चुनाव के दौरान मीडिया के दुरूपयोग पर अध्ययन के निष्कर्ष

चुनाव के दौरान मीडिया के दुरूपयोग पर अध्ययन के निष्कर्ष

१५वीं लोक सभा चुनाव के दौरान लखनऊ के चार अखबारों का अध्ययन करने पर यह ज्ञात हुआ कि कुछ राजनीतिक दलों एवं उम्मीदवारों ने व्यवस्थागत ढंग से प्रायोजित खबरें जो प्रत्येक दिन अखबार में एक ही अकार की और एक ही स्थान पर देखने को मिलीं, छपवाई हैं. ऐसा करके अखबारों ने अपने पाठकों के साथ विश्वासघात किया है क्योंकि यह पाठक के उस मूल विश्वास को तोड़ता है जिसके आधार पर निष्पक्ष एवं संतुलित खबर पढ़ने के लिये पाठक अखबार खरीदता है. चुनाव के दौरान कुछ अखबारों में, समाचार, विचार और प्रचार के बीच कोई भेद ही नहीं रह गया था. कुछ अखबारों ने तो छोटे अक्षरों में 'advt' या इस तरह का कोई संकेत छापा जिससे मालूम हो कि प्रकाशित सामग्री प्रायोजित है किन्तु कुछ अखबारों ने यह भी छापने का कष्ट नहीं उठाया. इन ख़बरों को विश्वसनीयता प्रदान करने के लिये समाचार पत्रों ने अल्प-कालिक एजेंसिया भी बना लीं जो स्पष्ट नहीं है कि समाचार एजेंसियां है या विज्ञापन एजेंसियां?

हमने उम्मीदवारों द्वारा छपवाई गयी प्रायोजित ख़बरों को विज्ञापन मान कर अखबार के विज्ञापन दरों से उनके द्वारा इन ख़बरों को छपवाने में हुए खर्च का आंकलन किया है. इसके अनुसार लखनऊ के एक उम्मीदवार डॉ अखिलेश दास गुप्ता ने सिर्फ एक ही अखबार में २५ लाख रूपये, जो एक उम्मीदवार द्वारा लोक सभा चुनाव में खर्च किये जाने की अधिकतम सीमा है, से ज्यादा खर्च किये हैं. हम उम्मीद करते हैं कि चुनाव आयोग अपनी आचार संहिता के उस उल्लंघन को गंभीरता से लेगा.

यह स्पष्ट है कि राजनितिक दल एवं उम्मीदवार जो अन्यत्र चुनाव आयोग की आचार संहिता का गंभीरता से पालन करते हैं, अपने प्रचार हेतु मीडिया का जम कर दुरूपयोग करते हैं. और अफ़सोस की बात यह है कि मीडिया भी अपना दुरूपयोग होने देती है. दोनों के खिलाफ ही कठोर कारवाई की आवश्यकता है.

हम उम्मीद करते हैं कि प्रेस काउंसिल समाचार पत्रों पर अंकुश लगायेगी तथा उन्हें 'प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया की चुनाव के दौरान पत्रकारिता हेतु मार्ग-निर्देश १९९६' का पालन करने के लिये बाध्य करेगी. कोई भी समाचार पत्र जो इस मार्ग-निर्देश का उल्लंघन करता है उसके खिलाफ कारवाई होनी चाहिए. निबंधक, समाचार पत्र, को ऐसे समाचार पत्रों का पंजीकरण रद्द कर देना चाहिए.

चुनाव आयोग को जिस तरह वह अन्य चुनाव खर्चों पर पैनी नज़र रखता है उसी तरह समाचार पत्रों में छप रहे विज्ञापनों या प्रायोजित समाचारों के खर्चे का हिसाब-किताब भी लेना चाहिए. राजनीतिक दलों द्वारा खर्च किया गया पैसा भी उम्मीदवारों के खाते में जुड़ना चाहिए. रजनीतिक दलों पर, उम्मीदवारों की तरह, चुनाव प्रचार में खर्च पर या तो सीमा तय होनी चाहिए अन्यथा उनके खर्चे को सभी उम्मीदवारों में बराबर-बराबर बाँट दिया जाना चाहिए.

एस.आर दारापुरी, डॉ संदीप पाण्डेय, इश्वर चन्द्र द्विवेदी, अरुंधती धुरु, नवीन तिवारी, डॉ राहुल पाण्डेय, प्रभा चतुर्वेदी, रमाकांत चतुर्वेदी, विवेक राय, हिमांशु, महेंद्र, अभिषेक, बाबी रमाकांत

जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय (एन.ए.पी.एम्) एवं लोक राजनीति मंच
संपर्क: २३४७३६५ (संदीप), ९८३९० ७३३५५ (बाबी रमाकांत)

No comments: