[विश्व टीबी दिवस 2017] टीबी उन्मूलन मुश्किल है पर असंभव नहीं!

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डॉ केके चोपड़ा, निदेशक, नयी दिल्ली टीबी सेंटर
टीबी नियंत्रण कार्यक्रम अनेक दशकों से चल रहे हैं पर जिस अति-धीमी गति से टीबी दरों में गिरावट साल-दर-साल आ रही है उस गति से 2184 साल तक टीबी उन्मूलन हो सकेगा. विश्व स्वास्थ्य संगठन की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, 2015 में तो भारत में टीबी दर में गिरावट के बजाय बढ़ोतरी हो गयी और टीबी मृत्यु दर में भी इजाफा हुआ. भारत सरकार समेत 190 देशों से अधिक की सरकारों ने 2030 तक टीबी उन्मूलन का वादा किया है. पर यह सपना कैसा पूरा हो? यह जानने के लिए सीएनएस (सिटीजन न्यूज़ सर्विस) ने डॉ केके चोपड़ा, निदेशक, नई दिल्ली टीबी सेंटर से मुलाकात की. डॉ केके चोपड़ा, पिछले 33 सालों से टीबी नियंत्रण कार्यों के लिए समर्पित रहे हैं.

1997 से भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय का "पुनरीक्षित राष्ट्रीय टीबी नियंत्रण कार्यक्रम" (RNTCP) देशभर में सक्रियता से टीबी उन्मूलन के लिए प्रयासरत है. 1997 से पहले, "राष्ट्रीय टीबी कार्यक्रम" दशकों चला था.

1997 से पूर्व चले इस कार्यक्रम के बारे में डॉ केके चोपड़ा ने बताया कि टीबी के इलाज एक्सरे के आधार पर होता था और २ वर्ष की अवधि तक चलता था. दशकों पहले चले राष्ट्रीय टीबी कार्यक्रम में आंकड़ें एकत्रित तो होते थे पर हर रोगी के बारे में पूरी जानकारी और इलाज सम्बन्धी जरुरी तथ्य नहीं रिपोर्ट होते थे. हर जिले में सिर्फ एक टीबी क्लिनिक होती थी. रोगी को अपने जिले की टीबी क्लिनिक से हर माह, पूरे महीने की, दवा मिलती थी. हर रोगी का एक उपचार-कार्ड बनता था. यदि रोगी हर माह दवा लेने नहीं आये तो एक सप्ताह बाद एक पोस्टकार्ड भेजा जाता था कि 'क्लिनिक से दवा ले लें' और यदि इसके बावजूद भी रोगी दवा लेने नहीं आता था तो एक दूसरा पोस्टकार्ड 21 दिन बाद भेजा जाता था. २ पोस्टकार्ड भेजने के बाद भी यदि रोगी क्लिनिक नहीं आया तो उपचार कार्ड पर विराम लगा दिया जाता था.

1997 से पहले राष्ट्रीय टीबी कार्यक्रम क्यों बेअसर था?

आज 85% रोगी सफलतापूर्वक अपना उपचार पूरा करते हैं. पर 1997 से पूर्व, शोध के अनुसार, सिर्फ 30% रोगी ही अपनी टीबी जांच करवाते थे और उपचार प्राप्त करते थे, और इनमें से मात्र एक-तिहाई ही उपचार पूरा करते थे. टीबी के 70% रोगी न जांच और न ही उपचार पाते थे - और - जिनको इलाज नसीब होता था उनमें से दो-तिहाई का इलाज अधूरा रह जाता था. इसका जन स्वास्थ्य परिणाम सोच कर ही घबराहट होती है. जाहिर है कि जन स्वास्थ्य की दृष्टि से इस कार्यक्रम का टीबी उन्मूलन पर शायद ही कोई प्रभाव पड़ रहा था. बल्कि आकंड़ों को देखें तो 1990 के दशक में, टीबी दरों में गिरावट के बजाय वृद्धि हो गयी थी.

इसीलिए राष्ट्रीय टीबी कार्यक्रम को संशोधित और पुनरीक्षित कर के 1997 में RNTCP (पुनरीक्षित राष्ट्रीय टीबी नियंत्रण कार्यक्रम) के रूप में देश भर में लागू किया गया. RNTCP का मुख्य आधार था: डॉट्स (DOTS) प्रणाली जिसके तहत रोगी, हर एक दिन छोड़ कर, निकटतम डॉट्स केंद्र में जाकर स्वास्थ्यकर्मी की निगरानी में अपनी दवा लेता था. टीबी की जांच बलगम से माइक्रोस्कोप द्वारा होती थी जिसके कारणवश पहले के मुकाबले (जब जांच एक्सरे से होती थी) अधिक कुशलता से टीबी रोगी चिन्हित होने लगे.

टीबी की नियमित दवा उपलब्ध होना एक बड़ी उपलब्धि बनी

1997 से पूर्व चले राष्ट्रीय टीबी कार्यक्रम में 3 दवाओं में से अक्सर एक न एक दवा उपलब्ध नहीं रहती थी. अधिकाँश रोगी निजी दवा दुकानों से दवाएं नहीं खरीद पाते थे और जितनी दवाएं उपलब्ध होती उतनी वे लेते थे. फलस्वरूप टीबी कार्यक्रम के नतीजे, न केवल असंतोषजनक बल्कि चिंताजनक भी रहे.

1997 के पश्चात् चले RNTCP के तहत नियमानुसार, डॉट्स केन्द्रों में हर रोगी के नाम से एक दवाओं का डिब्बा रहता है और दवाएं नियमित रूप से उपलब्ध रहती हैं. हालाँकि दवाओं की अनियमितताओं के सम्बन्ध में भी कुछ समाचार मिलते हैं पर स्थिति 1997 के पूर्व जैसी विकराल भी नहीं है और एक बड़ा सुधार तो हुआ है. 1997 के पूर्व अनियमित दवाओं की वजह से रोगी उपचार पूरा नहीं कर पाते थे. सभी रोगी उपचार सफलतापूर्वक पूरा करें, इसके लिए नियमित दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है.

सुधार करना हो तो असंतुष्ट रोगी से सीखें!

इस बात में कोई संशय नहीं है कि हर टीबी रोगी की जल्द-से-जल्द पक्की जांच होनी चाहिए और उसे बिना विलम्ब प्रभावकारी उपचार मिलना चाहिए. यदि किसी भी कारणवश रोगी उपचार पूरा करने में असमर्थ रहा हो तो उससे सीखने की जरुरत है कि वे क्या कारण थे जिनकी वजह से वो उपचार पूरा न कर पाया. उपचार पूरा करने में बाधा बन रहे कारणों का निवारण करना अतिआवश्यक है जिससे कि भविष्य में इन कारणों की वजह से किसी अन्य रोगी का उपचार अधूरा न रह जाए.

1997 से चल रहे RNTCP कार्यक्रम में यदि रोगी किसी भी कारणवश दवा लेने डॉट्स केंद्र न आये तो डॉट्स स्वास्थ्यकर्मी को उसी दिन या अगले दिन रोगी के घर अवश्य जाना चाहिए. डॉट्स स्वास्थ्यकर्मी को रोगी के घर पर उसको स्वास्थ्य-सम्बन्धी जानकारी प्रदान करनी चाहिए और उसको वापस डॉट्स केंद्र आने के लिए प्रेरित कर, उसका अधूरे उपचार को पूरा करवाना चाहिए.

टीबी और दवा प्रतिरोधक टीबी की पक्की जांच

टीबी की दवा नियमित न लेने से दवा प्रतिरोधक टीबी हो सकती है. दवा प्रतिरोधकता उत्पन्न होने के बाद, दवाएं कारगर नहीं रहतीं और नयी दवाओं से उपचार करना पड़ता है. समस्या यह है कि नयी दवाएं हैं ही बहुत कम और यदि इन दवाओं से भी प्रतिरोधकता हो गयी तो इलाज के विकल्प अत्यंत सीमित हैं और इलाज के परिणाम बहुत निराशाजनक हैं.

एक और बात: दवा प्रतिरोधकता उत्पन्न होने के बाद जो दवाओं के विकल्प हैं वो टीबी के उपचार को अधिक जटिल और लम्बी अवधि वाला बनाते हैं. हर संभव प्रयास यही होना चाहिए कि दवा प्रतिरोधकता उत्पन्न ही न हो जिससे कि इलाज 6-8 माह में सफलतापूर्वक समाप्त हो सके. दवा प्रतिरोधक टीबी का इलाज २ साल से ऊपर चलता है और परिणाम भी असंतोषजनक हैं: औसतन 50% सफलता दर है.

2008 के बाद से भारत में दवा प्रतिरोधक टीबी की जांच और उपचार सेवाओं में विशेष बढ़ोतरी हुई है. देश में गिनती की चंद अत्यंत आधुनिक जांच केंद्र थे और अब 2017 में भारत के हर प्रदेश में ऐसे अति-आधुनिक जांच केंद्र हैं. इन केन्द्रों से दवा प्रतिरोधक टीबी की जांच और इलाज नि:शुल्क वितरित होता है. पर इतने प्रयास के बाद भी विश्व स्वास्थ्य संगठन की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, दवा प्रतिरोधक टीबी का दर भारत में घटा नहीं, बढ़ा है. दवा प्रतिरोधक टीबी का दर इसलिए भी बढ़ सकता है क्योंकि अब नि:शुल्क जांच और उपचार सेवाएँ हर प्रदेश में उपलब्ध हैं, जो पहले नहीं थीं. पर इस बात से मुकरा नहीं जा सकता कि यदि टीबी कार्यक्रम सफलतापूर्वक चल रहा हो तो दवा प्रतिरोधक टीबी उत्पन्न नहीं होनी चाहिए. दवा प्रतिरोधक टीबी इस बात का प्रमाण है कि टीबी कार्यक्रम में अभी सुधार की जरुरत है.

दवा प्रतिरोधक टीबी की जांच अवधि: 3-4 माह से कम हो के अब २ घंटे

दवा प्रतिरोधक टीबी की जांच, सॉलिड कल्चर विधि से 3-4 माह में आती है और इसके पश्चात ही उपयुक्त उपचार दिया जा सकता है. 3-4 माह तक रोगी कष्ट में रहता है और अक्सर निजी उपचार और अन्य विधियों से उपचार करवा के राहत पाने का प्रयास करता है. दवा प्रतिरोधक टीबी वायु के जरिये फ़ैल भी सकती है.

इसलिए यह जरुरी शोध था कि दवा प्रतिरोधक टीबी की जांच शीघ्र हो सके और इलाज जल्दी शुरू हो सके.

मॉलिक्यूलर टेस्ट (जीन-एक्सपर्ट) मशीन से टीबी की पक्की जांच और दवा प्रतिरोधक टीबी की जांच दोनों २ घंटे के भीतर पूरी हो जाती हैं. जांच रिपोर्ट के अनुसार उपयुक्त इलाज भी हो सकता है. यह निश्चित रूप से एक बड़ी उपलब्धि है. आज भारत के लगभग हर जिले में कम-से-कम एक जीन-एक्सपर्ट मशीन सरकारी स्वास्थ्य सेवा केंद्र में उपलब्ध है.

शोध पश्चात निकली नयी दवाएं उपलब्ध करवाने में सालों का विलम्ब क्यों?

कड़े वैज्ञानिक परिश्रम के बाद हुए शोध से निकली नयी दवाएं, लोगों तक सालों के बाद क्यों पहुँचती हैं? सिटीजन न्यूज़ सर्विस (सीएनएस) की निदेशिका शोभा शुक्ला ने कहा कि "शोध की उपलब्धियों को जन स्वास्थ्य उपलब्धियों में परिवर्तित करने में कोई भी देरी नहीं की जानी चाहिए. महिला कंडोम को 1993 में अमरीकी FDA ने पारित किया पर भारत में अब तक इसको जरूरतमंद महिलाओं तक नहीं पहुँचाया गया है जबकि अनचाहे गर्भ और यौन संक्रमण रोग (जैसे कि एचआईवी) एक चुनौती हैं. टीबी की नयी दवाएं भी कुछ साल पहले तो अवश्य ही कार्यक्रम में शामिल की जा सकती थीं."

दवा प्रतिरोधक टीबी के नए 9 माह अवधि के उपचार पर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने मोहर तो लगायी पर यह मोहर चंद साल पहले भी लग सकती थी. आज भी अनेक दवा प्रतिरोधक टीबी के रोगियों का इलाज २ साल से अधिक लम्बा वाला ही है. इन रोगियों को मौजूदा वैज्ञानिक उपलब्धियों का लाभ कब मिलेगा?

बीडाक्यूलीन और देलामनिद दवाएं भी चंद सालों से अमीर देशों में उपलब्ध हैं पर भारत में बीडाक्यूलीन को 2016 विश्व टीबी दिवस पर शामिल किया गया था जब दवा कंपनी ने 600 रोगियों के लिए दवाएं मुफ्त दीं. पर अब 2017 विश्व टीबी दिवस आने को है (24 मार्च) पर सिर्फ 200 लोगों को ही इन दवाओं से लाभ मिला है. एक रोगी को तो कोर्ट के चक्कर भी लगाने पड़े थे!

भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसन्धान परिषद् (इंडियन कौंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च/ ICMR) की महानिदेशिका डॉ सौम्या स्वामीनाथन ने एक समाचार पत्र को बताया है कि 3-4 माह में देलामनिद दवा जरूरतमंद रोगियों के लिए उपलब्ध होगी. जाहिर है, कि इन नयी दवाओं को सरकारी टीबी कार्यक्रम में शामिल करने में कोई भी विलम्ब नहीं होनी चाहिए - यह भविष्य के लिए बड़ी सीख है.

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बाबी रमाकांत, सीएनएस (सिटीजन न्यूज़ सर्विस)
9 मार्च 2017

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