कम उम्र में शादी जीवन की बरबादी

जितेंद्र कौशल सिंह, सिटिज़न न्यूज सर्विस - सीएनएस     
भारत में स्वास्थ्य सेवाओं में उत्तरोत्तर प्रगति हुई है। जहां आजादी से पूर्व जीवन रक्षक दवाओं का मिलना ‎मुश्किल रहता था वहीं आज ग्रामीण क्षेत्रों में भी ब्लाक स्तर पर अच्छे स्वास्थ्य केन्द्र व मुफ्त एम्बुलेंस सुविधा भी उपलब्ध है। देश की स्वास्थ्य सेवाओं में क्रान्तिकारी परिवर्तन हुआ है। किन्तु महिला स्वास्थ्य सम्बन्धी कई आँकड़े अब भी चौंकाने वाले हैं.  जहां एक ओर हम आर्थिक उन्नति का दावा भरते हैं, वहीँ दूसरी ओर बाल-विवाह के मामले में शीर्ष 10 देशों में भारत भी शामिल है जोकि वैश्विक सतत विकास लक्ष्य को पूरा ‎करने में मूल बाधा नजर आती है।

यूनिसेफ ने एक अध्ययन में इस बात पर मुहर लगाई है कि कम उम्र में शादी ‎शिक्षाप्राप्ति में बाधक तो है ही मातृ अस्वस्थता एवं उच्च शिशु मृत्युदर का कारण भी है। कम उम्र में विवाह समाज की अपरिपक्व मानसिक सोच को दर्शाता है। जहां इसके कारण लड़कियों का स्कूल जाना कम ‎उम्र में ही बन्द हो जाता है वहीं उनके शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक विकास के रास्ते भी पथरीले हो जाते है। ‎इसके साथ खड़ी होने वाली यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य समस्याएं जीवन को अँधेरी खाई में ढकेल देती हैं। बाल विवाह के कारण लड़कियां काम उम्र में ही माँ बन जाती है और पढ़ाई  रोजगार, तथा स्वास्थ्य की बुनियादी जरूरतों से वंचित रह जाती हैं  जिससे उपजे धनाभाव के ‎कारण उन्हें  अनेकों समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ‎
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एक ग्रामीण गृहणी सुशीला देवी का कहना है कि जब उनका विवाह हुआ तो वे  8वीं कक्षा की छात्रा थीं।  ‎विवाह के बाद पढ़ाई तो छूट ही गयी, वे एक वर्ष में ही माँ बन गयीं। जन्म के दो माह के बाद उनके बच्चे की मृत्यु हो गयी। दूसरे बच्चे की मृत्यु प्रसव ‎के दौरान हो गयी। जिससे इनका स्वास्थ्य आज भी खराब रहता है। २०१३ के सरकारी आँकड़ों के अनुसार  देश में 61% महिलाओं का विवाह 16 वर्ष की उम्र में हो जाता है, जिसमें 69 प्रतिशत ग्रामीण और 31 प्रतिशत ‎‎शहरी महिलाएं शामिल हैं। प्रसव के समय जहां महिलाओं की औसत उम्र 19.2 वर्ष पाई गयी है वहीं लगभग 16 प्रतिशत किशोरियां ‎‎15 से 16 वर्ष में ही माँ बन चुकी थीं, जो कि मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य को लेकर एक अत्यन्त भयावह स्थिति  है
       
चिकित्सक डॉ  मो अहमद खान बाल विवाह से हुए नुकसान के बारे में कहते हैं कि बाल विवाह के चलते कम उम्र में ही गर्भ धारण करने के ‎कारण किशोरी माता व उसका बच्चा दोनों ही मौत की कश्ती पर सवार होते हैं। विवाह के बाद कम उम्र में गर्भ धारण होने पर जहाँ एक ओर माँ और गर्भस्त शिशु, दोनों ‎पूर्ण रूप से विकसित नहीं हो पाते, वहीं प्रसव के दौरान दोनों की जान को खतरा दो गुना बढ़ जाता है। कभी-कभी तो माँ और ‎बच्चे को बचाना मुश्किल हो जाता है। ‎बस्ती जिले के महिला अस्पताल में कार्यरत महिला चिकित्सक डॉ ममता रानी का कहना है कि  कम उम्र में लड़कियों की शादी से उनके प्रजनन तंत्र पर सीधा असर पड़ता है जिससे गर्भावस्था में खून की कमी, गर्भपात, व समय से पहले बच्चे का जन्म आम  समस्या हो जाती है.  अत: कम  उम्र में शादी लड़की की जान के लिए खतरा बन जाती है. कम उम्र में विवाह से किशोरी माँ व उसके बच्चों में कुपोषण, खून की कमी आदि समस्याएं उत्पन्न होती है। हमारे देश में मातृ और शिशु मृत्यु की बढ़ी हुई दरों का एक प्रमुख कारण बाल विवाह भी है।

वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप चंद्र पाण्डेय ने कहा कि जहां अशिक्षा, गरीबी और अभाव है वहीं कुरीतियां भी हैं.  और जब तक ‎समस्याओं का ‎यह त्रिकोण रहेगा तब तक बाल विवाह से निपटना मुश्किल है। केवल जागरूकता के आधार पर ‎आप समस्या से निपट नहीं सकते। आर्थिक समृद्धि एवं शैक्षिक विकास भी आवश्यक है। ग्रामीण क्षेत्र के एक  जूनियर हाईस्कूल में कार्यरत अध्यापिका बिंदु सिंह का मानना है कि  हाल के दशक में जागरूकता बढ़ी है और बाल विवाह रोकने के लिए क़ानून भी बना है जिससे कुछ हद तक बाल विवाह में कमी तो आई है लेकिन यह काफी नहीं है.  आज भी गावों में लड़कियों की शादी कम उम्र में कर दी जा रही है. ऐसे में बाल विवाह को रोकने के लिए बनाये गए कानून को और प्रभावी बनाना होगा और जागरूकता बढ़ाने के लिए और प्रयास करना होगा तभी बाल विवाह पर रोक लगाई जा सकती है.
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युवा समाज सेवी बृहस्पति पाण्डेय ने कहा कि कम उम्र में शादी से लड़के व लड़की के स्वास्थ्य पर ही नहीं अपितु ‎उनके होने वाले बच्चे के स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है। अगर कम उम्र में शादी को रोकना है तो समुदाय की ‎सोच में बदलाव लाना पड़ेगा। इसके साथ ही बाल विवाह विरोधी कानून का कठोर रूप से पालन भी सुनिश्चित करना होगा। अगर हम स्वस्थ देश व समाज की कल्पना करते हैं  तो हमें सबसे पहले स्वस्थ परिवार की कल्पना करनी होगी, ‎और यह तभी संभव है जब परिवार की महिलाएं स्वस्थ होंगी। क्योंकि स्वस्थ महिला ही स्वस्थ बच्चे को जन्म दे ‎सकती है और स्वस्थ बच्चे ही एक स्वस्थ भारत व विश्व का निर्माण कर पायेगें।

जितेंद्र कौशल सिंह, सिटिज़न न्यूज सर्विस - सीएनएस
26 फरवरी, २०१६

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