मन न रहत एक समान

(दैनिक हिंदुस्तान में प्रकाशित - रविवार, १२ फरवरी २०१२)
आज 104 बरस की उम्र में भी, उस्ताद अब्दुल रशीद खान का मन एक नवजात शिशु के समान निर्मल और निश्चल है। 1908 में उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले के सलोन कस्बे में एक लब्ध प्रतिष्ठ संगीतज्ञ परिवार में जन्मे, खान साहब आज हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के ग्वालियर घराने के सबसे वयोवृद्ध गायक हैं। उनका सीधा ताल्लुक मियां तानसेन के घराने से है। इस उम्र में भी चेहरे पर न कोई झुर्री और न ही माथे पर कोई शिकन। बस एक दिल अजीज मासूमियत और एक खुशनुमा मुस्कान। हाल ही में खान साहब लखनऊ में महिंद्रा सनतकदा फेस्टिवल में शिरकत करने आए थे। लखनऊ के पार्क सरोवर होटल के कमरे में सी एन एस के माध्यम से उनसे बातचीत करने की खुशकिस्मती हासिल हुई। उसी गुफ्तगू की थोड़ी सी बानगी--

आपको देख कर जीने की ललक पैदा होती है। आप क्या संदेश देंगे आज के नौजवान को जो बचपन से ही मानसिक तनाव से जूझ रहा है।आपको देख कर यह जानने का दिल करता है की क्या राज है ज़िंदगी में खुश रहने का?

कोई राज़ नहीं है, बस एक रूटीन है जो चलता जाता है बराबर—हर पल को हर दिन को एक नए अंदाज़ से जीना। यह तो कुदरत का तमाशा है कि किसी को बीमार डाल दे किसी को अच्छा कर दे, किसी को मार दे, किसी को जिला दे। लेकिन मन से कभी खुद को बीमार नहीं समझना चाहिए।यह न समझे कि वो बीमार है। वही बीमार जल्दी अच्छा होता है।

इस उम्र में आपको कोई तकलीफ या परेशानी?

वैसे तो मुझे कोई परेशानी नहीं है, पर यह तो अपने अपने नज़रिये का सवाल है। अगर देखा जाय तो दो आदमी मुझे पकड़ कर उठाते, बैठाते हैं, तकलीफ और दर्द तो होता रहता है। एक वक़्त ऐसा था कि मुझे व्यावसायिक जलन के चलते पारा दिया गया जिससे मेरी सारी उँगलियाँ टेढ़ी होकर ठूंठ जैसी हो गयी। मगर अल्लाह का करम है कि मालिक ने मेरी आवाज़ बचा ली और वो आज भी बरकरार है। इस बात को बहुत अरसा बीत गया, पचासों बरस बीत गए। (शायद वो इस हादसे को याद ही नहीं करना चाहते)॰

आपने रियाज़ कब से शुरू किया?

वैसे तो जब बच्चा पैदा होता है, माँ की गोद में जाता है, माँ लोरी सुनाती है, तो वो भी सुर में सुनाती है। तो सुर तो उस वक़्त से ही कान में पड़ता रहता है। मैंने तालीम शुरू की 8,9 बरस की उम्र से। रायबरेली जिला के सलोन कस्बे में।मेरी पैदाइश वही की है। वही मैं गाया बजाया, पला बढ़ा। अभी भी मेरा खानदान वहाँ रहता है और मैं अब भी आता जाता रहता हूँ। 15-16 बरस की उम्र में पहला प्रोग्राम दिया और तब से लगातार प्रोग्राम कर रहा हूँ। अब तक 4000 से ऊपर अपनी बन्दिशें बना चुका हूँ (रसन पिया के नाम से)।

आप तो दुनिया के लिए एक मिसाल हैं। ताज्जुब है कि आपका नाम लिमका या गिनेस बुक में नहीं आया?

अब लिमका या गिनेस बुक में नाम नहीं है तो उसका मुझे कोई गिला नहीं। कलकत्ता में एक प्रोग्राम के दौरान किन्ही गीता देसाई ने मुझसे कहा कि आप जैसा हिंदुस्तान में कोई नहीं है, पूरी दुनिया में कोई नहीं है—इतना उम्दा गायक।

कोलकाता की आई टी सी संगीत रिसर्च अकेडमी में कबसे हैं?

कलकत्ता में रहते हुए 20-21 साल हो गए हैं। उसके पहले रियासतों में आना जाना लगा रहता था, सैकड़ों कान्फरेंसों में शिरकत करी। रियासतों ने बड़ा साथ दिया। मुगल पीरियड खत्म होने के बाद तो गाना बजाना रियासतों में आ गया। राजा इसमें अपनी शान समझते थे कि दरबार में एक दो गायक होने चाहिए, एक दो पहलवान होने चाहिए। जब रियासतें खत्म हो गईं तब हमें कान्फरेंसे देखना पड़ी।

बीते हुए वक़्त की कोई यादें? क्या आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा लिया?

नहीं कोई यादें नहीं हैं। मैं बीते वक़्त को याद नहीं करना चाहता। आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा नहीं लिया। पर यह ज़रूर है कि 1947 से पहले के जो हालात थे उनके मुक़ाबले आज का हिंदुस्तान कहीं बेहतर है। परेशानी और आराम तो लगा रहता है। पर आज हम आज़ाद हैं। यह बहुत बड़ी नेमत है।

क्या आप अब भी रियाज़ करते हैं?

वो कुछ नाराज़ हो गए। बोले—क्या मेरी यह उम्र रियाज़ करने की है? क्या यह मुमकिन है कि मैं इस उम्र में रियाज़ करूंगा?

पर इस उम्र में तो आप बहुत कुछ ऐसा कर रहे हैं जो एक आम इंसान के लिए मुमकिन ही नहीं है।

यह तो खुदा की मर्ज़ी है कि मैं ऐसा कुछ नामुमकिन सा कर पा रहा हूँ। आज भी कोलकाता की अकेदेमी में 15-20 शागिर्दों को रोज़ तालीम दे रहा हूँ। मेरे दो बेटे और दो बेटियाँ हैं। एक बेटे ने थोड़ा बहुत सीखा और अब नोयडा के एक कालेज में म्यूज़िक सिखा रहा है। दूसरा लड़का सड़क और पुल का कांट्रैक्टर है। बेटियों को मैंने संगीत नहीं सिखाया। हमारे यहाँ बेटियों को मौसीकी नहीं सिखाई जाती. हमारे यहाँ पुरखों से यह सिलसिला चला आ रहा है कि औरतें नहीं गाएँगी। वैसे मेरी महिला शागिर्द भी हैं। हालांकि अगर बेटियों ने सीखा होता तो शायद मुझसे अच्छा ही गातीं। एक बेटी मेरे साथ रहती है दूसरी हाथरस में ब्याही है। घर परिवार में नाती, पर नाती, पोते, परपोते, नगरपोते सब ही हैं। पर गाने का शौक किसी को नहीं है। मेरी विरासत यही लड़का (शुभोमोय भट्टाचार्य जो उनसे कोलकाता में पिछले 15 सालों से संगीत की शिक्षा ले रहे हैं) लेगा।

आप आई टी सी संगीत रिसर्च अकेदेमी में पढ़ा रहे हैं। क्या इस कंपनी को सिगरेट बेचने का धंधा करना चाहिए या नहीं?

वो हँसते हुए कहते हैं कि यह तो धंधा है। वो जहर बाँट रहे हैं तो बांटने दीजिये। आप क्यों खाते हैं। मैं जहर बाटूंगा, आप की मर्ज़ी खाएं या न खाएं। यह आप की समझ की बात है।

शुभोमोय हमेशा मेरे साथ रहते हैं। यहाँ लखनऊ से में अपने वतन रायबरेली जाऊंगा, फिर दिल्ली होते हुए नागपुर, अमरावती, रायपुर, खैरागढ़ से वापस कोलकाता। सभी जगह प्रोग्राम लगे हैं।  पिछले महीने भी काफी राउंड हुआ। पुणे, मुंबई, बरोदा, अहमदाबाद।

मगर आपके चेहरे पर थकान का कोई निशान नहीं? 

थकान किस बात की? खुदा ने मुझे आवाज़ की नेमत दी जिसे मैं खुले दिल से तकसीम कर रहा हूँ। तकलीफ़े कम नहीं हैं। मैं अब चल फिर नहीं सकता। दो आदमी पकड़ें तो उठूँ बैठूँ। बीस साल पहले कूल्हे की हड्डी टूट जाने से ऐसी हालत हो गयी। आपरेशन भी हुआ, पर चलने की ताकत वापस नहीं आई।

पर उनके चेहरे पर दर्द का नामोनिशान नहीं है। आँखों में एक खास तरह की चमक है।और ज़िंदगी को भरपूर जीने का उत्साह। मेरे बहुत इसरार करने पर उन्होने अपनी ही बनाई हुई यह बंदिश अपनी शीशे जैसी चमकदार आवाज़ में गा कर मुझे धन्य कर दिया :

मन न रहत एक समान, मन न रहत एक समान। छिन नाहीं छिन हाँ ही, बलमा तोरी कौन बान।  अँचरा गहत, झगड़ा करत, बतियाँ करत भौएँ तान। मन न रहत एक समान, मन न रहत एक समान

शोभा शुक्ला - सी.एन.एस. 
(दैनिक हिंदुस्तान में प्रकाशित - रविवार, १२ फरवरी २०१२)
(दैनिक हिंदुस्तान में प्रकाशित - रविवार, १२ फरवरी २०१२)

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