लोकपाल बिल का विरोध करना राजनीतिज्ञ बंद करें

[English] जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय (उत्तर प्रदेश) एवं लोक राजनीति मंच ने मांग की है कि लोकपाल बिल का विरोध करना राजनीतिज्ञ बंद करें क्योंकि इस बिल से भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा, प्रशासन व्यवस्था में जवाबदेही बढ़ेगी एवं देश की राजनीति का चरित्र भी बदलेगा। मग्सेसे पुरुस्कार से सम्मानित वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता डॉ संदीप पाण्डेय ने कहा कि जिस दिन से लोकपाल बिल के मसौदा तैयार करने की समिति का गठन हुआ है, तब से ही इस समिति में जनता की ओर से आमंत्रित सदस्यों पर आरोप मढ़े जा रहे हैं. ऊपर से लगता है कि आरोप लगाने वाले लोग राजनीतिज्ञ हैं, परन्तु यह भी संभव है कि परदे के पीछे से दफ्तरशाह अधिकारी इसको पूरा समर्थन प्रदान कर रहे हों.

डॉ संदीप पाण्डेय ने कहा कि पहले कपिल सिबल ने लोकपाल बिल का उपहास किया जब उन्होंने कहा कि इससे हर बच्चे को शिक्षा और हर नागरिक को पीने का पानी तो नहीं मिल जायेगा. अब सिबल से यह पूछना चाहिए कि मानव संसाधन विकास मंत्री होने के नाते,  क्या यह उनकी जिम्मेदारी नहीं थी कि वें यह सुनिश्चित करें कि हर बच्चे को शिक्षा मिले? उन्होंने शिक्षा अधिकार आधिनियम तो पारित करवा दिया पर सामान स्कूल प्रणाली को शिक्षा अधिकार अधिनियम से बाहर रख कर उन्होंने लोगों को धोखा ही दिया है, खासकर कि गरीब लोगों को. जब तक सामान स्कूल प्रणाली नहीं लागू की जाएगी, जिसका तात्पर्य यह है कि हर बच्चा एक ही तरह के स्कूल में शिक्षा प्राप्त करे, शिक्षा अधिकार अधिनियम के क्या मायने हैं?

डॉ संदीप पाण्डेय ने कहा कि दिग्विजय सिंह ने अन्ना हजारे के उपवास पर हुए खर्च पर जांच की मांग की. क्या उन्हें यह नहीं लगता कि २-जी, राष्ट्रमंडल खेल या आदर्श सोसाइटी घोटाला आदि अधिक महत्वपूर्ण और संगीन मुद्दे हैं? यह और बात है कि अरविन्द केजरीवाल के दल ने भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन के आय-व्यय का ब्यौरा सार्वजनिक कर दिया है. यही नहीं, लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करने वाली समिति में जनता से सदस्यों ने अपनी परिसंपत्ति भी घोषित कर दी है. राजनीतिज्ञ तो भ्रष्टाचार पर ही टिके हुए हैं. शयद ही कोई सांसद मिले जिसने चुनाव आयोग द्वारा तय की हुई चुनाव खर्चा सीमा (२५ लाख रूपये) में ही चुनाव लड़ा हो. इस तरह के भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के लिये ही लोकपाल बिल आवश्यक है.

डॉ संदीप पाण्डेय ने कहा कि अमर सिंह जिस सी.डी. की बात कर रहे हैं, वो सिर्फ शरारत है. यह तो कल्पना से परे है कि जिस प्रशांत और शांति भूषण ने सुप्रीम कोर्ट के १५ में से आधे मुख्य न्यायाधीशों को भ्रष्ट करार किया हो, वो किसी न्यायाधीश को प्रभावित करने की कोशिश करें. अमर सिंह एक ऐसे राजनेता हैं जो अपना सन्दर्भ खो चुके हैं. उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में आम लोगों से जुड़ा एक भी मुद्दा नहीं उठाया है, जब कि प्रशांत और शांति भूषण ने बिना कोई फीस लिये, अनेक जनहित में मुद्दों को उठाया है. चूँकि इस सी.डी. विवाद के पीछे अमर सिंह हैं, इसीलिए इसको संजीदगी से नहीं लेना चाहिए.

डॉ संदीप पाण्डेय ने कहा कि दिग्विजय सिंह ने न्यायाधीश संतोष हेगड़े पर टिपण्णी की है कि कर्णाटक में वो प्रभावशील लोकायुक्त नहीं रहे हैं. दिग्विजय सिंह ने कहा कि यदि अन्ना हजारे उत्तर प्रदेश में मायावती के भ्रष्टाचार के विरोध में अभियान छेड़ेंगे तब उनकी पार्टी उनका समर्थन करेगी. लगता है दिग्विजय सिंह अपनी पार्टी के लोगों के अलावा सबके विरोध में कारवाई चाहते हैं और सबकी इमानदारी को परखना चाहते हैं.

डॉ संदीप पाण्डेय ने कहा कि मनमोहन सिंह ने दफ्तरशाह अधिकारियों को यही सिद्धांत बताया है कि वें अपने भ्रष्ट सहकर्मियों का बहिष्कार करें. परन्तु यह सुझाव मनमोहन सिंह अपने ऊपर नहीं लागू करते. यदि उन्होंने अपनी पार्टी में भ्रष्ट सदस्यों और मंत्रियों का बहिष्कार किया होता तो स्थिति इतनी गंभीर नहीं होती.

डॉ संदीप पाण्डेय ने कहा कि एक प्रभावकारी और मजबूत लोकपाल बिल के विचार से सभी राजनीतिज्ञ परेशान है क्योंकि यह उनकी सबसे बड़ी कमजोरी पर चोट कर रहा है. यदि कल को एक मजबूत कारगर लोकपाल बिल आ गया तो इन राजनीतिज्ञों का राजनीति में रहना मुश्किल हो जायेगा. इसीलिए यह सब इतने घबरा रहे हैं. और यही वजह है कि उनके पीछे की उद्योग एवं दफ्तार्शाहों की ताकत पूरा प्रयास कर रही है कि लोकपाल  बिल का मसौदा तैयार करने की प्रक्रिया खंडित हो जाये.

डॉ संदीप पाण्डेय ने कहा कि लोकपाल बिल सिर्फ भ्रष्टाचार को ही नहीं रोकेगा बल्कि इस देश की राजनीतिक चरित्र को ही बदल कर रख देगा. हम लोग, धनाढ्य लोगों के बजाय जमीन से जुड़े हुए लोगों को मुख्यधार की राजनीति में देखेंगे जो अपनी सीमित आये में ही जीवन-यापन कर रहे होंगे और अपनी राजनीति भी पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ करते होंगे. ऐसे लोगों पर अनुचित दबाव बनाना, लुभाना आदि असंभव होगा. इसीलिए उद्योग एवं दफ्तरशाह भी राजनीतिज्ञों के साथ बहुत चिंतित हैं.

जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय (उत्तर प्रदेश) एवं लोक राजनीति मंच द्वारा जारी पत्र पर अनेक हस्ताक्षर हैं जिनमें अलोक अगरवाल, जीपी सिंह, मधुरेश कुमार, संदीप पाण्डेय, अजित झा, अरुंधती धुरु, एस.एर.दारापुरी, गौतम बंदोपाध्याय, कविता श्रीवास्तव, महेश कुमार, अधिवक्ता रवि किरण जैन, अधिवक्ता मोहम्मद शोएब, अरविन्द मूर्ति, केशव चाँद, आर सुनीलम, जयशंकर पाण्डेय, नन्दलाल मास्टर, मनीष गुप्ता, राजीव यादव, शाहनवाज़ आलम, आदि प्रमुख हैं.

बाबी रमाकांत - सी.एन.एस

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