बिना लक्षण वाले लोगों में टीबी की पहचान में मदद कर रहे हैं एआई एक्स-रे


[English] दिल्ली में समुदाय-आधारित टीबी स्क्रीनिंग की दो अहम पहलों में टीबी से संक्रमित पाए गए कई लोग ऐसे थे, जो खांसी, बुखार या किसी अन्य स्पष्ट लक्षण की शिकायत लेकर स्वास्थ्य केंद्र नहीं पहुंचे थे। वे या तो एचआईवी की नियमित देखभाल के लिए आए थे या फिर उनके इलाके में लगे मोबाइल स्क्रीनिंग कैंप तक पहुंचे थे।

इसके बाद आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित छाती के एक्स-रे ने तस्वीर बदल दी।

एचआईवी के साथ जीवन जी रहे लोगों के बीच चलाए गए एक कार्यक्रम में दिल्ली के दो सरकारी एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी (एआरटी) केंद्रों पर 1,559 लोगों की छाती का एक्स-रे किया गया। इनमें 21 लोगों में सक्रिय टीबी की पुष्टि हुई। इनमें से 12 - यानी आधे से अधिक - में टीबी के कोई लक्षण नहीं थे।

ह्यूमाना पीपल टू पीपल इंडिया के जहांगीर आलम ने भारत के पटियाला में आयोजित 81वें नेशनल कॉन्फ्रेंस ऑफ ट्यूबरकुलोसिस एंड चेस्ट डिजीजेज (नैटकॉन 2026) में इस कार्यक्रम के अनुभव साझा करते हुए बताया कि अगर एक्स-रे स्क्रीनिंग नहीं की जाती, तो इन 12 एचआईवी संक्रमित लोगों में केवल मौखिक लक्षण-आधारित स्क्रीनिंग के जरिए टीबी का पता नहीं चल पाता।

नैटकॉन 2026 ने जहाँगीर आलम की इस शोध प्रस्तुति को सर्वश्रेष्ठ अनुशंसा प्रशस्तिपत्र से पुरस्कृत भी किया।

एचआईवी के साथ जीवन जी रहे लोगों में टीबी की रोकथाम के साथ-साथ समय पर और सटीक निदान तथा मानक उपचार, और पर्याप्त देखभाल और सहायता भी महत्वपूर्ण है। टीबी आज भी इस आबादी में सबसे आम अवसरवादी संक्रमणों में से एक है और मृत्यु का एक प्रमुख कारण भी है।

जहांगीर का अनुभव टीबी कार्यक्रमों के सामने उभर रही एक बड़ी चुनौती को रेखांकित करता है: जिन लोगों तक पहुंचना सबसे जरूरी है, जरूरी नहीं कि वे बीमार दिखाई भी दें।

टीबी खोजने के तरीके में भारत का बड़ा बदलाव


भारत सरकार ने 2024 से नवीनतम वैज्ञानिक प्रमाणों और विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशानिर्देशों के अनुरूप टीबी खोजने की अपनी रणनीति में बुनियादी बदलाव किया है। राष्ट्रीय और उप-राष्ट्रीय सर्वेक्षणों से पता चला कि सक्रिय टीबी वाले लगभग आधे लोगों की पहचान तभी हो सकी, जब उन्हें एक्स-रे स्क्रीनिंग की सुविधा दी गई, क्योंकि उनमें टीबी के लक्षण नहीं थे।

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि एक्स-रे एक स्क्रीनिंग उपकरण है। जिन लोगों में टीबी की आशंका सामने आती है, उनमें बीमारी की पुष्टि के लिए मॉलिक्यूलर टेस्ट परीक्षण जरूरी होता है।

फिर भी टीबी को जल्द और सही तरीके से पहचानना बेहद जरूरी है - क्योंकि इससे रोगी को अनावश्यक पीड़ा नहीं झेलनी पड़ती, असामयिक मृत्यु का खतरा भी कम होता है, और सही इलाज आरम्भ होने के बाद चंद दिनों में उससे किसी को टीबी फैलने का खतरा भी नहीं रहता.

7 दिसंबर 2024 से भारत का सरकारी टीबी कार्यक्रम, उस आबादी में जिन्हें टीबी होने का खतरा अधिक है, उनमें स्क्रीनिंग के लिए एआई-सक्षम एक्स-रे मशीनों से लैस वैन चला रहा है। केवल 2025 में ही इस पहल के तहत भारत में 10 लाख से अधिक ऐसे लोगों में सक्रिय टीबी की पहचान हुई, जिनमें बीमारी के लक्षण ही नहीं थे।

हालांकि, एचआईवी के साथ जीवन जी रहे लोगों के लिए सरकारी एआरटी केंद्रों में अभी भी मुख्य रूप से मौखिक लक्षण-आधारित टीबी स्क्रीनिंग की जाती है। ह्यूमाना पीपल टू पीपल इंडिया की पहल एचआईवी संक्रमित लोगों में टीबी की पहचान के लिए एआई-सक्षम एक्स-रे स्क्रीनिंग की अहमियत का मजबूत प्रमाण पेश करती है।

एचआईवी की नियमित देखभाल के दौरान टीबी की पहचान


भारत सरकार के राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम की 2025 की संकलक रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में दिल्ली में एचआईवी के साथ जीवन जी रहे 43,035 लोगों को 12 एआरटी केंद्रों के जरिए जीवनरक्षक एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी मिली।

ह्यूमाना पीपल टू पीपल इंडिया ने दो सरकारी एआरटी केंद्रों के साथ मिलकर इन केंद्रों के भीतर छाती के एक्स-रे स्क्रीनिंग कैंप शुरू किए। इसका उद्देश्य एचआईवी के साथ जीवन जी रहे लोगों को टीबी स्क्रीनिंग के लिए अलग से स्वास्थ्य केंद्र आने की जरूरत को खत्म करना था। नियमित फॉलो-अप के लिए केंद्र आने वाले लोगों की, उसी दौरान एक्स-रे स्क्रीनिंग की जा सकती थी।

टीबी स्क्रीनिंग में एआई आधारित परिणामों का इस्तेमाल किया गया, जो टीबी की आशंका वाले मामलों की पहचान करते थे। किसी व्यक्ति में टीबी की आशंका सामने आने पर उसी दिन उसका बलगम लिया गया और पुष्टि के लिए निकटतम सरकारी मॉलिक्यूलर टेस्ट परीक्षण केंद्र तक पहुंचाया गया।

नतीजे उल्लेखनीय रहे।

1 मई से 31 अगस्त 2026 के बीच 1,559 एचआईवी संक्रमित लोगों की टीबी के लिए एक्स-रे स्क्रीनिंग की गई। इनमें 273 लोग, यानी स्क्रीन किए गए लोगों के 17.51 प्रतिशत, टीबी के संभावित मामलों के रूप में सामने आए।

इन सभी 273 संभावित मामलों—यानी 100 प्रतिशत—का पुष्टि के लिए मॉलिक्यूलर टेस्ट परीक्षण किया गया।

WHO की ग्लोबल टीबी रिपोर्ट 2025 के अनुसार, 2024 में भारत में सक्रिय टीबी वाले केवल 38 प्रतिशत लोगों की मॉलिक्यूलर टेस्ट जांच हुई थी। दुनिया के सभी राष्ट्र-अध्यक्षों ने 2027 तक 100% टीबी की जांच - मॉलिक्यूलर टेस्ट करने का वादा किया है क्योंकि बलगम की माइक्रोस्कोपी जांच आधे से अधिक टीबी मामलों का पता लगाने में चूक जाती है।

इस लिहाज से दिल्ली में ह्यूमाना पीपल टू पीपल इंडिया तथा सरकारी एचआईवी और टीबी कार्यक्रमों की इस पहल में एचआईवी संक्रमित लोगों के संभावित मामलों के बीच 100 प्रतिशत मॉलिक्यूलर टेस्ट जांच एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

जहांगीर आलम ने बताया कि इस पहल में एचआईवी के साथ जीवन जी रहे 21 लोगों में टीबी की पुष्टि हुई। यह संभावित टीबी मामलों का 7.69 प्रतिशत था।

लेकिन सबसे महत्वपूर्ण आंकड़ा उन मरीजों का है जिनमें कोई लक्षण नहीं था। निदान किए गए 21 मरीजों में से 12, यानी 57.14 प्रतिशत, बिना लक्षण वाले थे।

टीबी की पुष्टि वाले सभी मरीजों को सरकार के राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम के तहत उपचार शुरू कराया गया।

कार्यक्रम से मिलने वाला सबक सीधा है: सरकारी एआरटी केंद्रों की सेवाओं में नियमित एक्स-रे स्क्रीनिंग को शामिल किया जाना चाहिए। इससे टीबी की जल्द पहचान में मदद मिल सकती है, खासकर उन मामलों में जिनमें बीमारी के लक्षण नहीं हैं या जो शुरुआती, उप-नैदानिक अवस्था में हैं।

स्वास्थ्य केंद्रों से आगे स्क्रीनिंग का विस्तार


नैटकॉन 2026 में ह्यूमाना पीपल टू पीपल इंडिया के रविंद्र कुमार ने एक अन्य प्रस्तुति में एक अलग चुनौती पर प्रकाश डाला—ऐसे लोगों में टीबी की पहचान कैसे की जाए, जो नियमित रूप से औपचारिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंचते ही नहीं। इनमें दिल्ली में बेघर लोग और प्रवासी कामगार शामिल हैं।

लीड प्रोजेक्ट के तहत ह्यूमाना पीपल टू पीपल इंडिया ने राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम के साथ मिलकर शहरी क्षेत्रों में प्रमुख और अन्य संवेदनशील आबादी तक पहुंच बनाई। इनमें बेघर लोग, प्रवासी और अस्थायी बस्तियों में रहने वाले लोग शामिल हैं।

रविंद्र और उनकी टीम ने नवंबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच दिल्ली के नौ सरकारी छाती रोग क्लीनिकों के साथ काम किया। टीम ने हॉटस्पॉट आधारित स्क्रीनिंग कैंप, शुरुआती चरण में एआई-सक्षम छाती एक्स-रे और समुदाय-आधारित फॉलो-अप एवं सहायता का इस्तेमाल किया।

इससे टीबी की आशंका वाले लोगों को जांच, उपचार, देखभाल और सहायता सेवाएं प्रदान की गईं. जो लोग पात्र थे, उन्हें टीबी की रोकथाम से जुड़ी सेवाओं तक भी पहुंच दी गई।

समुदाय-आधारित नियमित फॉलो-अप और सहायता के कारण—जिसमें ह्यूमाना पीपल टू पीपल इंडिया के प्रशिक्षित फ्रंटलाइन स्वास्थ्यकर्मियों, जिनमें अधिकांश महिलाएं हैं, की अहम भूमिका रही—बेघर लोगों और प्रवासी कामगारों में टीबी उपचार पूरा करने और उपचार सफलता की दर 90 प्रतिशत रही। यह सामान्य आबादी के बराबर है।

इस अनुभव ने शहरी स्वास्थ्य कार्यक्रमों की एक बुनियादी लेकिन अक्सर नजरअंदाज की जाने वाली सच्चाई सामने रखी: स्क्रीनिंग कहां होती है, यह उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि स्क्रीनिंग कैसे होती है।

बेघर आबादी के लिए परियोजना में वाहन-आधारित एक्स-रे अधिक उपयुक्त पाई गईं। वहीं, घनी आबादी और संकरी झुग्गी बस्तियों में, जहां वाहनों का पहुंचना मुश्किल था, अल्ट्रा-पोर्टेबल और बैटरी से चलने वाली एक्स-रे मशीनें अधिक उपयोगी साबित हुईं।

रविंद्र कुमार के अनुसार, इसका मतलब है कि तकनीक को आबादी की जरूरत के मुताबिक ढलना होगा—आबादी को तकनीक के मुताबिक नहीं।


एक्स-रे से ज्यादा संभावित मामले मिले, लेकिन पुष्टि की तस्वीर अलग थी.

लीड-2 के आंकड़े एक्स-रे स्क्रीनिंग और केवल मौखिक लक्षण-आधारित स्क्रीनिंग के बीच एक महत्वपूर्ण तुलना भी पेश करते हैं।

एक्स-रे के जरिए 30,025 लोगों की स्क्रीनिंग की गई। इनमें 4,082 लोग, यानी 13.5 प्रतिशत, टीबी के संभावित मामलों के रूप में सामने आए।

इसके मुकाबले केवल मौखिक स्क्रीनिंग में 13,912 लोगों में से 759 लोग, यानी 5.4 प्रतिशत, संभावित टीबी मामलों के रूप में पहचाने गए।

पहली नजर में ये आंकड़े बताते हैं कि एक्स-रे ने संभावित टीबी वाले लोगों का कहीं बड़ा अनुपात पहचाना।

लेकिन जब यह देखा गया कि संभावित मामलों में से कितने लोगों में मॉलिक्यूलर टेस्ट परीक्षण के जरिए वास्तव में टीबी की पुष्टि हुई, तो तस्वीर बदल गई।

मौखिक स्क्रीनिंग से पहचाने गए 759 संभावित मामलों में से 354 में टीबी की पुष्टि हुई—यानी 46.6 प्रतिशत की पुष्टि दर।

वहीं, एक्स-रे के जरिए संभावित पाए गए 4,082 लोगों में से 234 में टीबी की पुष्टि हुई—यानी 5.7 प्रतिशत की पुष्टि दर।

इन आंकड़ों को केवल दो स्क्रीनिंग विधियों के बीच मुकाबले के रूप में देखना सही नहीं होगा। दोनों विधियां अलग-अलग समूहों की पहचान करती हैं और उनकी भूमिकाएं भी अलग और महत्वपूर्ण हैं।

मौखिक स्क्रीनिंग मुख्य रूप से उन लोगों की पहचान करती है जिनमें पहले से टीबी के लक्षण या बीमारी के अन्य संकेत मौजूद हैं। इसके विपरीत, एक्स-रे का दायरा व्यापक है। यह उन लोगों के फेफड़ों में रेडियोलॉजिकल असामान्यताओं की पहचान कर सकता है, जो अभी कोई लक्षण महसूस या रिपोर्ट नहीं कर रहे हैं।

टीबी का जल्द निदान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे संक्रमण का फैलना रुकता है और मरीज को समय पर जीवनरक्षक उपचार उपलब्ध कराने में मदद मिलती है।

व्यापक स्क्रीनिंग का मतलब यह भी है कि पुष्टि के लिए अधिक लोगों की जांच करनी पड़ सकती है, भले ही अंततः टीबी की पुष्टि होने वाले लोगों का अनुपात कम हो।

छिपे हुए मामले


बिना लक्षण वाले लोगों में टीबी की पहचान करने की एक्स-रे की क्षमता, लीड-2 से सामने आया एक और महत्वपूर्ण निष्कर्ष था।

रविंद्र कुमार ने बताया कि 26,639 बिना लक्षण वाले लोगों की स्क्रीनिंग की गई। इनमें से 1,533 लोग संभावित टीबी मामलों के रूप में सामने आए और 52 लोगों में टीबी की पुष्टि हुई।

लीड-2 ने स्क्रीनिंग को सरकारी मॉलिक्यूलर टेस्ट जांच और उपचार सेवाओं से जोड़ा। इससे संभावित मामले की पहचान से लेकर बीमारी की पुष्टि, उपचार शुरू करने और समुदाय-आधारित नियमित फॉलो-अप एवं सहायता तक एक निरंतर व्यवस्था बनी।

इस व्यवस्था का उद्देश्य मरीजों को रोजाना दवा लेने में मदद करना, उपचार जारी रखना और अंततः पूरा उपचार सुनिश्चित करना भी था।

ह्यूमाना पीपल टू पीपल इंडिया ने सरकारी छाती रोग क्लीनिकों में संभावित मामलों के बीच एक बार फिर 100 प्रतिशत मॉलिक्यूलर टेस्ट जांच और टीबी से निदान किए गए लोगों में 99 प्रतिशत उपचार शुरू होने की जानकारी दी।

स्क्रीनिंग, निदान, उपचार, देखभाल और सहायता के बीच मजबूत जुड़ाव बेहद जरूरी है। जमीनी स्तर पर काम कर रहे ह्यूमाना पीपल टू पीपल इंडिया के कार्यकर्ताओं ने इस कड़ी को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

कोई स्क्रीनिंग कार्यक्रम उन लोगों की पहचान तो कर सकता है जिन्हें संभावित टीबी हो, लेकिन उसका जन-स्वास्थ्य पर वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि वे लोग जांच पूरी करते हैं या नहीं; टीबी की पुष्टि होने पर सही उपचार शुरू करते हैं या नहीं; दवाएं नियमित ले पाते हैं या नहीं; और अंततः उपचार पूरा कर ठीक हो पाते हैं या नहीं।

पहचान के साथ रोकथाम भी


दिल्ली का यह अनुभव केवल सक्रिय टीबी के मामलों को खोजने तक सीमित नहीं रहा।

लीड-2 टीमों ने स्क्रीनिंग कैंप के मॉडल में टीबी निवारक उपचार को भी शामिल किया। इससे कार्यक्रम को सक्रिय टीबी की खोज के साथ-साथ बीमारी की रोकथाम पर भी काम करने का अवसर मिला।

नैटकॉन 2026 में रवींद्र की प्रस्तुति के अनुसार, सक्रिय टीबी वाले मरीजों के 232 करीबी संपर्कों और प्रमुख एवं अन्य संवेदनशील आबादी के 1,222 सदस्यों को टीबी निवारक उपचार उपलब्ध कराया गया।

सेवाएं वहीं पहुंचाएं, जहां लोग हैं


ह्यूमाना पीपल टू पीपल इंडिया की दोनों प्रस्तुतियों को साथ रखकर देखें तो कहानी केवल किसी एक मशीन या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस प्रणाली के प्रदर्शन की नहीं है। असली कहानी यह है कि जब स्क्रीनिंग उन लोगों के करीब पहुंचाई जाती है, जिनके स्वास्थ्य व्यवस्था से छूट जाने की सबसे अधिक संभावना है, तो क्या बदलाव आता है।

दिल्ली के इन दोनों अनुभवों से सबसे महत्वपूर्ण सबक यह है कि अगर टीबी की पहचान केवल मौखिक लक्षण-आधारित स्क्रीनिंग के जरिए की जाए, तो टीबी से पीड़ित लगभग आधे लोगों की पहचान छूट सकती है—जबकि उनमें से कई को एक्स-रे स्क्रीनिंग के जरिए बीमारी के शुरुआती चरण में खोजा जा सकता है।

जो बीमारी मरीज को दिखाई नहीं देती, वह स्वास्थ्य व्यवस्था से भी छिपी रह सकती है—जब तक कि स्क्रीनिंग के तरीके उसे खोजने के लिए तैयार न किए जाएं।


टीबी मुक्त भारत अभियान जब टीबी से पीड़ित लोगों की जल्द पहचान के अपने प्रयास तेज कर रहा है, तब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि लक्षणों के साथ कितने लोग क्लीनिक तक पहुंचते हैं। सवाल यह भी है कि कितने लोग कभी क्लीनिक तक पहुंचते ही नहीं - और कितने लोग टीबी रोग से ग्रसित होंगे, बिना यह जाने कि उन्हें बीमारी है। उनके लक्षण आने से पहले या अधिक बीमार होने से पहले, एक्स-रे जाँच स्क्रीनिंग का पहुँचना ज़रूरी है.

जहांगीर, रविंद्र और उनकी टीमों के अनुभवों के सामने अब बड़ा सवाल यही है: क्या हम वास्तव में उन लोगों तक पहुंचने और उन्हें सेवाएं देने के लिए तैयार हैं, जो अब तक स्वास्थ्य व्यवस्था की पहुंच से बाहर हैं?

शोभा शुक्ला - सीएनएस

(सिटीज़न न्यूज़ सर्विस)
5 अक्टूबर 2026

शोभा शुक्ला, नारीवादी चिंतक, स्वास्थ्य एवं विकास न्याय की प्रखर पैरोकार तथा पुरस्कृत लेखिका एवं संपादिका हैं। वे सीएनएस (सिटीज़न न्यूज़ सर्विस) की संस्थापक-संपादक हैं और सेवा-निवृत्त होने तक, लोरेटो कॉलेज में 3 दशक तक भौतिक विज्ञान की वरिष्ठ शिक्षिका रही हैं। वे 2026 में प्रकाशित पुस्तक, “जस्टिस अनबाउंड” की लेखिका हैं एवं 2025 में संयुक्त राष्ट्र के अंतर-सरकारी उच्च-स्तरीय राजनीतिक फोरम में एसडीजी-3 की प्रमुख चर्चकर्ता रही हैं। उन्हें एक्स पर पढ़ें: @shobha1shukla


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