मासिक धर्म स्वच्छता का लड़कियों के स्वास्थ्य एवं शिक्षा पर प्रभाव

मधुमिता वर्मा, सिटिज़न न्यूज़ सर्विस – सीएनएस 
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आँकड़े बताते हैं कि मासिक धर्म स्वच्छता का सीधा सम्बन्ध न केवल किशोरियों के स्वास्थ्य वरन उनकी शिक्षा से भी है। इस प्रक्रिया के दौरान साफ़ सफाई न रखने के कारण अनेक प्रकार के संक्रमण  बीमारियाँ  होने का खतरा बना रहता है, जो कभी कभी जानलेवा भी हो सकता है। यूनीसेफ के एक सर्वे के अनुसार उत्तर प्रदेश में ८५% किशोरियां माहवारी के दौरान फटे पुराने कपड़ों का प्रयोग कर अपने स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करती हैं। और उत्तर  प्रदेश स्वास्थ्य विभाग की माने तो प्रदेश में हर साल २८ लाख।

किशोरियाँ  मासिक धर्म सम्बंधित परेशानियों के कारण स्कूल तक जाना बंद देती हैं। फिर भी इस गंभीर विषय पर किशोरियों खुल चर्चा  होना तो दूर, उन्हें इस बारे में  जानकारी का नितांत अभाव है। यूनीसेफ के आँकड़े बताते हैं कि सही जानकारी के अभाव में ६०% लड़कियों में इसको लेकर डर का भाव है और ८०% लड़कियाँ इस प्रक्रिया के शुरू होने पर उसके लिए मानसिक रूप से तैयार ही नहीं होतीं।

फैमिली प्लानिंग एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया की लखनऊ शाखा की एक वालंटियर नीतू यादव ने इस बात पर ज़ोर दिया कि प्रत्येक किशोरी/महिला को यह पता  चाहिए कि मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता बनाये रखना कितना आवश्यक है।  नीतू के अनुसार, "मासिक धर्म के  समय गर्भाशय का मुंह खुलता है जिससे गन्दगी के कारण इसके अंदर इन्फ़ैकशन फैलने की संभावना भी बढ़  जाती है । इसका हमारे स्वास्थ्य पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है. अतः  पीरियड के समय हमें साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

इसके लिए बाजार में बिकने वाले सैनिटरी पैड का  प्रयोग कर सकते हैं, या फिर साफ़  सूती कपड़े का प्रयोग भी कर सकते हैं। लेकिन इस्तेमाल करने से सबसे पहले उस कपड़े को अच्छी तरह से साफ पानी से धो कर  उसे धूप में सुखाना चाहिए ताकि कपड़े में जो भी रोगाणु हों वो नष्ट हो जाएँ । उसके बाद कपड़ों को तह लगा कर  किसी पोलीथीन में स्टोर करना चाहिए।  कपड़े को प्रयोग करने के पहले तथा बाद में हाथों को अच्छी तरह साबुन से धोना चाहिए।

किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी के प्रसूती विभाग की डा. अमिता पाण्डेय जी का कहना है कि अभी भी ज़्यादातर महिलाएं और किशोरियाँ मासिक धर्म एवं उससे संबंधी स्वच्छता के प्रति जागरूक नहीं हैं। यह अज्ञानता  ग्राम या कस्बों में ज्यादा है। उन्हें यही नहीं मालूम है कि मासिक धर्म कितने दिनों के अंतर पर आना चाहिए और कितने दिनों तक रहना चाहिए। डा. पाण्डेय ने बताया कि यदि किसी लड़की में मासिक धर्म की शुरुआत १० वर्ष से पहले या  १५ वर्ष के बाद होती है तो यह सही नहीं है । यदि ऐसा है तो उसे इलाज की जरूरत है, लेकिन अधिकतर लोग इस  पर ध्यान नहीं देते, जिससे आगे चलकर गर्भाशय सम्बन्धी अनेक समस्याएँ हो सकती हैं-- यहाँ तक कि बांझपन भी।  इसलिए वे कहती है कि इस प्रक्रिया के बारे में महिलाओं और किशोरियों को जागरूक एवं जानकार होना आवश्यक है। मासिक धर्म सम्बन्धी समाज में प्रचिलित भ्रांतियों को दूर करना भी ज़रूरी है-- जैसे इन दिनों रसोई घर और धार्मिक स्थलों पर जाने की मनाही होना या नहाने से परहेज़ करना आदि।

कोयम्बटूर के श्री अरुणाचलम मुरुगनाथन ने कम लागत में सेनेटरी पैड्स बनाने की सस्ती मशीन का निर्माण किया है जो उत्तर प्रदेश सरकार की २०१७ तक १००% मेन्स्ट्रुअल हाइजीन लाने की योजना को सफल बनाने में सहायक हो सकती है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने उन्हें ये मशीनें यू पी  ब्लॉक स्तर पर लगाने के लिए आमंत्रित किया है जो एक अच्छी पहल है। फ़ोन पर सीएनएस  द्वारा लिए गए एक इंटरव्यू में अरुणाचलम जी ने कहा कि मासिक धर्म स्वच्छ्ता के लिए सैनिटरी पैड बनाने के लिए  बड़ी-बड़ी मशीनें न होकर छोटी-छोटी मशीनें होनी चाहिए ताकि उन्हें गाँव या ब्लॉक स्तर पर कुटीर उद्योग की तरह महिलाओं द्वारा चलाया जाय. इससे न केवल काम दाम में पैड उपलब्ध हो सकेंगे वरन महिलाओं के लिए रोज़गार का साधन भी उपलब्ध हो जाएगा।  उनका यह सुझाव भी अच्छा है कि ये मशीनें विद्यालयों में भी लगायी जा सकती हैं जिससे कि स्वावलंबी बाल मॉडल प्रस्तुत किये जा सकें।

यह  वास्तव में एक अच्छा तरीका है महिलाओं तक सैनिटेरी नैपकिन पहुंचाने का -- गाँव की महिलाएं आजीविका भी कमाएं और स्वयं के द्वारा बनाये गए सेनेटरी पैड्स का प्रयोग कर मासिक स्वच्छता भी बनाये रखें. गाँव की महिलाएं उत्साह के साथ स्वयं बनाएँगी तो उनका इस्तेमाल भी ज्यादा होगा। साथ ही साथ किशोरियाँ मासिक धर्म के दिनों में स्वयं को अधिक स्वस्थ  सुरक्षित  करेंगी और उन्हें इस प्राकृतिक प्रक्रिया चलते स्कूल से छुट्टी लेने की आवश्यकता नहीं होगी, और न ही उन्हें इस कारण से अपनी पढ़ाई छोड़ने पर मजबूर होना पड़ेगा।

मधुमिता वर्मा, सिटिज़न न्यूज़ सर्विस – सीएनएस 
२५  अगस्त, २०१५ 

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