[अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2017] गैर-बराबरी और महिला हिंसा पर पर्दा न डालें, उसको समाप्त करें!

डॉ संदीप पाण्डेय, सीएनएस वरिष्ठ स्तंभकार और मग्सेसे पुरुस्कार से सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता
महिला दिवस के पहले भारत ने एक उपलब्धि हासिल की। पहली बार सिर्फ महिला कर्मियों द्वारा संचालित एक एअर-इण्डिया वायुयान यात्रियों को दिल्ली से अमरीका के सैन-फ्रांसिसको तक ले गया और फिर वापस लाया। इसमें वायुयान के अंदर ही नहीं बाहर भी अभियंता आदि कर्मी सभी महिलाएं थीं। क्या ये भारत में महिला सशक्तिकरण का प्रतीक है? 

एअर-इण्डिया खुद ही अब कुछ सीटें महिलाओं के लिए अलग से रखता है क्यों कि वर्ष के शुरू में महिलाओं के साथ हवाई यात्रा के दौरान छेड़-छाड़ की घटनाएं सामने आईं थीं। देखा जाए तो महिलाओं के खिलाफ हिंसा की जो घटनाएं देश में घटती हैं उसके आधार पर हम नहीं कह सकते कि देश में महिलाएं सुरक्षित हैं।

भारत में हरेक 3 मिनट में किसी महिला के साथ हिंसा की घटना होती है औा हरेक 9 मिनट में हिंसा करने वाला पति या पति के परिवार का ही कोई व्यक्ति होता है। दहेज के कारण मारी जाने वाली महिलाओं की संख्या प्रति वर्ष आठ हजार से ऊपर होती है। प्रति वर्ष करीब पच्चीस हजार बलात्कार की घटनाएं होती हैं जबकि बलात्कार की सारी घटनाएं दर्ज नहीं की जाती हैं। बलात्कार के इरादे से किए गए हमले तो इसके करीब दोगुने होते हैं। बलात्कार के जो मामले पुलिस दर्ज करती भी है तो उनमें से आरोपियों को सजा बहुत कम मामलों में मिल पाती है। पति या पति के परिवार द्वारा महिला के खिलाफ हिंसा के एक लाख से ज्यादा मामले होते हैं। चालीस हजार के करीब महिलाओं का प्रति वर्ष अपहरण हो जाता है। 

इसके अलावा तेजाब फेंकना, वाल विवाह, वेश्यावृत्ति में ढकेलना, बच्ची को कम उम्र में ही मारने की घटनाएं भी घटती हैं। यदि लड़की अपनी मर्जी से शादी कर ले, खासकर अपनी जाति या धर्म के बाहर, तो लड़की के अपने पिता, भाई, परिवार-समुदाय के अन्य पुरूष उसको मारने में अपने सम्मान की रक्षा समझते हैं। डॉ राम मनोहर लोहिया ने अपनी सप्त क्रांति की अवधारणा में नर-नारी समानता के मुद्दे को सबसे अधिक प्राथमिकता दी थी। समाज की सभी किस्म की गैर-बराबरियों में सबसे कठिन वे इसे ही मानते थे।

हमारी संसद और विधान सभा में 33 प्रतिशत महिलाओं के आरक्षण पर अभी तक राजनीतिक दलों में सहमति नहीं बन पा रही है। हलांकि पंचायत चुनावों में यह आरक्षण लागू किया गया है और कई जगह तो 33 प्रतिशत से ज्यादा महिलाएं निर्वाचित हो कर आ रही हैं। कायदे से तो महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण होना चाहिए। विद्यालय स्तर की शिक्षा में तो लड़कियों की संख्या निश्चित रूप से बढ़ी है लेकिन उच्च शिक्षा में अभी उनकी संख्या काफी कम है जिस वजह से नौकरियों में भी उनकी संख्या कम ही है। इसी तरह अन्य क्षेत्रों में जैसे पत्रकारिता, न्यायपालिका, आदि में भी उनकी संख्या में बढ़ोतरी आवश्यक है। किंतु सबसे महत्वपूर्ण निर्णय लेने वाले पदों पर महिलाओं का होना जरूरी है। जब महिलाएं ऊंचे पदों पर पहुंचेंगी और महिलाओं को ध्यान में रखते हुए निर्णय लिए जाएंगे तब पुरुष-महिला के बीच का अंतर खत्म होने लगेगा। अभी एक ही काम के लिए महिला व पुरुष की आय में भी अंतर होता है। पुरुष प्रधान समाज इस सोच से ग्रसित है कि महिला की शारीरिक ही नहीं मानसिक क्षमता भी पुरुष से कम होती है। कई महिलाओं के लिए आरक्षित निर्वाचित पदों पर उनके परिवार के पति ही काम करते देखे जाते हैं।

भारत में महिला-पुरूष अनुपात 940 है जबकि बंग्लादेश में ये 997 है। अन्य दक्षिण एशियाई देशों का भी अनुपात हमसे अच्छा ही है। इसका साफ मतलब है कि भारत में ज्यादा कन्या भ्रूण हत्याएं हो रही हैं। भारतीय मानसिकता अभी पुत्र की आशा से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाई है। भारत की महिला साक्षरता दर बंग्लादेश की महिला साक्षरता दर से कम है हलांकि पुरूष साक्षरता दर में भारत आगे है। बंग्लादेश में कामकाजी महिलाओं का प्रतिशत 57 प्रतिशत है जबकि भारत में वह सिर्फ 29 प्रतिशत है। बंग्लादेश की संसद में महिलाओं को प्रतिशत भारत की संसद में महिलाओं के प्रतिशत से ज्यादा है। बच्चों के टीकाकरण की स्थिति बंग्लादेश में भारत से कहीं ज्यादा बेहतर है। बंग्लादेश में ऐसे बच्चों का प्रतिशत 82 है जबकि भारत में वह सिर्फ 44 है। भारत में करीब 55 प्रतिशत लोग खुले में शौच करने जा रहे हैं जबकि बंग्लादेश में यह प्रतिशत मात्र 8.4 रह गया है। खुले में शौच का सीधा सम्बंध महिला के स्वास्थ्य से है। बंग्लादेश में प्रति परिवार बच्चों की संख्या 2.2 रह गई है जबकि भारत में यह अभी भी 2.4 है। यह बात उल्लेखनीय है कि बंग्लादेश ने जहां मुस्लिम बहुसंख्यक आबादी है न सिर्फ अपनी महिलाओं का शिक्षा और स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से आर्थिक सशक्तिकरण किया है बल्कि अपनी आबादी पर भी नियंत्रण पा लिया है जबकि आम धारणा यह है कि मुस्लिम परिवारों में महिलाओं पर काफी पाबंदियां होती हैं और उनके बच्चों की संख्या ज्यादा होती है। बंग्लादेश के उदाहरण से समझ में आता है कि परिवार में बच्चों की संख्या का ताल्लुक किसी धर्म से न होकर महिलाओं के विकास से होता है। ज्यादा पढ़ी-लिखी व कामकाजी महिलाओं के बच्चों की संख्या अपने आप ही कम होगी। इसलिए विकास ही सबसे बढ़िया जनसंख्या नियंत्रक का काम कर सकता है।

इस तरह हम देखते हैं कि हमारे देश की तुलना में बंग्लादेश ने अपनी महिलाओं का सशक्तिकरण करके अपने सामाजिक मानकों को बेहतर बनाया है। भारत से कम प्रति व्यक्ति आय और सकल घरेलू उत्पाद की विकास दर होते हुए भी बंग्लादेश में विकास का लाभ आम नागरिकों, खासकर महिलाओं, तक पहुंचा है। बल्कि बंग्लादेश ने महिलाओं के बल पर ही विकास किया है।

हम अपने विकास हेतु अमीर व विकसित देशों की ओर देखते हैं। अनके विकास के तरीकों में तमाम दोष हैं, जैसे प्रदूषण की समस्या का कोई निदान नहीं और जलवायु परिवर्तन की स्थिति दिनोंदिन विकट होती जा रही है। हमें शायद ऐसे गरीब देशों से भी सीखने की जरूरत है जिन्होंने बुद्धिमानी पूर्वक अपने नागरिकों की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा कर उनका बेहतर ख्याल रखा है।

सिर्फ प्रतीकात्मक रूप से महिलाओं की उपलब्धियों को दिखा कर यह भ्रम पैदा करना कि हमारे समाज में महिलाओं को अब समान अवसर मिल रहे हैं अपने समाज में मौजूद भयंकर गैर-बराबरी और महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा पर पर्दा डालने जैसी बात होगी।

डॉ संदीप पाण्डेय, सीएनएस वरिष्ठ स्तंभकार और मग्सेसे पुरुस्कार से सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता
8 मार्च 2017
(डॉ संदीप पाण्डेय, मग्सेसे पुरुस्कार से सम्मानित वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता हैं. वर्त्तमान में वे आईआईटी गांधीनगर में इंजीनियरिंग पढ़ा रहे हैं और सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी हैं. वे आईआईटी-कानपुर और आईआईटी-बीएचयू समेत अनेक प्रतिष्ठित संस्थानों में आचार्य रहे हैं. डॉ पाण्डेय जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय और आशा परिवार के भी नेत्रित्व कर रहे हैं. ईमेल: ashaashram@yahoo.com | ट्विटर )

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