"कोई नवजात शिशु एचआईवी पोसिटिव न हो" इस सपने को एड्स कार्यक्रम साकार करे

थाइलैंड और श्री लंका जैसे कुछ देशों ने एचआईवी पॉज़िटिव मातापिता से बच्चे को होने वाले एचआईवी संक्रमण को पूर्ण रूप से समाप्त कर दिया है। सभी गर्भवती महिलाओं को एचआईवी जाँच प्रदान करना, जो एचआईवी के साथ जीवित हों उन्हें नेविरापीन-वाली दवा का इलाज आदि नि:शुल्क प्रदान करवाना और बच्चे के जन्मोपरांत पहले 6 माह सिर्फ़ माँ का स्तनपान करवाना (और कोई आहार नहीं) जैसे प्रमाणित कार्यक्रमों के ज़रिए इन देशों ने यह जन स्वास्थ्य के लिए बड़ी उपलब्धि हासिल की है. इसके साथ ही इन देशों में जो महिलाएँ गर्भावस्था के दौरान एचआईवी पॉज़िटिव पायी गयीं थीं उनको पूरी उम्र नि:शुल्क अंतिरेट्रोविरल दवा मिलती है जिससे कि वे सामान्य ज़िंदगी जी सकें।

पर भारत अभी इस लक्ष्य को हासिल करने से दूर है। उत्तर प्रदेश में एक समाचार के अनुसार सिर्फ़ 20% गर्भवती महिलाओं को एचआईवी जाँच मिल रही है। यह अत्यंत चिंताजनक है क्योंकि यदि सभी गर्भवती महिलाओं को एचआईवी जाँच नहीं मिलेगी तो कैसे यह सुनिश्चित होगा कि कोई भी नवजात शिशु एचआईवी पोसिटिव न हो?

इसके साथ यह भी अत्यंत आवश्यक है कि जो महिलाएँ एचआईवी पोसिटिव हों उन्हें अंतिरेट्रोविरल दवा मिले जिससे कि वे प्रसूति उपरान्त सामान्य ज़िंदगी जी सकें.

भारत सरकार ने अन्य 190 से अधिक देशों की सरकारों के साथ संयुक्त राष्ट्र में यह वादा किया है कि 2030 तक एड्स समाप्त हो जाएगा (Sustainable Development Goals/ SDGs या सतत विकास लक्ष्य). यदि सरकार अपने किए इस वादे के प्रति ईमानदार है तो यह बिना विलम्ब सुनिश्चित करना होगा कि सभी गर्भवती महिलाओं को एचआईंवी जाँच मिले और जो महिलाएँ एचआईवी पोसिटिव हों उन्हें नेविरापीन दवा आधारित उपचार, अंतिरेट्रोविरल दवा और अन्य सुविधाएँ मिलें.

अब वैज्ञानिक शोध से यह स्थापित है (HPTN052) कि यदि एचआईवी पोसिटिव व्यक्ति अंतिरेट्रोविरल दवा समयानुसार लेगा तो उसका वाइरल लोड अत्यंत कम रहेगा और उससे किसी और को एचआईवी संक्रमण फैलने का ख़तरा भी लगभग नगण्य या बहुत कम रहेगा. यह बड़ी जन-स्वास्थ्य उपलब्धि होगी: एचआईवी के साथ जीवित लोग स्वस्थ रहें, सामान्य जीवनयापन करें, और एचआईवी संक्रमण पर प्रभावकारी रोक लगे.

एचआईवी संक्रमण के फैलने पर प्रभावकारी रोक लगना आवश्यक है: यह तभी सम्भव है जब एचआईवी से बचाव के सभी व्यापक कार्यक्रम प्रभावकारी हों (लोग कंडोम आदि इस्तेमाल करें, रक्त दान सुरक्षित हो आदि), सभी एचआईवी के साथ जीवित व्यक्ति अंतिरेट्रोविरल दवा नियमित ले रहे हों और उनका वाइरल लोड अत्यंत कम (undetectable) रहे और वो सामान्य ज़िंदगी जी रहे हों, और किसी भी नवजात शिशु को एचआईवी माता पिता से संक्रमित न हो।

एड्स कार्यक्रम का समन्वयन, स्वास्थ्य और ग़ैर-स्वास्थ्य विकास कार्यक्रमों से बेहतर और अत्यंत प्रभावकारी हो. जब एचआईवी के साथ जीवित लोग सामान्य ज़िंदगी जी रहे हैं तो ज़ाहिर है उम्र सम्बंधित अन्य मुद्दे भी आएँगे इसीलिए एड्स कार्यक्रम का तालमेल अन्य कार्यक्रमों के साथ अधिक महत्वपूर्ण बन जाता है.

बाबी रमाकांत, सीएनएस (सिटिज़न न्यूज़ सर्विस)
6 फरवरी 2017

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