शारदा नदी के कटान को रोकने की मांग को ले कर जल सत्याग्रह

[फोटो] [English] रेउसा ब्लॉक सीतापुर जिला के सैंकड़ों लोगों ने 25-26 फरवरी 2013 को जल सत्याग्रह में भाग लिया। यह लोग शारदा नदी के पानी में इसलिए उतरे क्योंकि हर साल शारदा नदी के 7 किमी तक रास्ता बदलने पर और बढ़ते पानी से अनेक गाँव डूब आए। हजारों की संख्या में लोगों के घर पानी में पूर्णत: समाप्त हो गए। कटान रोको संघर्ष मोर्चा का नेतृत्व कर रहीं ऋचा सिंह ने कहा कि लगभग 800 परिवार तो सड़क पर दोनों ओर अस्थायी तरीके से किसी तरह से जीवित हैं। परंतु सीतापुर जिला प्रशासन और उत्तर प्रदेश सरकार दोनों ने अभी तक शारदा नदी से इन लोगों को बचाने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया है।

तहसील के आंकड़ों के अनुसार, 2010-2011 में 2074 घर पूरी तरह से शारदा नदी में पूर्णत: विलीन हो गए, और 4 लोगों की मृत्यु हो गयी। 2011-2012 में 1040 घर पूरी तरह से शारदा नदी के पानी में विलिप्त हो गए जिनमें 123 पक्के घर, 89 कच्चे घर और 850 झोपड़ी शामिल हैं।

पिछले अनेक दशकों में शारदा नदी में सीतापुर जिले के चार ब्लॉक के अनेक गाँव का अस्तित्व ही समाप्त हो गया है। ये चार ब्लॉक हैं: रेउसा, रामपुर मथुरा, सकरण और बेहटा। जो गाँव पूरी तरह खत्म हो गए हैं उनमें कुछ गाँव इस प्रकार हैं: काशीपुर, सेनापुर, और मल्लापुर।

ऋचा सिंह ने सिटीजन न्यूज़ सर्विस (सीएनएस) को बताया कि कुछ लोगों ने हताश हो कर अत्महत्या तक कर ली है। लगभग 4-5 लोगों ने पिछले बीते साल में ही अत्महत्या की। पिछले सालों  में लगभग 1500 परिवार इस समस्या से विस्थापित हुए हैं और सरकार ने अधिकतम जो किया है वो मात्र नगण्य हरजाना देने का काम – झोपड़ी खोने वाले व्यक्ति को सरकार ने रुपया 2000 दिया, जो स्थानीय लोग तक मानते हैं कि शर्मनाक है। एक व्यक्ति, सुधाकर, की मृत्यु 22 अक्तूबर 2012 को विस्थापित लोगों की बैठक में ही हो गयी।

जिला प्रशासन ने अनेक बार यह आश्वासन दिया है कि वो इस समस्या का समाधान करेगा पर कोई भी कार्यवाही आरंभ नहीं हुई है। लोगों की मांग है कि प्रदेश सरकार रुपया 3.52 करोड़ की धनराशि बिना विलंब सिचाई विभाग को दे जिससे कि शारदा नदी के कटान पर रोक लग सके। हालांकि यह अस्थायी समाधान है पर यह अत्यंत आवश्यक है क्योंकि इससे यह हजारों परिवार शारदा नदी से इस साल बच पाएंगे। ऋचा सिंह का मानना है कि इससे 50,000 लोगों की आबादी बच पाएगी जो 20-25 गाँव में रहती है।

बाबी रमाकांत, सिटिज़न न्यूज़ सर्विस - सीएनएस

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