क्या एचआईवी कार्यक्रम लोगों की बढ़ती उम्र के अनुरूप है?


[English] एचआईवी के साथ जी रहे लोग, जीवनरक्षक एंटीरेट्रोवायरल दवाएं के कारण (जो सरकारी स्वास्थ्य सेवा में निःशुल्क मिलती हैं) सामान्य जीवन यापन कर रहे हैं और हम सब की तरह उनकी भी उम्र बढ़ रही है। लेकिन उनके सामने चुनौतियां खत्म नहीं हुई हैं। सामाजिक भेदभाव, उम्र के साथ बढ़ती दूसरी बीमारियां, आर्थिक तंगी और स्वास्थ्य सेवाओं के बीच तालमेल की कमी उनके अधिकारों और सम्मान को प्रभावित कर रही है। ऐसे में बढ़ती उम्र के लोगों के मानवाधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र की एक बाध्यकारी संधि जरूरी है, ताकि लंबी उम्र के साथ सम्मान, सुरक्षा और समान अधिकार भी सुनिश्चित हो सकें।

एचआईवी के साथ दशकों से जी रहे लोगों को आज भी भेदभाव, कमज़ोर स्वास्थ्य सेवाओं और आर्थिक असुरक्षा का सामना करना पड़ता है। एचआईवी के साथ जीवित लोगों की मांग है कि संयुक्त राष्ट्र की प्रस्तावित संधि,  बढ़ती उम्र के लोगों के सम्मान, जेंडर समानता और सरकारों की जवाबदेही सुनिश्चित करे।

लंबा जीवन मिलना एक बड़ी जीत है। अब चुनौती है कि लोग सम्मान के साथ उम्रदराज़ हों


एचआईवी महामारी की तस्वीर बदल रही है। जीवनरक्षक एंटीरेट्रोवायरल दवाओं, वैज्ञानिक प्रगति और समुदायों के प्रयासों की बदौलत अब एचआईवी के साथ जी रहे लोग लंबा और स्वस्थ जीवन बिता रहे हैं। जब किसी व्यक्ति का वायरल लोड लगातार इतना कम रहता है कि वह जांच में पता नहीं चलता, तो वह यौन संपर्क के जरिए एचआईवी का संक्रमण नहीं फैलाता।

दुनिया भर में लाखों लोगों के लिए उम्र बढ़ना विज्ञान, सामाजिक आंदोलनों, आपसी सहयोग और समुदाय आधारित स्वास्थ्य सेवाओं की सफलता का प्रतीक है। लेकिन इस कामयाबी ने एक नई चुनौती भी सामने रखी है। एचआईवी के साथ लंबा और सामान्य जीवन जीने वाले लोगों को आज भी सम्मान, सुरक्षा और समान अधिकारों की गारंटी नहीं मिली है।

42 वर्षों से एचआईवी के साथ जी रहीं निकोलेटा पोलिसेक कहती हैं, "हम इतिहास के एक बेहद अहम दौर में हैं। पहली बार एचआईवी के साथ जी रहे लोगों के पास उम्रदराज होने का अवसर है।" पोलिसेक, "प्रिज्मा" की सह-संस्थापक और निदेशक हैं। उनके लिए लंबी उम्र केवल चिकित्सा विज्ञान की उपलब्धि नहीं, बल्कि सामूहिक संघर्ष, संवेदना और समुदायों के दृढ़ संकल्प का नतीजा है। निकोलेटा पोलिसेक ने शी एंड राइट्स सत्र में अपनी बात रखी।

अनुमानों के मुताबिक, 2025 में दुनिया भर में एचआईवी के साथ जी रहे करीब 1.15 करोड़ लोग 50 वर्ष या उससे अधिक उम्र के थे। यह एचआईवी के साथ जी रहे कुल लोगों का लगभग 29 प्रतिशत था। अनुमान है कि 2040 तक यह संख्या बढ़कर 2.02 करोड़ हो जाएगी, जो कुल संख्या का करीब 51 प्रतिशत होगी।

हालांकि, एचआईवी के साथ उम्र बढ़ने की प्रक्रिया कई लोगों के लिए जटिल हो सकती है। कुछ लोगों में उम्र से जुड़ी बीमारियां अपेक्षाकृत जल्दी सामने आती हैं। लेकिन इसका अनुभव हर व्यक्ति में एक जैसा नहीं होता।

उम्र बढ़ने के साथ स्वास्थ्य सेवाओं, सामाजिक सुरक्षा, दीर्घकालिक देखभाल और अपनी जिंदगी से जुड़े फैसलों में भागीदारी हासिल करना भी चुनौती बन सकता है। इससे सार्वजनिक स्वास्थ्य की एक अहम सीमा सामने आती है: केवल वायरस को नियंत्रित कर लेना, बेहतर जीवन की गारंटी नहीं है।

ऐसे समय में, जब संयुक्त राष्ट्र और विभिन्न देश बढ़ती उम्र के लोगों के मानवाधिकारों की रक्षा के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय समझौते पर विचार कर रहे हैं, एचआईवी के साथ उम्रदराज हो रहे लोगों के अनुभवों को इस प्रक्रिया का अहम हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

आबादी की बढ़ती उम्र, लेकिन जरूरतें अब भी नजरअंदाज


एचआईवी के साथ उम्र बढ़ने पर दूसरी बीमारियों का जोखिम भी सामने आता है। उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हृदय संबंधी बीमारियों और अन्य गैर-संचारी रोगों के साथ मानसिक स्वास्थ्य, चलने-फिरने में परेशानी और सामाजिक अलगाव जैसी समस्याओं के लिए भी देखभाल की जरूरत पड़ सकती है।

जिम्बाब्वे में एचआईवी के साथ जीवित लोगों के समूह, जेडएनएनपी प्लस, में पैरवी प्रमुख तारिरो कुताद्जा कहती हैं, "लंबा जीवन जीना एक उपलब्धि है। अब लक्ष्य है कि लोग अच्छी सेहत और सम्मान के साथ उम्र बढ़ाएं।"

अपने अनुभवों के आधार पर वह बताती हैं कि कई बीमारियों से जूझते हुए लोगों को भेदभाव, अकेलेपन और इलाज के सीमित विकल्पों का भी सामना करना पड़ता है। इसके लिए जरूरी है कि स्वास्थ्य सेवाओं की सफलता को केवल वायरल लोड नियंत्रित होने के आधार पर न आंका जाए। इलाज की निरंतरता, दूसरी बीमारियों की समय पर पहचान, मानसिक स्वास्थ्य और व्यक्ति की जरूरतों के मुताबिक देखभाल भी उतनी ही अहम होनी चाहिए।

भारत में एचआईवी के साथ जीवित लोगों के समूह एनसीपीआई प्लस की सह-संस्थापक और पूर्व अध्यक्ष दक्षा पटेल ने स्वास्थ्य व्यवस्था की बिखरी हुई संरचना की ओर ध्यान दिलाया।

उन्होंने बताया कि एचआईवी के साथ जी रहे लोगों को अलग-अलग अस्पतालों और विभागों के चक्कर लगाने पड़ सकते हैं। सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए कई तरह के दस्तावेज और पात्रता संबंधी शर्तें पूरी करनी पड़ती हैं। उनकी जरूरतों के अनुरूप स्वास्थ्य बीमा और सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था भी पर्याप्त नहीं है।

किसी योजना का कागजों पर मौजूद होना और जरूरतमंद तक उसका लाभ पहुंचना दो अलग बातें हैं। जब सेवाओं तक पहुंचना ही मुश्किल हो, तो अधिकार केवल औपचारिक घोषणा बनकर रह जाते हैं।

जेंडर असमानता और भेदभाव के कारण समाज के हाशिए पर लोग


एचआईवी के साथ उम्र बढ़ने का अनुभव हर व्यक्ति के लिए एक जैसा नहीं है। लिंग, दिव्यांगता, गरीबी, सामाजिक बहिष्कार और लैंगिक और जेंडर पहचान जैसे कारक तय करते हैं कि किसे इलाज मिलेगा, किसके पास आर्थिक संसाधनों पर नियंत्रण होगा और किसकी जरूरतों को गंभीरता से लिया जाएगा।

जीवन भर बिना वेतन के परिवार की देखभाल करने वाली कई महिलाएं, उम्रदराज़ होने पर, बचत और आर्थिक सुरक्षा से वंचित रह जाती हैं। एचआईवी के साथ जी रही महिलाओं को सामाजिक कलंक, आर्थिक निर्भरता और घर या स्वास्थ्य संबंधी फैसलों में सीमित भूमिका जैसी चुनौतियों का सामना भी करना पड़ सकता है।

ट्रांसजेंडर और जेंडर-विविधता वाले लोगों को उम्र बढ़ने पर स्वास्थ्य सेवाओं, आवास और देखभाल केंद्रों में अतिरिक्त भेदभाव झेलना पड़ सकता है। कम साक्षरता, जानकारी तक सीमित पहुंच और जटिल सरकारी प्रक्रियाएं इन समस्याओं को और बढ़ा देती हैं।

निकोलेटा पोलिसेक इस सामाजिक अदृश्यता के व्यक्तिगत असर को रेखांकित करते हुए कहती हैं, "मैं नहीं चाहती कि सामाजिक देखभाल की व्यवस्था में मुझे अनदेखा कर दिया जाए। मैं अपने अधिकारों की आवाज उठाते समय भी अदृश्य नहीं होना चाहती।"

उनकी बात एक बुनियादी मानवाधिकार सवाल उठाती है। एचआईवी के साथ जी रहे लोगों को केवल मरीज, आश्रित या मदद पाने वाले व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि अपने अधिकारों का दावा करने वाले नागरिकों के रूप में पहचाना जाना चाहिए।

उम्र का सवाल भी राजनीति का सवाल है


पोलिसेक कहती हैं, "उम्र का सवाल राजनीतिक है।"

संसाधनों का बंटवारा कैसे होगा, सार्वजनिक सेवाएं किस तरह बनाई जाएंगी और बढ़ती उम्र के लोगों के लिए सम्मानजनक ज़िंदगी की परिभाषा कौन तय करेगा—ये सभी राजनीतिक फैसले हैं।

यदि समाज लंबी उम्र को उपलब्धि तो मानता है, लेकिन लंबे समय से एचआईवी के साथ जी रहे लोगों की जरूरतों को नजरअंदाज करता है, तो सार्वजनिक स्वास्थ्य की सफलता असमानता का नया रूप बन सकती है।

बजट नहीं, लोगों की जरूरतें हों प्राथमिकता


तारिरो कुताद्जा का कहना है कि स्वास्थ्य सेवाओं के एकीकरण, उनकी निरंतरता और कार्यक्रमों के नए ढांचे की बात तभी सार्थक है, जब वह बढ़ती उम्र के लोगों के वास्तविक अनुभवों और जरूरतों को ध्यान में रखे।

अंतरराष्ट्रीय सहायता बजट पर दबाव बढ़ने और देशों की घरेलू वित्तीय प्राथमिकताएं बदलने के बीच यह खतरा है कि एचआईवी के साथ लंबे समय से जी रहे बढ़ती उम्र के लोगों की जरूरतें पीछे छूट जाएं। कार्यक्रमों का ध्यान युवाओं और संक्रमण की रोकथाम पर अधिक केंद्रित होने से पहले से इलाज करा रहे बढ़ती उम्र के लोगों की समस्याओं की अनदेखी हो सकती है।

तारिरो ने यह भी रेखांकित किया कि उम्र बढ़ने पर टीबी का जोखिम अन्य लोगों की तुलना में दो से तीन गुना तक हो सकता है। एचआईवी के साथ जी रहे लोगों के लिए यह जोखिम और बढ़ जाता है।

दक्षा पटेल ने एचआईवी के साथ जी रहे लोगों के नेतृत्व वाले सहकर्मी सहायता नेटवर्क को मजबूत करने की जरूरत बताई। उन्होंने ऐसी सामुदायिक निगरानी व्यवस्था पर भी जोर दिया, जो स्वास्थ्य सेवाओं से इनकार, भेदभाव और सरकारी योजनाओं तक पहुंचने में आने वाली बाधाओं को दर्ज करे।

सहकर्मी सहायता नेटवर्क लोगों को सही विभाग तक पहुंचने, इलाज जारी रखने, अकेलेपन से निपटने और भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाने में मदद कर सकते हैं।

लेकिन समुदायों की भागीदारी का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि सरकारें अपनी जिम्मेदारियों से पीछे हट जाएं।

पोलिसेक आगाह करती हैं कि सार्थक भागीदारी के लिए लगातार आर्थिक मदद, प्रशिक्षण, आसान और सुलभ प्रक्रियाएं, काम के अनुरूप उचित भुगतान और प्रतिभागियों की पहचान की सुरक्षा जरूरी है।

सरकारें समुदायों को सशक्त बनाने का दावा करते हुए उनसे यह उम्मीद नहीं कर सकतीं कि वे सीमित संसाधनों और बिना वेतन काम करने वाले स्वयंसेवकों के भरोसे सार्वजनिक सेवाओं की कमियों को पूरा करते रहें।

संयुक्त राष्ट्र की संधि में क्या होना चाहिए?


संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में बढ़ती उम्र के लोगों के मानवाधिकारों की रक्षा के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज तैयार करने की प्रक्रिया चल रही है। उम्र के आधार पर भेदभाव खत्म करने की लड़ाई में एचआईवी से जुड़े कलंक को खत्म करना भी जरूरी है।

संधि में सरकारों के लिए ऐसे स्पष्ट कानूनी दायित्व होने चाहिए, जो उम्र या एचआईवी स्थिति के आधार पर स्वास्थ्य सेवाओं, बीमा, रोजगार, आवास, सामाजिक सुरक्षा और दीर्घकालिक देखभाल में भेदभाव को रोकें। सुरक्षा के दायरे में बुज़ुर्ग महिलाओं, ट्रांसजेंडर लोगों, दिव्यांग व्यक्तियों और अन्य हाशिये पर रहने वाले समुदायों के साथ होने वाला दोहरे या कई स्तरों पर भेदभाव भी शामिल होना चाहिए।

संधि में निजता और गोपनीयता की गारंटी भी जरूरी है। किसी व्यक्ति की एचआईवी स्थिति का उसकी अनुमति के बिना खुलासा उसे भेदभाव, दुर्व्यवहार और सामाजिक बहिष्कार के जोखिम में डाल सकता है।

'हमारे बिना हमारे बारे में कोई फैसला नहीं'


पोलिसेक, कुताद्जा और पटेल के अनुभव एक साझा सिद्धांत की ओर इशारा करते हैं: एचआईवी के साथ उम्रदराज़ हो रहे लोगों की भागीदारी के बिना बनाई गई नीतियां उनकी वास्तविक जरूरतों को पूरा नहीं कर सकतीं।

पोलिसेक के मुताबिक, संयुक्त राष्ट्र की यूनिवर्सल पीरियॉडिक रिव्यू प्रक्रिया सरकारों के कामकाज की समीक्षा करने का एक अहम मंच है।

एचआईवी आंदोलन ने दिखाया है कि सामूहिक संघर्ष और समुदायों की अगुवाई से बड़े बदलाव लाए जा सकते हैं। अब अगली चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि दशकों तक एचआईवी के साथ जीने वाले लोग उम्र बढ़ने पर इलाज, आर्थिक सुरक्षा, अपनी जिंदगी के फैसले लेने की आजादी और समाज में अपनी आवाज उठाने का अधिकार न खो दें।

शोभा शुक्ला - सीएनएस

(सिटीज़न न्यूज़ सर्विस)
30 अक्टूबर 2026

शोभा शुक्ला, नारीवादी चिंतक, स्वास्थ्य एवं विकास न्याय की प्रखर पैरोकार तथा पुरस्कृत लेखिका एवं संपादिका हैं। वे सीएनएस (सिटीज़न न्यूज़ सर्विस) की संस्थापक-संपादक हैं और सेवा-निवृत्त होने तक, लोरेटो कॉलेज में 3 दशक तक भौतिक विज्ञान की वरिष्ठ शिक्षिका रही हैं। वे 2026 में प्रकाशित पुस्तक, “जस्टिस अनबाउंड” की लेखिका हैं एवं 2025 में संयुक्त राष्ट्र के अंतर-सरकारी उच्च-स्तरीय राजनीतिक फोरम में एसडीजी-3 की प्रमुख चर्चकर्ता रही हैं। उन्हें एक्स पर पढ़ें: @shobha1shukla


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