भेदभाव से जूझ रहे एचआईवी/एड्स के साथ जीवित लोग

वृहस्पति कुमार पाण्डेय, सिटीजन न्यूज सर्विस - सी एन एस
[सर्व-प्रथम सरस-सलिल में प्रकाशित]
देश में बढ रहे एचआईवी/एड्स के साथ जीवित लोगों की संख्या को देखते हुए सरकार द्वारा व्यापक स्तर पर न केवल प्रचार प्रसार किया जा रहा है बल्कि सरकारी व गैर सरकारी स्तर पर सघन रूप से ऐसी गतिविधियां भी संचालित की जा रही हैं जिससे एचआईवी/एड्स को फैलने से रोका जा सके। सरकार द्वारा चलाये जा रहे जागरूकता गतिविधियों का एक उद्देश्य एड्स को फैलने से रोकने के अलावा इसको लेकर समाज में फैली भ्रान्तियों व भेदभाव को खत्म करना भी है, लेकिन सरकार का यह प्रयास आज भी इस मामले में नाकाफी साबित हो रहा है।

लोगों का ऐसा मानना है कि एच.आई.वी. व एड्स साथ बैठने, साथ खाना खाने, हाथ मिलाने जैसे कारणों से फैलता है जिसकी वजह से लोग एचआईवी/एड्स के साथ जीवित व्यक्ति से दूरी बनाने की कोशिश करते हैं जबकि आज तक एड्स फैलने के सिर्फ चार कारण ही सामने आ पाये हैं जिसमें १) असुरक्षित यौन सम्बन्ध बनाना; २) एच.आई.वी. पीडित मां से उसके होने वाले बच्चे में; ३) एच.आई.वी. व एड्स संक्रमित रक्त को सामान्य व्यक्ति को चढाना; और ४) संक्रमित सुई से नशा लेना व एच.आई.वी. संक्रमित औजारों का शरीर के अंगों व घावों में प्रवेश करना ही है। इसके अलावा कोई भी कारण एड्स फैलने का खतरा नहीं बनता है, फिर भी  लोग यह जानने के बाद भी एच.आई.वी. व एड्स के साथ जीवित व्यक्तियों से दूरी बनाने की  कोशिशि करते हैं, जिसकी वजह से एच.आई.वी. व एड्स  साथ जीवित लोगों को तमाम परेशानियों से दो चार होना पडता है।

लखनऊ, उत्तर पद्रेश की रहने वाली टीना (बदला हुआ नाम) को जन्म के समय ही एच.आई.वी की बीमारी मां से मिली थी जब इस बात की जानकारी टीना के पिता को हुई तो उन्होने टीना की मां के ऊपर गलत सम्बन्धों का लांछन लगाकर घर से निकाल दिया। टीना की मां लाख दुहाई देती रही, रोई गिड़गिड़ायी कि उसका किसी से गलत सम्बन्ध नहीं रहा है वह ऐसी अवस्था में अपनी छोटी सी बिटिया को लेकर कहाँ जायेगी लेकिन उसके पति का दिल नहीं पसीजा उसने टीना व उसकी मां को धक्के मारकर घर से निकाल दिया। बाद में पता चला कि टीना की मां को यह बीमारी उसके पिता से मिली थी क्योंकि उनका कई महिलाओं से नाजायज सम्बन्ध था, जिसके चलते कहीं से उनको यह बीमारी लग गयी फिर उनसे यह बीमारी टीना की मां को और फिर मां से टीना को हो गयी।

टीना की मां का पति का साथ छूटने के बाद टीना का लालन पालन करना कठिन हो गया था तभी उनकी मुलाकात एचआईवी/एड्स के साथ जीवित लोगों के  संगठन से हुआ। टीना की मां ने उस नेटवर्क से जुडने के बाद लखनऊ के एक बडे सरकारी अस्पताल में काउन्सलर की नौकरी कर ली लेकिन जिस किराये के मकान में टीना की मां रह रही थी उस मकान के मालिक को यह पता चला कि मां बेटी दोनों एचआईवी/एड्स से संक्रमित हैं तो उसने घर खाली करने को कह दिया। इसके बाद यह सिलसिला सा चल पड़ा। इसी बीच टीना की मां की एच.आई.वी. की बीमारी एड्स में बदल गयी और उसी बीच उसे कैंसर जैसी बीमारी ने जकड़ लिया, ज्यादा तबियत बिगडने के बाद टीना ने अपनी मां को उसी अस्पताल में भर्ती कराया जहां वह काउन्सलर थी लेकिन उसको तब एहसास हुआ कि वहां इलाज करने वाले डाक्टर भी एचआईवी/एड्स संक्रमित मरीजों के साथ भेदभाव करते हैं।

टीना ने देखा कि जिस वार्ड में उसकी मां भर्ती थी उसमें उसकी मां के साथ जितने भी एचआईवी/एड्स से संक्रमित मरीज भर्ती थे उनके बेड पर एक विशेष टैग लगा हुंआ था। जो उनके इस इस बीमारी से ग्रसित होने का संकेत था। ऐसे मरीजों से डाक्टर एक विशेष दूरी बनाकर ही बात करते थे साथ ही इन मरीजों से डाक्टरों का व्यवहार भी अजीब तरह का होता था। टीना का कहना है कि एचआईवी/एड्स के चलते उसकी मां की जान चली गयी लेकिन उसकी मां तो मरने के पहले भी तिल तिलकर इसलिए मरती रही क्योंकि उसको एच.आई.वी. व एड्स पीड़ा से ज्यादा लोगों की उपेक्षा की पीड़ा भी झेलनी पड़ी। मां की मौत के बाद टीना को तमाम तरह की परेशानियों से जूझना पड़ा। वर्तमान में वह उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा संचालित लखनऊ के एक बडे अस्पताल में एच.आई.वी. व एड्स मरीजों की काउन्सलर है वह कहती है कि उसे एच.आई.वी. है लेकिन वह एक स्वस्थ जीवन जी रही है। फिर भी वह अपनी इस बीमारी के बारे में किसी को इसलिए नहीं बता सकती क्योंकि उसकी इस बीमारी के जानने के बाद लोगों का नजरिया बदल जाता है। उसके लिए सबसे बडी समस्या किराये के मकान की है क्योंकि कोई भी मकान मालिक उसके इस बीमारी के बारे में जानने के बाद उसे मकान देने को तैयार नहीं होता है। इसके अलावा लोग उसमें एच.आई.वी. होने के कारण उसको गलत चाल चलन का मानते हैं जबकि यह बीमारी उसे मां के गर्भ से ही मिली थी।

नजरिये में लाना होगा बदलाव

एचआईवी/एड्स के साथ जीवित लोगों के लिए सरकार द्वारा यह पॉलिसी तय की गयी है कि किसी भी एच.आई.वी. व एड्स के साथ जीवित लोगों का जहां पर जांच इलाज या काउन्सिलिंग चल रहा है वहां का सम्बन्धित डाक्टर या जिम्मेदार व्यक्ति उस व्यक्ति से जुड़े सभी रिकार्डो व नाम को गोपानीय रखेगा और किसी भी स्थिति में उस का नाम सार्वजनिक नही करेगा। इस मसले पर स्वास्थ्य को वोट अभियान के निदेशक राहुल द्विवेदी का कहना है कि एच.आई.वी.व एड्स के साथ जीवित व्यक्तियों के प्रति लेागों का रवैया नकरात्मक व घृणाष्पद रहता है जबकि एच.आई.वी. से संक्रमित व्यक्ति भी सामान्य लेागों की तरह जीवन जीने में सक्षम होता है। उनका कहना है कि एच.आई.वी.व एड्स का संक्रमण जानकारी के अभाव में होता है ऐसे में व्यापक स्तर पर जागरूकता लाने से एच.आई.वी. को फैलने से रोका जा सकता है। वह बताते हैं कि सरकार द्वारा एच.आई.वी. व एड्स संक्रमित लोगों के प्रति भेदभाव पर रोक लगाने के लिए नेशनल एड्स कन्ट्रोल आर्गनाइजेशन के माध्यम से पॉलिसी तय की गयी है जिसका अनुपालन न करने पर सम्बन्धित व्यक्ति पर कार्यवाही भी सम्भव है। उन्होंने बताया कि सरकार ने वर्ष 2030 तक वैश्विक स्तर पर सतत विकास लक्ष्य के तहत यह वायदा किया है  कि वह २०३० तक एचआईवी/एड्स संक्रमण और इससे होने वाली मौतों को पूरी तरह से रोक लिया जायेगा। ऐसे में जरूरत है कि आम लोग भी एच.आई.वी. व एड्स के प्रति सकारात्मक नजरिया अपनायें।

सरकार के आदेशों पर भारी साबित होता भेदभाव

सरकार द्वारा एचआईवी/एड्स के साथ जीवित लोगों के लिए सरकारी स्तर पर तमाम तरह के सुविधायें प्रदान की गयी हैं लेकिन सरकार की यह सुविधायें भेदभाव व भ्रान्तियों के चलते उन तक नही पहुंच पाती। भेदभाव का एक मामला राजस्थान के बाडमेर शहर में देखने को मिला जब एक एचआईवी/एड्स संक्रमित व्यक्ति ने सरकारी बस में सफर करते समय कण्डक्टर से किराये में छूट लेने के लिए अपनी बीमारी का प्रमाण पत्र दिखाया लेकिन कण्डक्टर ने उसकी बीमारी को जानने के बाद उस व्यक्ति को डांटडपट कर उसकी बीमारी सार्वजनिक करते हुए उसे बस से उतार दिया। इस तरह घटनायें न केवल दुखद है बल्कि एचआईवी/एड्स के साथ जीवित लोगों के सुखी जीवन में भी आडे आती हैं।

एच आई वी संक्रमित व्यक्ति को प्यार दें, दुत्कार नहीं 

आम लोगों की तरह एचआईवी/एड्स के साथ जीवित लोग भी सामान्य जीवन व्यतीत कर सकते हैं लोगों की तरह उठ बैठ सकते हैं, त्यौहार और खुशियां मना सकते हैं व जीवनयापन के लिए नौकरी एवं व्यवसाय भी कर सकते हैं। ऐसे में इनके साथ किसी तरह का भेदभाव इनको भावात्मक रूप से तोड़ सकता है एच.आई.वी संक्रमित को उसी तरह समाज में रहने व जीवन यापन करने का हक है जैसे दूसरे लोगों को ।

गौतम बुद्ध जागृति समिति के सचिव श्रीधर पाण्डेय का कहना है कि उनकी संस्था नोएडा व गाजियाबाद में एचआईवी/एड्स संक्रमित लोगों  के साथ काम कर रही है। उन्होंने बताया कि पूरे दुनिया में तीन करोड से भी ज्यादा लोग एन्टीरेट्रो वायरल ट्रीटमेन्ट लेकर खुद की बीमारी को एक हद तक कन्ट्रोल में किये हुए हैं जिसकी वजह से उन्हें एच.आई.वी. से किसी तरह की परेशानी नही हो रही है। नई दिल्ली के रहने वाले हरि सिंह को जब पता चला कि वे एच.आई.वी. संक्रमित हैं तो उन्होंने हार नहीं मानी खुद के जीने का रास्ता तलाशा साथ ही साथ भारत सहित दुनिया भर के एच.आई.वी. व एड्स के साथ जीवित लोगों को लेकर फैली भ्रान्तियों व् एचआईवी/एड्स रोकने के अभियान को गति दी। वह वर्तमान में दिल्ली सरकार में एच.आई.वी. व एड्स मरीजो के लिए काउन्सिलिंग का काम कर रहे हैं उनका कहना है कि एच.आई.वी. व एड्स से जुड़ी काउन्सिलिंग व जागरूकता के लिए एच.आई.वी.व एड्स के साथ जी रहे लोगों को आगे आना होगा क्योंकि एचआईवी/एड्स के साथ रह रहे लोगों के सुख-दुख को यह भली भांति समझ सकते हैं और उसका सही निदान भी दे सकते हैं। ऐसी स्थितियों से बचने के लिए एचआईवी/एड्स के साथ जीवित लोगों द्वारा जिला लेबल से लेकर राज्य व राष्ट्रीय लेबल तक एच.आई.वी. व एड्स संक्रमित लोगों का संगठन बनाया गया है। जिनमें वह अपने साथ होने वाले भेदभाव व सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित होने की दशा में आवाज उठा सकते हैं।

समझें एचआईवी एड्स में अंतर

एड्स संक्रमित लोगों के साथ भेद भाव में रोक थाम के लिए में एच.आई.वी एड्स में अंतर-अंतर को जानना बहुत जरुरी है। एच.आई.वी एक वायरस है जिसका पूरा नाम ह्यूमन इमियुनो वायरस है। एच.आई.वी विषाणु संक्रमण के लगभग 12 सप्ताह के बाद ही रक्त की जॉंच से ज्ञात होता है कि यह विषाणु शरीर में प्रवेश कर चुका है, ऐसे व्यक्ति को एच.आई.वी. पोजिटिव कहते हैं। एच.आई.वी. पाजिटिव व्यक्ति कई वर्षो यानि 6 से 10 वर्ष तक सामान्य प्रतीत होता है और सामान्य जीवन व्यतीत कर सकता है, यह विषाणु मुख्यतः शरीर को बाहरी रोगों से सुरक्षा प्रदान करने वाले रक्त में मौजूद टी-कोशिकाओं व मस्तिष्क की कोशिकाओं को प्रभावित करता है और धीरे-धीरे उन्हे नष्ट करता रहता है कुछ वर्षो बाद यानि 6 से 10 वर्ष यह स्थिति हो जाती है कि शरीर आम रोगों के कीटाणुओं से अपना बचाव नहीं कर पाता और तरह-तरह का संक्रमण (इन्फेक्शन) से ग्रसित होने लगता है इस अवस्था को एड्स कहते हैं। लेकिन एच.आई.वी संक्रमित व्यक्ति को  एड्स की अवस्था में जाने से रोका जा सकता है अगर संयमित दिनचर्या, खानपान व अपने स्वास्थ्य के प्रति सजग रहे । एक जिम्मेदार नागरिक के तौर पर हमारी और आप की यह जिम्मेदारी बनती है कि हम किसी एच.आई.वी संक्रमित के बारे में जानने के बाद उससे भेद भाव न करें। बल्कि उसके साथ हम प्यार से पेश आयें । यह किसी को भी हक नहीं है कि एच.आई.वी संक्रमित को नौकरी से निकालें या उसके साथ अमानवीय व्यवहार करें बल्कि उन्हें भी औरों की तरह समाज में इज्जत से रहने और जीने हक दें ।

वृहस्पति कुमार पाण्डेय, सिटीजन न्यूज सर्विस - सी एन एस 
१५ जुलाई, २०१६                          

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