बेबस प्रधानमंत्री की अंतर्व्यथा

2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की चुप्पी आखिरकार टूट ही गई। जब उन्होंने खुद को नादान कह कर सबको चौंका दिया। कहते हैं खामोशी किसी आने वाले तूफान का पैगाम होती है। लेकिन पीएम की खामोशी का टूटना और खुद को छात्र कहना दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के मुखिया को शोभा नही देता। वैसे मनमोहन सिंह के इस कथन से ज्यादातर लोगों को आश्चर्य इस बात से भी नही होगा कि उन्होंने जो बातें कहीं हैं, वह कहीं न कहीं कांग्रेस पार्टी की रिवायत रही है। जहां आलाकमान का कद काफी ऊंचा माना जाता है। अपने कई दशकों के शासनकाल में कांग्रेस पार्टी के अंदर यह देखने को मिला जब कांग्रेस अध्यक्ष के समक्ष कांग्रेसी प्रधानमंत्री का कद भी छोटा पड़ा। जवाहर लाल नेहरू जब प्रधानमंत्री थे तब वे कुछ वर्षों तक पार्टी अध्यक्ष भी बने। वहीं इन्दिरा गांधी भी प्रधानमंत्री रहते हुए पार्टी सुप्रीमों  बनीं। राजीव गांधी ने भी कुछ इसी तरह की परंपरा का खनवाह किया। कहने का आशय यह है कि स्वयं को लोकतान्त्रिक पार्टी कहने का दम भरने वाली देश की सबसे पुरानी पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र का कितना कितना घोर आभाव है इसका उदाहरण मोरार जी देसाई के समय देखने को मिला। जब प्रधानमंत्री पद के लिए उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के खिलाफ उम्मीदवारी का दावा ठोंका | हालांकि चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा, जानकारों की माने तो मोरार जी भाई का यह कदम गांधी परिवार के मठाधीशी के खिलाफ एक मौन बगावत थी। कहा तो यहां तक जाता है कि इन्दिरा गांधी और मोरार जी देसाई के तनाव के कारण ही सन 1969 में पहली बार कांग्रेस दो खेमों में विभाजित हुई जो नई कांग्रेस और पुरानी कांग्रेस के नाम से जानी गई। इन्दिरा नई कांग्रेस की नेता बनीं और मोरार जी देसाई पुरानी कांग्रेस पार्टी के नेता।

हांलाकि पुरानी कांग्रेस कई बार टूटती और बिखरती रही। पार्टी में हो रहे बिखराव को रोकने के लिए दल के वरिष्ठ नेताओं ने मिलकर संगठन कांग्रेस बनाया। लेकिन मजबूत नेतृत्व के आभाव में संगठन कांग्रेस का जनता पार्टी में विलय हो गया। आज की तारीख में न तो संगठन कांग्रेस रहा और न ही जनता पार्टी-बची रही तो सिर्फ कांग्रेस और आलाकमान की स्वंयभू छवि। हालांकि कुछ सियासी जानकार मानते हैं कि कांग्रेस की टूट की वजह 1969 का वह राष्ट्रपति चुनाव भी बना, जब नीलम संजीव रेड्डी प्रेसीडेन्ट पद के लिए कांग्रेस के अधिकारिक उम्मीदवार थे। उनका कद पार्टी में काफी ऊंचा माना जाता था। इन्दिरा गांधी उस समय कांग्रेस प्रमुख थीं, लिहाजा उन्हें यह आशंका थी कि रेड्डी के चुनाव जीतने पर उनकी हैसियत कम हो सकती है। ऐसे में वी.वी. गिरि का राष्ट्रपति चुनाव लड़ना और 3 मई 1969 को देश का प्रथम नागरिक बनना किसी सियासी पार्टी के इतिहास में पहला मौका था जब पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार को हार मिली हो। पार्टी आलाकमान के बारे में वैसे तो ज्यादातर नेताओं की मुंह खोलने की हिम्मत नही रही। कई पुराने नेताओं ने पार्टी में घुटन भरी जिंदगी गुजार ली, लेकिन कभी अपनी जुबान नही खोली। ऐसा इसलिए कि वह कभी भी पार्टी लाइन से अलग जाने की हिम्मत नही जुटा पाए। पूर्व रेलमंत्री स्वर्गीय ललित नारायण मिश्र जो उन दिनों कांग्रेस में चाणक्य की भूमिका रखते थे। उनकी नाराजगी भी कई बार देखी गई, आलाकमान उन्हें क्या सजा देती उससे पहले ही वह काल- कल्वित हो गए और उनके साथ ही कई अनकही बातें और रहस्य भी खत्म हो गए। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने खुद को स्कूली छात्र कहकर अपना दर्द-ए-हाल सुनाया। लेकिन कहीं न कहीं इस दर्द की वजह वही समानांतर रेखाएं हैं, जिसे पूर्व के कई कांग्रेसी भुगत चुके हैं। चूंकि मनमोहन सिंह एक धीर-गंभीर और शालीन व्यक्ति हैं इसलिए उनकी अभिव्यक्ति का तरीका एक निर्दोष छात्र की तरह था। उनके मुताबिक जबसे वह प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे, उन्हें कई तरह के इम्तिहानों से गुजरना पड़ा। प्रधानमंत्री के इस विलाप को देखकर पूर्व प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के जमाने में उनकी कृपा से राष्ट्रपति बने ज्ञानी जैल सिंह की वह बात याद आती है जब उन्होनें  कहा था ‘अगर इन्दिरा कहें तो मैं झाड़ू लगाने को तैयार हूं’ इस बात में भले ही कांग्रेसी इन्दिरा की पार्टी में अहमियत तलाश रहे हों, लेकिन खुद को भारत की सबसे पुरानी और लोकतांत्रिक पार्टी कहने वाली कांग्रेस के भीतर अंदरूनी राजशाही प्रदर्शित होता है। एनडीए के शासन के बाद यूपीए की ओर से प्रधानमंत्री बने मनमोहन सिंह कभी भी खुद को मानसिक तौर पर एक मजबूत आत्मनिर्णय लेने में सक्षम प्रधानमंत्री के तौर पर स्थापित नहीं कर पाए हैं। कहीं न कहीं उनके अन्दर यह बात आज भी है कि कांग्रेस सुप्रीमों सोनिया गांधी ने उन्हें यह पद देकर उपकृत किया है। लगभग साढ़े सात साल का कार्यकाल पूरा कर चुके डॉ. मनमोहन सिंह की यह पीड़ा एक दिन की नही है। जब वामदलों के सहारे यूपीए प्रथम थी तो कई आर्थिक मसलों पर उन्हें सहयोगी पार्टियों के दबाव के आगे झुकना पड़ा था। वह चाहकर भी स्वतंत्र फैसले नही कर पाए। एक जाने-माने अर्थशास्त्री होने के नाते वह कई बार अपने अनुभवों से कई सारे प्रयोग करने चाहे, लेकिन उन्हें भरसक कामयाबी नही मिली। यह कहना अतिश्योक्ति न होगा देश की एक बड़ी आबादी आज भी उनके अन्दर आत्मविश्वास की कमी देख रही है। उनके संभाषणों और बयानों में इसकी झलक साफ देखी जा सकती है। दुनिया में एक मंजे हुए अर्थशास्त्री के रूप में निश्चित तौर पर उनकी छवि असरदार हो, लेकिन एक सशक्त प्रधानमंत्री के तौर पर देश उन्हें अब तक नहीं देख पाया है। अपने दूसरे कार्यकाल में उनके सामने चुनौतियां कई रूपों में सामने आईं, लेकिन हर मसले पर उन्होंने खुलकर कोई बयान नही दिया। ए. राजा मामले में जब बात उन पर आई तो प्रधानमंत्री ने अपनी खामोशी भंग की, लेकिन खामोशी टूटी भी तो उसमें गरज कम, लाचारी ज्यादा दिखी। सवाल इस बात का है कि क्या मनमोहन सिंह वाकई एक लाचार प्रधानमंत्री हैं, क्या उनके अधिकार क्षेत्र कांग्रेस आलाकमान से कमतर है? क्या गठबंधन धर्म निभाने की खातिर वे राजधर्म निभाने में असफल हैं।

अभिषेक रंजन सिंह (पत्रकार)

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