लोकतंत्र व गरीब के लिए उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार बनना कोई अच्छी खबर नहीं

डॉ संदीप पाण्डेय, सीएनएस वरिष्ठ स्तंभकार और मग्सेसे पुरुस्कार से सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता
उत्तर प्रदेश के 2017 के विधान सभा चुनावों में चौंकाने वाले परिणाम लाते हुए भारतीय जनता पार्टी ने 403 में से 325 सीटें हासिल कर ली हैं। भाजपा का नारा है ‘सबका साथ, सबका विकास,' किंतु न तो 2014 के संसद चुनाव में और न ही ताजा विधान सभा चुनाव में भाजपा ने किसी मुस्लिम को अपना उम्मीदवार बनाया। उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आबादी 19.3 प्रतिशत है। भाजपा ने मुस्लिम मतों को भी हासिल करने का कोई प्रयास नहीं किया। भाजपा और उसकी वैचारिक प्रेरणा स्रोत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि उनकी राजनीति में मुसलमानों का कोई स्थान नहीं है।

सवाल यह है कि जो पार्टी अब केन्द्र और उत्तर प्रदेश में सरकार में रहेगी वह प्रदेश के पांचवे हिस्से का प्रतिनिधित्व करने को तैयार नहीं और न ही उनकी कोई जिम्मेदारी लेने को तैयार है। देश की आजादी के समय जो साम्प्रदायिक दंगे हुए उससे देश में साम्प्रदायिकता की भावना काफी फैल गई थी। 1992 से अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिरने के समय से देश में साम्प्रदायिक राजनीति का दूसरा चरण सामने आया है जिसमें लोगों के दिमागों में विभाजन पैदा कर दिया गया है। आजादी के समय की तरह इस समय भी देश में मुसलमान एक असुरक्षा की भावना से ग्रसित हो रहे हैं। जाहिर है कि यह स्थिति देश के लिए ठीक नहीं है। इस देश में आतंकवाद की शुरुआत बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद से हुई है।

यही गुजरात मॉडल है। अल्पसंख्यकों को अलग करो और फिर उनको हर सुविधा से वंचित करो। गुजरात में आज यह स्थिति है कि हिन्दू-मुस्लिम साथ में रह नहीं सकते। सच्चर समिति की आख्या यह बताती है कि इस देश में मुस्लिमों की स्थिति दलितों से थोड़ी ही बेहतर है। यदि राष्ट्रीय गरीबी का औसत 22.7 प्रतिशत है तो मुसलमानों की गरीबी का प्रतिशत 31 और अनुसूचित जाति व जनजाति का 35 प्रतिशत है। 40.7 प्रतिशत मुस्लिम अन्य पिछड़ा वर्ग श्रेणी में आते हैं जो कुल अन्य पिछड़ा वर्ग का 15.7 प्रतिशत हैं। मुस्लिम में अरजाल समुदाय की स्थिति तो अति पिछड़ा वर्ग में आएगी।

आबादी के किसी एक हिस्से का बहिष्कार करने वाली राजनीति का लोकतंत्र की भावना से तालमेल नहीं बैठता। नरेन्द्र मोदी देश के पहले प्रधान मंत्री हैं जो अपने आप को हिन्दुओं के प्रधान मंत्री के रूप में स्थापित कर रहे हैं। जिस तरह की बातें उन्होंने उत्तर प्रदेश के चुनाव में कहीं - कि दिवाली पर भी उतनी ही बिजली मिलनी चाहिए जितनी रमजान पर मिलती है, शमशान में उतनी जगह मिलनी चाहिए जितनी कब्रिस्तान में मिलती है और कानपुर में कुछ माह पहले हुई रेल दुर्घटना को अचानक सीमा पार, यानी पाकिस्तान, से कराई गई घटना बता दिया - ताकि हिन्दू मतों का ध्रुवीकरण हो जाए, ऐसा अभी तक के किसी प्रधान मंत्री ने नहीं किया है। जब नरेन्द्र मोदी प्रधान मंत्री बने तो विश्व हिन्दू परिषद के तत्कालीन अध्यक्ष अशोक सिंघल ने बयान दिया था कि मुगल काल के बाद भारत में पहली बार हिन्दू शासन की वापसी हुई है। यह बात उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी के लिए नहीं कही थी क्योंकि उनकी छवि साम्प्रदायिक व्यक्ति की नहीं थी। अब मोदी इस बात को साबित कर रहे हैं। प्रधान मंत्री अपने को सिर्फ एक समुदाय के हितों से जोड़े इस बात के लिए भी लोकतंत्र में कोई जगह नहीं।

हिन्दुओं के मतों का इस आधार पर धु्रवीकरण करना कि मुसलमानों का इस देश में तुष्टिकरण होता है मुसलमानों के साथ एक क्रूर मजाक है। हकीकत तो यह है कि मुसलमान एक वंचित और पीड़ित तबका है। बम विस्फोट या आतंकवादी घटनाओं में आरोपी बनाए गए कई मुस्लिम नवजवान कई सालों बाद न्यायालय द्वारा बरी किए जाते हैं क्योंकि उनके खिलाफ सबूत नहीं होते। लेकिन उनका जीवन बरबाद हो जाता है और समाज में यह धारणा और मजबूत हो जाती है कि ऐसी घटनाओं के पीछे मुस्लिम ही होते हैं क्यों कि जितना बढ़ा चढ़ा कर उनकी गिरफ्तारी की खबरें छपती हैं उतना उनकी रिहाई की नहीं छपतीं।

जितना चौंकाने वाली भाजपा की जीत है उतना ही चौंकाने वाली मणिपुर में इरोम शर्मीला की हार है। शायद ही मणिपुर में कोई हो जो मणिपुर से सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम को हटने के पक्ष में न हो जिसको लेकर इरोम ने 16 वर्षों की कठिन तपस्या की किन्तु वहां की जनता ने उसे सिर्फ 90 मत दिए।

दूसरी तरफ अपनी पत्नी की हत्या के आरोपी अमनमणि त्रिपाठी, जिनके माता-पिता दोनों मधुमिता शुक्ला हत्याकांड में पहले ही जेल में हैं, नौतनवा से विधान सभा चुनाव जीत गए। इसी तरह आपराधिक छवि के मुख्तार अंसारी भी मऊ से चुनाव जीत गए।

इससे साफ है कि सिर्फ जनता के मुद्दों पर संघर्ष करने वालों को जनता आसानी से मत नहीं दे देती। चुनाव जीतने के लिए पैसा, संगठन और तिकड़म, यहां तक कि समाज को जाति या धर्म के आधार पर बांटने की जरूरत पड़े तो वह भी किया जाता है। जनता इरोम जैसी सीधी-सादी महिला को नहीं चुनती लेकिन आपराधिक छवि के लोगों को चुन लेती है।

कई लोग यह मान रहे हैं कि भाजपा अच्छा शासन देगी। भाजपा के 137 उम्मीदवारों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज थे और हरेक चार में से एक के खिलाफ तो गम्भीर मामले दर्ज थे। अन्य पार्टियों की तुलना में भाजपा के पास कई गुना पैसा था और उसके उम्मीदवार भी खूब पैसे वाले थे। चार में से तीन उम्मीदवार तो करोड़पति थे। क्या यह आम समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं? आम इंसान न तो अपराधी है और न अमीर। भाजपा सिर्फ अमीर वर्ग की पार्टी है और उसी के लिए काम करेगी।

अतः हम देखते हैं कि लोकतंत्र व गरीब की दृष्टि से उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनना कोई बहुत अच्छी खबर नहीं है।

डॉ संदीप पाण्डेय, सीएनएस वरिष्ठ स्तंभकार और मग्सेसे पुरुस्कार से सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता
13 मार्च 2017
(डॉ संदीप पाण्डेय, मग्सेसे पुरुस्कार से सम्मानित वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता हैं. वर्त्तमान में वे आईआईटी गांधीनगर में इंजीनियरिंग पढ़ा रहे हैं और सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी हैं. वे आईआईटी-कानपुर और आईआईटी-बीएचयू समेत अनेक प्रतिष्ठित संस्थानों में आचार्य रहे हैं. डॉ पाण्डेय जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय और आशा परिवार के भी नेत्रित्व कर रहे हैं. ईमेल: ashaashram@yahoo.com | ट्विटर )

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