योगी की राजनीति सामाजिक ताने-बाने के लिए खतरा

तस्वीर: राजीव यादव
[प्रोफेसर (डॉ) रूप रेखा वर्मा के वक्तव्य की ऑडियो रेकॉर्डिंग सुनने के लिए यहाँ क्लिक कीजिये
[English] न केवल गोरखपुर को बल्कि पूर्वी उत्तर प्रदेश को जिस तरह से उग्र हिंदुत्ववाद जकड़ता जा रहा है वो नि:संदेह भारत के समक्ष एक जटिल चुनौती है कि कैसे हर नागरिक के लिए भले ही वो किसी भी धर्म-जाति की (का) हो, उसको सभी संवैधानिक अधिकार प्राप्त हो सकें और सम्मानजनक सुरक्षित और बिना-खौफ जीवन-यापन कर सके. उत्तर प्रदेश प्रेस क्लब में प्रदर्शित वृत्तचित्र "भगवा युद्ध: एक युद्ध राष्ट्र के विरुद्ध" के दौरान यही बात स्पष्ट थी.

लखनऊ विश्वविद्यालय की भूतपूर्व उप-कुलपति एवं 'साझी दुनिया' से जुड़ीं प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता प्रोफेसर (डॉ) रूप रेखा वर्मा ने कहा: "एक समय में पूर्वी उत्तर प्रदेश प्रगतिशील विचारों की सरजमीन मानी जाती थी, जहां पर राही मासूम रज़ा जैसे साहित्यकार पैदा हुए और वहाँ से एक लम्बे समय तक लिखा, और वामपंथी आन्दोलन की, प्रगतिशील विचारों की, समतावादी आन्दोलन की वजह से पूर्वी उत्तर प्रदेश की सरजमीं जानी जाती थी. फिरकापरस्ती को घुसने न देने की ताकत थी उस जमीन में, उसके लिए पूर्वांचल जाना जाता था."

प्रोफेसर (डॉ) रूप रेखा वर्मा ने कहा कि "किस तरह से गोरखपुर फिरकापरस्त लोगों के कब्जे में हुआ यह समझने की जरुरत है. जब गोरखपुर में यह नारा लगना शुरू-शुरू ही हुआ था कि: "गोरखपुर में रहना है तो योगी योगी कहना होगा", और शायद तब तक पूरा गोरखपुर भी उसके शिकंजे में नहीं आ पाया था, तो यहाँ लखनऊ में बैठक हुई थी जिसमें ये चिंता व्यक्त की गयी थी कि हम लोग जो गोरखपुर से इतनी दूर बैठे हैं जिनकी जड़ें गोरखपुर में नहीं हैं, जिनका कोई 'काडर' गोरखपुर में नहीं है, वो लोग कैसे इसको वहीँ-का-वहीँ रोक के, इस हवा को तहसनहस कर सकते हैं. उस समय देश में जगह-जगह फिरकापरस्त ताकतें पनप रही थीं और हस्तछेप भी हो रहे थे, और इतना वक़्त नहीं था कि हम लोग गोरखपुर में नए सिरे से अपनी कोई टीम बनाये और इस लड़ाई को लड़ें. बात यह हुई कि वो राजनीतिक दल जिनके एजेंडे में फिरकापरस्ती नहीं है और जिनके काडर चुनावी कारणों से हर जगह होने ही चाहिए, उनसे हम सहायता मांग सकते हैं कि वो तत्काल अपने काडर को भेज कर हस्तछेप करें और उनके लिए यह चुनावी दृष्टि से भी फायदेमंद होगा. उनके अपने हितों और हमारे सामाजिक हितों में इस मेल की वजह से हम उनसे मदद लें, यह योजना बनी थी."

प्रोफेसर (डॉ) रूप रेखा वर्मा ने कहा कि "मुझे वामपंथी दल और समाजवादी पार्टी जाने को कहा गया था और श्री प्रकाश कारत और श्री अहमद हसन से बात हुई थी. इन सभी ने यह कहा कि हमारे काडर इसको नियंत्रित कर लेंगे, और हम लोग इतनी चिंता नहीं करें. परन्तु हम लोगों के देखते-ही-देखते न केवल पूरा गोरखपुर बल्कि अन्य छेत्र जैसे कि मऊ में भी फिरकापरस्ती जमती गयी. हम लोगों के एक दल ने मऊ जा कर मऊ दंगों की रपट लिखी थी और इसके प्रमाण थे कि कैसे हिन्दू युवा सेना के लोगों ने पहली गोली चलायी थी और उसी से सारा दंगा शुरू हुआ था, वर्ना वहाँ दंगे होने की कोई जमीन बनने न पायी थी. इस तरीके से आज हालत यह है कि पूरा पूर्वी उत्तर प्रदेश फिरकापरस्त ताकतों के चंगुल में है." 

प्रोफेसर (डॉ) रूप रेखा वर्मा ने बताया कि "पहले तो फिरकापरस्त ताकतें सूक्ष्म या महीन तरीकों से लम्बे समय तक काम करने की कोशिशें कर रही थी जिसके बाद ही उनका जहर घुल पाता था. परन्तु अब तो एक दबंग फिरकापरस्त 'मूवमेंट' है जिसने पूर्वी उत्तर प्रदेश को अपना शिकार बनाया है, जिसमें उस महीन तरीके से काम करने की न तो शिद्दत है, न अक्ल है, न तमीज है, सिर्फ दबंगई की वजह से और गोरखनाथ पीठ का धार्मिक लाभ उठा कर के और गोरखनाथ पीठ के पूरे स्वरुप को बदल कर ही यह पनप राही हैं."

स्त्री विरोधी मुद्दे और फिरकापरस्ती ताकतें कैसे आसानी से जुड़ जाती है, इस पर भी प्रोफेसर (डॉ) रूप रेखा वर्मा ने प्रकाश डाला. प्रोफेसर वर्मा ने कहा कि "उत्तर प्रदेश की बड़ी अजीब स्थिति है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश पूरी तरह से फिरकापरस्त दबंगों के गिरफ्त में है और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में स्त्री-विरोधी पितृसत्ता व्याप्त है - यूँ तो पूरे भारत में ही पितृसत्ता है पर जिस तरह की पितृसत्ता, जिस तरह का स्त्री-विरोधी मौहौल, हमें पश्चिमी उत्तर प्रदेश में देखने को मिलता है वो चिंताजनक है. स्त्री-विरोधी पितृसत्ता का तानाबाना फिरकापरस्ती से होना बहुत आसान हो जाता है."

प्रोफेसर (डॉ) रूप रेखा वर्मा, उत्तर प्रदेश प्रेस क्लब में वृत्तचित्र "भगवा युद्ध: एक युद्ध राष्ट्र के विरुद्ध" के प्रदर्शन से पहले सत्र में अपने विचार रख रही थीं. भाजपा सांसद और गोरखनाथ पीठ के उत्तराधिकारी योगी आदित्यनाथ द्वारा पूर्वांचल में की जा रही साम्प्रदायिक आतंकी राजनीति पर यह वृत्तचित्र आधारित है. 

फिल्म के बाद आयोजित परिचर्चा को संबोधित करते हुए मागसेसे पुरुस्कार से सम्मानित मानवाधिकार कार्यकर्ता डॉ० संदीप पाण्डे ने कहा कि पूर्वांचल में यह प्रयोग लम्बे समय से चल रहा है और इसे लगातार सरकार व प्रशासन द्वारा नजरअंदाज किया जा रहा है। एडवोकेट मुहम्मद शुएब ने कहा कि भगवा युद्ध न केवल एक समुदाय विशेष के खिलाफ की जा रही आतंकी गतिविधियों को सामने लाती है, बल्कि बहुसंख्यक हिंदू समुदाय के दलितों, महिलाओं व बच्चों में साम्प्रदायिकता के विषरोपण को सामने लाती है। अयोध्या के महंत युगल किशोर शरण शास्त्री ने कहा कि आदित्य नाथ योगी परम्परा के विरुद्ध ऐसी परम्परा की रचना कर रहे हैं जिसमें योगी, बदमाश के रूप में सामने आया रहा है। उन्होंने कहा कि यह फिल्म ऐसे प्रयोगों का पर्दाफाश करती है।

हिंदी में बनी 43 मिनट की इस फिल्म का निर्देशन युवा फिल्मकार राजीव यादव, शाहनवाज आलम और लक्ष्मण प्रसाद ने किया है। इस प्रदर्शन में नर्मदा बचाओ आन्दोलन की वरिष्ठ कार्यकर्ता अरुधंती धुरू, अयोध्या-फैजाबाद की वरिष्ठ पत्रकार सुमन गुप्ता, वरिष्ठ पत्रकार अम्बरीश कुमार, वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ कलहंस, रवि शेखर सहित शहर के विभिन्न सामाजिक संगठनों के लोग और बुद्धिजीवियों ने भाग लिया।

बाबी रमाकांत - सी.एन.एस

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