तम्बाकू उद्योग बिना विलंब स्वास्थ्य नीतियों का अनुपालन करे
तम्बाकू उद्योग को 'रेगुलेट' करने के लिए अमरीका में अधिवेशन
चौदहवें अंतर्राष्ट्रीय तम्बाकू नियंत्रण अधिवेशन में अनेकों देशों की सरकारें एवं गैर-सरकारी संगठनों के प्रतिनिधियों ने यह मांग की है कि तम्बाकू उद्योग अब स्वास्थ्य नीतियों का कड़ाई से अनुपालन करे।
एक लंबे समय से तम्बाकू उद्योग ने जन स्वास्थ्य नीतियों में हस्तक्षेप किया है और मुनाफे के लिए जन हितैषी नीतियों को दरकिनार कर रखा है। इस उद्योग ने 'उपहार' देने से ले के सरकार के साथ 'भागीदारी' तक का प्रस्ताव रखा है।
अंतर्राष्ट्रीय तम्बाकू नियंत्रण संधि, जिसको World health Organization FrameworkConvention on Tobacco Control (WHO FCTC) कहते हैं, ने स्वास्थ्य नीतियों में तम्बाकू उद्योग के हस्तक्षेप पर पाबन्दी लगा दी है। नवम्बर २००८ में, अंतर्राष्ट्रीय तम्बाकू नियंत्रण संधि को पारित करने वाले १६२ देशों ने जन स्वास्थ्य नीतियों में तम्बाकू उद्योग के हस्तक्षेप पर रोक लगाने के लिए आर्टिकल ५.३ को पारित किया।
इस चौदहवें अंतर्राष्ट्रीय तम्बाकू नियंत्रण अधिवेशन में एक अभियान चल रहा है जहाँ अभी तक ५० देशों से अधिक आए लोगों ने हस्ताक्षर और फोटो-हस्ताक्षर अभियान में भाग लिया है कि दुनिया की सबसे बड़ी तम्बाकू कंपनी स्वास्थ्य नीतियों में हस्तक्षेप करना बंद करे। यह सारे हस्ताक्षर और फोटो-हस्ताक्षर इस तम्बाकू कंपनी को उसके शेयर-धारकों की बैठक में दिए जायेंगे।
इस अधिवेशन में लगभग 2,४०० लोग दुनिया भर से भाग ले रहे हैं। यह लोग अपने-अपने देशों में किस प्रकार से तम्बाकू उद्योग जन-स्वास्थ्य नीतियों में हस्तक्षेप कर रहा है - इसको उजागर कर रहे हैं।
भारत में एक अप्रैल २००९ में होने वाली कांफ्रेंस से स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने अपना सहयोग वापस ले लिया, क्योंकि यह आर्टिकल ५.३ का उलंघन कर रहा था।
हालाँकि अमरीका ने अंतर्राष्ट्रीय तम्बाकू नियंत्रण संधि को पारित नहीं किया है, उसने पिछले हफ्ते तम्बाकू उद्योग को 'रेगुलेट' करने के लिए एक प्रस्ताव रखा है।
अंतर्राष्ट्रीय तम्बाकू नियंत्रण अधिवेशन, सबसे पहली बार १९६७ में न्यू यार्क में आयोजित हुआ था। भारत, तम्बाकू का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादककर्ता और सेवनकर्ता देश है। उम्मीद है कि इस अधिवेशन से भारत में और विश्व में तम्बाकू नियंत्रण नीतियों को लागू करने के लिए मदद मिलेगी।
शोभा शुक्ला
संपादक - सिटिज़न न्यूज़ सर्विस - सी.एन.एस
अंतर्राष्ट्रीय तम्बाकू नियंत्रण अधिवेशन भारत में आरंभ
शोभा शुक्ला

अंतर्राष्ट्रीय तम्बाकू नियंत्रण अधिवेशन के इतिहास में यह पहली बार है कि यह अधिवेशन भारत में आयोजित हो रहा है। १२ साल के बाद यह अधिवेशन किसी विकासशील देश में आयोजित किया जा रहा है।
चौदहवां अंतर्राष्ट्रीय तम्बाकू नियंत्रण अधिवेशन ८-१२ मार्च २००९ के दौरान मुंबई में आयोजित किया जाएगा। इस वर्ष का अधिवेशन, 'अंतर्राष्ट्रीय तम्बाकू नियंत्रण अधिवेशन: तम्बाकू नियंत्रण के लिए बहु-आयामी नज़रिया - नीतियाँ, रास्ते, भागीदार और लोग' के विचार पर आधारित है।
इस अधिवेशन के स्थानीय आयोजनकर्ता हैं: सलाम बॉम्बे फाउंडेशन, एक्ट इंडिया, हेअलिस सेखसरिया इन्स्तितुत फॉर पब्लिक हैल्थ, महाराष्ट्र प्रदेश सरकार का स्वास्थ्य विभाग, भारत की केंद्रीय सरकार का स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, और तम्बाकू सेवन को कम करने के लिए समर्पित ब्लूमबर्ग कार्यक्रम। विश्व स्वास्थ्य संगठन इस अधिवेशन का तकनीकी प्रायोजक है और इस अधिवेशन के कई सत्र एवं परिचर्चाओं को वह सक्रिय रूप से संचालित करेगा।
यह अधिवेशन विकासशील देश में बड़े ही मौके से आयोजित हो रहा है क्योंकि इस समय तम्बाकू उद्योग विकासशील देशों में अपना बाज़ार मजबूत करने में लगा हुआ है। बहुराष्ट्रीय तम्बाकू कंपनियां हर सम्भव प्रयास कर रही हैं कि भारत में, हर साल १० लाख तम्बाकू जनित मौतों के बावजूद भी, उनका बाज़ार बढ़ता ही जाए।
तम्बाकू सेवन में चीन के बाद भारत का दूसरा नम्बर है। लगभग २३ करोड़ पुरूष और १०.२७ करोड़ महिलाएं भारत में तम्बाकू का सेवन करते हैं। १३-१५ साल के १७.३ प्रतिशत लड़के और ९.७% महिलाएं तम्बाकू का सेवन करते हैं। १८-४८ साल के ३२.७ प्रतिशत पुरूष और १०.४ प्रतिशत महिलाएं तम्बाकू का सेवन करती हैं।
भारत के युवाओं में खासकर, धूम्रपान और चबाने वाली तम्बाकू का सेवन तेज़ी से बढ़ता ही जा रहा है। १५ साल से कम लगभग ५० लाख बच्चे तम्बाकू सेवन से ग्रसित हैं। भारत में तम्बाकू सेवन ५-७% की वार्षिक दर से बढ़ रहा है।
उम्मीद है कि इस अधिवेशन में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कार्यरत तम्बाकू नियंत्रण कार्यकर्ता भारत में तम्बाकू नियंत्रण को भी प्रभावकारी तरीके से मजबूत करेंगे।
शोभा शुक्ला
(लेखिका, सिटिज़न न्यूज़ सर्विस की संपादिका हैं, वेबसाइट: www.citizen-news.org)
तम्बाकू विज्ञापनों का भ्रामक जाल
तम्बाकू विज्ञापनों का भ्रामक जाल
जहाँ कई देशों में एक तरफ़ तम्बाकू और तम्बाकू उत्पादनों पर रोक लगाने के लिए अभियान तेज किए जा रहे हैं, वहीँ दूसरी ओर तम्बाकू कम्पनियाँ तरह-तरह के लुभावने विज्ञापनों द्वारा युवाओं को इस नशीले पदार्थ की तरफ़ आकर्षित करने में जी-जान से जुटी हुई हैं। ग्लैमर, फैशन, लाइफस्टाइल आदि का झूठा प्रभाव दिखाने जैसे विज्ञापनों द्वारा तम्बाकू उत्पादों वाली कम्पनियाँ युवाओं के जीवन से खिलवाड़ कर रहीं हैं। यह बात निकल कर आई है मुंबई में चल रहे १४ वें विश्व स्वास्थ्य अथवा तम्बाकू सम्मलेन में।
सम्मलेन में आए विश्व स्वास्थ्य संगठन के पुरस्कार से सम्मानित श्री बाबी रमाकांत का कहना था, कि तम्बाकू कंपनिया अपने भ्रामक विज्ञापनों द्वारा युवाओं को अपनी और आकर्षित करती हैं, क्योंकि ये युवा ही इनके सबसे बड़े ग्राहक हैं।’
इस सम्मलेन का आयोजन ६ से १२ मार्च तक देश की आर्थिक महानगरी मुंबई में किया जा रहा है, जिसमे दुनिया भर के जन स्वास्थ्य संगठन संगठनो के प्रतिनिधि जैसे विश्व स्वास्थ्य संगठन , भारत के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, विश्व बैंक आदि भाग ले रहे हैं। सम्मलेन की खासियत यह है कि समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझते हुए युवा वर्ग भी इसमे बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहा है।
इसका आयोजन गैर सरकारी जन स्वास्थ्य संगठन 'सलाम बॉम्बे' और 'ह्रदय- शान ' संयुक्त रूप से कर रहे हैं।
पूनम
लेखिका वरिष्ट पत्रकार हैं और यह रिर्पोट उन्होंने सम्मलेन से लिखी है।
विटामिन 'ए' से बच्चों का मृत्युदर २० प्रतिशत कम हो सकता है
नवजात शिशुओं को और बच्चों को विटामिन 'ए' की खुराक देने से उनमें मृत्यु दर २० प्रतिशत से भी अधिक कम हो सकता है, कहना है हॉवर्ड बी शिफ्फेर का, जो विटामिन-अन्जेल नामक अंतर्राष्ट्रीय समूह के संस्थापक-अध्यक्ष हैं. हॉवर्ड, उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की विधान सभा से २५ किलोमीटर दूर एक ग्रामीण छेत्र में लोगों के साथ स्वास्थ्य जागरूकता शिविर में अपनी बात रख रहे थे - परन्तु उत्तर प्रदेश की विधान सभा में बैठे हुए राजनीतिज्ञों को इस बात का अनुमान है कि नहीं, कि विटामिन 'ए' की खुराक से बच्चों का मृत्यु दर २० प्रतिशत से भी अधिक कम हो सकता है, पता नहीं!
विटामिन 'ए' की कमी से सबसे अधिक कु-प्रभाव बचपन में पड़ता है और यह विटामिन 'ए' की कमी ही बच्चों में बीमारियों और मृत्यु तक का एक बड़ा कारण है. बच्चों में अंधापन होना या आंखों की देखने की छमता का ख़तम हो जाना विटामिन 'ए' की कमी का सबसे बड़ा लक्षण है. विटामिन 'ए' शरीर की प्रतिरोधकता के लिए भी आवश्यक है. इसीलिए अक्सर यह बच्चे जिनमें विटामिन अ की कमी होती है, वोह या तो अंधापन का शिकार हो जाते हैं या फिर उससे पहले ही प्रतिरोधक छमता के कम होने की वजह से संक्रामक रोगों का शिकार हो जातें हैं जैसे की मीसेल्स, दस्त या मलेरिया, कहा अरुल्मोनी ने, जो बेलिवेर्स चर्च के अध्यक्ष हैं.
विटामिन अन्जेल ने जब खासकर कि बच्चों को विटामिन 'ए' की खुराक देने का और इससे सम्बंधित जागरूकता बढ़ाने का कार्य शुरू किया था, तब यह विश्व स्तर पर ज्ञात नहीं था कि विटामिन 'ए' की खुराक से बच्चों के मृत्यु दर में इतनी भारी गिरावट आ सकती है (२० प्रतिशत से भी अधिक). विटामिन 'ए' को ले कर के अंतर्राष्ट्रीय मत कोपेनहागेन कंसेन्सस से बना.
कोपेनहागेन कंसेन्सस २००८ में, विश्व के ५० अर्थ-शास्त्री, वैज्ञानिक, और अन्य विशेषज्ञ जिनमें ५ नोबेल पुरुस्कार विजेता भी शामिल थे, ने सालों के अध्ययन का सार रखा जिसमें उन्होंने विश्व के समक्ष सब चुनौतियों पर गौर किया था और ३० सबसे प्रमुख चुनौतियों की सूंची बनाई जिससे कि सरकारों और गैर-सरकारी संगठन इन प्राथमिकताओं पर कार्य कर सकें और बदलाव ला सकें.
इस कोपेनहागेन कंसेन्सस २००८ के अनुसार कु-पोषणता सबसे बड़ी चुनौती है. विश्व में १४ करोड़ बच्चें हैं जो कु-पोषित हैं. इनमें से ८० प्रतिशत को पोषणता प्रदान करने में मात्र अमरीकी डालर ६ करोड़ प्रति वर्ष का व्यय आएगा और इस व्यय से सालों तक का लाभ मिलेगा - क्योंकि बच्चे स्वस्थ रहेंगे, उनकी मृत्यु दर २० प्रतिशत से भी अधिक गिर जाएगा, अंधापन के दर में भारी गिरावट आएगी, मंद-बुद्धि बच्चों के दर में भी गिरावट आएगी और अन्य लाभ भी मिलेंगे जो यह स्वस्थ बच्चे अपने-अपने देशों की अर्थव्यवस्था को देंगे. इस शोध के अनुसार यह ६ करोड़ का आर्थिक व्यय कम-से-कम १०० करोड़ का फायदा कराएगा. हर एक अमरीकी डालर के व्यय पर १७ अमरीकी डालर का लाभ मिलेगा.
विटामिन अन्जेल इस पृथ्वी से विटामिन 'ए' की कमी से होने वाले अंधापन को वर्ष २०२० तक समाप्त करना चाहती है - इसी अभियान को ऑपरेशन २०/२० कहते हैं.
विटामिन 'ए' की गोलियों के साथ-साथ बच्चों को पेट के कीड़े मारने वाली दावा भी दी जा रही है क्योंकि पेट में कीड़े होने से विटामिन 'ए' की खुराक बच्चों के शरीर में नहीं लगती है, कहना है हॉवर्ड शिफ्फेर का.
[सिटिज़न न्यूज़ सर्विस - सी.एन.एस]
भारत एवं पाकिस्तान के मध्य संवाद जारी रहना चाहिए
हमारा मानना है कि भारत और पाकिस्तान के बीच में जो समस्यां हैं, जिसमे आतंकवाद का खतरा भी शामिल है, वोह संवाद से ही सुलझाई जा सकती हैं. इसीलिए दोनों देशों के बीच संवाद को जारी रखना बहुत अहम् है.
पाकिस्तान के अन्दर लोकतंत्र और वहां पर चुनी हुई सरकार को मजबूत कर के ही यह संभव हो सकता है कि पाकिस्तानी सरकार अपने ही मुल्क में आतंकवादी ताकतों पर काबू पा सके.
दोनों ही देशों में सक्रिय आतंकवादी ताकतों के खिलाफ कारवाई करने की आवश्यकता है. भारत में जो आतंकवादी घटनाएँ हुईं हैं उसपर पाकिस्तानी सरकार को सख्त कारवाई करनी चहिये.
हाल ही में एक भारतीय शांति दल पाकिस्तान गया था जिसने पाया कि वहाँ पर मुंबई के आतंकवादी हमले के प्रति संपूर्ण और पारदर्शी जांच के लिए और बिना विलंब दोषियों को उपयुक्त सज़ा मिलने के लिए सहमती है. इसी के साथ पाकिस्तान की असल इच्छा है कि भारत के साथ शांति व्यवस्था कायम हो सके क्योंकि पाकिस्तान स्वयं ही आतंकवादी हमलों का शिकार हो रहा है.
'swat' या 'स्वाट' छेत्र और 'fata' या 'फेदेराली अड़मिनिसटेर्ड ट्राइबल ऐरेअस' या सरकार द्वारा नियंत्रित जन-जाति वाले छेत्र, पर पूरा नियंत्रण अब तालिबान और अन्य आतंकवादी संगठनों ने ले लिया है. पाकिस्तानी लोग अत्यन्त चिंतित हैं कि यह आतंकवादी ताकतें अब पाकिस्तान में अन्य छेत्रों में भी घुसने लगेंगी, और एक समय पर भारत के लिए भी संगीन खतरा बन सकती हैं.
इस बात पर दोनों देशों में सहमती बनने लगी है कि आतंकवाद दोनों देशों को चुनौती दे रहा है और भारत एवं पाकिस्तान दोनों को इस चुनौती का सामना एक-साथ करना है.
हम लोग श्री लंका के क्रिकेट के खिलाड़ियों पर हुए आतंकवादी हमले की निंदा करते हैं.
इस संकट की घड़ी में यह और भी जरुरी हो जाता है कि दक्षिण एशिया छेत्र में शान्ति और सौहार्द का मौहौल बना रहे. इसीलिए यह आवश्यक है कि वीसा-मुक्त और शांतिपूर्ण दक्षिण एशिया बनाने के लिए संघर्ष मजबूत करना चाहिए.
आतंकवादी ताकतें हमें इस छेत्र में शान्ति कायम रखने से भटकाने की कोशिश कर रही है, हम उनके खेल का शिकार होने को तैयार नहीं है.
हम लोकतंत्र, शांति और सामाजिक न्याय स्थापित करने में एकजुट लोगों का समर्थन करते हैं.
करामत अलि (PILER), डॉ संदीप पाण्डेय (मग्सय्सय अवार्डी २००२), मोहम्मद वासी सिदिकी, अरुंधती धुरु (नेशनल अलायंस of पीपुल'स मोवेमेंट्स - NAPM), इरफान अहमद (पाकिस्तान इंडिया पीपुल'स फॉरम फॉर पास एंड डेमोक्रेसी - PIPFPD, UP chapter)
भारत-पाकिस्तान के मध्य चल रही शान्ति प्रक्रिया को खतरा
पाकिस्तान के वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता और शान्ति दूत करामत अली, जो पाकिस्तान इन्स्तित्युत फॉर लबोरएजूकेशन एंड रिसर्च (Pakistan Institue for Labour Education and Research - PILER) का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, लखनऊ में भारत-पाकिस्तान के मध्य चल रही शान्ति वार्ता पर व्याख्यान देंगे। इस कार्यक्रम का विवरण इस प्रकार है:
तिथि: ४ मार्च २००९, बुधवार
समय: ११ बजे प्रात: से १ बजे दोपहर
स्थान: मौलाना मोहम्मद अली जौहर फाउंडेशन
१६७/८, सेंट्रल होटल के निकट, अमीनाबाद
इसी वार्ता के बाद प्रेस से बातचीत होगी,
अधिक जानकारी के लिये संपर्क करें:
मोहम्मद वासी सिद्दीकी, 9415023571
बोबी रमाकांत, 9839073355
लोक राजनीति मंच का पहला राष्ट्रीय अधिवेशन
लखनऊ, उत्तर प्रदेश
५-६ मार्च २००९
देश में राजनीतिक विकल्प प्रस्तुत करने के लिए लोक राजनीति मंच को संगठित किया गया है जिससे कि लोगों के मुद्दों को केंद्रीय स्थान मिल सके और ऐसे मुख्यधारा के राजनीतिक दल जो शारीरिक ताकत, पैसे की ताकत और अन्य संदिग्ध तरीकों से चुनाव जीतने में लगे रहते हैं, उनको अस्वीकार किया जा सके.
लोक राजनीति मंच, धीमे ही सही पर निश्चित तौर पर मजबूत संगठन का रूप ले रहा है. ५-६ मार्च २००९ को इस लोक राजनीति मंच का पहला राष्ट्रीय अधिवेशन आयोजित किया जा रहा है. आप सब सादर आमंत्रित हैं कि इस अधिवेशन में सक्रिय भाग लें, और लोक राजनीति मंच को मजबूत करने में अपना योगदान दें.
५ मार्च २००९
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जन सभा: गंगा प्रसाद स्मारक सभागार, अमीनाबाद, लखनऊ
६ मार्च २००९
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कार्यकर्ताओं की बैठक: कॉमन हॉल, बी-ब्लाक, दारुल शफा, विधान सभा के सामने, लखनऊ
लखनऊ से बाहर से आने वाले लोगों के लिए ठहरने का इंतजाम 'कॉमन हॉल, 'बी' ब्लाक, दारुल शफा' में ही किया गया है.
अरविन्द मूर्ति, ९८३९८३५०३२
केशव चंद, ९८३९८८३५१८
एस.आर दारापुरी, ९४१५१६४८४५
डॉ संदीप पाण्डेय/ अरुंधती धुरु, फ़ोन: ०५२२ २३४७३६५, मोबाईल ९४१५०२२७७२, ईमेल: ashaashram@yahoo.com
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लोक राजनीति मंच
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People's Politics Front (PPF)
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कृपया ‘फिलिप मौरिस इंटरनेशनल ’ को संदेश भेजें की वह जन स्वास्थ्य नीतियों से दूर रहे
एवं
अंतर्राष्ट्रीय फोटो ज्ञापन में हस्ताक्षर करें, जो फिलिप मौरिस इंटरनेशनल को प्रेषित किया जायेगा
सेवा में,
श्रीमान लुई केमिलेरी,
चीफ एक्जीक्यूटिव आफिसर,
फिलिप मौरिस इंटरनेशनल ,
लौसें ,
स्विट्जरलैंड।
प्रिय श्री केमिलेरी,
मैं, चौदहवें अंतर्राष्ट्रीय ‘तम्बाकू एवं स्वास्थ्य’ अधिवेशन' में एक प्रतिभागी होने के नाते से इस बात से अत्यन्त क्षुब्ध हूँ कि आपकी कंपनी का मुख्य उद्देश्य एक ऐसी रोकी जा सकने वाली महामारी को फैलाना है जिसकी चपेट में आकर विश्व के ५० लाख व्यक्ति मौत के शिकार होने वाले हैं।
सभी स्वास्थ्य अधिकारी एवं जन अधिकारी, सर्व सम्मति से यह मानते हैं कि जन स्वास्थ्य नीतियों के निर्धारण में तम्बाकू उद्दोग का कोई हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा प्रतिपादित ‘अंतर्राष्ट्रीय तम्बाकू नियंत्रण संधि’ में भी इस विचार को सम्मिलित किया गया है।
पिछले वर्ष, नवम्बर माह में दक्षिण अफ्रीका में हुए संधि सम्मलेन में, अनुमोदन करने वाले राष्ट्रों ने विशेष मानक तय किए थे कि किस प्रकार जनहित स्वास्थ्य नीतियों के निर्धारण में, फिलिप मौरिस और अन्य तम्बाकू कंपनियों का हस्तक्षेप न हो।
मेरा देश ‘भारत’, उन १६० से भी अधिक देशों में से एक है, जिन्होनें अंतर्राष्ट्रीय तम्बाकू संधि का अनुमोदन किया है।
इस समय, जब आपकी कंपनी के बोर्ड के सदस्य, वरिष्ठ अधिकारी एवं अन्य भागीदार, अपने वार्षिक सम्मलेन के लिए एकत्रित हो रहे हैं, तब मैं तथा विश्व के अन्य व्यक्ति आपको केवल एक सीधा और साफ़ संदेश देना चाहते हैं कि ‘आप कृपया जन स्वास्थ्य नीतियों से दूर रहें’।
भवदीय,
नाम ---------------
संस्था ---------------
देश ------------------
कृपया इस ज्ञापन पर हस्ताक्षर करके ‘कारपोरेट अकाउंट बिलिटी इंटरनेशनल ’ को भेजें।
अपनी फोटो प्रदर्शिनी स्थल पर ऍफ़ .सी ए . बूथ में खिंचवा लें।
मायावती जी, हमारे लिए घर के बदले बुलडोज़र क्यों?
दलित हितैषी सरकार ने दलितों-गरीबों को बेघर किया
१९ फ़रवरी को
यह घटना प्रदेश सरकार एवं केंद्रीय सरकार दोनों की ही हर-गरीब-को-घर देने की नीति पर सवाल खड़े कर देती है.
बिना वैकल्पिक आवास की व्यवस्था किए हुए जिस बर्बरता एवं संवेदनहीनता के साथ प्रशासन ने बुलडोज़रों से घरों को तोड़ गिराया है, यह अमानवीय है। इन घरों को तोड़ने का और सैकड़ों लोगों को विस्थापित करने का जो कारण बताया जा रहा है कि गोमती नदी के तट पर निजी कंपनी द्वारा ‘विकास’ एवं सुन्दरीकरण आदि का कार्य कराया जाएगा, जिससे निजी कंपनियों को और पूंजीपतियों को ही लाभ मिलेगा, यह विकास का तरीका हमें स्वीकार नहीं है।
इसी के विरोध में विस्थापित लोगों ने एवं शहर के विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों ने विधान सभा के सामने धरना प्रदर्शन किया है. इनकी मांग है कि विस्थापित लोगों को घर प्रदान किए जाएँ और इस तरह के 'विकास' को रोका जाए जिससे गरीब लोग विस्थापित होते हैं और सिर्फ़ पूंजीपतियों को ही लाभ मिलता हो।
डॉ संदीप पाण्डेय, एस आर दारापुरी, अरुंधती धुरु, चुन्नी लाल, एवं आशा परिवार और जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय के अन्य लोग
दलित हितैषी सरकार ने दलितों-गरीबों को बेघर किया
नदवा झोपड़-पट्टी को प्रशासन के बुलडोज़रों ने तोड़ गिराया
आज बहुजन समाज पार्टी के सतीश चंद्र मिश्रा के इशारे पर स्थानीय प्रशासन ने लखनऊ के डालीगंज छेत्र में नदवा झोपड़-पट्टी को बुलडोज़रों से तोड़ गिराया। २५० से भी अधिक लोग बेघर हो गए। यह घटना प्रदेश की मुख्य मंत्री मायावती के दावे पर सवाल खड़े कर देती है जो मायावती ने अपने जन्मदिन पर किया था - कि उत्तर प्रदेश के हर गरीब को घर मिलेगा।
जब वरिष्ट सामाजिक कार्यकर्ता एवं रामों मग्सय्सय पुरुस्कार से सम्मानित डॉ संदीप पाण्डेय नदवा झोपड़-पट्टी की और जा रहे थे तब पुलिस ने उनको जबरन हिरासत में ले लिए और नदवा जाने से रोका, और हसनगंज पुलिस थाने में रोक कर रखा।
'बेसिक सर्विसेस फॉर उर्बन पुअर' या BSUP के तहत जो मकान गरीबों को मिलने वाले थे, उनको पाने के लिए इस झोपड़-पट्टी में रहने वाले लोग पैसा इकठ्ठा कर रहे थे। इससे पहले कि BSUP वाले घर बन कर तैयार हों, प्रशासन ने इनको बर्बरतापूर्वक बेघर कर दिया। इस नदवा झोपड़-पट्टी में अधिकाँश लोग जो रहते हैं वोह दलित हैं।
जब दोपहर में डॉ संदीप पाण्डेय को हसनगंज पुलिस थाने से बहार जाने की अनुमति मिली, तब तक नदवा झोपड़-पट्टी को बुलडोज़रों ने पूरी तरह से तोड़ दिया था। जो २५० लोग बेघर हुए थे उन्होंने विधान सभा के सामने धरना देने के लिए प्रस्थान कर दिया कि उनको वैकल्पिक रहने की जगह मिले जबतक BSUP वाले मकान बन कर तैयार नहीं हो जाते।
परन्तु रास्ते में ही इन विस्थापित लोगों में से एक महिला को प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। अपर जिला मजिस्ट्रेट ओ.पी.पाठक जी ने समय से एंबुलेंस बुला कर इस महिला को जिला अस्पताल में भिजवाया जिससे इसको उपयुक्त चिकित्सकिये सहायता मिल सके।
लखनऊ के नागरिक, तमाम सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने और जो २५० से अधिक लोग विस्थापित हुए हैं, उन्होंने प्रदेश सरकार से वैकल्पिक रहने के स्थान के लिए मांग की है, और जल्द-से-जल्द BSUP वाले मकानों को पूरा बनाने के लिए और इन लोगों को आवंटित करने के लिए भी मांग की है।
डॉ संदीप पाण्डेय, एस.आर दारापुरी, चुन्नी लाल, चंद्र भूषण एवं जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय (NAPM) एवं आशा परिवार के अन्य लोग
पुलिस की उपस्थिति में बसपा से जुड़े प्रधान के पति द्वारा लाठियाँ चलवाने व् मजदूरी न देने के मामले में अभी तक कार्यवाही नहीं
१४ जनवरी २००९ को हरदोई जिले के भरावन विकास खंड की ग्राम पंचायत एराकाकेमऊ में बहुजन समाज पार्टी के कार्यकर्ता व् ग्राम प्रधान के पति धनश्याम ने जो अनुसूचित जाति के मजदूरों पर लाठियाँ चलवाई उस मामले में अभी तक कोई कार्यवाही नहीं हुई है . मजदूर ग्राम प्रधान के घर अपनी बकाया मजदूरी मांगने उपस्थित हुए थे।
लाठी चलने से एक अनुसूचित जाति के मजदूर मेदयी (पुत्र नारायण) व् आशा परिवार कार्यकर्ता राम भरोसे चोटिल हुए . यह घटना थानाध्यक्ष अतरौली व् उनके पुलिसकर्मियों की उपस्थिति में हुई . इस घटना के एक माह बाद भी उपर्युक्त पंचायत के लालपुर गाँव के ४० से ऊपर मजदूरों को अभी पूरी मजदूरी नहीं मिली है जो राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना का उलंघन है।
प्रधानपति ने ग्राम पंचायत खाते से अवैध रूप से पैसे भी निकाले हैं जो बात जॉब कार्ड पर चढ़े फर्जी मजदूर दिवसों और भुगतान की गई राशि से स्पष्ट होती है।
पुलिस के सामने मजदूरों पर लाठी चलाने तथा ग्राम पंचायत के खाते से पैसा निकाल लेने की जाँच व् दोषी पाए जाने पर घनश्याम के विरुद्ध कार्यवाही की मांग को लेकर करीब १२५ ग्रामीण हरदोई जिला मुख्यालय पर १६/०२/२००९ से धरने पर बैठें हैं तथा आज से दो कार्यकर्ता मोह्हमद नसीम व् रामप्रकाश अनशन भी शुरू कर चुके हैं।
यह मुहीम राजनीति में अपराध व् भ्रष्टाचार जो एक दुसरे को पुष्ट करते हैं , key ख़िलाफ़ है. राजनीति में भ्रष्टाचार व् अपराध के हावी होने का खामियाजा आम नागरिक को ही उठाना पड़ता है kyonki वह अपने मौलिक अधिकारों से वंचित हो जाता है।
एक दलित हितैषी सरकार जो भय मुक्त समाज बनाने का दावा करती है key साशन में ही खुलेआम भ्रष्ट व अपराधी तत्वों को राजनीतिक संगरक्षण प्राप्त है इससे ज्यादा खतरनाक बात लोकतंत्र के लिए नही हो सकती .
अपराध व् भ्रष्टाचार के विरुद्ध आशा परिवार व् जन आन्दोलनों के राष्ट्रीय समन्वय का संघर्ष जारी रहेगा .
मेदयी रामभरोसे संदीप पाण्डेय
निर्धन रोगियों के मसीहा - मनीष
यदि आज २७ वर्षीय मनीष लखनऊ में ज़रूरत मंद मरीजों की सेवा न कर रहे होते तो कदाचित अपने जन्म स्थानबलिया जिले में कपड़े धो रहे होते।
मनीष का जन्म धोबी जाति में हुआ, जो एक अनुसूचित जाति है। जब मनीष नवीं कक्षा में पढ़ते थे तब उन्हें अपने सहपाठियों के घर से धुलाई के लिए कपड़े लाने एवं धुले हुए कपड़े घरपहुँचाने पड़ते थे। यह कार्य उन्हें तनिक भी रुचिकर नहीं लगता था। स्कूल के अन्दर तो वे अपने मित्रों के समकक्ष थे। परन्तु उन्हीं मित्रों के घर जब वो धुलाई के कपड़े लेने जाते तो बराबरी का दर्जा ख़त्म हो जाता। उनसे एक धोबी की तरह व्यवहार किया जाता। जाँत- पात, धनी- निर्धन, का भेदभाव उन्हें दु:खी कर देता। जब कोईउनके पिता के साथ दुर्व्यवहार करता तो उनका मन क्षोभ से भर जाता। मनीष ने तय किया कि वो अपना पुश्तैनी धंधा छोड़कर कोई और सम्मानीय कार्य करेंगे। चार बार हाईस्कूल में फेल होने के बाद उन्होंने बिजनेस करने की ठानी। वो थोक में बिजली का सामान खरीद कर बेचने लगे। धीरे धीरे बिजली से सम्बंधित मरम्मत का काम भी सीख लिया।
सन् २००० में मनीष लखनऊ आकर एक स्वयं सेवी संस्था के ग्रामीण केन्द्र ‘आशा आश्रम’में कार्य करने लगे। यह केन्द्र लखनऊ से ६० किलोमीटर दूर हरदोई जिले के लालगंज गाँव में स्थित है। अपनी ईमानदारी के कारण मनीष को आश्रम के आय व्यय का हिसाब देखने का काम दिया
तब पहली बार लोगों ने मनीष के अन्दर छिपे हुए इस गुण को पहचाना। अब मनीष आशा परिवार के स्वास्थ्यसेवा स्वयं सेवक बन गए। उन्होंने लखनऊ को अपना कार्यक्षेत्र बनाया, क्योंकि आस पास के ग्रामीण क्षेत्रों के गंभीर रोगी इलाज के लिए लखनऊ ही आते हैं। लखनऊ मेडिकल कालेज को केन्द्र बना कर वो निर्धन रोगियों की सेवा में जुट गए। शहरी अस्पतालों से अनभिज्ञ रोगियों को वे उचित सलाह देते हैं तथा सरकारी अस्पतालों में उन्हें नि:शुल्क अथवा कम दाम में चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने में तत्पर रहते हैं। अपने कार्य करने के दौरान मनीष ने देखा कि सरकारी अस्पताल में चिकित्सा हेतु आए अनेक ग्रामीण रोगी दलालों के चक्कर में पड़ कर, प्राइवेट अस्पतालों में जाकर हजारों रुपये व्यय करने को बाध्य हो जाते हैं। मनीष को दु:ख है कि स्वास्थ्य परिचार को सेवाभाव से नहीं देखा जाता। उनके अनुसार केवल ५% डाक्टर एवं स्वास्थ्य कर्मी ही रोगियों के प्रति संवेदनशील हैं।
मनीष बेघर और लावारिस लोगों की सेवा में भी तत्पर रहते हैं। ऐसे ही एक व्यक्ति लच्छू की सहायता करके पहले उसका इलाज मेडिकल कालेज के मनोचिकित्सा विभाग में कराया, फिर आशा आश्रम में कई महीनों तक रखा। लच्छू की भाषा किसी को समझ ही नही आती थी, इस कारण उसके घरवालों से संपर्क नहीं हो पा रहा था। बाद में एक पुलिस अफसर की मदद से पता चला कि वो झारखंड प्रदेश के गाँव का निवासी था। उसके घर का पता लगा कर मनीष ने उसे उसके परिवार से मिला दिया। इसी प्रकार एक गरीब रिक्शा चालक के लीवर के आपरेशन के लिए पैसे जुटा कर मनीष ने उसका इलाज कराया। इस प्रकार अनगिनत बेसहारा और गरीब लोगों की नि:स्वार्थ भाव से सेवा कर रहे हैं मनीष। अब तो मेडिकल कालेज के अनेक डाक्टर एवं छात्र भी मनीष के सेवाकार्य में आर्थिक सहयोग देते हैं। हाल ही में वहाँ ‘जियोर्जियन होप’ नामक संगठन बना है जो अन्य सेवा कार्यों केअलावा, मनीष के सेवा कार्यों में भी योगदान देगा।
मनीष का सपना है कि वो गरीबों के इलाज के लिए एक ऐसा अस्पताल बनाएं जहाँ चिकित्सा सुविधाएं नि:शुल्क अथवा बहुत कम दामों पर उपलब्ध हों। उनकी लगन और मेहनत से यह स्वप्न अवश्य साकार होगा। मनीष का जीवन पूर्ण रूप से निर्बल एवं निर्धन व्यक्तियों की सेवा में ही समर्पित है।
(मौलिक रूप से यह लेख डॉ संदीप पाण्डेय द्वारा अंग्रेज़ी में रचित है जिसको यहाँ पर क्लिक करने से पढ़ा जा सकता है। इसका अनुवाद शोभा शुक्ला जी द्वारा किए गया है जिसके लिए हम सब कृतज्ञ हैं)
काला अज़ार के रोगियों के लिए पर्याप्त जाँच और दवाएं उपलब्ध नहीं
काला अज़ार पर चतुर्थ अंतर्राष्ट्रीय अधिवेशन में 'सरहद-रहित चिकित्सकों' (मेडिसिन्स सांस फ्रंटइर्स - एम्.एस.ऍफ़) ने कहा कि काला अज़ार का अनुपात कम करने के लिए और काला अज़ार के उपचार के लिए जो दवाइयाँ हैं उनके प्रति लोगों में प्रतिरोधकता का दर कम करने के लिए, यह आवश्यक है कि काला अज़ार के उपचार के लिए असरदायक दवाओं की उपलब्धता बढ़ाई जाए और इसकी जाँच होने के लिए सुविधाएँ बढ़ाई जाए। इस अंतर्राष्ट्रीय अधिवेशन में 'सरहद-रहित चिकित्सकों' (मेडिसिन्स सांस फ्रंटइर्स - एम्.एस.ऍफ़) एक अति-महत्त्वपूर्ण शोध के परिणाम घोषित कर रहा है जिसके अनुसार काला अज़ार के उपचार में "लिपोसोमल अम्फोतेरिसिन बी" (अम्बिसोम) एक प्रभावकारी भूमिका निभा सकता है।
बिहार प्रदेश में, जहाँ काला अज़ार महामारी का रूप लिए हुए है, वहाँ पर 'सरहद-रहित चिकित्सकों' (मेडिसिन्स सांस फ्रंटइर्स - एम्.एस.ऍफ़) के शोध से यह नतीजा सामने आया है कि 'लिपोसोमल अम्फोतेरीसिन बी' से काला अज़ार का उपचार अत्यधिक प्रभावकारी है, और सफल इलाज का दर ९८% आया है, काला-अज़ार सम्बंधित मृत्यु दर भी कम हुआ है और काला अज़ार का उपचार सफलतापूर्वक पूरा करने वालों के दर में भी गिरावट आई है। इस 'लिपोसोमल अम्फोतेरिसिन बी' से काला अज़ार के उपचार करने पर, इस रोग के दुबारा होने के दर में भी कमी आई है, यह दवाएं कम 'टोक्सिक' हैं, और उपचार की अवधि अन्य दवाओं के मुकाबले कम है।
"हालाँकि काला अज़ार के उपचार के लिए 'लिपोसोमल अम्फोतेरिसिन बी' एकमात्र दवा नहीं है, परन्तु यह शोध द्वारा प्रमाणित हुआ है कि यह सबसे प्रभावकारी और सुरक्षित इलाज का विकल्प है। हमारा मानना है कि इस दवा को 'काला अज़ार के उपचार के लिए भारतीय प्रोटोकोल' में शामिल करना चाहिए" कहना है डॉ० नायिन्स लीमा का जो 'सरहद-रहित चिकित्सकों' (मेडिसिन्स सांस फ्रंटइर्स - एम्.एस.ऍफ़) की 'ट्रोपिकल' चिकित्सक सलाहाकार हैं।
यदि काला अज़ार का इलाज न किया जाए, तो यह घातक भी हो सकती है। मानव में काला अज़ार का रोग, काला-अज़ार से संक्रमित 'सैण्ड' मक्खी के काटने से फैलता है। हालाँकि विकसित देश काला अज़ार से संभवत: अनभिज्ञ हैं, यह 'पैरासिटिक' रोग विश्व में लगभग १ करोड़ २० लाख लोगों को ग्रसित किए हुए है। प्रति वर्ष लगभग ५ लाख लोग काला अज़ार से संक्रमित होते हैं, और इनमें से ५० प्रतिशत भारत में है। भारत में काला अज़ार विशेषकर बिहार, झारखण्ड, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में महामारी का अनुपात लिए हुए है। इन भारतीय प्रदेशों में काला अज़ार मुख्यत: ग्रामीण छेत्रों में हाशिये पर रह रहे गरीब लोगों को ही सबसे भयंकर तरीके से प्रभावित करता है।
'सोडियम स्टिबोग्लूकोनेट', काला अज़ार का सबसे प्रचलित उपचार है। परन्तु इस दवा से लोगों में बढ़ती प्रतिरोधकता अत्यन्त चिंता का विषय है - खासकर कि भारत में, जहाँ लगभग ६५ प्रतिशत रोगियों को ऐसा काला अज़ार होता है जिसका कीटाणु संक्रमण के पहले से ही इस दवा के प्रति प्रतिरोधक होता है, और इसीलिए इन लोगों में यह दवा असरकारी होगी ही नहीं। शोध एवं विकास कार्यक्रमों ने काला अज़ार को नज़रअंदाज़ किया है।
"विकासशील देशों में काला अज़ार के रोगियों को बहुत लंबे समय तक नज़रअंदाज़ किया गया है। हमारे प्रोजेक्ट में, लोग तब स्वास्थ्य केन्द्र पर आते हैं जब काला अज़ार का रोग बहुत बढ़ गया होता है क्योंकि इन लोगों को न तो काला अज़ार के प्रारंभिक लक्षण के बारे में जानकारी होती है, और न ही यह पता होता है कि काला अज़ार की जांच के लिए और इलाज के लिए कहाँ जाएँ", कहना है गारेथ बैरेट का। "जिन लोगों में काला अज़ार का अनुपात अत्याधिक है, उनको जांच और उपचार उपलब्ध नहीं है, और गरीबी के कारण अक्सर इन्हीं लोगों में उपचार गुणात्मक दृष्टि से कमजोर होता है, जिससे काला अज़ार फैलने का खतरा और दवा के प्रति प्रतिरोधकता बढ़ने का खतरा बढ़ जाता है"
'लिपोसोमल अम्फोतेरिसिन बी' दवा से काला अज़ार के उपचार का खर्च रुपया २१,८५५ (यूरो ३५०) प्रति रोगी आता है जो बहुत महँगा है। "इस दवा की कीमत को जल्द-से-जल्द कम करने की आवश्यकता है, 'जेनेरिक' दवाएं एवं अन्य दवाओं के साथ मिलाकर इसको बनाने की भी जरुरत है जिससे कि भारत जैसे देशों में यह दवा काला अज़ार के उपचार के लिए प्रथम इलाज का विकल्प हो" कहना है गारेथ बैरेट का।
'सरहद-रहित चिकित्सकों' (मेडिसिन्स सांस फ्रंटइर्स - एम्.एस.ऍफ़) इस सत्य का स्वागत करता है कि काला अज़ार पर अंतर्राष्ट्रीय अधिवेशन भारत में संपन्न हो रहा है, और भारत से अपील करता है कि वोह काला अज़ार की रोकधाम के लिए स्वास्थ्य प्रणाली को सशक्त बनाने का वादा करे, और जो लोग समाज में हाशिये पर रहते हैं और काला अज़ार से सबसे अधिक संक्रमित हो सकते हैं, उन तक काला अजार की जांच एवं उपचार सेवाएँ उपलब्ध कराये।
'सरहद-रहित चिकित्सकों' (मेडिसिन्स सांस फ्रंटइर्स - एम्.एस.ऍफ़) एक अंतर्राष्ट्रीय संस्थान है, जो भारत में १९९९ से कार्यरत है। बिहार में हाजीपुर रेफेरल अस्पताल में, एम्.एस.ऍफ़ काला अज़ार की जांच और उपचार सेवाएँ लोगों को प्रदान कर रहा है। जुलाई २००७ से एम्.एस.ऍफ़ ने ६,५०० से भी अधिक लोगों को काला अज़ार की जांच सेवाएँ उपलब्ध करायी हैं, और इनमें से जिन २,५०० लोगों को काला अज़ार संक्रमण था, उनको 'लिपोसोमल अम्फोतेरिसिन बी' से उपचार उपलब्ध कराया है।