मासिक धर्म के प्रति अपराधबोध क्यों?

नीतू यादव, सिटीजन न्यूज़ सर्विस - सीएनएस 
मासिक धर्म महिलाओं की प्रजनन क्षमता से सम्बंधित एक प्राक्रतिक प्रक्रिया है तथा उनके शारीरिक स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है. प्रत्येक किशोरी को इस नियमित प्रक्रिया के विषय में पूर्ण जानकारी प्राप्त करने का न केवल अधिकार वरन आवश्यकता भी है। परन्तु यह खेद का विषय है कि आज के आधुनिक युग में भी भारत वर्ष, विशेषकर उत्तर प्रदेश जैसे पिछड़े प्रांत, में इस महत्त्व पूर्ण विषय पर कोई भी बातचीत करना बहुत ही शर्मनाक माना जाता है।

किशोरियों और अक्सर वयस्क महिलाओं में भी इसके बारे में  अधकचरा ज्ञान होने साथ साथ अनेक प्रकार की भ्रांतियाँ भी प्रचलित हैं जिनके चलते वे अपने मासिक धर्म को लेकर एक  हीन भावना एवं शर्म से ग्रसित रहती हैं। परिणाम स्वरुप वे इस विषय पर कोई भी बात करने से कतराती हैं और उचित जानकारी अभाव में प्रायः मासिक धर्म सम्बन्धी अनेक संक्रमणों और रोगों से ग्रसित हो कर  एक स्वस्थ जीवन जीने से वंचित रह जाती हैं।

ब्रहस्पति कुमार पाण्डेय, सचिव, युवा विकास समिति बस्ती का मानना है कि पुरुषों को भी इस विषय का ज्ञान होना चाहिए, तभी इससे सम्बधित भ्रांतियाँ एवं शर्म दूर करने में सहायता मिलेगी। उन्होंने बताया कि, " मैं मासिक धर्म के बारे में जानता हूँ. यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है जो महिलाओं के स्वस्थ होने का प्रमाण है. इसी प्रक्रिया के माध्यम से स्त्री माँ बन सकती है। इस विषय पर किसी से भी बात करने पर मुझे शर्मंदिगी महसूस नहीं होती। मैं अपने परिवार में इस विषय में खुल कर बात करता हूँ। यहाँ तक कि मैं अपनी माताजी के लिए स्वयं ही ‘सेनेटरी पैड’ खरीद कर लाता हूँ और उनसे भी  इस विषय पर बात करने में कोई झिझक महसूस नहीं करता हूँ।"

"मासिक धर्म के दौरान होने वाले संक्रमण रोगों के विषय में मुझे पूर्ण जानकारी है. लेकिन अधिकतर महिलायें भी इस विषय पर मौन रहती हैं। मैं सुझाव देना चाहता हूँ कि लोगों को सबसे पहले इस विषय से सम्बंधित अपनी झिझक को छोड़ देना चाहिए। मैं इसी क्षेत्र में कई वर्षों से काम कर रहा हूँ और मेरा निजी अनुभव है कि गाँव में लगभग ९०% महिलाएं मासिक धर्म के दौरान गंदे कपड़ों का इस्तेमाल करती हैं जिससे उनमें कई प्रकार के संक्रमण रोग हो जाते हैं। मेरा मानना है कि महिला एवं पुरुष प्रकृति के दो पहिये हैं. दोनों को एक दूसरे का समर्थन करना चाहिए और महिलाओं की इस अवस्था में पुरुषों को उनकी सहायता करनी चाहिए।"

किंग जॉर्ज मेडीकल यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर डॉक्टर अमिता पाण्डे ने मासिक धर्म सम्बन्धी महत्त्वपूर्ण जानकारी देते हुए बताया कि सामान्य मासिक धर्म की प्रक्रिया 21-15 दिन के अंतराल पर 5-7 दिन तक होनी चाहिए। इसमें 50-80 मिलिलीटर रक्तस्राव एवं हल्का दर्द सामान्य है। परन्तु  प्रक्रिया की शुरुआत १० वर्ष से पहले या १५ वर्ष तक न होना; रक्तस्त्राव कम होना या बहुत अधिक होना और रक्तस्त्राव में खून के थक्के आना; अथवा अनियमित मासिक चक्र होना या इस दौरान  अधिक दर्द होना--ये सभी चिंता के कारण हैं जिनके निवारण हेतु डॉक्टर से अवश्य सलाह लेनी चाहिए। कई बार मोटापे, मानसिक तनाव या हॉर्मोनल असंतुलन की वजह भी मासिक धर्म अनियमित हो सकता  है।

अमिता जी ने मासिक धर्म के दौरान विशेष साफ़ सफाई रखने पर बहुत ज़ोर दिया। उनके अनुसार मासिक के दौरान स्वच्छता न रखने से आगे चलकर कर अनेक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं, जैसे जननांगों में संक्रमण; बांझपन आदि।

समाज में मासिक धर्म से संबंधी अनेक भ्रांतियाँ हैं जिनका निराकरण आवश्यक है। इस दौरान महिला को मंदिर एवं रसोई में प्रवेश वर्जित होता है, उनके छूने से खाद्य सामग्री खराब होने की संभावना बताई जाती है, उन्हें सामान्य दिनचर्या जैसे नहाना, शारीरिक श्रम करना आदि भी मना होता है। यह सब तथ्यहीन है, तथा महिलाओं को इन दकियानूसी बातों का खुल कर विरोध करना चाहिए।

श्री अरुणाचलम मुरुगनाथन जी ने इस बात पर खेद व्यक्त किया कि भारत में माहवारी स्वच्छता विषय को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। उत्तर प्रदेश में केवल 5% महिलाएं ही सेनेटरी पैड का इस्तेमाल करती हैं। अरुणाचलम जी ने बताया कि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा राज्य में १००% मासिक धर्म स्वच्छता लाने की योजना में उनकी भी भागीदारी है। वे ब्लॉक स्तर पर सेनेटरी पैड्स के निर्माण हेतु सस्ती मशीनें महिलाओं के लिए एक कुटीर उद्योग के रूप में लगवाना चाहते हैं। ये पैड बाजार में बहुत कम कीमतों पर उपलब्ध कराये जाएंगे और किशोरियों एवं महिलाओं को इसके इस्तेमाल से होने वाले सकारात्मक प्रभावों की जानकारी भी उपलब्ध कराई जाएगी ताकि सभी इसके लाभ को समझकर इसके प्रयोग को महत्व दें। साफ़ सैनेटरी पैड केवल आराम के लिए ही नहीं वरन शारीरिक स्वच्छता के लिए आवश्यक हैं।

हमें आशा है कि उत्तर प्रदेश सरकार जल्द से जल्द मासिक धर्म स्वच्छता अभियान पूर्ण कर अधिक से अधिक किशोरियों/महिलाओं  को इसका लाभ दिला सकेगी। इसके साथ-साथ वह महिलाओं एवं किशोरियों को मासिक धर्म के विषय में पूर्ण एवं विस्तृत जानकारी भी प्रदान करेगी ताकि स्त्रियाँ पैड अथवा साफ़ कपड़े का इस्तेमाल मात्र आराम या स्वयं को दाग धब्बे से बचाने के लिए ही नहीं  बल्कि स्वयं को स्वस्थ व स्वच्छ रखने के लिए करें।

नीतू यादव, सिटीजन न्यूज़ सर्विस - सीएनएस 
६ अगस्त २०१५ 

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