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बगिया के सभी फूल सुन्दर हैं: सतत विकास के लिए लैंगिक समानता ज़रूरी

एशिया पैसिफ़िक क्षेत्र सहित विश्व के प्रत्येक देश के लिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि सभी व्यक्तियों के लिए सम्मान और समान अधिकार सुनिश्चित कराये जाएँ, भले ही उनकी लैंगिक अभिव्यक्ति और रुझान भिन्न हों। परन्तु दुःख की बात यह है कि परम्परा, धर्म और संस्कृति के नाम पर अक्सर एलजीबीटीआई (समलैंगिक, ट्रासजेन्डर, हिजरा, आदि) समुदाय के साथ भेदभाव किया जाता रहा है, और वे आज भी गरिमा और समानता के साथ जीने के बुनियादी मानवाधिकारों से वंचित हैं।

सरकार को वायु प्रदूषण, रोके जाने वाले रोगों और असमय होने वाली मौतों के लिए बड़े प्रदूषकों को ज़िम्मेदार ठहराना होगा

 

संदीप पांडे, शोभा शुक्ला, और बॉबी रमाकांत द्वारा लिखित

भारत में 2019 में 16 लाख से अधिक लोग मारे गए वायु प्रदुषणद लैंसेट प्लैनेटरी हेल्थ के अनुसार देश में होने वाली कुल मौतों में से 17 · eight प्रतिशत के लिए लेखांकन। वैश्विक स्तर पर समय से पहले मौत के लिए वायु प्रदूषण चौथा प्रमुख जोखिम कारक था, 2019 में अकेले 6.67 मिलियन से अधिक के साथ सभी मौतों का लगभग 12 प्रतिशत का लेखा-जोखा, ग्लोबल एयर रिपोर्ट 2020 की स्थिति को दर्शाता है। इन मौतों में से प्रत्येक को रोका जा सकता था: और वायु प्रदूषण से होने वाली हर बीमारी को रोका जा सकता था।

सभ्य समाज में लैंगिक और यौनिक हिंसा कैसे?

अनेक देशों में पितृसत्तात्मक व्यवस्था के चलते उत्पन्न गहरी लैंगिक असमानताएं तथा भेदभाव पूर्ण सामाजिक-सांस्कृतिक प्रथाएँ हैं और इस क्षेत्र में लैंगिक और यौनिक हिंसा की व्यापकता भी जारी है।

कोविड-19 महामारी पर विराम लगाने के लिए स्थानीय नेतृत्व ज़रूरी

कोविड-19 महामारी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जब तक हर व्यक्ति के लिए स्वास्थ्य सुरक्षा नहीं होगी तब तक कोई भी संक्रमण-मुक्त नहीं हो सकता, भले ही वह सबसे अमीर या बड़े ओहदे पर आसीन व्यक्ति ही क्यों न हो. इस बात में भी कोई संशय नहीं रह गया कि मज़बूत अर्थव्यवस्था के लिए मज़बूत स्वास्थ्य सुरक्षा अत्यंत आवश्यक है. 11 महीने पहले कोरोना वायरस का पहला संक्रमण वुहान में रिपोर्ट हुआ था। आज विश्व भर में 7.2 करोड़ व्यक्ति इससे संक्रमित हो चुके हैं.

120 माह शेष: क्या हम 2030 तक एड्स-मुक्त हो पाएँगें?

कोविड महामारी से एक सीख स्पष्ट है कि स्वास्थ्य सुरक्षा न सिर्फ अर्थव्यवस्था के लिए ज़रूरी है, बल्कि 'सबका साथ सबका विकास' के स्वप्न को पूरा करने के लिए भी. महामारी नियंत्रण जब प्राथमिकता बना तो अनेक गैर-कोविड स्वास्थ्य कार्यक्रम प्रभावित हुए हैं जिनमें से एक है एड्स नियंत्रण.

क्या विकलांगता केवल शारीरिक ही होती है?

अक्सर हमारी विकलांग सोच ही शारीरिक रूप से विकलांग व्यक्तियों के जीवन को कठिन बना देती है। वे अपनी शारीरिक अक्षमता को तो किसी हद तक झेल लेते हैं, परन्तु उसके मनोवैज्ञानिक प्रभाव से जूझ पाना आसान नहीं होता।

शादी कोई गुड्डे गुड़िया का खेल नहीं है

यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व में ६५ करोड़ महिलाओं और लड़कियों की शादी बचपन में ही कर दी जाती है। इनमें से एक तिहाई से अधिक भारत में हैं जो बाकी सब देशों से अधिक है। बाल विवाह पर कानूनी प्रतिबंध होने के बावजूद भारत में २२.३ करोड़ ऐसी महिलाएं हैं जिनका विवाह १८ वर्ष की आयु से पूर्व हो गया था। २७% लड़कियों की शादी उनके १८ वें जन्मदिन के पहले हो जाती हैं और ७% की १५ साल की उम्र से पहले। ग्रामीण इलाकों में रहने वाली लड़कियों के लिए बाल विवाह का खतरा अधिक होता है। इस कुरीति का सबसे बड़ा कारण है सामाजिक असमानता, शिक्षा का अभाव, गरीबी और असुरक्षा।