बाल उत्पीड़न के अपराधियों को दण्डित करने के लिए कड़े क़ानून का अभाव

अंजलि सिंह -सी.एन.एस

भारत में यौन उत्पीड़न के शिकार बच्चों कि संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है. हाल ही में नई दिल्ली में हुए एक हादसे में एक युवक ने अपने पड़ोसी की पांच वर्षीय बच्ची का बलात्कार करके उसक क़त्ल कर दिया. इसी प्रकार कुछ समय पूर्व, कानपुर की एक बालिका अपने शिक्षक की यौन अमानुषिकता की शिकार होकर मृत्यु का ग्रास बनी.

उत्तर प्रदेश में इस प्रकार के हादसों की कमी नहीं है. सितम्बर २००९ में १३ वर्षीय नौरा को लखनऊ के मानकनगर रेलवे स्टेशन के पास मृत अवस्था में पाया गया. उसकी ७ वर्षीय सहेली नूर बानो वहीं पर बेहोश अवस्था में पायी गयी तथा उसके शरीर पर चाकू के घाव और जलने के निशान पाए गए. गरीब बस्ती में रहने वाली उन दोनों बच्चियों के परिवार वालों ने जब पुलिस में शिकायत दर्ज करने की कोशिश की तो कृष्णा नगर थाने के इंचार्ज ने उन्हें भगा दिया. ४ महीनों तक ने तो कोई भी पुलिस कार्यवाही की गयी न ही नूर बानो को किसी मजिस्ट्रेट या चाइल्ड वेलफेयर कमीशन के समक्ष पेश किया गया. नूर के शरीर के निशानों से यौन उत्पीड़न का मामला साफ़ ज़ाहिर था, परन्तु मेडिकल परीक्षण की रिपोर्ट ने केवल सिर पर चोट की बात कही. नौरा की संदिग्ध मौत के बारे में भी कोई छान बीन नही करी गयी.

नूर बानो के अनुसार, दोनों को कुछ व्यक्तियों ने एक सफ़ेद गाड़ी के अन्दर घसीट लिया था. उसके बाद उसे कुछ याद नहीं. पुलिस ने यह कह कर केस बंद कर दिया की बच्चियां चलती ट्रेन से गिर गयी थीं. मई २००५ में, कूड़ा बीनने वाली एक १३ वर्षीय बालिका के साथ कुछ लड़को ने घंटों बलात्कार कर के आशियाना पुलिस स्टेशन के सामने फ़ेंक दिया. ५ वर्षों के बाद भी आशियाना रेप केस के नाम से मशहूर इस केस का अभी तक कोई निपटारा नहीं हुआ है. बच्ची अभी तक एक डरी और सहमी हुई गुमनामी की ज़िन्दगी जी रही है, और अपराधी स्वछंद घूम रहे हैं. मुक़दमा नाबालिग अपराधियों के न्यायालय में चल रहा है.

खेद की बात है कि भारत में अभी भी बच्चों के साथ हुए इस प्रकार की वारदातों को अपराधिक नहीं करार किया जाता.  अध्ययनों द्वारा यह पता चलता है कि भारत में घरों में काम करने वाले, या फिर सड़कों पर अथवा संरक्षण गृहों में रहने वाले बच्चों में ७५% ऐसे हैं जो कभी न कभी यौन उत्पीड़न का शिकार हुए हैं. महिला एवम् बाल विकास मंत्रालय द्वारा २००७ में किये गए एक अध्ययन से पता चलता है कि विश्व भर में सबसे अधिक उत्पीड़ित बच्चे भारत में ही हैं (५३%). अधिकाँश हादसों में उत्पीड़क कोई अनजान नहीं, वरन जान पहचान  वाला व्यक्ति ही होता है.  केंद्र सरकार की २००८ की एक रिपोर्ट ने भी इस बात की पुष्टि की है. यह वास्तव में लज्जा का विषय है की यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन ऑफ चाइल्ड राइट्स पर हस्ताक्षर करने के बावजूद, भारत सरकार अपने देश के बच्चों को यौन उत्पीड़न से बचाने में असक्षम है. भारतीय दंड संहिता में भी इन हादसों को किसी विशेष प्रकार के अपराध का नाम नहीं दिया गया है.  फिर जो संस्थाएं बच्चों के अधिकारों को लेकर काम कर रही हैं, वो कानून की मदद किस प्रकार लें? 'यू.पी. स्टेट लीगल सर्विसेस अथॉरिटी' की सचिव जी श्री देवी के अनुसार, ' हमारी राष्ट्रीय नीति के अनुसार, बच्चे देश की अनमोल धरोहर हैं, और हम सबका कर्तव्य है कि उन्हें हर प्रकार के उत्पीड़न एवम् शोषण से बचाएं. यह सच है कि भारतीय दंड संहिता में इसके लिए विशेष प्रावधान नहीं है, पर रुचिका बलात्कार केस के बाद, माननीय गृह  मंत्री  चिदंबरम जी के संरक्षण में एक नया 'यौन अपराध क़ानून' प्रस्तावित है. यदि यह कानून पास हो गया तो बलात्कारी को २ वर्ष कि जेल हो सकती है.'

परन्तु ऐसे घृणित अपराधों के लिए क्या दो वर्ष कि सजा काफी है?

श्री देवी जी का कहना है कि, ' ड्राफ्ट बिल में अवयस्क के साथ किये गए बलात्कार के मामलों में अधिकतम १०साल कि कैद हो सकती है. बिल में अवयस्क की आयु सीमा भी १६ वर्ष से बढ़ा कर १८ वर्ष कर दी गयी है. इससे बाल विवाह, एवम् अवयस्क विवाहित के साथ किये गए बलात्कार के मामलों को भी अपराध की श्रेणी में लाया जा सकेगा.

बाल कल्याण कमिटी नई दिल्ली की भूतपूर्व अध्यक्ष भारती शर्मा के अनुसार, ' ऐसे सभी मामलों में तुरंत पुलिस कार्यवाही आवश्यक है, और अपराधी को तुरंत पकड़ना भी ज़रूरी है ताकि वो अन्य बच्चों के साथ यही कुकर्म दोबारा न कर सके. साथ ही बच्चों को भी इस विषय की उचित जानकारी एवम् परामर्श देना आवश्यक है ताकि वे स्वयं अपनी रक्षा कर सकें. बच्चों में यह विश्वास पैदा करना भी ज़रूरी है कि कोई ऐसी दुर्घटना हो जाने की स्थिति  में वे किसी समझदार और विश्वसनीय व्यक्ति से इस बारे में बात कर सकें, तथा बच्चे की शिकायत पर उचित कार्यवाही की जा सके.

एक धनात्मक बात यह है कि शीघ्र ही एक इंटिग्रेटेड चाइल्ड प्रोटेक्शन योजना को कार्यान्वित किया जाने वाला है जिसके अंतर्गत बाल संरक्षण का एकीकृत कार्यक्रम बड़े और छोटे शहरों में उपलब्ध हो पायेगा.'

 बच्चों के हितों के लिए काम करने वाली 'साथी' नामक संस्था से सम्बद्ध अनुराधा वर्मा का कहना है कि, ' उत्पीड़न के शिकार बच्चों को बहुत अधिक देखभाल एवम् संरक्षण की आवश्यकता होती है. अधिकतर मामलों में अपराधी कोई जानने वाला  व्यक्ति ही होता है. ऐसी स्थिति में बच्चे को बार बार उसी व्यक्ति के हाथों यौन उत्पीड़न का शिकार तब तक होना पड़ता है जब तक उसे उस परिवेश से बाहर निकाल कर बचाया नहीं जाता. ऐसे बच्चे जीवन भर के लिए भावात्मक रूप से घायल हो जाते हैं, तथा उन्हें लम्बे समय तक उचित मनोवैज्ञानिक परामर्श की आवश्यकता होती है. परन्तु दुर्भाग्यवश, बाल संरक्षण अथवा बचाव केन्द्रों पर इस प्रकार की सुविधा उपलब्ध नहीं होती. इन केन्द्रों पर प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिकों की कमी, समस्या को और गंभीर बना देती है. इस कमी का निराकरण तुरंत होना चाहिए'.

अंजलि सिंह -सी.एन.एस
(अनुवाद: शोभा शुक्ल - सी.एन.एस)

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