस व भाजपा राष्ट्रीय स्तर पर अमरीका जैसी द्विदलीय प्रणाली चाह रहे थे। क्षेत्रीय दलों में से काफी कोशिश के बाद भी कोई सही अर्थों में राष्ट्रीय दल नहीं बन पा रहा था।


एक वर्ष पहले बने दल आम आदमी पार्टी ने भारतीय राजनीति में धमाकेदार प्रवेश किया है। अपने पहले ही चुनाव में उसे अप्रत्याशित सफलता मिली और उसने दिल्ली में सरकार भी बना ली भले ही वी उसे ठीक से चलाने में सफल नहीं रही।

       अब उसने अगले आम चुनावों हेतु अपनी दावेदारी ठोंकी है। उसने सभी दलों के राजनीतिक समीकरण तो बिगाड़ दिए हैं। द्विदलीय संघर्ष को उसने त्रिकोणीय बना दिया है। जहां नरेन्द्र मोदी और भाजपा यह मान कर चल रहे थे कि कांग्रेस को हराने में उन्हें कोई खास दिक्कत नहीं आएगी, अब उनके सामने अचानक एक नई चुनौती खड़ी हो गई है जिसके लिए वे तैयार नहीं थे। भाजपा का पूरा प्रचार अभियान कांग्रेस के विरोध पर केन्द्रित था। कांग्रेस के भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर उसने कांग्रेस को तो बचाव की मुद्रा में ला दिया था और कांग्रेस को भी लगने लगा था कि अगला चुनाव उसके लिए जीतना मुश्किल होने वाला है।

       लेकिन अरविंद केजरीवाल के उभार ने नरेन्द्र मोदी को स्तब्ध कर दिया है। कांग्रेस द्वारा नरेन्द्र मोदी की सरकार पर 2002 में गुजरात में मुसलमानों के नरसंहार में संलिप्तता के आरोप का तो कोई न कोई जवाब मोदी दे ही देते थे। कभी वे कांग्रेस पर आक्रामक होते तो कभी अपना बचाव करते। मोदी के खिलाफ धर्मनिर्पेक्ष ताकतों की लड़ाई कमजोर पड़ने लगी थी। न्यायालय उन्हें बरी कर रहे हैं और जिन विदेशी सरकारों ने उनका बहिष्कार किया हुआ था वे भी अब नरम पड़ने लगी हैं।

       इसी बीच अरविंद केजरीवाल ने भाजपा और कांग्रेस की मुकेश अंबानी से सांठ-गांठ का आरोप लगा दिया। यह ऐसा आरोप है जिसका जवाब देते मोदी से नहीं बन रहा है।

       यह तो किसी से छिपा है नहीं कि भाजपा ने भी धीरे-धीरे कांग्रेस के ही भ्रष्ट तरीके अपना लिए हैं। उसे भी तमाम देशी-विदेशी औद्योगिक घराने वैध-अवैध चंदा देते हैं। अवैध पैसा लेंगे नहीं तो उन चुनावों में जिनमें चुनाव आयोग ने खर्च की सीमा लाखों में तय कर रखी है करोड़ों रुपए कैसे खर्च करेंगे? करोड़ों खर्च नहीं करेंगे तो जीतेंगे कैसे? लेकिन आप ने दिखा दिया है कि चुनाव आयोग द्वारा तय सीमा के अंदर भी खर्च कर चुनाव जीता जा सकता है।

       नरेन्द्र मोदी के अंबानी व अडानी से सम्बंध खुली बात है। एक राजनीतिज्ञ का एक उद्योगपति से क्यों सम्बंध होता है यह भी सबको मालूम है। अरविंद केजरीवाल ने तो उजागर कर दिया है कि कैसे मुकेश अंबानी को फायदा पहुंचाने के लिए प्राकृतिक गैस के दाम बढ़ाए गए। इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों को जैसे सांप सूंघ गया हो। कोई अंबानी के पक्ष या विरोध में बोलने को तैयार नहीं। लेकिन अंदर ही अंदर मिली भगत तो है ही। इसका अच्छा उदाहरण है लखनऊ में जिस तरह सहारा कम्पनी के प्रमुख सुब्रत राय को गिरफ्तार कर वन विभाग के गेस्ट हाऊस में रखा गया। सुब्रत राय के भी सभी राजनीतिक दलों से मधुर सम्बंध हैं। बाल ठाकरे, जिन्हें मुम्बई छोड़ कहीं जाते नहीं देखा गया, सुब्रत राय के बेटे की शादी में आए थे। ऐसा बताया जाता है कि सुब्रत राय नेताओं, खिलाड़ियों व फिल्मी कलाकारों के काले धन का प्रबंधन करते हैं।

      अरविंद ने काले धन की राजनीति के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। अब भाजपा भी काले धन का इस्तेमाल राजनीति में तो करती ही है। तो कोई यह भी नहीं कह सकता कि अरविंद के आरोप झूठे हैं। भाजपा चली थी कांग्रेस के भ्रष्टाचार की पोल खेलने और वह अपने ही खेल में फंस गई।

       हो सकता है कि साम्प्रदायिकता के मुद्दे पर नरेन्द्र मोदी को न घेरा जा सके। मोदी भी भरपूर कोशिश कर रहे हैं कि उनकी साम्प्रदायिक छवि खत्म हो। इसके लिए उन्होंने अपने को किसी संघ परिवार के नेता से जोड़ने के बजाए सरदार पटेल और महात्मा गांधी से जोड़ने की कोशिश की है।

       किंतु अरविंद केजरीवाल ने यह घोषणा कर कि जहां से मोदी चुनाव लड़ेंगे वे भी वहीं से लड़ेंगे मोदी के लिए संकट खड़ा कर दिया है। अब गुजरात के बाहर से यदि मोदी चुनाव में खड़े होते हैं तो जहां पहले उनकी जीत पक्की मानी जा रही थी अब केजरीवाल ने सबको संशय में डाल दिया है। शीला दीक्षित को करारी हार देने के बाद अब कोई अरविंद केजरीवाल को हल्के में नहीं ले सकता।

       अरविंद केजरीवाल ने दावा किया है कि आप सौ सीटें जीतेगी। जिसके साथ योगेन्द्र यादव जैसा चुनाव विशलेषक हो तो उसके दावे का ठोस आधार होगा। सौ सीटें लाकर आप सरकार बनाने नहीं तो बनवाने की भूमिका में तो आ ही जाएगी। यह बयान देकर कि भ्रष्टाचार से बड़ी समस्या इस देश के लिए साम्प्रदायिकता है, क्योंकि भ्रष्टाचार तो शायद कानून बना कर खत्म किया जा सकता है लेकिन साम्प्रदायिक सोच से निपटना एक कठिन चुनौती है, अरविंद ने भाजपा के लिए संकट गहरा दिया है। यह साफ है कि साम्प्रदायिकता का रथ अब यदि कोई रोक पाएगा तो वह और कोई धर्मनिर्पेक्ष ताकत नहीं बल्कि अरविंद केजरीवाल होंगे। नरेन्द्र मोदी के मंसूबों पर पानी फेरने की तैयारी में है आप।

       अरविंद केजरीवाल, जिनके ऊपर अण्णा हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के शुरू में साम्प्रदायिक होने का भी आरोप लगा, ने अब साम्प्रदायिकता के खिलाफ स्पष्ट भूमिका लेते हुए दिखा दिया कि वे न सिर्फ भ्रष्टाचार के खिलाफ हैं बल्कि हरेक बुराई के खिलाफ हैं और बड़े से बड़े विरोधी के छक्के छुड़ाने की काबिलियत रखते हैं।

डॉ संदीप पाण्डेय , सिटीजन न्यूज़ सर्विस (सीएनएस) के स्तम्भ-लेखक
मार्च २०१४

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