जीवन अपनाइए, तम्बाकू छोडिये

                                        जीवन अपनाइए, तम्बाकू छोडिये

 विश्व स्वास्थ्य संगठन इस वर्ष विश्व तम्बाकू निषेध दिवस २०१०, 'जेंडर एवं तम्बाकू: महिलाओं को निशाने पर रख कर होने वाली तम्बाकू मार्केटिंग' के विषय वस्तु पर मना रहा है. इसका मुख्य उद्देश्य है महिलाओं एवं किशोरियों पर केन्द्रित तम्बाकू की दुकानदारी के कुप्रभावों की ओर सबका ध्यान आकर्षित करना. महिलाओं में तम्बाकू उपभोग के संक्रमण को रोकना राष्ट्र स्वास्थ्य के हित में अति आवश्यक है.

इस विषय पर हाल ही में हांगकांग निवासी एवं वर्ल्ड लंग फ़ौंडेशन की वरिष्ठ सलाहकार प्रोफ़ेसर जूडिथ लोंगस्टाफ मैकाय से मेरी बातचीत हुई. प्रोफ़ेसर जूडिथ को उनके तम्बाकू उन्मूलन प्रयासों के लिए अनेक अंतर्राष्ट्रीय पुरुस्कारों से अलंकृत किया गया है. टाइम मैगजीन के अनुसार, तम्बाकू उद्योग उनको विश्व के तीन सबसे खतरनाक व्यक्तियों में से एक मानता रहा है. उनके अनुसार इस वर्ष तम्बाकू निषेध दिवस कि विषय वस्तु अत्यंत सामयिक है, क्योंकि महिलायें सभी स्वास्थ्य योजनाओं का अभिन्न अंग हैं. जूडिथ ने इस बात पर खेद प्रकट किया कि वर्षों से तम्बाकू उद्योग महिलाओं एवं युवाओं को अपने सुअवसरों का लक्ष्य बना रहा है, खास तौर से अब, जब उसे तम्बाकू सेवन के लिए नए उपभोक्ताओं की तलाश है, क्योंकि उसके वर्तमान उपभोक्ताओं में से पचास प्रतिशत तम्बाकू जनित रोगों का शिकार होकर असामयिक मृत्यु को प्राप्त हो जायेंगे. विश्व के एक अरब धूम्रपानियों में २०% महिलायें ही हैं. किशोरियों में तम्बाकू का उपयोग बढ़ता ही जा रहा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन कि एक नवीन रिपोर्ट के अनुसार, तम्बाकू विज्ञापन कम उम्र कि लड़कियों को ही अपने दुकानदारी हथकंडों  निशाना बना रहे हैं. युवाओं में धूम्रपान कि दर तथा तम्बाकू कंपनियों द्वारा अपने बिक्री प्रचार पर किये गए व्यय में परस्पर गहरा सम्बन्ध है.

    उन्होंने बताया कि वेस्ट पेसिफिक रीजन में केवल ५% महिलायें धूम्रपान करती हैं, जबकि इस क्षेत्र के पुरुषों में यह औसत ६०% है. २५ साल पहले ऐसा पूर्वानुमान था कि एशिया महाद्वीप में  सिगरेट पीने वाली महिलाओं कि संख्या में वृद्धि अवश्याम्भी है. इस अनुमान के मुख्य कारण थे तम्बाकू उद्योग द्वारा महिला केन्द्रित आक्रामक विज्ञापन प्रचार; महिलाओं की बढ़ती हुई आर्थिक स्वतंत्रता; एवं अभिभावकों/शिक्षकों/ माता पिता का उन पर ढीला होता हुआ अंकुश.
    परन्तु सौभाग्य से ऐसा नहीं हुआ. फिर भी हमें वर्त्तमान में धूम्रपानी महिलाओं की कम संख्या को लेकर काफी सजग रहने की आवश्यकता है. क्योंकि स्थिति कभी भी विस्फोटक हो सकती है. कुछ नवीन अध्ययनों ने इस बात की पुष्टि कि है कि नवयुवतियों में सिगरेट पीने की ललक बढ़ रही है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार १५१ देशों से एकत्रित आंकड़े बताते हैं कि ७% किशोरियां सिगरेट पीती हैं, जबकि किशोरों में यह प्रतिशत १२% है. इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सिगरेट कम्पनियां नए नए तरीकों से युवा लड़कियों को हल्की/ मेन्थाल युक्त/निकोटिन रहित सिगरेटों का लालच देकर लुभा  रही हैं. अपने हांगकांग प्रवास में मैंने पहली बार नवयुवतियों को सडकों पर स्लिम सिगरेट के कश लगाते देखा. हालाँकि हांगकांग में, सार्वजनिक स्थलों पर धूम्रपान निषेधी कठोर नियम हैं, तथा महिलाओं में सिगरेट पीने का प्रतिशत ४% है. हांगकांग में  १९८७ से सभी प्रकार की खाने वाली तम्बाकू के आयात/ उत्पादन/ विक्रय पर भी पूर्ण निषेध है.

    भारत में, कतिपय सामाजिक बंधनों के कारण, सामान्यत: महिलायें खुले आम धूम्रपान कम ही करती हैं. परन्तु पार्टियों में अथवा दोस्तों के साथ छुप कर पीने में उन्हें कोई संकोच नहीं होता. भारत में सिगरेट पीने वाली महिलाओं का प्रतिशत, अन्य देशों के मुकाबले भले ही कम हो, परन्तु किसी न किसी प्रकार की खाने वाली तम्बाकू का प्रयोग ११% से भी अधिक महिलायें करती हैं. गुटखा, मावा, गुल, मिश्री, पान मसाला, आदि का प्रयोग धड़ल्ले से हो रहा है.हालाँकि तम्बाकू कम्पनियाँ  इन सभी को मुख सुवास के रूप में दर्शाती हैं, परन्तु ये सिगरेट के समान ही  अत्यधिक व्यसनकारी एवं हानिकारक हैं. पान मसाला एवं गुटखा सेवन महिलाओं समेत सभी वर्ग एवं आयु के लोगों में  अत्यधिक लोकप्रिय है. बच्चों  से लेकर बूढों तक, अमीर से लेकर गरीब तक, सभी का यह प्रिय पदार्थ है, और स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक भी. डॉक्टरों के अनुसार, गुटखा सेवन के कारण भारत में मुख के कैंसर के रोगियों की संख्या लगातार बढती जा रही है.

    आजकल, दिल्ली, मुंबई जैसे महानगरों हुक्का पीने का प्रचलन भी जोर पकड़ रहा है, विशेषकर युवा वर्ग में. हुक्का बार अथवा लाउंज में जा कर अनेक प्रकार के मसालेदार सुगन्धित हुक्कों के कश खींचना आधुनिकता एवं विलासिता का प्रतीक माना जाने लगा है. स्कूली बच्चे भी इस सनक के शिकार हैं. हुक्का पीने वालों का मानना है कि यह हानिकारक नहीं है क्योंकि इसमें तम्बाकू पानी में घुल जाने के कारण उसमें निकोटिन की मात्रा बहुत ही कम होती है. परन्तु यह धारणा बिलकुल गलत है. हुक्का पीने से शरीर में कार्बन मोनोक्साईड नामक ज़हरीली गैस की मात्रा का स्तर बहुत बढ़ जाता है जो श्वास सम्बन्धी एवं अन्य घातक बीमारियों को जन्म देता है.

    डा. जूडिथ इस बात से भी चिंतित हैं कि महिलायें न केवल तम्बाकू कंपनियों के लुभावने परन्तु भ्रामक विज्ञापनों की शिकार हैं, वे अपरोक्ष धूम्रपान से भी त्रसित हैं. एक रूढ़ीवादी समाज का अंग होने के कारण, वे (विशेषकर निम्न/अशिक्षित वर्ग की महिलायें) प्राय: परिवार के सिगरेट प्रेमी सदस्यों को धूम्रपान करने से रोक नहीं पाती हैं. इस प्रकार वे स्वयं सिगरेट/तम्बाकू उपभोग न करने पर भी सेकण्ड हैण्ड स्मोक के खतरों का शिकार होती हैं.

    अत: यह नितांत आवश्यक है कि महिलायों एवं किशोरियों के स्वास्थ्य की रक्षा हेतु, उनमें सिगरेट एवं अन्य प्रकार के तम्बाकू उपभोग की रोकथाम के लिए उचित कदम उठाये जाएँ. इसके लिए स्कूलों में ऐसे जागरूकता अभियान चलाये जाने चाहिए जो अन्य सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों से जुड़े हुए हों. तम्बाकू निषेध 'एकल स्कूल' कार्यक्रम सफल नहीं हो सकते. यह देखा गया है कि बच्चों को सिगरेट/ तम्बाकू से होने वाले कैंसर आदि रोगों का भय दिखाना कारगर नहीं होता है. यह बात तो वे जानते ही हैं. आवश्यकता है उन्हें सिगरेट कंपनियों द्वारा पोषित भ्रामक विज्ञापनों के जाल से बचाने की. उन्हें यह बताना आवश्यक है कि सिगरेट पीना 'कूल' या 'ट्रेंडी' नही है, वरन एक भयानक आदत है. सिगरेट कम्पनियाँ अपने विज्ञापनों के ज़रिये युवाओं को यह सन्देश देती हैं कि सिगरेट पीना मुक्ति/आज़ादी का द्योतक है, जबकि वास्तव में यह गुलामी की निशानी है. ये कम्पनियां लाखों करोड़ों रुपये खर्च करके युवाओं को कठपुतली की तरह अपने इशारों पर नचाने में लगी हुई हैं. हम सभी को इसकी काट करनी होगी. बच्चों को यह बताना ज़रूरी है कि वास्तविक स्वंत्रतता सिगरेट पीने में नहीं, वरन जीवन में सही विकल्प चुनने में है; वास्तविक शौर्य सुट्टा लगाने में नहीं बल्कि अपनी दोस्ती बरक़रार रखते हुए, दोस्तों की सिगरेट पीने की गलत सलाह को न मानने में है.

    तम्बाकू निषेध कार्यक्रम तभी सफल हो सकते हैं जब तम्बाकू पदार्थों का क्रय मूल्य इतना बढ़ा दिया जाय कि वो आम आदमी, विशेषकर अवयस्कों, की पँहुच से बाहर हो जाय. इसके अलावा, सरकारी स्तर पर न केवल तम्बाकू विरोधी कड़े क़ानून बनाना आवश्यक है, वरन उनका कठोरता से परिपालन करना भी. भारत सरकार ने कानून तो बहुत अच्छे बनाए हैं, परन्तु उनका कार्यान्वन नहीं हो रहा है. उदाहरण के लिए अवयस्क बच्चों को (एवं उनके द्वारा) तम्बाकू पदार्थ बेचना कानूनन अपराध है. परन्तु इसका खुले आम उल्लंघन हो रहा है. इससे बच्चों के मन पर भी यही प्रभाव पड़ता है कि क़ानून की अवमानना करना कोई बुरी बात नहीं है.

    हम सभी महिलाओं को तम्बाकू के विरुद्ध छिड़े इस युद्ध में सम्मिलित होकर तम्बाकू उद्योग के घातक सम्मोहनों का बहिष्कार करना होगा. हमें न केवल अपनी भावी पीढ़ी को सिगरेट कंपनियों के विज्ञापनी जाल से बचाना होगा, वरन स्वयं भी तम्बाकू पदार्थों का बहिष्कार करके उनके समक्ष अनुकरणीय उदाहरण रखने होंगे. केवल उपदेश देने से काम नहीं चलेगा.
   

शोभा शुक्ला





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