यह चुनाव निष्पक्ष कहां हैं ?

उ.प्र. समेत पांच राज्यों में विधान सभा चुनाव होने वाले हैं। प्रचार जोर पकड़ने लगा है। सभी दल व उम्मीदवार मतदाताओं को प्रभावित करने में लगे हुए हैं। दूसरी तरफ चुनाव आयोग एक शक्ति के रूप में उभरा है जो चुनावों को निष्पक्ष कराने की कोशिश करता है। चुनाव आयोग की सख्ती का काफी फर्क भी पड़ा है। काफी फिजूल खर्ची और अनैतिक तरीकों से मतदाताओं को प्रभावित करने पर रोक लगी है। किन्तु फिर भी कुछ मुद्दे हैं जिनपर विचार किया जाना जरूरी है।

विधान सभा चुनाव में प्रत्येक उम्मीदवार के प्रचार पर खर्च की सीमा रु. 16 लाख तय की गई है। किन्तु राजनीतिक दलों के प्रचार पर कोई सीमा नहीं तय है। दल के मद से जो अखबारों में विज्ञापन दिए जाएंगे या प्रचार के दौरान हेलीकॉप्टरों अथवा चार्टर्ड  हवाई जहाजों का जो इस्तेमाल किया जाएगा इन पर कोई अंकुश नहीं है। यानी कि बड़े दलों, जिनके पास वैसे भी पैसों की कोई कमी नहीं और जो पहले से ही मजबूत स्थिति में हैं के खर्च पर तो कोई रोक है ही नहीं। खर्च की सीमा सिर्फ छोटे दलों या निर्दलीय उम्मीदवारों के लिए है। कायदे से बड़े दलों का खर्च उसके जितने उम्मीदवार खड़े हैं उनमें बराबर बराबर जुड़ना चाहिए या फिर उन उम्मीदवारों के खर्च में जुड़ना चाहिए जिन्होंने दल की किसी खास सेवा का उपयोग किया, जैसे कि उनके यहां यदि दल का कोई बड़ा नेता हेलीकॉप्टर से प्रचार के लिए आया तो उस यात्रा का हेलिकॉप्टर खर्च उस उम्मीदवार के चुनाव खर्च में जुड़ना चाहिए।

गैर मान्यता प्राप्त दलों के उम्मीदवारों या फिर निर्दलीय उम्मीदवारों को अपना चुनाव चिन्ह मतदान से करीब 15 दिनों पहले मिलता है जबकि मान्यता प्राप्त दलों को पहले से ही अपना चुनाव चिन्ह मालूम है। यानी कि बड़े दलों को यहां भी लाभ है। वे अपना प्रचार कई दिनों या महीनों से कर रहे होते हैं जबकि छोटा उम्मीदवार सिर्फ पंद्रह दिन पहले ही अपना चिन्ह जान पाता है। चूंकि स्थापित दलों की तुलना में उसके पास संसाधनों का वैसे भी अभाव है, वह विधान सभा क्षेत्र की विशालता को देखते हुए किसी भी सूरत में अपने चुनाव चिन्ह से सभी मतदाताओं को अवगत नहीं करा पाएगा। होना तो यह चाहिए कि सभी उम्मीदवारों को प्रचार के लिए समान अवधि मिलनी चाहिए। या तो बड़े दलों को अपने चुनाव चिन्ह के प्रचार अवधि के पहले प्रचार पर कड़ी रोक लगनी चाहिए अन्यथा उन्हें हरेक चुनाव के लिए एक नया चिन्ह उसी दिन मिलना चाहिए जिस दिन बाकी लोगों को मिलता है।

इस पर विचार किया जाना जरूरी है कि हरेक चुनाव के लिए प्रत्येक दल को नया चिन्ह क्यों नहीं दिया जा सकता? इससे स्थाई चिन्हों को मूर्तियों में तब्दील करने की प्रवृत्ति पर भी रोक लगेगी।

चुनाव आयोग ने उ.प्र. में ठीक ही वर्तमान सरकार के कार्यकाल में बनी सुश्री मायावती की मूर्तियों व बहुजन समाज पार्टी के चुनाव चिन्ह हाथी की मूर्तियों को चुनाव अवधि में ढकने का निर्देश दिया। किन्तु मूर्तियों को ढकने का खर्च राजनीतिक दल से लिया जाना चाहिए था जिसको इन मूर्तियों का लाभ मिलने वाला है न कि प्रशासन से। यह तो जनता के साथ सरासर अन्याय है। पहले तो मूर्तियों व पार्क बनाने का बोझ उसके ऊपर और अब मूर्तियों को ढकने का खर्च भी जनता ही वहन करे। क्या अब हरेक चुनाव में मूर्तियों को ढकने का भी ठेका दिया जाएगा?

इस बार उ.प्र. चुनावों में निर्वाचन आयोग ने तय किया है कि उम्मीदवार के खर्च पर वह एक छाया रजिस्टर भी बनाएगी। यानी कि उम्मीदवार द्वारा अपना चुनाव खर्च दिए जाने के अलावा एक आयोग की तरफ से भी खर्च का अनुमान रखा जाएगा। लेकिन इसका तभी मतलब है जब उम्मीदवार और आयोग दोनों द्वारा जो हिसाब-किताब रखा जा रहा है उसकी जानकारी जनता तक पहुंचे। यदि जनता को यह जानकारी उपलब्ध रहेगी तो वह उम्मीदवार द्वारा दिए जा रहे हिसाब की जांच कर सकती है और यदि उसमें कोई गड़बड़ी पायी जाती है तो उसकी शिकायत की जा सकती है। दूसरी तरफ यदि आयोग के अनुमान को भी सार्वजनिक किया जाता है तो पहला काम तो यही होगा कि उम्मीदवार द्वारा जमा किए गए खर्च से उसका मिलान किया जाए और कोई बड़ी गड़बड़ी, यदि है तो, प्रकाश में लाई जाए। यदि आयोग जानकारी के अभाव में किन्हीं खर्चों को नहीं जोड़ता है तो जनता उसको जुड़वा सकती है। अतः हिसाब-किताब में आयोग की ओर से एक पारदर्शी व्यवस्था बनाने से चुनाव खर्च को सीमा के अंदर रखे जाने में जनता की सीधे सहभागिता सुनिश्चित होगी।

उम्मीदवार अब काफी ईमानदारी के साथ अपनी सम्पत्ति व आय का ब्यौरा तो सार्वजनिक करने लगे हैं लेकिन एक चुनाव व अगले चुनाव के बीच की अवधि में उनकी आय में जो वृद्धि हुई है इस पर सवाल उठाने की प्रक्रिया अभी तय नहीं हुई है। यदि उम्मीदवार की सम्पत्ति या आय में ऐसी वृद्धि हुई है जो उनके ज्ञात आय के स्रोतों से जायज नहीं ठहराई जा सकती तो उसकी जांच की प्रकिया स्वतः चालू हो जानी चाहिए अथवा आयकर विभाग को तुरंत सक्रिय हो जाना चाहिए। इसके बिना सिर्फ सम्पत्ति या आय की जानकारी को सार्वजनिक करने का क्या अर्थ है? जन प्रतिनिधि बनने के बाद भ्रष्टाचार के पैसे से सम्पत्ति जुटाने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना जरूरी है। इसके लिए इस बात की नियमित जांच होती रहनी चाहिए कि किसी भी जन प्रतिनिधि या सरकारी कर्मचारी/अधिकारी की सम्पत्ति उसकी आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक न हो।

डॉ. संदीप पाण्डेय

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