यूरोपीय संसद में एएमआर प्रदर्शनी ने चेताया: ‘मूक महामारी’ कहना बंद कीजिए - अब वन हेल्थ की बात को कानून, निवेश और जवाबदेही में बदलने का वक्त है
[English] यूरोपियन संसद में इन दिनों लगी एक प्रदर्शनी देखने के बाद, यह मानना मुश्किल है कि दवा प्रतिरोधकता (एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस) कोई दूर या केवल वैज्ञानिकों की चिंता वाली समस्या है। जो लोग इससे जूझ रहे हैं उनकी कहानियां बताती हैं कि दवाओं का असर खत्म होने का संकट हमारे घरों, अस्पतालों, खेतों, पशुशालाओं और पर्यावरण तक पहुंच चुका है।
दवा-प्रतिरोधी बैक्टीरिया अकेले हर साल कम-से-कम 10 लाख लोगों की जान लेते हैं। यानी औसतन हर मिनट दो मौतें।
यूरोपीय संसद में 28 सितंबर से 2 अक्टूबर 2026 तक चल रही प्रदर्शनी, विश्व स्वास्थ्य संगठन (डबल्यू0एच0ओ0) और यूरोपीय संसद में जर्मनी के सांसद मार्टिन हॉयसलिंग द्वारा आयोजित की गई है. इसकी खासियत यह है कि यहां दवा प्रतिरोधकता को आंकड़ों के बजाय उन लोगों की जिंदगी और बीते अनुभव के जरिए समझाया जा रहा है, जो इससे गुजर चुके हैं और आज भी उसके असर के साथ जी रहे हैं। और शायद यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है।
क्योंकि दवा प्रतिरोधकता की कहानी सिर्फ यह नहीं है कि कुछ बैक्टीरिया (या फंगस, वायरस या पैरासाइट) दवाओं से नहीं मरते। असली कहानी यह है कि जब दवा काम करना बंद कर देती है, तो उसके साथ क्या-क्या टूटता है: स्वास्थ्य, परिवार, कमाई, बचत और कभी-कभी पूरी जिंदगी।
‘मूक महामारी’ क्यों?
रॉब पर्डी पिछले 14 सालों से एएमआर (दवा प्रतिरोधकता) का प्रकोप झेल रहे हैं. उनका कहना है जब 50 लाख लोग हर साल इससे मृत होते हैं, तो इसको मूक महामारी कहना ग़लत है. 50 लाख परिवार बिखरते हैं, स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा खंडित होती हैं, पर्यावरण दूषित होता है, तो यह महामारी 'मूक' कैसे हो सकती है?
जनवरी 2012 में रॉब को साधारण-सा सिरदर्द हुआ। देखते-देखते वह असहनीय माइग्रेन में बदल गया। पहले डॉक्टर ने इसे साइनस संक्रमण माना और एंटीबायोटिक दे दी। फायदा नहीं हुआ। दूसरे डॉक्टर ने दूसरी एंटीबायोटिक दी। फिर भी राहत नहीं मिली।
आखिरकार कान, नाक और गले के विशेषज्ञ ने एक्स-रे कराया और कहा—साइनस संक्रमण है ही नहीं।
इसके बाद भी सही बीमारी तक पहुंचने में समय लगा। पर्डी को "क्लस्टर हेडेक" बताया गया, लेकिन बीमारी के कारण की पुष्टि करने वाली जांच तब भी नहीं हुई थी।
इस बीच दर्द बढ़ता गया। सिरदर्द इतना भयानक था कि उन्हें बिल्कुल अंधेरे कमरे में बैठना पड़ता था। टीवी की छोटी-सी पावर लाइट भी आंखों को चुभती थी।
फिर उनकी नजर कमजोर होने लगी।
इस बार उन्हें अस्पताल की इमरजेंसी में जाना पड़ा। वहां "लम्बर पंचर" किया गया। 2012 के वैलेंटाइन डे पर आखिरकार वह जवाब मिला जिसकी तलाश लंबे समय से थी: उन्हें फंगल या फफूँदीय संक्रमण था, जो अब मेनिन्जाइटिस में बदल चुका था।
बाद में संक्रमण की पहचान "वैली फीवर", यानी "कोक्सीडियोइडोमाइकोसिस", के रूप में हुई।
पर्डी का मानना है कि अगर सही जांच पहले हो गई होती, तो शायद संक्रमण मेनिन्जाइटिस तक नहीं पहुंचता।
यही उनकी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण सबक है: एएमआर से लड़ाई में सही समय पर सही निदान उतना ही जरूरी है जितनी प्रभावी दवा।
आखिरकार कान, नाक और गले के विशेषज्ञ ने एक्स-रे कराया और कहा—साइनस संक्रमण है ही नहीं।
इसके बाद भी सही बीमारी तक पहुंचने में समय लगा। पर्डी को "क्लस्टर हेडेक" बताया गया, लेकिन बीमारी के कारण की पुष्टि करने वाली जांच तब भी नहीं हुई थी।
इस बीच दर्द बढ़ता गया। सिरदर्द इतना भयानक था कि उन्हें बिल्कुल अंधेरे कमरे में बैठना पड़ता था। टीवी की छोटी-सी पावर लाइट भी आंखों को चुभती थी।
फिर उनकी नजर कमजोर होने लगी।
इस बार उन्हें अस्पताल की इमरजेंसी में जाना पड़ा। वहां "लम्बर पंचर" किया गया। 2012 के वैलेंटाइन डे पर आखिरकार वह जवाब मिला जिसकी तलाश लंबे समय से थी: उन्हें फंगल या फफूँदीय संक्रमण था, जो अब मेनिन्जाइटिस में बदल चुका था।
बाद में संक्रमण की पहचान "वैली फीवर", यानी "कोक्सीडियोइडोमाइकोसिस", के रूप में हुई।
पर्डी का मानना है कि अगर सही जांच पहले हो गई होती, तो शायद संक्रमण मेनिन्जाइटिस तक नहीं पहुंचता।
यही उनकी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण सबक है: एएमआर से लड़ाई में सही समय पर सही निदान उतना ही जरूरी है जितनी प्रभावी दवा।
जब दवा के बाद दवा भी हार जाए
मार्च 2012 में अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद रॉब पर्डी को एंटीफंगल दवा दी गई। वह दवा अमेरिका और यूरोपीय संघ में फंगल संक्रमणों के इलाज के लिए मंजूर थी, हालांकि उनके खास संक्रमण के लिए नहीं।
वह पहली दवा काम नहीं आई।
दूसरी भी नहीं।
तीसरी भी नहीं।
जब विकल्प खत्म होने लगें तो डॉक्टरों ने कहा कि काम न कर रही दवा को छोड़ने के बजाय, उसके साथ दूसरी दवा जोड़कर मरीज को बचाने की कोशिश करनी चाहिए।
रॉब पर्डी के मामले में "एम्फोटेरिसिन-बी" का इस्तेमाल हुआ। यह 1950 के दशक से इस्तेमाल की जा रही दवा है पर इसके गंभीर दुष्प्रभाव हो सकते हैं। रॉब पर्डी के मस्तिष्क तक, इस दवा को सिर में लगाए गए एक पोर्ट के जरिए पहुंचाया गया।
संक्रमण पर कुछ हद तक नियंत्रण हुआ, लेकिन दवाओं की विषाक्तता ने अपनी अलग कीमत वसूली।
एक दवा से उनमें प्रकाश के प्रति असामान्य संवेदनशीलता पैदा हुई और 2015 में उन्हें "स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा" (कैंसर) हुआ। इसके बाद, उन्हें पांच और त्वचा कैंसर निकालने पड़े।
2016 से वह चौथी एंटीफंगल दवा ले रहे हैं—हर दिन चार गोलियां, जीवनभर।
लेकिन यहां भी एक कड़वी सच्चाई है: उपलब्ध दवाएं संक्रमण को खत्म नहीं कर सकतीं। वे सिर्फ उसे नियंत्रण में रख सकती हैं।
अस्पताल का बिल अकेले ढाई लाख डॉलर (ढाई करोड़ रुपये) तक पहुंच गया। पांच साल तक रॉब पर्डी काम नहीं कर सके। घर में पत्नी और दो बच्चों की जिम्मेदारी थी। इलाज के शारीरिक बोझ के साथ आर्थिक और मानसिक नुकसान भी जुड़ता गया।
एएमआर या दवा प्रतिरोधकता के कारण “आप बहुत कुछ खो देते हैं,” रॉब पर्डी कहते हैं।
इसीलिए वह चाहते हैं कि एएमआर को ‘साइलेंट पैंडेमिक’ या "मूक महामारी" कहना बंद किया जाए।
‘वन हेल्थ’ नारा नहीं, जरूरत है
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुख्यालय में एएमआर विभाग के निदेशक डॉ जीन-पियरे न्येमाजी ने रॉब पर्डी की कहानी को एक बड़े परिप्रेक्ष्य में रखा।
एएमआर या दवा प्रतिरोधकता सिर्फ इंसानों की बीमारी नहीं है। इसका संबंध जानवरों, पौधों, खाद्य व्यवस्था, अर्थव्यवस्था और पर्यावरण से भी है। दवा-प्रतिरोधी जीवाणु - सीमाएं नहीं मानते—वे देशों और महाद्वीपों के बीच जाते हैं, जानवरों से इंसानों तक पहुंचते हैं और फिर इंसानों से जानवरों तक लौट सकते हैं।
इसीलिए, ‘वन हेल्थ’ की अवधारणा महत्वपूर्ण हो जाती है जिससे कि मानव स्वास्थ्य, पशु स्वास्थ्य और पशुपालन, खाद्य और कृषि और पर्यावरण में व्याप्त दवाओं के दुरुपयोग या अनुचित उपयोग पर रोक लग सके और एएमआर से बचा जा सके.
“वन हेल्थ कोई विकल्प नहीं है—यह जरूरी है। लेकिन यह सिर्फ एक कथन बनकर नहीं रह सकता। इसे जमीनी कार्रवाई में बदलना होगा,” डॉ न्येमाजी ने कहा।
और यहां राजनीति का मतलब दलगत राजनीति नहीं, बल्कि नीति और सार्वजनिक जवाबदेही है।
सांसदों को यह सुनिश्चित करना होगा कि एएमआर पर किए गए राष्ट्रीय वादे कानून में बदलें, उसके कार्यक्रम में पर्याप्त निवेश करें, और यह भी तय हो कि कौन किस काम के लिए जवाबदेह है।
क्योंकि एएमआर या दवा प्रतिरोधकता केवल स्वास्थ्य व्यवस्था को चुनौती नहीं देता। यह खाद्य सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और पर्यावरण के लिए भी खतरा है।
जब एक बीमार पक्षी की कीमत पूरा झुंड चुकाता है
एएमआर की कहानी अस्पताल की चारदीवारी से बाहर भी जाती है।
यूरोपीय संसद सदस्य मार्टिन हॉयसलिंग ने कृषि और पशुपालन में एंटीबायोटिक के इस्तेमाल पर सवाल उठाया। कई देशों में अब भी पशुओं के लिए बिना पर्चे के एंटीबायोटिक मिल जाती हैं। कई बार यह तय किए बिना कि वास्तव में कौन-सी दवा और कितनी मात्रा जरूरी है, एंटीबायोटिक मिल जाती है. पोल्ट्री फार्म इसका सीधा उदाहरण हैं।
हजारों पक्षी एक साथ रखे जाते हैं। एक पक्षी बीमार हुआ तो कई बार पूरे झुंड को एंटीबायोटिक दे दी जाती है - स्वस्थ पक्षियों को भी।
हॉयसलिंग का कहना है कि बचाव के नाम पर किया जाने वाला, इस तरह का सामूहिक दवा-उपचार, खत्म होना चाहिए।
मामला सिर्फ दवा तक सीमित नहीं है। बूचड़खानों और पशुपालन से निकलने वाला अपशिष्ट जल दवा-प्रतिरोधी रोगजनकों को पर्यावरण में पहुंचा सकता है। वही प्रदूषण आगे पानी और दूसरे माध्यमों से लोगों तक पहुंच सकता है।
और सबसे चिंताजनक बात यह है कि जिन एंटीबायोटिक दवाओं को आखिरी विकल्प के रूप में बचाकर रखना चाहिए, उनका इस्तेमाल भी खाद्य उत्पादन करने वाले पशुओं में अब तक बहुत ज्यादा हो रहा है।
हॉयसलिंग ने अमेरिका का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां एंटीबायोटिक का इस्तेमाल अब भी वृद्धि बढ़ाने के लिए किया जाता है और इस प्रथा को खत्म करना जरूरी है।
उनका तर्क सीधा है: पहले यह पता होना चाहिए कि बीमारी क्या है और उसके इलाज के लिए कौन-सी दवा चाहिए। उसके बाद ही दवा का इस्तेमाल हो।
दवा कम इस्तेमाल करना लक्ष्य नहीं; दवा का सही इस्तेमाल करना लक्ष्य है।
समाधान हमारे सामने हैं
एएमआर की सबसे बड़ी विडंबना शायद यही है कि हमारे पास समस्या से निपटने के कई प्रभावी तरीके मौजूद हैं।
मई 2026 में, 193 देशों ने एएमआर या दवा प्रतिरोधकता पर संशोधित वैश्विक कार्ययोजना को मंजूरी दी। यह अगले दशक के लिए दिशा तय करेगी और इसका आधार ‘वन हेल्थ’ दृष्टिकोण है।
जोर रोकथाम पर है: टीकाकरण, संक्रमण की रोकथाम और नियंत्रण, साफ पानी, स्वच्छता, साफ-सफाई और बेहतर पशुपालन।
नई योजना में शासन और जवाबदेही के लिए नया लक्ष्य भी शामिल है। दवा लिखने और इस्तेमाल करने के व्यवहार में बदलाव पर भी जोर दिया गया है।
2024 में संयुक्त राष्ट्र महासभा की उच्चस्तरीय बैठक में एएमआर पर राजनीतिक घोषणा को सभी 193 देशों का समर्थन मिला था। इसमें 2030 तक बैक्टीरियल एएमआर से होने वाली मौतों में, 2019 के स्तर की तुलना में, 10 प्रतिशत कमी लाने का लक्ष्य भी शामिल है।
डॉ. न्येमाजी के अनुसार यह लक्ष्य हासिल किया जा सकता है - अगर संक्रमण की रोकथाम, टीकाकरण और गुणवत्तापूर्ण। एंटीमाइक्रोबियल दवाओं तक पहुंच को मजबूत किया जाए।
लेकिन यहां एक बड़ा सवाल है।
जब हमें पता है कि क्या काम करता है, तो हम उसे पर्याप्त पैमाने पर कर क्यों नहीं रहे?
कथनी और करनी में भेद क्यों?
डॉ. न्येमाजी के मुताबिक संक्रमण की रोकथाम पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। बेहतर टीकाकरण, संक्रमण नियंत्रण, पानी और स्वच्छता की व्यवस्था तथा बेहतर पशुपालन एएमआर को रोकने में मदद कर सकते हैं।
इसके साथ निगरानी व्यवस्था मजबूत करनी होगी, एंटीमाइक्रोबियल दवाओं का जिम्मेदार इस्तेमाल सुनिश्चित करना होगा, अच्छी दवाओं और निदान सुविधाओं तक पहुंच बढ़ानी होगी और पर्यावरण में दवा-प्रतिरोधी प्रदूषण कम करना होगा।
“उपकरण हमारे पास हैं और सबूत भी मौजूद हैं,” वे कहते हैं। “लेकिन कार्रवाई न करने की कीमत बढ़ती जा रही है। जितनी देर होगी, कीमत उतनी ज्यादा होगी।”
दूसरी ओर, दुनिया के कई हिस्सों में समस्या यह भी है कि लोग, आवश्यक दवाओं से ही वंचित हैं - दुरुपयोग तो दूर की बात है.
नेपाल और अफ्रीका के कुछ हिस्सों में डॉक्टर की पर्ची हासिल करना तक मुश्किल हो सकता है। ऐसे में लोग सीधे फार्मेसी पहुंचते हैं।
इसलिए समाधान सिर्फ ‘बिना डॉक्टर के पर्चे के एंटीबायोटिक मत लो’ कह देने से नहीं निकलेगा। प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना होगा, लोगों को जानकारी देनी होगी, बिना पर्चे के रिजर्व एंटीबायोटिक बेचने पर रोक के नियम लागू करने होंगे और दवा वितरण को डिजिटल बनाना होगा ताकि पर्चों की निगरानी और ऑडिट संभव हो।
नई दवा की उम्मीद, पुरानी दवा की रक्षा
उच्च-आय वाले देशों में तस्वीर कुछ अलग है। रॉब पर्डी के मुताबिक अमेरिका में 50 प्रतिशत तक एंटीबायोटिक वाले डॉक्टर के पर्चे एंटीबायोटिक के अनावश्यक उपयोग वाले होते हैं.
नई एंटीबायोटिक, नई एंटीफंगल दवाएं और फेज थेरेपी जैसी तकनीकें जरूरी हैं। लेकिन नई एंटीफंगल दवा विकसित करने में लगभग 30 साल तक लग सकते हैं। यही वजह है कि केवल नई दवाओं की उम्मीद करना पर्याप्त नहीं होगा।
अगर हम आज उपलब्ध दवाओं का गलत इस्तेमाल करते रहे, तो नई दवाएं भी जल्दी बेअसर हो सकती हैं।
नई दवाओं पर शोध के साथ-साथ मौजूदा दवाओं को भी एएमआर से बचाना होगा.
आखिर आधुनिक चिकित्सा की कितनी ही उपलब्धियां - सर्जरी से लेकर कैंसर उपचार और अंग प्रत्यारोपण तक - प्रभावी एंटीमाइक्रोबियल दवाओं की उपलब्धता पर टिकी हैं।
हर किसी की भूमिका है—लेकिन जिम्मेदारी बराबर नहीं
रोकथाम सबसे सस्ता और प्रभावी रास्ता है। रॉब पर्डी की कहानी बताती है कि देर से निदान का खर्च सिर्फ अस्पताल के बिल में नहीं दिखता। वह वर्षों की कमाई, परिवार की आर्थिक सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता तक निगल जाता है।
सरकारों की जिम्मेदारी है कि वे सही नीतियां बनाएं और सबकी स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच सुनिश्चित करें।
नागरिक समाज को लोगों में जागरूकता बढ़ाने और सरकारों से जवाबदेही मांगने की भूमिका निभानी होगी।
व्यक्ति अपने स्तर पर हाथ धोने, टीकाकरण और अनावश्यक एंटीबायोटिक से बचने जैसे कदम उठा सकते हैं। लेकिन यह भी याद रखना जरूरी है कि व्यक्तिगत जिम्मेदारी तभी सार्थक है जब व्यवस्था सही विकल्प उपलब्ध कराए।
मार्टिन हॉयसलिंग ने एएमआर को संसद के एजेंडे पर बनाए रखने का संकल्प लिया है। डॉ. न्येमाजी ने मीडिया से अपील की है कि वह इसे सार्वजनिक विमर्श में बनाए रखे। और रॉब पर्डी की मांग है कि उन लोगों की आवाज सुनी जाए जो एएमआर के साथ जी रहे हैं - या उसके कारण अपने जीवन का कोई हिस्सा खो चुके हैं।
शोभा शुक्ला, नारीवादी चिंतक, स्वास्थ्य एवं विकास न्याय की प्रखर पैरोकार तथा पुरस्कृत लेखिका एवं संपादिका हैं। वे सीएनएस (सिटीज़न न्यूज़ सर्विस) की संस्थापक-संपादक हैं और सेवा-निवृत्त होने तक, लोरेटो कॉलेज में 3 दशक तक भौतिक विज्ञान की वरिष्ठ शिक्षिका रही हैं। वे 2026 में प्रकाशित पुस्तक, “जस्टिस अनबाउंड” की लेखिका हैं एवं 2025 में संयुक्त राष्ट्र के अंतर-सरकारी उच्च-स्तरीय राजनीतिक फोरम में एसडीजी-3 की प्रमुख चर्चकर्ता रही हैं। उन्हें एक्स पर पढ़ें: @shobha1shukla
प्रकाशित:
- सीएनएस
- रूबरू न्यूज़, श्योपुर, मध्य प्रदेश
- द लीजेंड न्यूज़, मथुरा, उत्तर प्रदेश
