इन अधिकार-विरोधी अभियानों को आगे बढ़ाने वाली ताकतें बेहद सुनियोजित ढंग से ‘राष्ट्रीय संप्रभुता’, ‘पारिवारिक मूल्य’, ‘संस्कृति’ और ‘धर्म’ जैसे शब्दों की आड़ में अपने एजेंडे को बढ़ा रही हैं। ये शब्द सुनने में सहज और स्वीकार्य लगते हैं, लेकिन इनके जरिए महिलाओं की समानता, अपने शरीर पर अधिकार और स्वास्थ्य संबंधी अधिकारों को मजबूत करने वाले कदमों का विरोध या उन्हें कमजोर करने की कोशिश हो रही है।
अधिकार-विरोधी विमर्श अब भेदभाव को ‘वैध’ ठहराने और महिलाओं की स्वायत्तता सीमित करने का औजार बनता जा रहा है। विशेषज्ञों ने कहा कि ‘परिवार की रक्षा’ के नाम पर ऐसे कानूनों और नीतियों के प्रस्ताव सामने आ रहे हैं, जो महिलाओं के अपने शरीर पर अधिकार, प्रजनन संबंधी फैसलों, आर्थिक अधिकारों और विवाह के भीतर समानता को सीमित कर सकते हैं।
यह चिंता हाल ही में आयोजित शी एंड राइट्स के एक सत्र में सामने आई। सत्र का विषय था: "अधिकार-विरोधी दबावों का मुकाबला और स्वास्थ्य एवं जेंडर समानता के मानवाधिकार को कायम रखना।"
अधिकार-विरोधी विमर्श अब भेदभाव को ‘वैध’ ठहराने और महिलाओं की स्वायत्तता सीमित करने का औजार बनता जा रहा है। विशेषज्ञों ने कहा कि ‘परिवार की रक्षा’ के नाम पर ऐसे कानूनों और नीतियों के प्रस्ताव सामने आ रहे हैं, जो महिलाओं के अपने शरीर पर अधिकार, प्रजनन संबंधी फैसलों, आर्थिक अधिकारों और विवाह के भीतर समानता को सीमित कर सकते हैं।
यह चिंता हाल ही में आयोजित शी एंड राइट्स के एक सत्र में सामने आई। सत्र का विषय था: "अधिकार-विरोधी दबावों का मुकाबला और स्वास्थ्य एवं जेंडर समानता के मानवाधिकार को कायम रखना।"
बहस का मूल सवाल यही है: जब ‘परिवार’, ‘परंपरा’ और ‘संप्रभुता’ के नाम पर समानता की ही नई भ्रामक व्याख्या की जाने लगे, तो जेंडर समानता और स्वास्थ्य के अधिकार जैसे बुनियादी मानवाधिकारों की रक्षा कैसे की जाए?
यही बढ़ते अधिकार-विरोधी अभियान की असली चुनौती है। परिवार, जिसे सुरक्षा और संरक्षण का सबसे स्वाभाविक स्थान माना जाता है, उसी के भीतर भेदभाव को ‘वैध’ ठहराने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। दूसरी ओर, संप्रभुता, जिसका अर्थ राष्ट्रों की स्वतंत्रता और स्वायत्तता है, उसे मानवाधिकार मानकों के प्रति जवाबदेही से बचने के तर्क में बदला जा रहा है।
परिवार समानता की पहली पाठशाला हो, असमानता की नहीं
भेदभावपूर्ण प्रथाएं किस तरह धीरे-धीरे ‘सामान्य’ बना दी जाती हैं, इसका एक उदाहरण अफ्रीकी संघ के अफ्रीकी मानव एवं जन अधिकार न्यायालय के रजिस्ट्रार डॉ. रॉबर्ट एनो ने साझा किया।
नैरोबी में एक सम्मेलन के दौरान प्रतिभागियों के सामने कुछ कथन रखे गए और उनसे पूछा गया कि वे तथ्य हैं या कल्पना। एक कथन था कि बिना किसी पक्ष की गलती के तलाक चाहने वाली महिला को अपने पति को आर्थिक मुआवजा देना पड़ता है। दूसरे में कहा गया कि बेटी को भाई की तुलना में विरासत में केवल आधा हिस्सा मिल सकता है और भाई न होने पर संपत्ति पुरुष रिश्तेदारों को मिल सकती है। तीसरे कथन में कहा गया कि विवाह के भीतर पति को बलात्कार के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि पत्नी उसके यौन आग्रह को अस्वीकार नहीं कर सकती।
एनो को लगा कि ये सभी काल्पनिक उदाहरण हैं।
उन्होंने बाद में स्वीकार किया, “मैं गलत था।”
उनके मुताबिक, ये तीनों बातें ऐसी कानूनी व्यवस्थाओं को दर्शाती हैं जो कई देशों में कभी मौजूद रही हैं या अब भी मौजूद हैं। और वे महिलाओं तथा लड़कियों की रोजमर्रा की वास्तविकता का हिस्सा हैं।
यही कारण है कि ‘पारिवारिक मूल्यों’ के अर्थ को लेकर चल रही मौजूदा बहस इतनी महत्वपूर्ण है।
मुसावा नमक संस्था की रेहमा नामुकोसे ने कहा कि ‘परिवार’ की आड़ में बाल विवाह और महिला जननांग विकृति/छेदन (एफजीएम/सी) जैसी हानिकारक प्रथाओं को गलत तरीके से ‘उचित’ ठहराया जा रहा है। इसी आड़ में महिलाओं को बिना वेतन वाले देखभाल कार्य तक सीमित करने, उन्हें संपत्ति और विरासत के अधिकार से वंचित करने तथा परिवार के भीतर पितृसत्तात्मक पुरुष सत्ता को मजबूत करने की कोशिश भी हो रही है।
इसलिए ‘परिवार की रक्षा’ के दावे पर एक बुनियादी सवाल उठना चाहिए - किसके परिवार की रक्षा की जा रही है और किससे?
महिलाओं को कमतर अधिकार देकर परिवार मजबूत नहीं होता। और लड़कियों को शिक्षा से वंचित करके बच्चों की सुरक्षा नहीं की जा सकती।
संप्रभुता भेदभाव का लाइसेंस नहीं
अधिकार-विरोधी अभियान की सबसे बड़ी जहरीली 'ताकत' उसकी धूर्तता है। वह खुद को इस तरह पेश करता है कि पहली नजर में उसे मानवाधिकारों के विरोध के रूप में पहचानना आसान नहीं होता।
इनिशिएटिव फॉर स्ट्रैटेजिक लिटिगेशन इन अफ्रीका (आईएसएलए) ने परिवार और संप्रभुता से जुड़े एक प्रतिगामी अफ्रीकी चार्टर के मसौदे का विश्लेषण करते हुए इसी प्रवृत्ति की ओर इशारा किया है। उसके अनुसार, ‘अधिकारों की भाषा’ ऊपर से बनी रहती है, लेकिन अधिकारों का वास्तविक दायरा भीतर से संकुचित कर दिया जाता है।
इसमें ‘परिवार की रक्षा’ बहिष्कार का आधार बन जाती है, ‘संप्रभुता’ जवाबदेही से बचने का रास्ता और ‘संस्कृति’ तथा ‘मूल्य’ समानता की कानूनी सुरक्षा सीमित करने के औजार।
इसलिए संप्रभुता की बहस अहम है। किसी भी राज्य को अपनी संवैधानिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा करने का अधिकार है। लेकिन संप्रभुता का अर्थ मानवाधिकार संबंधी दायित्वों से मुक्ति नहीं हो सकता।
मुद्दा संप्रभुता को नकारना नहीं है। सवाल यह है कि उसे जवाबदेही से बचने की ढाल बनने से कैसे रोका जाए।
डॉ. एनो के मुताबिक, परंपरा सम्मान की हकदार है, संस्कृति संरक्षण की और धर्म स्वतंत्रता का। लेकिन इनमें से किसी का इस्तेमाल भेदभाव को सही ठहराने या मानव गरिमा को कम करने के लिए नहीं किया जा सकता।
पहले समीक्षा, फिर अनुमोदन
महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ हिंसा समाप्त करने के लिए अफ्रीकी संघ के कन्वेंशन को लेकर चल रही बहस बताती है कि नए कानूनी दस्तावेजों की बारीकी से समीक्षा क्यों जरूरी है।
यह कन्वेंशन फरवरी 2025 में अपनाया गया था। अब तक नौ देशों ने इस पर हस्ताक्षर किए हैं और दो देशों ने इसका अनुमोदन किया है। इसे प्रभावी होने के लिए कम-से-कम 15 देशों के अनुमोदन की जरूरत है।
आईएसएलए की फातू बांतू सलाह का कहना है कि कन्वेंशन के प्रभावी होने से पहले की अवधि का इस्तेमाल जल्दबाजी में अनुमोदन आगे बढ़ाने के बजाय गंभीर समीक्षा के लिए किया जाना चाहिए।
आईएसएलए ने इसीलिए अभियान शुरू करने का आह्वान किया है। इसका मकसद कन्वेंशन को खारिज करना नहीं, बल्कि इतना समय लेना है कि स्वतंत्र और अनुच्छेद-दर-अनुच्छेद कानूनी समीक्षा हो सके, व्यापक स्तर पर परामर्श किया जा सके और इसकी तुलना मौजूदा अफ्रीकी मानवाधिकार मानकों से की जा सके।
संदेश सीधा है - "रुकें, सुनें, समीक्षा करें, मजबूत करें और फिर अनुमोदन करें।"
सलाह के मुताबिक, ऐसी समीक्षा अधिकार-विरोधी कदम नहीं है। इसके उलट, एक मजबूत मानवाधिकार व्यवस्था के लिए यही जरूरी है।
यही कसौटी राष्ट्रीय कानूनों पर भी लागू होनी चाहिए। यदि कोई कानून विवाह, तलाक, विरासत या बच्चों की अभिरक्षा में महिलाओं के साथ भेदभाव करता है, तो उसे चुनौती मिलनी चाहिए। यदि गर्भवती होने के कारण किसी लड़की को स्कूल छोड़ना पड़ता है, तो जिम्मेदारी केवल उस लड़की पर नहीं डाली जा सकती।
और यदि कोई महिला सामाजिक कलंक या किसी और की अनुमति की बाधा के बिना स्वास्थ्य सेवा हासिल नहीं कर सकती, तो कागज पर मौजूद स्वास्थ्य नीति का कोई खास अर्थ नहीं रह जाता।
धर्म, संस्कृति और समुदाय पर किसी का एकाधिकार नहीं
अधिकार-विरोधी विमर्श से निपटने का एक प्रभावी तरीका यह भी है कि धर्म, संस्कृति और परिवार पर उसके समर्थकों के कथित एकाधिकार को चुनौती दी जाए।
मुसावा की वैश्विक निदेशक सामाह हदीद का कहना है कि धर्म का इस्तेमाल महिलाओं पर नियंत्रण और पितृसत्तात्मक व्यवस्था को मजबूत करने के लिए किया जा रहा है। लेकिन इसका जवाब धार्मिक विमर्श से दूरी बनाना नहीं, बल्कि उसे फिर से अपने पक्ष में लेना होना चाहिए।
उनके शब्दों में, रूढ़िवादी आवाजों के लिए धर्म के सवाल पर जगह छोड़ने के बजाय धार्मिक परंपराओं के भीतर से जेंडर न्याय की व्याख्याओं को सामने लाना जरूरी है।
मानवाधिकार समर्थक केवल उन लोगों से बात करके बदलाव नहीं ला सकते जो पहले से उनसे सहमत हैं। डॉ. एनो के मुताबिक स्थायी बदलाव के लिए समुदायों के साथ ईमानदारी से संवाद जरूरी है। यह संवाद अदालतों और सम्मेलन कक्षों तक सीमित नहीं रह सकता। इसे घरों, स्कूलों, पूजा स्थलों, पारंपरिक संस्थाओं और समुदायों तक पहुंचना होगा।
इस प्रक्रिया में पुरुषों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है - महिलाओं की आवाज दबाने या नारीवादी स्थानों पर कब्जा करने के लिए नहीं, बल्कि उन सोच और सामाजिक व्यवस्थाओं को बदलने के लिए जो असमानता को कायम रखती हैं।
"गर्ल्स नॉट ब्राइड्स" की विम्बाई कपुरुरा के मुताबिक, महिलाओं और लड़कियों को बदलाव के केंद्र में रखना जरूरी है, लेकिन समानता के लिए उनके आसपास मौजूद पूरे सामाजिक तंत्र को भी बदलना होगा।
इसलिए अधिकार-विरोधी राजनीति का जवाब कोई दूसरा ध्रुवीकरण पैदा करने वाला नारा नहीं हो सकता। बेहतर जवाब परिवार, संस्कृति और समुदाय की ऐसी परिभाषा है, जिसमें समानता परिवार को कमजोर नहीं, बल्कि अधिक सुरक्षित और न्यायपूर्ण बनाती है।
जमीन पर अधिकारों की असली परीक्षा
एस्वातिनी का विम्बाई कपुरुरा का अनुभव इस बहस को जमीनी संदर्भ देता है। देश ने किशोरियों में गर्भधारण और कम उम्र में मातृत्व को घटाने की दिशा में प्रगति की है। फिर भी ग्रामीण और गरीब समुदायों की लड़कियां अब भी अधिक जोखिम में हैं।
कागजों पर स्वास्थ्य सेवाएं 'उपलब्ध' हैं, लेकिन व्यवहार में उन तक पहुंच सीमित है। गर्भनिरोधक साधनों की जरूरत पूरी न होने की समस्या भी बनी हुई है।
ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि कोई लड़की गर्भवती 'क्यों' हुई। सवाल यह भी होना चाहिए कि क्या उसे सही जानकारी मिली थी? क्या उसके पास स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच थी? क्या उसे ऐसा सहयोग मिला जिससे वह स्कूल में बनी रह सके?
यही तय करेगा कि अधिकार वास्तव में जमीन पर मौजूद हैं या केवल दस्तावेजों में।
क्या लड़की स्कूल में बनी रह सकती है?
क्या युवा महिला बिना सामाजिक कलंक के स्वास्थ्य सेवा हासिल कर सकती है?
क्या यौन उत्पीड़न की शिकायत करने वाली पीड़िता की बात पर विश्वास किया जाता है और उसे सुरक्षा मिलती है?
क्या महिला को पुरुष के बराबर संपत्ति विरासत में मिलती है?
क्या वह अपने शरीर से जुड़े फैसले खुद ले सकती है?
प्रगति की असली कसौटी यही है। केवल कितनी संधियों पर हस्ताक्षर हुए या कितनी घोषणाएं अपनाई गईं, यह अपने आप में पर्याप्त नहीं है।
नीतियों से आगे बढ़ अब क्रियान्वयन की चुनौती
नीतिगत प्रतिबद्धताएं अपने आप जिंदगियां नहीं बदलतीं। ऐसी संधि जिसका क्रियान्वयन नहीं होता, ऐसा न्यायिक फैसला जिसे नजरअंदाज कर दिया जाता है और ऐसी रणनीति जो केवल कागजों पर रह जाती है - इनमें से कोई भी उस महिला की जिंदगी नहीं बदलता जो अस्पताल तक नहीं पहुंच सकती या उस लड़की की स्थिति नहीं बदलता जिसे शिक्षा से वंचित कर दिया जाता है.
विम्बाई कपुरुरा के मुताबिक अब सबसे बड़ी चुनौती क्रियान्वयन और जवाबदेही की है।
उन्होंने यूनिवर्सल पीरियॉडिक रिव्यू (UPR) जैसे तंत्रों को अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं को बजट, स्वास्थ्य सेवाओं और समुदाय स्तर पर वास्तविक बदलाव में बदलने के अवसर के रूप में रेखांकित किया। इसमें उन लोगों पर विशेष ध्यान देना होगा जो अब भी विकास और अधिकारों की मुख्यधारा से बाहर हैं।
समुदाय को मात्र लाभार्थी नहीं, बल्कि बदलाव की प्रक्रिया में बराबर का भागीदार बनाना होगा। विशेषकर कि सबसे वंचित और शोषित समुदाय को.
अधिकार-विरोधी अभियान तब मजबूत होता है जब भेदभाव को ‘सामान्य’ मान लिया जाता है, डर को नीति में बदल दिया जाता है और चुप्पी को सहमति समझ लिया जाता है।
इसका जवाब भी उतना ही स्पष्ट और दृढ़ होना चाहिए - भेदभावपूर्ण कानूनों को चुनौती दी जाए, भ्रामक आख्यानों की असलियत सामने लाई जाए, धर्म और संस्कृति को उन लोगों के कब्जे से वापस लिया जाए जो उनका इस्तेमाल भेदभाव और नियंत्रण के लिए करते हैं और, सबसे महत्वपूर्ण, समुदायों के साथ मिलकर काम किया जाए।
परिवार वह जगह होना चाहिए जहां अधिकारों की शुरुआत होती है, न कि जहां वे खत्म हो जाते हैं।
और संप्रभुता लोकतांत्रिक आत्मनिर्णय की बुनियाद होनी चाहिए- महिलाओं की समानता, गरिमा और स्वतंत्रता से इनकार करने का बहाना नहीं।
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