नहीं लौटेंगे गाँधी, हमें ही कुछ करना होगा

इक्कीसवीं सदी में जिस प्रकार की हिंसा का हमारी दुनिया को सामना करना पड़ रहा है वह एक बिलकुल अलग प्रकार की हिंसा हैं /११ के बाद से दुनिया इसे "आतंकी हिंसा " कहने लगी है वैसे, हिंसा तो हिंसा है चाहे हम उस पर कोई भी लेबल चस्पा कर दें

उन्नींसवीं सदी में युद्ध तब होते थे जब अपने साम्राज्य का विस्तार करने के लिए कोई देश, किसी दूसरे देश पर हमला करता था कभी-कभी दो देश आपस में किसी और कारण से उन्हे लड़ थे। आतंकी हिंसा दो दृष्टियों से युद्ध की हिंसा से अलग हैं पहली यह कि आंतकी हमलों का किसी देश के विरुद्ध युद्ध की घोषणा करने जैसा औपचारिक स्वरुप नहीं होता और दूसरी यह कि आतंकी हिंसा अक्सर प्रतिक्रिया स्वरुप होती है आतंकी हिंसा की तुलना गुरिल्ला युद्ध से भी नहीं की जा सकती

हाल में, नक्सलियों या माओवादियों जो भी नाम हम उन्हें देने चाहें की हिंसा ने पूरे देश कों झकझोर कर रख दिया है इसी तरह, जिस क्रूरता से पाकिस्तान में जिहादी, निर्दोषों का खून बहा रहे हैं, वह भी बहुत दु:खद है शुक्रवार २८ मई को लाहौर की अहमदी मस्जिदों में हुए हमले जिनमें सत्तर से अधिक नमाजी मारे गए-ने पूरी मानवता को कलंकित किया है

भारत ने पिछली सदी में अहिंसा के अनन्य पुजारी महात्मा गाँधी को जन्म दिया , जिन्होंने अहिंसक तरीकों से देश को ब्रिटिश गुलामी से मुक्ति दिलाई आतंकवादियों की बेजा हिंसा के चलते, कई लोग यह प्रश्न उठा रहे हैं की हमारे युग में गाँधी जी के अहिंसा के सिद्धांत की तनिक भी प्रासंगिकता बची है ? क्या महात्मा गाँधी अप्रासंगिक हो गए हैं ? क्या गाँधी जयंती और शहीद दिवस पर उन्हें औपचारिक श्रद्धांजली देना ही गाँधी जी से हमारा एक मात्र रिश्ता रह गया है ?

गांधीवादी विचारकों की यह जिम्मेदारी है की वे इन प्रश्नों के उत्तर दें और इन शंकाओ का समाधान करें जो लोग स्वयं को गांधीवादी कहते हैं, क्या वे भी गाँधी जी और उनके चिंतन को गम्भीरता से लेते हैं ? या फिर गाँधीवाद एक तरह का धर्म बन चुका है जिसके अपने कर्मकांड हैं, आश्रम है और संग्रहालय हैं आखिर गाँधीवादी कहाँ हैं ? वे क्या कर रहे हैं ? हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि गाँधी जी की अहिंसा केवल दर्शन नहीं थी उनके लिए अहिंसा एक पवित्र धर्म था जिसकी रक्षा के लिए वे अपनी जान तक देने के लिए तैयार रहते थे वे हिंसा के विरुद्ध सडकों, चौराहों और दूर-दराज के गाँवों में संघर्ष करते थे

सन १९८० के दशक में मैं गुजरात गया था उस दौर में वहाँ जातिगत साम्प्रदायिक हिंसा को बोलबाला था मुझे गाँधी के प्रदेश में और अहमदाबाद तक में जहाँ साबरमती आश्रम है एक भी सा गांधीवादी नहीं मिला जो फिरका परस्तों के सामने हिम्मत से खड़ा हो सके या कम से कम साम्प्रदायिक हिंसा के खिलाफ आमरण अनशन कर सके आमरण अनशन एक ऐसा प्रभावी तरीका था जिसका गाँधी जी ने साम्प्रदायिकता की आग को बुझाने के लिए कई बार इस्तेमाल किया कटु सत्य तो यह है कि सन २००२ में साबरमती आश्रम के कर्ताधर्ताओ ने मेधा पाटकर और अन्य शान्ति कार्यकर्ताओं को आश्रम में शान्ति सभा तक आयोजित नहीं करने दी थी उन्हें डर था कि राज्य सरकार उन्हें मिलने वाला अनुदान बंद कर देइसे गांधीवादी किस काम के जिन्हें गाँधी के सिद्धांतों से ज्यादा प्यारा सरकारी अनुदान है ?

आईये
, सबसे पहले हम गांधीजी के अहिंसा के सिंद्धांत के मुख्य तत्वों कों समझेंगाँधी जी सत्यग्रह और अहिंसा अटूट आस्था रखते थेवे सत्य और अहिंसा दोनों के पुजारी थे सत्य और अहिंसा कों एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकतासत्य के बिना अहिंसा बेमानी है और अहिंसा-विहीन सत्य, अर्थहीन है

सत्य और अहिंसा अविभाज्य इसलिए हैं क्योंकि सत्य ही अहिंसक हो सकता है और अहिंसा केवल सीटी पर आधारित हो सकती हैसत्य कभी जोर-जबरदस्ती से लादा नहीं जा सकतासत्य एक आंतरिक भावना हैं और किसी भी प्रकार की जोर जबरदस्ती सत्य को प्रदूषित कर देगीदूसरी और हिंसा, जोर जबरदस्ती का चरम स्वरुप हैहिंसा के जरिए लोगों को वह मानने पर मजबूर किया जाता है जो वे नहीं मानना चाहतेहिंसा के कारण लोगों को वह स्वीकार करना पड़ता है जो उन्हें अस्वीकार्य हैअत: सत्य और अहिंसा परस्पर विरोधी हैं

अहिंसा प्रत्येक व्यक्ति को अंत:करण की आजादी की पूर्ण गारंटी देती हैहर व्यक्ति अपनी आस्था विश्वास के अनुरूप कार्य और व्यवहार करने के लिए स्वतंत्र रहता हैस्वहित के लिए किया जाने वाला कार्य, सत्य को प्रदूषित करता है और इससे प्रेरित व्यक्ति नकली व्यवहार करता है जो अंतत: हिंसा का कारण बन सकता है । इस तरह अहिंसक व्यवहार के मुख्यत: तीन लक्षण हैं-
१. वह सच्ची आस्था व विश्वास पर आधारित होना चाहिए ।
२.वह सत्याचरण पर आधारित होना चाहिए और
३. वो अंत: करण की आवाज पर आधारित होना चाहिए ।
ऐसा व्यवहार, जिसमें इनमें से एक भी लक्षण कम है, का अंतिम नतीजा हिंसा भी हो सकती है।

डॉ
. असगर अली

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